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मेरे गाँव की नदी (Completed)
अरे कल्लु कहा चल दिया सूरज सर पर है और तू है की बार बार नदी की तरफ जा रहा है सुबह से तीन दफ़ा जा चूका है।
आज क्या तेरा पेट ख़राब है।
मेरे बाबा ने मुझे खेत से नदी की और जाते हुए देख कर कहा।
मैंने कहा हाँ बाबा आज तो सुबह से पेट गड़बड़ हो रहा है क्या करू बार बार लग रही है।
बाबा ने हँसते हुए कहा जा जल्दी करके आ जा और जरा सोच समझ कर खाया कर फिर तो जब खाने को मिलता है तो तबियत से पेल लेता है और आगा पीछा कुछ नहीं सोचता।
मेरी गाण्ड फ़टी जा रही थी और बाबा था की लैक्चर मार रहा था मै जल्दी से नदी के पास पंहुचा और निचे उतरने लगा।
दरअसल हमारे खेत के पास की नदी गर्मियो में सुख जाती थी और उसमे इतना ही पानी बचता था की लोग अपनी गाण्ड धो सके, मै झाड़ियो के बीच जाकर अपनी धोती खोल कर बैठ गया तभी मुझे कुछ आवाज सी सुनाइ दी।
आवाज किसी औरत की थी, लेकिन आह बीरजु
क्या कर रहा है बेटा की आवाज सुनते ही मेरी तो टट्टी बंद हो गई मैंने जल्दी से अपनी गाण्ड धोइ और चुपके से झाड़ियो के पीछे जहा से आवाज आ रही थी उस तरफ बैठे बैठे ही आगे बढ़ने लगा।
मेरे रोंगटे तो बिरजु शब्द सुनते ही खड़े हो गये थे क्यों की मै उस औरत की आवाज पहचान चूका था वह मेरी चाची संतोष की आवाज थी और मेरे चचेरे भाई का नाम बिरजु था।
बीरजु से मेरी बिलकुल नहीं बनती थी वह मुझसे एक साल छोटा था, लेकिन था मेरा भाई ही पर उसका बाप शहर में पंचायत में नौकर था तो दोनों माँ बेटो के भाव कुछ ज्यादा ही था, घमण्ड सर चढ़ कर बोलता था, लेकिन वही मेरी माँ और चाची में काफी जमती थी, वैसे भी सुना जाता है की पहले माँ बहुत सीधी साधी थी लेकिन जब से चाची से मिली तब से काफी तेज तरार हो गई थी।
अब मै जरा अपने बारे में बता दू फिर कहानी की ओर चलते है।
मेरा नाम कल्लु है मै 20 साल का हु मेरे दादा जी मेरे लिए काफी जमीन छोड़ कर गए जिसमें हम बाप बेटे खेती करते है।
हल चलाते है, खेती किसानी के काम के चलते मेरा शरीर काफी बलिश्त और लम्बा है, मेरे पिता जी की दूसरी शादी हुई है पहली के मरने के बाद मेरे पिता जी ने मेरी माँ निर्मला से शादी कर ली, मेरे पिता जी 50 पार कर चुके है जबकि मेरी माँ उनसे बहुत छोटी केवल 38 साल की है याने मुझसे सिर्फ 18 साल ही बड़ी है, गांव में लड़कियो की शादी कम उम्र में ही हो जाया करती है इसलिए कम उम्र में ही माँ की शादी हो गई और 18 की उम्र में मै पैदा हो गया, मेरी माँ बहुत खूबसूरत और सेक्सी नजर आती है, मेरी एक छोटी बहन भी है 18 साल की जिसका नाम गीतिका है लेकिन प्यार से हम सब उसे गुड़िया भी कहते है, मेरे बाबा का बड़ा मन था उसे डॉक्टर बनाने का इस्लिये उनहोने उसे शहर भेज दिया था पढने के लिये, वह काफी सुन्दर और बिलकुल मेरी माँ के जैसी गदराई हुई और सेक्सी है।
वह पढने में बड़ी तेज है शहर में हॉस्टल में रह कर पढाई करती है और एक महिने में एक बार गांव जरुर आती है।
लेकिन अभी मेरी माँ की तो यह हालत है की उसको देख कर हर किसी का मन उसे चोदने का होता है यह बात मैंने गांव के लोगो की जो नजर मेरी माँ पर
पडती है उससे मैंने जाना। माँ बहुत गदरा गई है और उसके बदन पर चर्बी भी बढ़ गई है जिसके कारन उसका पेट काफी उभरा हुआ नजर आता है वह घाघरा भी नाभि के निचे ही पहनती है, हमारे यहाँ घाघरा और चोली पहनने का ही चलन है माँ का घाघरा घुटनो तक और बहुत घेरे वाला होता है, उनके चुचे और उनकी गाण्ड बहुत उठि हुई और मोटी है, उनकी गाण्ड देखते ही लौंडा खड़ा हो जाये इस बात की ग्यारंटी है, वह भी हमारे साथ खेतो में काम करती है।
हाँ तो जब मैंने देखा की आवाज पास की झाड़ियो के पीछे से आ रही है तब मै झाड़ियो के पास जाकर पीछे देखने लगा, लेकिन खोदा पहाड और निकली चुहिया वाली बात थी, संतोष चाची के पैर में कान्टा लगा हुआ था और उसका बेटा बिरजु उसके पैरो से काँटे
को निकाल रहा था संतोष चाची अपने दोनों हांथो को जमीन पर पीछे टेके हुए अपनी एक टाँग उठा कर अपने बेटे के मुह की ओर देख रही थी।
लेकिन मैंने देखा बिरजु का ध्यान काँटा निकालने की बजाय अपनी माँ के घाघरे के अंदर उसकी जांघो की जोडो की ओर देख रहा था।
संतोष : क्या हुआ मुये कितनी देर लगाएगा तुझसे एक कांटा भी नहीं निकाला जाता है, जल्दी कर मेरा पैर उठाये उठाये दर्द करने लगा है।
बीरजु : अरे माँ काँटा भी तो देखो कितनी बीच में घुसा है जरा चुप चाप बैठो निकाल रहा हु और अपने पैर न हिलाओ।
संतोष चाची आँखे बंद किये हुए अपने चहरे पर सारा दर्द समेटे आह ओहः कर रही थी और बिरजु था की अपनी माँ की बुर देखने की कोशिश कर रहा था, तभी बिरजु ने अपनी माँ की टाँगो को थोड़ा चौड़ा कर दिया और बिरजु तो बिरजू, संतोष चाची की चुत की फटी हुई फाँक
मुझे भी साफ नजर आ गई, वह दोनों नहीं जानते थे की मै बिरजू के जस्ट पीछे वाली झाडी के पीछे बेठा था, अब संतोष चाची की फुली हुई बड़ी बडी फांको वाली बुर साफ नजर आ रही थी, कुछ देर बाद बिरजु ने कहा ले माँ निकल गया तेरा काँटा और फिर संतोष चाची उठ गई और लंगड़ाते लंगडाते चलने लगी।
बिरजु उसके पीछे पीछे जाने लगा और मै चाची की घाघरे में उठि लहराती गाण्ड को देख कर मस्त हो रहा था, यह पहली दफ़ा था जब मैंने चाची की गुदाज
गाँड पर ध्यान दिया था।
चाची के जाने के बाद मै वहाँ से अपने खेतो में आ गया और अपने बाबा के साथ खेत के कामो में हाथ बटाने लगा।
बाबा : कल तो बेटा गीतिका आएगी तू बस स्टैंड जाकर उसे ले आना, मैंने कहा ठीक है बाबा, कुछ देर हमने काम किया उसके बाद दुर से हमें माँ आती हुई दिखाई दी।
मा खाना बना कर हमारे लिए लेकर रोज दोपहर तक आ जाती है, उसके बाद बाबा खाना खा कर फिर से खेती में लग जाता है और मुझे एक दो घंटे अपने खेत की झोपडी में आराम करने को कह देता है, माँ एक दो घंटे काम करती है और फिर वह भी झोपडी में आकर लेट जाती है, शाम को मै और माँ घर आ जाते है और अगले दिन फिर वही खेत किसानी का काम बस हमारी लाइफ ऐसे ही चल रही थी, अभी तक मेरा ध्यान औरतो पर कम ही रहता था लेकिन एक तो संतोष चाची की चुत जबसे मैंने देखा तब से मेरा लंड बहुत परेशान करने लगा था यही वजह थी की आज जब खेत से मै और माँ लौट रहे थे तो अनायास ही मेरी नजर अपनी माँ के बड़े बड़े मटकते गदराए चुतडो पर चलि गई जो की घाघरे में बहुत उछल रहे थे और समा नहीं रहे थे, सच बताऊ माँ को चलते हुए उसके मटकते भारी भरकम चूतडो को देखने पर चलते चलते ही मेरा लंड खड़ा हो गया था।
आज मुझे महसूस हुआ था की मेरी माँ को लोग गांव में क्यों घुरते रहते है और जब वह उनके सामने से अपनी भारी गाँड मटकाते हुए गुज़रती है तब लोग अपने लंड को क्यों मसलने लगते थे।
मा का घाघरा इतना छोटा था की उसके घुटने साफ नजर आते थे और अगर वह बैठती थी तो कई बार
उसकी मोटी मोटी गुदाज जाँघे भी नजर आ जाती थी, उस रात मै ठीक से सोया नहीं मुझे कही चाची की फुली हुई चुत और कभी माँ के लहराते हुए मोटे मोटे चूतड़ नजर आ जाते थे, मै यह भी सोचने लगा था की जब चाची की चुत इतनी फुली और बड़ी नजर आ रही थी तो माँ तो चाची से कई गुणा ज्यादा सुन्दर और तगडे बदन की है फिर उसकी चुत कितनी फुली हुई होगी, मेरे विचार अभी पनपे ही थे जिनमे किसी चिंगारी लगने के बाद उठते धुएं को आग देने का काम मेरी बहन गीतिका ने पूरा कर दिया और मै अपनी चाची माँ और बहन को चोदने के लिए तडपने लगा।
