मैं जब खुद को छूती हूँ शब्दों में,
तो तुम्हारा नाम हर अक्षर में उतर आता है।
मेरे होंठों पर कोई कविता ठहरी है,
जो तुम्हारी साँस से पूरी होती है।
मेरी देह कोई दृश्य नहीं,
एक अनुभूति है —
जहाँ प्रेम की नदी बहती है,
और उसकी हर लहर तुम्हारा स्पर्श माँगती है।
कंधों पर तुम्हारी यादें हैं,
बालों में रात का सन्नाटा,
त्वचा पर तुम्हारी धूप —
धीरे-धीरे उतरती, जैसे कोई प्रणय-प्रार्थना।
मैं सिर्फ स्त्री नहीं, एक गान हूँ,
जिसे तुम्हारी नज़र ने अर्थ दिया है।
मेरी नमी में, मेरी धड़कन में,
तुम्हारा नाम — जैसे कोई दीप,
जो रात के भीतर भी उजाला रखता है।