मै बस स्टैंड पर खड़ा शहर से आने वाली बस का इंतजार कर रहा था, तभी बस स्टैंड पर एक किताब बेचने वाला आया और मेरे पास आकर कहने लगा बाबू जी मेहँदी की बच्चो की और गानो की शायरी की बताइये कौन सी बुक लेना पसंद करेंगे, मैंने कहा कहानियो की बुक है, उसने कहा है बाबू जी अकबर बीरबल के चुटकुली, पुराणी दंतक कथाए,
पंचतन्त्र बोलो कौन सी दूँ, मैंने उससे धीरे से कहा चुदाई की कहानियो की किताब है क्या, तब उसने भी धीरे से कहा बाबूजी २० रु की आएगी, मैंने कहा कहानी मस्त है न उसने कहा बाबू जी एक बार पढोगे तो बार बार मुझसे लेकर जाओगे, मैंने उससे वह किताब ले ली और इतने में सामने से बस आ गई और मैंने वह किताब अपनी धोती में कमर पर खोस ली, तभी गीतिका बस से उतरी, मै तो उसे देखता ही रह गया, सच बताऊ गीतिका को ऊपर से निचे तक देखने भर से मेरा लंड खड़ा हो गया था, गीतिका तो बहुत मॉडर्न हो गई थी, उसके खुले हुए बाल होठो पर लिप्स्टीक, एक रेड कलर की टीशर्ट और टाइट जीन्स है क्या लग रही थी,
जब उसने अपनी गुदाज गाण्ड मेरी ओर की तो मै तो उसके जीन्स में न समा सकने वाले चौड़े सी भारी चूतडो को देख कर पागल हो गया और सच पुछो तो मेरे मन में उस समय यह आया की गीतिका की इतनी चौड़ी गाण्ड जीन्स में इतनी मस्त नजर आ रही है तो अगर यह जीन्स मेरी माँ पहने तो उसके चौड़े चूतड़ तो और भी बडे बड़े है जीन्स में माँ की मोटी गाण्ड कैसे नजर आएगी, मै अभी कुछ सोच ही रहा था की मुझे दुसरा झटका तब लगा जब गीतिका, एक दम से भैया कहती हुई मेरे सिने से लग गई मुझे और कुछ एह्सास तो नहीं हुआ पर मेरे सिने से जब उसकी एक झीनी सी टीशर्ट में कसे हुए मोटे मोटे दूध जब दबे तो ऐसा लगा जैसे मेंरा लंड पानी छोड़ देगा।
कल्लु : अरे गुड़िया इतना कह कर मैंने भी उसकी पीठ को और कस कर अपने सिने की ओर दबोचा और उसके मोटे मोटे मस्त दूध के मस्त एह्सास का खूब मजा लिया।
गीतिका अभी भी मुझसे चिपकी हुई थी इसलिए मैंने धीरे से उसकी मस्त गुदाज मोटी गाण्ड पर जीन्स के ऊपर से हाथ फेरा और क्या बताऊ उसके चूतडो के नरम माँस के उठाव ने मुझे पागल कर दिया दिल कर रहा था की अपनी बहन गीतिका के भारी चूतडो और उसके मोटे मोटे दूध को यही खूब कस कस कर दबा डालूं।
कुछ देर बाद गीतिका ने मुझे छोड़ा और कहने लगी अब चलिये भी या यही खड़े रहेगे।
कल्लु : अरे गुड़िया तू तो हर एक दो महिने में बढ़ने लगी है अभी पिछ्ली बार देखा था तो तो काफी छोटी थी और अब एक दम से जवान लड़की के जैसे लगने लगी है,
अगर तू साड़ी पहन कर आती तो मै तो तुझे पहचान ही नहीं पाता।
गीतिका : मुसकुराकर मुझे देखति हुई, भैया मै तो उतनी ही बड़ी हूँ, पर मुझे इस बार ऐसा लग रहा है जैसे आपका अपनी बहन को देखने का नजरिया बदल गया है।तभी तो आपको अपनी बहन बड़ी नजर आ रही है
कल्लु : पता नहीं गुड़िया पर तूने यह कैसे कपडे पहने है भला अपने गांव मै लड़किया ऐसे पेंट शर्ट में कहा रहती है, गांव के लोग कैसी कैसी बाते करने लगते है
गीतिका : मै जानती हु भैया तुम फिकर न करो चलो हम पहले उस सामने वाले काम्प्लेक्स में चलते है वहां मै ड्रेस चेंज कर लेती हु।
कालू : मै अपनी बहन की गुदाज जवानी को देखते हुए कहने लगा, वैसे गुड़िया तू मुझे तो इन कपडो मै अच्छी लग रही है, पर मै सोचता हु गांव घर में कोइ तूझसे कुछ कहे न इसलिए मै कह रहा था।
गीतिका : भैया आप नहीं भी कहते तो भी मै यह ड्रेस चेंज करके गांव जाती क्योंकि मै जानती हु गांव के लोगो को उन्हें बात का बतंगड बनाते देर नहीं लगती है,
पर मुझे यह जान कर अच्छा लगा की आपको मेरी यह ड्रेस अछि लगी है
कालू : अरे पगली तेरी ड्रेस तो ठीक है तू तो कुछ भी पहन लेगी तो अच्छी लगेगी, आखिर मेरी गुड़िया परी है जो इतनी खुबसुरत।
गीतिका : मुस्कुराते हुए चलिये अब इतना भी झूठ मत बोलिये।
कालू : नहीं गुड़िया मै सच कह रहा ह, मैंने तुझसे सुन्दर लड़की आज तक नहीं देखी।
गीतिका : अरे क्या भैया, आप कभी शहर में नहीं रहे हो न इसलिए ऐसी बाते करते हो कभी शहर की लड़कियो को देखते तो पागल हो जाते।
कल्लु : क्यों शहर में तुझसे भी सुन्दर लड़कियाँ रहती है।
गीतिका : लड़किया तो ठीक है भैया पर उनकी ड्रेस जब आप देख लोगे तो आपका तो बस।।।।।।।।।।यह कह कर गीतिका जोर जोर से हॅसने लगी।
कालू : क्या गोल मोल बाते कर रही है, साफ साफ बता ना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, बाद मै बताऊँगी अब चलो भी, उसके बाद गीतिका ने काम्प्लेक्स में जाकर कपडे बदले और अब वह एक येलो सलवार कमीज मे नजर आ रही थी।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, अब कैसी लग रही हु भैया,
कालू : अच्छी लग रही हो।
गीतिका : अच्छा भैया मै आपको पहले ज्यादा अच्छी लग रही थी या अब।
कालू : मुस्कुराते हुए सच कहु तो तू जीन्स और टॉप में मुझे ज्यादा सुन्दर लग रही थी।
गीतिका : मै जानती हु भैया और गीतिका फिर मुस्कुराने लगी, कुछ भी कहो गीतिका इस बार और बार की अपेक्षा कुछ बदली हुई लग रही थी।
गीतिका : भैया अब तो यह खटारा साइकिल बेच दो और कोई बाइक का जुगाड़ करो।
कल्लु : अरे वह तो ठीक है पर यहाँ गाड़ी चलाना आती किसे है।
गीतिका : वह तो मै आपको सीखा दूंगी।
मैने साईकल के पीछे गुड़िया का बैग बांध दिया और फिर साईकल पर चढ़ कर उसे साईकल का डंडा दिखाते हुए कहा, आजा गुड़िया डण्डे पर बैठ जा
गीतिका मेरी बात सुन कर खिलखिला कर हँस पड़ी इस बार तो मै भी उसकी हँसी का मतलब समझ गया था, गीतिका का चेहरा कुछ लाल हो रहा था और वह साईकल के आंगे के डण्डे पर बैठ गई जब वह बेठी तो उसके मोटे मोटे चूतडो से मेरा लंड जो की खड़ा हो गया था टकराने लगा और मै एक दम से सिहर गया,
उपर से गीतिका के बदन से बहुत ही मस्त खुशबु आ रही थी, मै धीरे धीरे साइकिल चलाने लगा और गुड़िया से बात करने लगा।
कल्लु : गुड़िया इस बार कितने दिनों की छुट्टी पर आई है
गीतिका : भैया ८-१० दिन तो रहुँगी।
कालू : तेरी पढाई का क्या पुछु वह तो अच्छी ही चल रही होगी, आखिर तू इतनी होशियार तो है।
गीतिका : आखिर बहन किसकी हूँ।
कालू : अरे इसमें तेरे भैया का क्या बड़प्पन हुआ यह तो सब तेरी मेहनत का नतीजा है, पर यह तो मर्दो जैसे कपडे कब से पहनने लगी, क्या वह सब ऐसे ही कपडे
पहनती है।
गीतिका : भैया आज कल ऐसा ही जमाना है, सब या तो मिनी स्कर्ट या फिर जीन्स पहनती है।
कालू : मिनी स्कर्ट मतलब।
गीतिका : भैया जो स्कर्ट घटनो से भी ऊपर रहती है। उसे मिनी स्कर्ट कहते है।
कालू : तो क्या बड़ी उम्र की औरते भी जीन्स या वह मिनी स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भैया तुम देख लो तो कहोगे की कैसे यह औरते अपने भारी शरीर पर जीन्स पहन कर निकलती है।
कल्लु : क्या हमारी माँ जैसी औरते भी जीन्स या स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भइया, आज कल सब औरते ऐसे ही कपडे पहनती है।
कालू : तो गुड़िया उन्हें शर्म नहीं आती होगी, ऐसे कपडो में तो बड़ी उम्र की औरते न जाने कैसी दिखती होगी।
गीतिका : क्यों मै जीन्स में आपको अच्छी नहीं लग रही थी।
कालू : नहीं तू तो बहुत अच्छी लग रही थी।
गीतिका : तो फिर अब यह बताओ अगर वह जीन्स माँ पहनेगी तो क्या अच्छी नहीं लगेगी।
कल्लु : पता नही।
गीतिका : पता नहीं क्या अगर तुम माँ को जीन्स और टीशर्ट में देख लो तो तुम तो उन पर मर मिटोगे।
कालू : मतलब।
गीतिका : ओह भैया आप भी न बहुत भोले हो यही नुकसान है गांव में रहने के, अरे बाबा माँ जब यह कपडे पहनेगी तो बहुत सेक्सी नजर आएगी।
अच्छे अच्छे पागल हो जाएगे उन्हें देख कर।
कालू : ये सेक्सी का क्या मतलब होता है गुडिया, मै जानता था लेकिन गीतिका मुझे कुछ ज्यादा ही भोला समझती थी लेकिन वह यह नहीं जानती थी की मेरा भी
एक दोस्त है गोपी जो शहर में रहता था और
वह मुझे नई नई बाते बताता रहता था, सेक्स की बाते भी उसने मुझे बताइ थी इसलिए मुझे उसका मतलब पता था, मै यह तो समझ गया था की गीतिका
जितनी दिखाई दे रही है वह उससे कही ज्यादा सेक्सी है पर इस बार उसमे कुछ ज्यादा ही बदलाव दिखाई दे रहा था।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, भैया अब मै आपको सेक्स का मतलब कैसे बताऊ।
कालू : अरे बोलने वाली चीज न हो तो कर के दिखा दे मै समझ जाऊँगा
मेरी बात सुन कर गीतिका ठहाके लगा कर हॅसने लगी और कहने लगी भैया आप बहुत बुद्दू हो, आपको तो सच में कुछ भी नहीं पता, अगर यह बात
आप शहर में मेरे दोस्तों के सामने बोलते तो लोग आपका मजाक उड़ा उड़ा कर इतना हँसते की उनका पेट् दुखने लगता।
कालू : अरे हमने ऐसा क्या कह दिया, हमको अब उसका मतलब पता नहीं है तो हम क्या करे।
गीतिका : सच भैया आप भी ना।
कालू : अब हँसती ही रहोगी या हमें उसका मतलब भी बतायेगी।
गीतिका : हस्ते हुए भैया मै आपको बाद में उसका मतलब बताऊँगी, मै पगडण्डी से होता हुआ गांव के रास्ते पर पहुच गया। वहाँ आम का बगीचा था और पके हुए आम नजर आ रहे थे, तभी गीतिका ने इशारा करते हुए कहा भैया वो देखो कितना मस्त पका हुआ आम है प्लीज उसे तोड़ो ना।
कल्लु : मैंने साईकल रोकी और फिर गीतिका अपने भारी चूतडो को डण्डे से हटा कर उतर गई, मैंने साईकल खड़ी कर दी और उचक कर उस पके आम को तोड़ने लगा लेकिन वह मेरे हाथ से थोड़ा ऊपर था, मै बार बार ऊपर उचक कर उस आम को तोड़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन वह मेरे हाथ से टच होकर रह जाता था।
तभी गुड़िया ने कहा भैया ऐसे नहीं टूटेगा आप एक काम करो मुझे अपनी गोद में उठाओ मै तोड़ती ह, मैंने गीतिका की बात सुन कर उसे अपनी गोद में उठाया, गुड़िया की सलवार इतनी पतले कपडे की थी की मुझे तो ऐसा लगा जैसे मै गुड़िया को नंगी करके उठा रहा हूँ।
मैने गुड़िया की मोटी जांघो पर दोनों हाथो का
घेरा डाल कर उसे ऊपर उठाया, गुड़िया काफी हेल्दी हो गई थी 55 के जी के लगभग वजन होगा मेरे हाथ उसकी जांघो से गुजरते हुए जब गुड़िया के भारी चूतडो
पर पहुचे तो गुड़िया की जांघो और भारी चूतडो के गर्म मांस के एह्सास ने मुझे पागल कर दिया था मै गुड़िया को उठाये हुए उसके मोटे मोटे चूतडो को खूब कस कर दबोचे हुए था और मेरे लंड महराज धोती में टनटना चुके थे, मै गुड़िया के चूतडो को दबाये ऊपर देखने लगा तभी गुड़िया ने मुझे हँसते हुए देखा उसके हाथ में पका हुआ आम था और वह कहने लगी अब उतारो भी आम तो मैंने तोड़ लिया, मैंने धीरे से गुड़िया को छोडना चालु किया।
आउर गुड़िया मेरे बदन से रगड ख़ाति हुई निचे आई और मेरा लैंड गीतिका के चुत वाले हिस्से से रगड खाता गया, गुड़िया ने आम की ख़ुश्बू लेते हुए कह
वाह भैया क्या मस्त पका है।
गीतिका : आओ न भैया थोड़ी देर इस आम की छाया में बेठते है फिर चलते है, मै वही बैठ गया और गीतिका भी बैठ गई और आम के ऊपर के हिस्से को अपने
दान्तो से थोड़ा सा काट कर उसने आम को दबाया और उसका रस चुसते हुए कहने लगी।
गीतिका : वह भैया कितना रसीला और मीठा आम है, मेरी नजर गीतिका के रसीले होठो पर चलि गई और मै उसके रस भरे होठो को हसरत भरी निगाहॉ
से देखने लगा।
गीतिका : लो भैया तुम भी चुसो बड़ा मस्त टेस्ट है इसका।
मै आम चुसना तो नहीं चाहता था लेकिन गीतिका के रसिले होठो और उसकी गुलाबी जीभ को देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया और मैंने सोचा गीतिका का
जूठा आम चुसने का मेरा मन हो गया और मैंने भी गीतिका से आम लेकर चुसने लगा, गीतिका ने कहा भैया चीटिंग नहीं एक बार आप चुसो एक बार मैं।
बस फिर बारी बारी से गुड़िया और मै आम को चुसने लगे।
गीतिका : भैया गांव का माहौल बड़ा अच्छा लगता है यहाँ कितनी शांति है ऐसे में तो कोई कुछ भी करे कोई देखने वाला नहीं है।
कालू : मतलब।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मतलब की मुझे और आम चुसना है और तोड़ो न भैया और फिर गीतिका खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी और फिर उसने उछलते
हये एक आम दिखाया और उसे तोड़ने के लिए कहने लगी।
वाह आम भी ऊँचाई पर था और गीतिका ने मेरी ओर देखा और बड़ी स्टाइल में अपने हाथ ऊपर कर दिए की आओ और मुझे गोदी में उठाओ, मेरा लंड तो खड़ा ही था।
इस बार गुड़िया को मैंने पीछे से उठाया, लेकिन आम थोड़ा ऊपर था तब गुड़िया कहने लगी भैया थोड़ा और ऊपर उठाओ न, आप भी न इतने बालिश्त शरीर है आपका और आप अपनी कमसीन और नाजुक बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहे है।
मेरा इतना सुनना था की मैंने गुड़िया को ऊपर किया इस बार गुड़िया की मोटी गाँड बिलकुल मेरे मुह पर दबी थी और मै अपने मुह से गुड़िया के भारी चूतडो को महसूस कर रहा था, इतने में गुड़िया ने कहा भैया बस थोड़ा और उपर, गुडिया का इतना कहना था की मैंने गुड़िया की गाण्ड में हाथ भर कर उसे और ऊपर उठा दिया, मेरा लंड झटके मारने लगा मेरा हाथ गुड़िया की मस्त उभरी हुई चूत और गाण्ड की जडो में फसा हुआ था।
उसकी भरी गदराई जवानी ऐसी थी मनो मैंने किसी बड़ी औरत को ऊपर उठा रखा हो, कुल मिला कर यह था की गीतिका एक मस्त पका हुआ माल हो चुकी थी जिसे अब चुसना बहुत जरुरी हो गया था, मैंने गीतिका के चूतडो और चुत को इस दौरान अपने हाथो से दबा कर देख लिया था, तभी गीतिका ने आम तोड़ लिया और मैं उसे धीरे से निचे उतारने लगा लेकिन वह एक दम से निचे सरक गई और मेरे दोनों हाथो में गुड़िया के सुडौल खूब मोटे मोटे और कसे हुये
मस्त दूध दब गए और तब मुझे एह्सास हुआ की गीतिका के मस्त बड़े बड़े आम खूब मोटे मोटे और खूब कसे हुए है जब मेरा हाथ अपनी बहन के पके
आमो पर पड़ा तो मुझे एक अजीब सा आननद आया और गीतिका मजे से आम चुसने लगी।
वह बीच बीच में मुझे भी आम चुस्ने को दे देति थी।
कुछ देर हम वही आम खाते रहे और फिर गुड़िया को मैंने साईकल पर बैठा लिया और गांव की ओर चल दिया।
हम जब घर पहुचे तो गुड़िया माँ से लिपट गई और फिर मै वहाँ से खेतो में चला गया कुछ देर बाबा के साथ काम किया।
उसके बाद मैं झोपड़ी में चला गया और बाबा खेतो में काम में लगे रहे वहाँ जाकर मैंने अपनी धोती से किताब निकाल कर पढना शुरू किया।
जब मैंने पहली कहानी पढ़ी तो पहली कहानी ही अपनी सगी बहन को चोदने की थी जिसे पढ़ कर मै मस्त हो रहा था, लेकिन किताबे तो मै बहुत बार पढ चूका था पर इस बार मुझे बार बार गुड़िया ही याद आ रही थी गुड़िया की गदराई जवानी रह रह कर मेरे लंड को खड़ा कर रही थी।
कहानी पढने के बाद मै थोड़ी देर लेट गया
शाम को घर पर जब मै पंहुचा अभी मै दरवाजे के बाहर ही था दरवाजे से एक रास्ता घर के अंदर और दुसरा पास के बाथरूम में जाता था।
बाथरूम ऐसा था की उसमे दरवाजा नहीं था और वह तीन तरफ लकड़ी के पटिये लगा कर बनाया गया था।
निर्माला : अरे गीतिका जल्दी नहा ले खाना बन गया है।
गीतिका : बस माँ आती हूँ।
मै समझ गया की गुड़िया बाथरूम में नहा रही है, मेरे मन में गीतिका को नंगी देखने का ख़याल आ गया, जबकि इससे पहले भी उस बाथरूम में माँ या गीतिका
नहाती रही है पर पहले ऐसा ख़याल नहीं आया, मै धीरे से बाथरूम के पीछे की तरफ चला गया और जैसे ही मैंने लकड़ी के गैप से झाँका ।
क्या बताऊ सीधे मेरी आँखों के सामने गुडिया के मोटे मोटे गोरे गोरे चूतड़ थे और क्या उठे हुए और क्या मस्त गांड थी उसकी गाण्ड की दरार में मेरा लंड तो पूरी तबियत से खड़ा हो गया।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाल कर मसलते हुए गीतिका को देखना शुरू किया गीतिका जब भी थोड़ा झुकती तो उसकी फुली चुत की फाँके पीछे से नजर आ जाती और मेरा लंड उसकी फांको
को और फाडने के लिये मचलने लगता था तभी गीतिका मेरी और मुह करके घुम गई और जब मैंने उसके मस्त बड़े बड़े कलमी आमो को देखा तो ऐसा लगा की यह कठोर आम मुझे निचोडने के लिए मिल जाये तो मजा आ जाए, फिर गुड़िया जल्दी जल्दी अपने नंगे बदन पर पानी ड़ालने लगी, उसकी चुत के ऊपर हलके हलके बाल नजर आ रहे थे और चुत का उभार मुझे बहुत उत्तेजित कर रहा था।
कुछ देर में गीतिका ने एक लाल रंग की पेंटी पहन ली और ऊपर उसने ब्रा नहीं पहनी बल्कि एक ब्लू कलर की टी शर्ट पहन लिया और निचे एक टाइट लेगी पहन ली।
उसकी मोटी मोटी जाँघे लेगी में बड़ी मुश्किल से समां रही थी और उसके चुतड़ तो लेगी में और भी चोदने लायक नजर आ रहे थे, गीतिका ने अपनी उत्तरी हुई ब्रा और पेंटी वही छोड़ कर बाथरूम से बाहर आई और घर के अंदर घुस गई।
मै कुछ देर बाद घर के अंदर गया तब माँ खाना बना रही थी और गीतिका बैठ कर खा रही थी, मुझे देखते ही माँ ने कहा कल्लु आजा तू भी हाथ मुह धो कर खा ले।
मैने भी खाना खा लिया उसके बाद बाबा आ गए और माँ उन्हें खाना देने लगी ।
गर्मी ज्यादा थी मै बहार खटिया डाल कर लेता हुआ था और गीतिका माँ और बाबा के पास बेठी थी, मै आँखे बंद किये लेटा था तभी पायल की आवाज सुनाइ दी छन छन छ्न छ्न।
मैंने धीरे से आँखे खोल कर देखा। माँ बाथरूम की तरफ जा रही थी।
मेरा लंड माँ के भारी उठे हुए चूतडो की मतवाली थिरकन देख कर खड़ा हो गया और मै चुपके से बाथरूम के पीछे चला गया, माँ के भरे चूतङ मेरी तरफ थे तभी माँ ने अपने घाघरे को ऊपर चढ़ाया और जब मैंने माँ के चौड़े चौड़े मस्त चूतडो को देखा तो लगा पानी निकल जाएगा।
आज पहली बार मैंने माँ के गोरे गोरे चौड़े चौड़े चूतडो के दर्शन किये थे, माँ वही मुतने बैठ गई और रात के सन्नाटे में मुतने की तेज आवाज ने मुझे पागल कर दिया, माँ काफी देर तक मुतती रही फिर खड़ी होकर अपने घाघरे से चुत पोछती हुई बाहर आ गई।
मै वापस खटिया पर जाकर लेट गया, थोड़ी देर बाद गीतिका मेरे बगल में आकर बैठ गई और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे कमर से टच होने लगी।
गीतिका : क्या भैया सो गए क्या।
कालू : अरे नहीं अभी कहा नींद आएगी, और बता तुझे तो शहर में अच्छा लगता होगा।
गीतिका : हाँ भैया बड़ा मजा आता है काश आप भी मेरे कॉलेज में होते तो मस्त मजा आता।
कल्लु : हाँ मजा तो आता लेकिन गांव में खेती का काम भी तो सम्भालना पड़ता है। इसीलिए तो मै पढने नहीं गया।
गीतिका : भैया रात को आप बाहर यही खटिया पर ही सोते हो क्या।
कालू : हाँ गर्मी में बाहर ठण्डी हवा में सोने का मजा ही कुछ और है।
गीतिका : भैया मै भी यही सो जाउ।
कालू : नहीं तू अंदर ही सो बाबा ग़ुस्सा होंगे, तभी गीतिका के मोबाइल पर कोई फ़ोन आया और वह बातें करने लगी और मै उसकी बात सुनने लगा।
गीतिका : हेलो
मोनिका : क्यों राजकुमारी पहुच गई अपने गाँव।
गेटिका : हाँ यार बड़ा मस्त माहौल है गांव में बड़ी सुहानी हवा चल रही है।
मोनिका : क्या यार तू वहाँ चलि गई यहाँ अब मुझे अकेले ही टाइम पास करना पड़ रहा है, आज एक मस्त डीवीडी ले कर आई हूँ, एक निग्रो एक गोरी को मस्त चोद रहा है।
उस निग्रो का लंड तो बड़ा मस्त है।
गीतिका : अरे यार अभी नहीं बाद में बात करते है।
मोनिका : क्यों क्या हुआ।
गीतिका : मै भैया के पास बेठी हूँ।
मोनिका : मुस्कुराते हुये, भैया के पास बेठी है या भैया की गोद में बेठी है।
गीतिका : चुप कर जो मुह में आया बक देति है।
मोनिका : सच कह रही हु रानी, एक बार अपने भैया की गोद में बैठ कर देख ले तेरे जवान चौड़े चूतडो के वजन से तेरे भैया का लंड न डगमगा जाए तो कहना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, मै फ़ोन रख रही हु।
मोनिका : अच्छा मेरी बात तो सुन।
गीतिका :क्या।
मोनिका : अच्छा तो कुछ मत बोल मै तुझे मूवी का लाइव शो बताती हूँ।
गीतिका : चल तेरे पास ज्यादा बैलेंस है तू बोल मै तो चुपचाप यही बेठी हु।
मोनिका : वो गोरी उस निग्रो के काले काले मस्त मोटे लंड को लोलीपोप की तरह चूस रही है, तू देखति तो तेरा भी मन चुसने का होने लगता।
गीतिका : और वह निगरो।
मोनिका : वह निग्रो उस गोरी की चुत की तरफ मुह करके लेटा हुआ है और अपनी लम्बी जीभ निकाल कर उस गोरी की मस्त चुत को चाट रहा है दोनों ६९ की पोजीशन में एक दूसरे के लंड और चुत को खूब कस कस कर चूस चाट रहे है।
गीतिका : बस कर मोनिका मै अब फ़ोन रख रही हूँ। तुझसे बाद में बात करती हूँ।
मोनिका : अच्छा चल जब फ्री हो तो मिस कॉल कर देना।
कल्लु : तेरी दोस्त थी क्या गुडिया।
गीतिका : हाँ भैया मेरी सबसे पक्की सहेली है
मै केवल धोती पहने हुए था और गीतिका की नजरे मेरे चौड़े सिने की तरफ बार बार चलि जाती थी लेकिन मै कुछ समझ नहीं पाया फिर रात को सब सो गए और
सूबह वही दिनचर्या।
सूबह सुबह गीतिका मस्त घाघरा चोली पहन कर नजर आई मै तो उसकी गोरी गोरी टाँगो को देखता ही रह गया।
जीतिका : भैया मै भी आपके साथ खेतो में चल रही हु।
कालू : ठीक है चल पर खेत दुर है तू थक जायेगी तो।
गीतिका : निकालो न अपनी खटारा साईकल उसी पर बैठ कर चलते है।
कालू : ठीक है चल और मैंने अपनी साईकल निकाली और गीतिका को फिर से कहा चल बैठ डण्डे के उपर, मेरे इतना कहने पर गीतिका मुस्कुराते हुए डण्डे पर
बैठ गई और कहने लगी, भैया आराम से चलाना आपका डंडा मुझे बहुत चुभता है।
गीतिका की बात सुन कर मेरा लंड अकडने लगा था, पर मजा भी बहुत आ रहा था।
कालू : तू क्यों तैयार हो गई सुबह।
गीतिका : भैया कल के रसीले आमो ने बड़ा मजा दिया, आज फिर मुझे ऐसे ही रसीले आम खाना है।
कालू : हाँ हाँ क्यों नहीं अपने खेतो के पास तो बहुत बड़ा बगीचा है वैसे तुझे आम खाता देख मेरा भी मन आम चुसने का होने लगा था नहीं तो मैं
वेसे आम चुसता नहीं हूँ।
गीतिका ; मुस्कुराते हुये, भैया जब आपको अच्छे मस्त रसीले आम चुसने को मिलेँगे तो आप भी नहीं छोडोगे।
कालू : गांव में आम तो बहुत है पर चुसने का समय कहा मिलता है।
गीतिका : फिकर न करो भैया मै आ गई हु न अब मस्त आम चुसाउंगी आपको।
कालू : तू तो दो चार दिन रहेगी और फिर चलि जाएगी, अगली बार कुछ ज्यादा दिनों की छुटटी लेकर आ तो मजा आएगा तब तक शायद बारिश भी हो जाये तो नदी में पानी भी आ जायेगा और फिर मस्त नदी में नहाने का मजा ही अलग होगा।
जीतिका : भैया आपको तैरना आता है।
कालू : हाँ मै तो एक साँस में इस छोर से उस छोर तक तैर कर जा सकता हूँ।
गीतिका : भैया मुझे भी तैरना सीखा दोगे क्या।
कालू : क्यों नहीं पर पहले नदी में पानी तो आने दे।
गीतिका : अगली बार जब आउंगी तब तक बारिश हो ही जायेगी।
कालू : हाँ वह तो है।
जब हम खेतो में पहुच गए तो कुछ देर मैंने काम किया और फिर गीतिका ने रट लगा दी की चलो भैया आम के बगीचे में।
उधर बाबा उसकी रट सुन रहे थे और फिर मुझसे कहने लगे अरे बेटा कल्लु दो दिनों के लिए बिटिया आई है जाता क्यों नहीं उसे मस्त मीठे आमो का रस तो चखा दे।
मै वहाँ से गीतिका को लेकर पास के बगीचे में चल दिया और फिर गीतिका आम देखने लगी तभी वह चिल्लाइ वाह भैया क्या मस्त बड़ा सा पका हुआ आम लगा है।
उसको तोड़ो न, मैंने कहा गुड़िया वह तो बहुत ऊपर है।
गीतिका : तो मुझे उठाओ न अपनी गोद में, मैंने गीतिका के पीछे आकर उसकी कमर पकड़ कर उसे उठाया और जब उसके गुदाज चोदने लायक चूतडो का स्पर्श मेरे लंड से हुआ तो वह गीतिका के घाघरे में घूसने को तैयार हो गया, लेकिन गीतिका को ऊपर उठाने पर भी आम उसके हाथो से थोड़ी दुर ही रह गया और मैंने गीतिका को थक कर निचे उतार दिया।
कल्लु : गुड़िया वह बहुत ऊपर है कोई दुसरा देख ले
गीतिका : पैर पटकते हुए नहीं भैया मुझे तो वही वाला चहिये, आप कैसे उठा रहे हो मुझे आपको तो सचमुच कुछ नहीं आता।
कालू : तो तू ही बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका : मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और मेरे नंगे चौड़े सिने को और मेरी बाजुओ को हाथ लगा कर कहने लगी, मेरा भाई इतना बलिश्त है और अपनी कमसिन सी बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहा है।
मैने गीतिका के खूब मोटे मोटे कसे हुए दूध पर नजर डालते हुए अपनी नज़रो को निचे फिसलाया और गीतिका के भारी चूतडो और मोटी मोटी गदराई जांघो को देखते हुए कहा ।अब तू कमसीन कहा रही अब तो भरपूर जवान हो गई है 55 के जी तो वजन होगा तेरा फिर कैसे मै तुझे आसानी से उठा लु।
गीतिका : क्या भैया आपके बराबर मरद तो बड़ी बड़ी औरतो को उठा लेते है मै तो फिर भी लड़की हूँ।
कालू : अच्छा बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका मेरे सामने आकर मेरे हाथो को पकड़ कर अपनी कमर में रखते हुए कहने लगी पहले झुक कर मेरी जांघो पर अपने हाथ का घेरा डालो और मुझे
उपर उठाओ।
मैने गीतिका की मोटी जांघो को अपनी बांहो में भर कर उसे ऊपर उठाया अब उसके मोटे मोटे चोली में कसे दूध मेरे मुह से टकराने लगे और मै अपने आपको रोक न सका और मैंने अपने मुह को गीतिका के मोटे मोटे बोबो में दबा दिया और उसकी मस्त सुगंध लेने लगा, हाय क्या मतवाली मस्त महक थी मेंरा
लंड तो ऐसा लग रहा था की धोती फाड कर बाहर आ जाएगा।
गीतिका ने अपनी बांहे मेरी गर्दन पर डाले हुए एक हाथ ऊपर बढ़ाया लेकिन आम उसकी पहुच से दुर था,
गीतिका : भैया ऐसे ही उठाये रहना उतारना मत, बस थोड़ा सा और ऊपर उठाओ, अब की बार मैंने अपने हाथो से गीतिका के चौड़े चौड़े मोटे चूतडो को
दबोचते हुए अपने पंजो को उसकी मस्त गुदाज गाण्ड में भर कर और भी ऊपर उठाया।लकिन गीतिका का हाथ आम तक नहीं पहुच रहा था, गीतिका भैया बस
थोड़ा सा और ऊपर करो न, गीतिका का घाघरा ऊपर हो गया और मेरे हाथ गीतिका की नंगी जांघो से होते हुये, जैसे ही उसकी गाण्ड की दरार में पहुचे मै चौक गया और मेरा लंड झटके देने लगा।
गीतिका घाघरे के अंदर पूरी नंगी थी जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मै तो एक दम से मस्त हो गया और न जाने कहा से मेरे हांथो में इतनी ताकत आ गई की मैंने गीतिका को और ऊपर करते हुए उठा दिया और गीतिका की चुत वाला हिस्सा मेरे मुह के सामने आ गया।
मैने अपनी आँखे बंद कर ली और गीतिका की चुत को अपने मुह पर दबाने लगा, लेकिन घाघरे का अगला हिस्सा चुत को ढके हुए था और मै गीतिका की बुर को
सूँघने की कोशिश कर रहा था, और फिर अचानक मैंने अपने मुह को गीतिका की चुत के ऊपर दबाते हुए उसकी फुली चुत को घाघरे के ऊपर से ही पप्पी लेनी
शुरु कर दी, तभी गीतिका के मुह से आवाज निकली यस और मैंने जब ऊपर देखा तो उसके हाथ में आम आ चूका था।
गीतिका : भैया अब उतारो भी लेकिन आराम से मैंने गीतिका पर पकड़ ढिली की और वह धीरे धीरे निचे की तरफ फ़िसलने लगी, जब वह निचे फ़िसलने लगी तो पहले उसका नंगा पेट मेरे मुह के सामने आया और मैंने भरपूर उसके नंगे पेट पर अपने होठो को फेरा और फिर जब वह और निचे सरकी तो उसके मोटे मोटे दूध मेरे
मुह के सामने आ गये।
लेकिन मुझे यह ध्यान नहीं था की गीतिका जब और निचे सरकेगी तो मेरा खड़ा लंड उसकी चुत को रोक लेगा और जैसे ही गीतिका की चुत मेरे लंड के पास पहुची लंड से उसकी बुर घिस गई और मेरे डण्डे की वजह से शायद गीतिका की फाँके एक बार खुल कर बंद हो गई या फिर उसके भग्नाशे से मेरे लंड
का घर्षण हो गया और गीतिका के मुह से आह जैसे शब्द निकल पड़े और गीतिका अब जमीन पर खड़ी थी।
उसकी नजर मेरी नज़रो से बच कर मेरे खड़े लंड
पर जा रही थी जो धोती के अंदर से तम्बू बनाये खड़ा था और गीतिका के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान फैल गई थी लेकिन उसका चेहरा कुछ लाल हो गया था और
सच कहु तो गीतिका मुझे बहुत चुदासी चुत नजर आ रही थी उसका चेहरा देख कर ही लग रहा था की उसकी बुर जरुर लंड के लिए पानी छोड़ रही होगी, फिर भी मै जानना चाहता था और ऊपर से वह अपनी चड्डी भी पहन कर नहीं आई थी मतलब उसके अंदर कुछ चल जरुर रहा था, गीतिका ने उस आम को चुसना शुरू कर दिया और मै उसके रसीले होठो को देखने लगा फिर जब उसने मेरी ओर नजरे उठा कर देखि तो उसकी नशीली आँखे ऐसी लग रही थी जैसे कह रही हो की भइया अपनी बहन की कुंवारी चुत में अपना मस्त लंड पेल दोगे क्या।
कल्लु : गुड़िया तू आम चूस तब तक मै और दूसरे आम देखता ह, गुड़िया पेड़ के निचे बैठ गई और मै इधर उधर के पेडो पर आम देखने लगा तभी गुड़िया ने आवाज देकर मुझे बुलाया और एक दुसरा आम दीखाते हुए कहने लगी भैया वो वाला तोड़ो देखो कितना मस्त पका है, मै गुड़िया की बात सुन कर उसके मोटे मोटे चोली में कसे उरोजो को देखने लगा, फिर मैंने कहा गुड़िया वह भी बहुत ऊपर है, तब गुड़िया ने झट से अपना हाथ मेरी ओर लम्बा करते हुए कहा तो फिर उठाओ अपनी बहन को अपनी गोद में।
गुडिया की बात सुन कर मेरे लंड की नशे और भी तन गई और गुड़िया जैसे ही मेरे पास आई उसकी मादक ख़ुश्बू ने अलग पागल कर दिया मै झुका और गुड़िया के भारी भरकम चूतडो को अपनी बांहो में कस कर
उसे ऊपर उठा दिया, जब गुड़िया का चिकना पेट मेरे मुह के पास पहुच गया तब गुड़िया ने मेरे सर को पकड़ते हुए कहा भैया और ऊपर करो न अभी तो आम
बहुत दुर है।
मैने गुड़िया की मोटी जांघो को पकड़ा और दुसरा हाथ गुड़िया की गुदाज चौड़ी गाण्ड के निचे लगा दिया, मुझे ऐसा लग रहा था की मेरा लंड फट जाएग, गुड़िया क
गुदाज चूतडो के नरम नरम माँस को दबोचने में बड़ा मजा आ रहा था, तभी मेरी ऊँगली गुड़िया की गाण्ड के जडो में घुस गई और मै तब चौक गया जब गुड़िया की गाण्ड के गैप में उसका घघरा गीला हो रहा था, मै समझ गया की गुड़िया की रसीली बुर खूब पानी छोड़ रही है, मै बिना घबराये गुड़िया की दोनों जांघो की जडो में अपने हाथ को भर कर गुडिया को और ऊपर उठाने लगा।
मेरे हाथ का पूरा जोर गुड़िया की जांघो की जडो में यानि उसकी फुली हुई बुर और गाण्ड के छेद पर लगा हुआ था, जहा से मैंने गुड़िया को दबा रखा था वही उसका घाघरा काफी गीला लग रहा था, अब मुझे गुड़िया की नीयत पर शक होने लगा था, क्या गुड़िया जानबूझ कर चड्ढी पहन कर नहीं आई थी, क्या गुड़िया भी लंड लेने के लिये तडपने लगी है, पर मै तो उसका भाई हु फिर वह.
मैं सोच में डूबा हुआ था तभी गुड़िया ने कहा भैया अब उतारो भी और मैंने फिर से उसे नीचे उतारा और इस बार फिर उसका गुदाज रसीला बदन मेरे बदन से रगड खाता हुआ निचे आया और फिर से गुड़िया की चुत में मेरे खड़े लंड का एह्सास हुआ, गुड़िया के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान
थी। जिसे वह दबाते हुए कहने लगी वाह भैया क्या मस्त आम है, उसके बाद एक दो आम और तोड़ने के बाद मैं और गुड़िया खेत में आ गये, गुड़िया खाट पर बैठ कर आम चुस्ने लगी और मै बाबा के साथ काम में
लग गया, मै दुर से गुड़िया को देख रहा था लेकिन वह मोबाइल में न जाने क्या कर रही थी, तभी मुझे ध्यान आया की मैं किताब झोपड़ी में ही मै भूल गया था
जाकर उसे कही छुपा देता हु नहीं तो गुड़िया के हाथ न लग जाए, जब मै गुड़िया की ओर जाने लगा तब गुड़िया को मैंने फ़ोन पर यह कहते सुना की चल रंडी मै तुझसे बाद में फ़ोन करती हूँ।।
गुडिया : मुस्कुराते हुए क्या हुआ भैया काम में मन नहीं लग रहा क्या या फिर भूख लगी है, अगर भूख लगी हो तो आम चूस लो काफी पके और बड़े बड़े है,
मैने गुड़िया के तने हुए आमो को देखते हुए कहा
हाँ भुख तो लगी है पर तू अपने आम मुझे कहा चुसने देगी।
गुडिया : मुस्कुराते हुये, तुम मुझसे कहते ही नहीं।
नहीं तो मै क्या अपने भाई को अपने आम न चुसा दूँ।
कालू : चल ठीक है जब मुझे चुसना होगा मै तुझसे कह दुँगा।, इतना कह कर मै झोपड़ी के अंदर गया लेकिन जहा मैंने किताब रखी थी वह वहाँ नहीं थी, अब तो
मै पक्का समझ गया की किताब गुड़िया ने ली है, तभी आज वह पूरी रंडी की तरह मेरे ऊपर चढ़ चढ़ कर मजे ले रही थी, जरुर उसने भाई और बहन की चुदाई वाली कहानी पढ ली थी इसीलिए आज उसकी चुत इतनी गरमा रही है।
मै बाहर आया और गुड़िया की ओर देखा तो वह मुसकुराकर मुझे देखते हुए पहले आम को दबा कर उसका रस बाहर निकाली और फिर मुझे देखते हुए अपनी रसीली जीभ बाहर निकाल कर उसे चाटने लगी, मेरा मन तो किया की अपनी रंडी बहना को वही नंगी करके खूब कस कस कर उसकी मस्त फुली चुत में लंड पेल दू लेकिन मै मन मार कर रह गया और गुड़िया कहने लगी, आओ भइया बैठो।
कल्लु : नहीं गुड़िया बाबा अकेले काम कर रहे है मुझे भी उनकी मदद करना होगा।
गुडिया : माँ कब आएगी खाना खाने का टाइम तो हो गया बड़ी भुख लगी है।
कालू : बस आती ही होगी थोड़ी देर और राह देख ले और फिर मै बाबा के साथ काम में लग गया, कुछ देर बाद माँ नजर आई, और फिर मै और बाबा हाथ मुह धोकर पेड़ की छाँव मै बैठ गए सामने गुड़िया और माँ बैठी थी और उनके सामने मै और बाबा, हमने खाना खाया और फिर बाबा कहने लगे की भाई मेरी तो आज तबियत ठीक नहीं लग रही है इसलिए मै तो घर जाकर आराम करुँगा।
निर्मला तु और कल्लु वो सामने की घास बची है उसे मिल कर काट लेना और उधर गट्ठर बना कर रख देना।
बाबा के जाने के बाद वह बिरजु आ गया और माँ के पैर छुता हुआ कहने लगा पाय लागूं बड़ी माँ।
निर्माला : क्यों रे बिरजु आज कल तो तू इधर का रास्ता ही भूल गया, कहा है तेरी माँ।
बीरजु : बड़ी माँ वहाँ खेत में है, संतोष चाची का खेत नदी के उस पार था और चूँकि नदी में पानी न के बराबर था इसलिए माँ ने गुड़िया से कहा चल गुडिया
तूझे चाची के खेत दिखा कर लाती हु और फिर माँ ने मेरी ओर देखते हुये कहा कल्लु मै अभी एक घंटे में आती हु तब तक तू वहाँ की घास काटना शुरू कर दे फिर मै भी आकर कटवाती हु और माँ गुड़िया के साथ जाने लगी।,
बीरजु बराबर गुड़िया के बोबो को देख रहा था और जब गुड़िया जाने लगी तो वह उसके चूतडो को घुरने लगा, मैंने बिरजु को देखा और जब मैंने गुड़िया के चूतडो
को देखा तो वह बहुत मटक रहे थे, लेकिन तभी मेरी नजर माँ के चूतडो पर पडी तो मुझे मजा आ गया माँ के चूतड़ गुड़िया से काफी बड़े और हैवी नजर आ रहे थे, जिन्हे देखते ही लंड अकड गया था।
कल्लु : क्यों रे आज कल दिन भर अपने खेतो में ही घुसा रहता है गांव में भी कम नजर आता है।
बीरजु : तुझे क्या करना है दादा मै घर में रहु या बाहर।
कालू : अच्छा बिरजु मैंने सुना है तू चुदाई की कहानी की किताब पढता है।
बीरजु : सकपकाते हुये, तुम ।।।।तुमसे किसने कह दिया, मै ऐसे काम नहीं करता हूँ।
कालू : झूठ न बोल मुझे सुख लाल ने सब बता दिया है जब तुम दोनों शहर गए थे और वह तुमने किताब ख़रीदी थी
बीरजु : अरे दादा तुम उसकी बात कहा मान गए वह तो पक्का मादरचोद है।
कालू : अच्छा सुख लाल तो तेरा दोस्त है ना।
बीरजु : अरे दोस्त तो है दादा लेकिन है पक्का मादरचोद।
कालू : वह भला क्यो।
बीरजु : अरे दादा एक दिन मै उसके घर गया तो उसकी माँ ऑंगन में नंगी होकर नहा रही थी और सुख लाल छूप कर अपनी माँ को पूरी नंगी देख रहा था और अपना लंड मुठिया रहा था।
कालू : इस हिसाब से तो तू भी पक्का मादरचोद है।
बीरजु : मुझे देख कर सकपकाते हुये, मै क्यों मादरचोद होने लगा।
कालू : अच्छा कल तो नदी के अंदर झाड़ियो के पास चाची के साथ क्या कर रहा था।
मेरी बात सुन कर बिरजु का गला सूखने लगा और वह हकलाने लगा और कहने लगा वो तो ।।।। वो तो दादा माँ के पांव में काँटा लगा था मै उसे ही निकाल रहा था।
कालू : झूठ न बोल तू समझता है मै कुछ जानता नही, मैंने सब देखा था की तो काँटा निकालने के बहाने क्या देख रहा था।
बीरजु : अपने माथे का पसीना पोछते हुये, नहीं तुम्हे धोखा हुआ है दादा मै कुछ नहीं देख रहा था मै तो बस माँ के पैर में लगे काँटे को निकाल रहा था।
कल्लु : अबे भोसडी के मुझसे नखरे न चोद, नहीं तो समझ लो मै कहा कहा ढिंढोरा पिटूंगा।
बीरजु : तुम गलत सोच रहे हो दादा।
कालू : ज्यादा होशियारी नहीं बेटा, खा जा अपनी माँ की कसम की तू चाची की मस्त फुली हुई चुत नहीं देख रहा था।
बीरजु : बिना कुछ बोले अपने मुह को निचे झुकाये खड़ा था।
कालू : अब क्यों बोलति बंद हो गई।
बीरजु : दादा मुझे माफ कर दो आगे से ऐसा नहीं करुँगा।
कालू : मुस्कुराते हुये, एक शर्त पर माफ़ कर सकता हूँ।
बीरजु : वह क्या।
कालू : तो मुझे वचन दे की आज से मै जो कहुंगा मेरी हर बात मानेगा।
बीरजु : मेरे पांव पकड़ते हुये, दादा तुम तो वैसे भी बड़े भाई हो, आज से यह बिरजु तुम्हरा दास हो गया पर दादा तुम यह बात किसी को नहीं बताओगे ना।
कालू : नहीं बताउंगा, लेकिन तुझे मेरा एक काम करवाना पडेगा।
बीरजु : कौन सा काम।
कालू : मुझे भी चाची की फुली हुई चुत देखना है।
बीरजु : लेकिन दादा यह सब मुझसे कैसे होगा वो तो उस दिन इतफ़ाक़ से मुझे माँ की चुत के दर्शन हो गये, नहीं तो माँ तो मुझे छोटा बच्चा ही समझती है।
और बापु तो शहर में नौकरी करता है और महिने भर में आता है और माँ अपनी चुत कभी कभी खुद ही रगड लेती है।
कल्लु : अच्चा यह बता तेरा मन भी होता है न अपनी माँ संतोष को नंगी करके चोदने का।
बीरजु : मुस्कुराते हुये, अरे दादा मन होने से माँ चोदने को थोड़े ही मिल जयेगी ।
कालू : अगर तू मेरी मदद कर दे तो मै तुझे तेरी माँ को चोदने की व्यवश्था कर सकता हूँ।
बीरजु : लेकिन कैसे।
कालू : कल दोपहर को मै तेरे खेतो में आउंगा तब वही बात करेगे लेकिन यह बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिये।
बीरजु : ठीक है दादा लेकिन तुम भी वह नदी वाली बात किसी से न कहना।
कालू : हाँ ठीक है चल अब तो यहाँ से कट ले कल मिलेगे उसके जाने के बाद मै खेतो में जमी घास काटने लगा और उधर माँ और गीतिका चाची के खेतो की ओर पहुच गई थी।
संतोष चाची : और सुनाओ दीदी तुम्हे तो आजकल मेरे पास बेठने की भी फुर्सत नहीं है।
निर्माला : नहीं रे ऐसी बात नहीं है, बस काम में ही लगी रहती हूँ।
संतोष : गीतिका को सामने टहलते हुए उसके मोटे मोटे लहराते चूतडो को देख कर, क्यों दीदी अब तो गीतिका भी बड़ी हो गई है, इसकी शादी वादी के बारे मे
सोचा है की नही।
निर्माला : अरे अभी तो वह और आगे पढना चाहती है कहती है अभी तो मै छोटी हूँ।
सन्तोष : अरे कहा छोटी है उसके चूतडो का उठाव तो देख, इसकी उम्र में तुम और मै तो बच्चे जन चुकी थी और वह कहती है की छोटी है, अच्छा तुम ही
बाताओ अभी बुढों के सामने नंगी करके खड़ी कर दो तो उनका लंड खड़ा हो जाए।
निर्माला : चुप कर रंडी, अभी वो सुन लेगी तो क्या सोचेगी।
संतोष : अरे दीदी सुन लेगी तो कुछ न सोचेगी, आज कल तो लड़किया आपस में यही सब बाते करती ही है, और सुनाओ जब से भैया ने तुम्हे चोदना बंद किया है तब से तुम कुछ ज्यादा ही गदरा गई हो, अब तो चलने पर भी तुम्हारे चूतड़ खूब मटकने लगे है।
निर्मला : तू भी तो लंड के लिए तरसती रहती है, तेरा आदमी भी तो शहर में ही पड़ा रहता है, इसीलिए तुझे दिन रात यह सब बाते ही सूझती है।
संतोष: अरे दीदी, सुबह से घाघरे से चुत का पानी पोछना शुरू करती हु तो घाघरा पूरा गीला हो जाता है, कई बार तो बिरजु भी कहने लगता है, माँ तेरा घघरा
कहा से गीला हो गया।
निर्माला : लो तो अब हालत इतनी ख़राब है की बेटा खुद माँ को बता रहा है की तेरे चुत से रस बह बह कर तेरे घाघरे को गीला कर रहा है, कही तेरे घाघरे की
गंध सूँघ कर तेरा बेटा समझ न जाये की यह पानी तो उसकी अपनी माँ की फुली चुत से रह रह कर रिस रहा है।
संतोष : अरे दीदी आज कल के लोंडो का कोई भरोषा नहीं हम उन्हें बच्चा समझते है और वह हमें नंगी करके चोदने का सोचने लगते है।
निर्माला : ऐसा क्या हो गया।
संतोष : अरे क्या बताऊ दीदी कल नदी पार करते हुए मेरे पेरो में काँटा लग गया तब मैंने बिरजु से कहा बेटा देख जरा काँटा कहा लगा है तो उसने मेरी टाँगो
को उठा कर देखना शुरू किया और फिर मैंने उसे ध्यान से देखा तो मुआ मेरे घाघरे के अंदर से मेरी चुत देखने की कोशिश कर रहा था।
निरमला : तूने कुछ कहा नही।
संतोष : मैंने कहा क्या कर रहा है जल्दी निकाल, तो कहने लगा माँ निकाल तो रहा हु बहुत गहरा लगा है थोड़ा पैर और ऊपर उठाओ, मुझे तो लगता है उसने मेरी पुरी फटी हुई चुत को खूब अच्छे से देखा है।
निर्माला : वह तो मस्त हो गया होगा तेरी फुली चुत देख कर।
संतोष : हाँ दीदी वह तो मेरा पैर छोड़ ही नहीं रहा था और मेरी टांगो को कस कर पकडे हुए ऊपर उठा रहा था।
निर्माला : तेरा बेटा अब जवान हो गया है उसे भी चोदने का मन करता होगा अब उसके लिए लुगाई का बंदोबस्त कर ले नहीं तो वह कही तुझे ही न छोड़ दे,
यह कहते हुए निर्मला हँस पडी।
संतोष : हसो मत दीदी, जिसके घर खुद शीशे के होते है उसे दूसरो के घरो में पथ्थर नहीं फ़ेकना चहिये।
निर्माला : क्या मतलब।
संतोष : मतलब की केवल मेरे ही घर जवान बेटा नहीं है, तुम्हारे भी एक जवान बेटा है और वह तो और भी मुस्टंडा हो गया है, कही ऐसा न हो की तुम मुझ पर हसो और वह तुम्हे ही चोद दे।
निर्माला : नहीं मेरा बेटा बड़ा भोला है वह ऐसी नजरे मुझ पर डाल ही नहीं सकता।
संतोष : अरे दीदी ऐसे भोले ही तो ज्यादा खुराफ़ाती होते है, कभी गौर करना अपने बेटे की नज़रो पर, जरुर तुम्हारे चूतडो को घूरता होगा।
निर्माला : चुप कर गीतिका आ रही है।
गीतिका : कहो चाची कैसी हो।
संतोष : मै तो ठीक हु गीतिका तू बता जब से शहर पढने गई है अपनी चाची को तो भूल ही गई।
गीतिका : अरे चची भूली होती तो माँ को ले कर यहाँ क्यों आती, अब तो कभी आप आ जाओ तो आपको शहर घुमा देति हूँ।
सन्तोष : अरे बिटिया अपने ऐसे भाग्य कहा, तेरे चाचा रहते तो है पर मुझे ले जाने की उनको फुर्सत कहा है।
गीतिका : अरे वो नहीं ले जाते तो क्या हुआ आप ही चलो मेरे साथ।
संतोष : देख कभी मोका लगा तो जरुर चलुंगि।
निर्माला : चल संतोष अब मै चलती हु बड़ा काम पड़ा है और कल्लु अकेले लगा होगा आज तो उसके बाबा की भी तबियत ठीक नहीं लग रही थी तो वह भी घर
चले गए है।
थोड़ी देर बाद माँ वहाँ से वापस आ गई और फिर गुड़िया आराम से खटिया पर लेट गई और माँ अपनी गुदाज मोटी गाण्ड मेरे मुह की ओर करके निचे बेठी और घास काटने लगी।
थोड़ी देर बाद घास काटते काटते हम दोनों एक दूसरे के सामने आ गए तभी मेरी नजर माँ की दोनों जांघो की गैप में पड़ी तो मेरी आँखे खुली रह गई, मेरी माँ की मस्त फुली हुई चिकनी चुत अपनी फांके
फैलाये मेरी और देख रही थी, माँ की भोसडी पर एक भी बाल नहीं था और बहुत चिकनी लग रही थी, उसकी चुत की फाँके बहुत फुली हुई नजर आ रही थी, और माँ का ध्यान जमीन पर घास काटने में लगा हुआ था।
मा की मस्त बुर देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया था और धोती में बड़ा भारी तम्बू बनाये हुए था, मै टक टकी लगा कर माँ की मस्त चुत देख रहा था, घास
काटते हुए माँ जब बैठे बैठे आगे बढ़ती तो उसकी फुली चुत की फाँके और भी खुल जाती और माँ की चुत का गुलाबी रसीला छेद भी नजर आ रहा था, तभी माँ ने मुझे अपनी मस्त चूत को घुरते हुए देख लिया और पहले तो माँ ने ध्यान नहीं दिया फिर जब उसे मेरे लंड का तम्बू नजर आया तो उसकी नजरे मेरी नज़रो से मिली और मा मंद मंद मुस्कुराते हुए दूसरी ओर घुम गई और घास काटने लगी, मेरा लंड अकड़ा जा रहा था और मैंने अपने लंड को धोती के ऊपर से मसलते हुए माँ की चूत की कल्पना करने लगा।
निर्माला : मन ही मन में मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन झुका कर अपनी फटी चुत और उसकी फुली फाँको को देखति हुई, सोचने लागि, बाप रे कल्लु का लंड कितना मोटा और बडा लग रहा है, कैसे मेरी भोस को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, उसका लंड मेरी भोस को देख कर कैसे किसी डण्डे की तरह खड़ा हो गया था, संतोष सच ही कहती है आज कल के लड़को का कोई भरोषा नहीं है।
पर मेरी बुर क्यों फूल रही है, और निर्मला ने अपनी बुर को हाथ लगा कर देखा तो उसके हाथ में पानी आ गया, उसके अपनी बुर को रगडा और फिर कुछ सोच कर, खड़ी हो गई और कल्लो की ओर देख, और उसकी नजर कल्लु के तने हुए लंड पर पडी, तो वह सोचने लगी हाय राम यह तो और भी बड़ा हो गया, कितना मस्त लंड है कल्लु का।
निर्माला : बेटे मै वहा का गठ्ठर इसमें मिला देती हु तू यही बैठ कर बांध लेना और निर्मला अपने भारी चूतडो को मटकाते हुए जाने लगी, उसकी घुटनो तक के घाघरे में उसकी गोरी पिण्डलिया और मोटी जांघो की झलक दिखाई दे रही थी, और वह यह देखना चाहती थी की कल्लु उसके भारी चौड़े चौड़े चूतडो को देखता है की नही, जब उसने पीछे मुड कर देखा
तो कल्लु अपनी माँ की मोटी लहराती गाण्ड को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, और निर्मला की साँसे तेज चलने लगी, निर्मला गठ्ठर लेकर वापस कल्लु की ओर आने लगी और उसकी निगाहें कल्लु के मोटे लोडे पर ही थी।
निर्माला को तभी संतोष की काँटा लगने वाली बात याद आ गई और निर्मला को यह भी याद आया की कैसे संतोष का बेटा काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की
गुलाबी रसीली बुर को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, क्या सोच रहा होगा बिरजु अपनी गदराई माँ की मस्त चुत देख कर, जरुर उसका मन अपनी माँ की चुत में मुह डाल कर चुस्ने का कर रहा होगा।
या फिर वह अपनी माँ की फुली हुई चुत देख कर अपने मोटे लंड को ड़ालने के बारे में सोच रहा होग, पर यह सब मै क्यों सोच रही ह, मेरी चुत इतनी क्यों मस्त हो रही है।
मै भी बिलकुल ध्यान नहीं रखती हु कैसे मैंने अपने ही बेटे को अपनी मस्त गदराई चुत दिखा दी, पूरी खुल के फ़ैली हुई थी मेरे बेटे ने तो मेरा गुलाबी छेद भी देख लिया होगा।
पर मेरा मन ऐसा क्यों कर रहा है की मै उसे फिर से अपनी भोस दिखा दूँ, तभी मेरे पैरो में कुछ थोड़ा सा चुभा और न जाने क्यों मैंने जोर से कहा आह राम काँटा लग गया।
और मै वही अपनी मोटी जांघे फैला कर जमीन पर बैठ गई।
कल्लु : क्या हुआ माँ।
निर्माला : देख तो बेटा मेरे तलवो में काँटा घुस गया है और फिर मैंने अपनी टांगे उसके मुह की ओर उठा दी।हाय क्या टांगे थी माँ की बहुत चिकनी गोरी और गदराई लग रही थी मैंने उसकी गुदाज पिण्डलियों को
पकड़ कर काँटा देखते हुए कहा, कहा लगा है माँ मुझे तो दिखाई नहीं दे रहा, माँ ने अपनी जांघो को और फ़ैलाते हुए कहा जरा झुक कर अच्छे से देख बेटे, मैंने जैसे ही झुक कर माँ की टांगो को और ऊपर किया। उसकी मस्त फुल्ली चुत अपनी फाँके फ़ैलाये मुझे देख रही थी और उसकी चुत का गुलाबी छेद पूरा पानी से भरा नजर आ रहा था, क्या मस्त भोस थी माँ की।
निर्माला : कल्लु की ओर देखते हुए सोचने लगी कैसे किसी प्यासे सांड़ की तरह देख रहा है अपनी माँ की चुत को ऐसा लगता है मुह डाल कर मेरी चुत को खा जाएगा।
उसका लंड कितना बड़ा है, पूरा काला और खूब मोटा होग, मेरी चुत को तो पूरी फाड् कर रख देगा, हे भगवन मै यह सब क्या सोच रही हु और अपने बेटे को अपनी चुत खोल कर दीखाते हुये मेरी चुत इतना मस्ता क्यों रही है, कितना पानी रिस रहा है बुर से।
निर्माला : दिखा बेटे।
कालू : माँ की भोस को ताड़ते हुये, हाँ माँ नजर तो आ गया है पर तू पीछे हाथ टीका कर आराम से बैठ जा मै अभी निकालता ह, माँ मुझे देखति हुई पीछे अपने हाथ टीका कर बैठ गई और उसकी जाँघे अपने आप और
भी खुल कर चौड़ी हो गई अब माँ की भोस की फाँके पूरी खुली हुई थी और मै उसकी एक टाँग पकडे बस उसके तलवे सहला रहा था, कुछ देर तक माँ की मस्त चुत घुरने के बाद मैने देखा माँ भी कनखियों से मेरे लंड के उठाव को देख रही है, पर माँ की बुर कितनी मस्त और रसीली है, कल बिरजु भी चाची की यानि अपनी माँ की बुर को ऐसे ही देख देख कर मजे ले रहा था।
लागता है बिरजु अपनी माँ को खूब चोदना चाहता है, पर मेरी माँ की गुदाज चुत है कितनी चौड़ी और फटी हुई चुत है माँ की इसमें मेरा लोडा पूरा समां जाय तो कितना मजा आयेगा।
निर्माला : निकला बेटे, मेरे पैर ऊपर उठाये उठाये दर्द करने लगे है।
कालू : बस माँ निकलने वाला है तू अपने पैर को ऊपर ही उठाये रहना बस अभी तेरे अंदर घुसा काँटा निकल जाएगा।
कुछ देर तक मै माँ की चुत घूरता रहा फिर मैंने पैर निचे रखते हुए कहा माँ काँटा निकल गया है।
निर्माला : आह बड़ा दर्द हुआ रे।
कालू : ज्यादा मोटा था ना।
निर्माला : मंद मंद मुस्कुराते हुये, हाय रे बहुत ही मोटा था क्या।
उस दिन पूरा दिन मेरे सामने माँ के मोटे मोटे चूतड़ और मस्त फुली चुत ही घूमते रहा, अगले दिन गुड़िया जाने को तैयार हो गई।
कालू : गुड़िया अब कब आयेगि।
गीतिका : भैया अब तो जल्दी ही आउंगी और कुछ दिनों की छुटटी लेकर आउंगी, मैंने गीतिका को साईकल पर बेठा लिया और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे लंड से सट गई फिर साईकल चलाते हुये मै उससे बाते करने लगा, और फिर बस स्टैंड आ गया और गुड़िया एक दम से मेरे सिने से लग गई, आज पहली बार मुझे गीतिका के मोटे मोटे कसे हुए दूध का मस्त सा
एहसास हुआ क्योंकि गीतिका ने अपनी छातिया बहुत जोरो से मेरे सिने से चिपका ली थी, मैंने भी गुड़िया के गालो को चुमते हुए एक बार उसके भारी चूतडो में हाथ फेर दिया।
गुडिया : भैया मुझे आपकी सबसे ज्यादा याद आती है, मै आपको बहुत मिस करुँगी।
कालू : मुझे भी तेरे बिना अच्छा नहीं लगता तो जल्दी से एक लम्बी छुटटी लेकर आजा फिर हम खूब मजे करेगे।
गुड़िया : रोते हुए ओके भेया।
कालू : जरा एक बार मुसकुराकर कर बोल।
गुडिया : मुस्कुराते हुए बाय भैया आई लव यु, उसके बाद बस चल दी और कल्लु बुझे बुझे मन से वापस गांव की और साईकल मोड़ देता है।
होस्टल में मोनिका टी वी देख रही थी और फिर गीतिका आ गई गीतिका को देख कर मोनिका उससे चिपक गई।
मोनिका : क्यों परी क्या विचार है, अपना रसीला जूस पिलाओगी।
गीतिका : रुक जा पहले मुझे चेंज तो कर लेने दे।
मोनिका : गीतिका का हाथ पकड़ कर बेड पर खीचते हुये, मेरी जान तू तो मुझे नंगी ही अछि लगती है।
गीतिका : पहले मुझे वो निग्रो वाली मूवी तो दिखा।
मोनिका : लगता है तो भी बड़ी चुदासी है अपने गांव में किसी का तगड़ा लंड ले लेती ना।
गीतिका : यार मोका ही नहीं लगा नहीं तो लंड तो बहुत है।
मोनिका : वो देख उस निग्रो के मोटे और काला लंड की बात कर रही थी मैं।
गीतिका : हाय क्या मस्त लंड है, कितना मोटा है।
मोनिका : क्या बात है आज तेरी चुत पहले से ही पानी छोड़ रही है।
गीतिका : अरे मेरी चुत तो 4 दिन पहले से ही पानी छोड़ रही है।
मोनिका : क्यों ऐसा क्या हो गया।
गीतिका : अरे इस बार गांव में आम खाने में बड़ा मजा आया, मै अपने भैया के ऊपर चढ़ कर आम तोड़ रही थी और भैया मुझे अपनी गोद में उठाये खड़े थे।
मोनिका : क्या बात कर रही है, फिर तो तेरे भैया ने तुझे खूब मसला और दबोचा होगा।
गीतिका : हाँ पर मै भी जानबूझ कर घाघरे के निचे पेंटी पहन कर नहीं गई थी मै पहले से ही भैया के साथ घाघरे के निचे नंगी जाने को रेड्डी हो गई।
मोनिका : ऐसा क्योँ।
गीतिका : मैंने भैया की एक किताब देखी जिस्मे भाई और बहन की चुदाई की कहानिया लिखी थी बस मैंने वह पढ़ी और मुझे भैया की नीयत का अन्दाजा हो गया।
मोनिका : तेरा मतलब यह है की तुझे ऐसा लगता है जैसे तेरे भैया तुझे चोदना चाहते हो।
गीतिका : हाँ और फिर जब मै उनके ऊपर चढ़ी तो कई बात तो मैंने अपनी चुत भी उनके मुह से रगड दी।
मोनिका : तो तूने अपनी चुत मरवाया क्यों नही, वही आम के बगीचे में खूब तबियत से चुद लेती किसी को पता भी नहीं चलता।
जीतिका : नहीं यार भैया भाई बहन की चुदाई की किताबे पढ़ते है इससे यह पक्का तो नहीं होता न की वह मुझे अपनी बहन को ही चोदना चाहते है।
मोनिका : गीतिका के मोटे मोटे दूध दबाते हुये, अच्छा तो अगर मैडम के भैया उनको पूरी नंगी करके चोदना चाहे तो क्या आप चुद्वाओगि।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मै कैसे चुदवाऊंगी, भला कोई अपने सगे भाई से अपनी चुत मारवाता है क्या।,
मोनिका : अरे रंडी परी आज कल तो लोग अपने बाप से चुदवा लेते है वह तो फिर भी भाई है, और देखना जब तेरे भैया का लंड तेरी बुर में घुसेगा तो तुझे सबसे ज्यादा मजा आएगा।,
गीतिका : आह थोड़ा दाने को सहला न, कितना कस कस कर चोद रहा है वह काला।
मोनिका : अच्छा तूने लंड देखा है तेरे भैया का।
गीतिका : कपडे के उपर से देखा है बहुत बड़ा और मोटा नजर आता है, बिलकुल काला होगा।
मोनिका : मुस्कुरा कर यह कैसे कह सकती है।
गीतिका : मुस्कुराकार, उनके नाम पर गया होगा।
मोनिका : यार तू भी न इतना अच्छा मोका था तुझे चुद ही लेना था, बोल कब चुदेगी अपने भैया से।
गीतिका : तू ही बता यार मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।
मोनिका : अरे इसमें समझना क्या है कॉलेज से छुटटी मार और पहुच जा अपने गांव, घर में तबियत ख़राब का बहाना कर लेना और आराम से एक महिने खूब कस कर चुत मरवा लेना अपने भैया से।
गीतिका : नहीं यार अभी जाऊंगी तो ठीक नहीं रहेगा। कुछ समय बाद जॉउगी, ले अब तो चूस कर मुझे थोड़ी राहत तो दे, उसके बाद दोनों एक दूसरे की मस्त रसीली बुर को चुस्ती हुई सो गई।
करीब 2 महिने बीत चुके थे, और फिर बारिश शुरू हो गई और इस बार गीतिका एक लम्बी छुटटी लेकर चली वह अब मस्ती के मूड में थी, और फिर गीतिका बस से उतरी और सामने कल्लु को खड़ा देखा।
मुस्कराते हुए उसके सिने से लग गई, कल्लु ने भी अपनी बहन की गुदाज जवानी को अपनी बांहो में भर लिया और फिर गीतिका को साईकल पर बेठा कर गांव की ओर चल दिया।
कल्लु : गुड़िया इस बार तो जीन्स पहन कर नहीं आई।
गीतिका : मुस्कुरा कर क्यों आपको मै जीन्स में ज्यादा अच्छी लगती हु क्या।
कालू : हाँ वो तो है, वैसे तो सभी कपडो में मस्त दिखती है।
गीतिका : पर आपने पहले से सोच रखा होगा की गीतिका जीन्स पहन कर बस से उतरेगी।
कालू : मुस्कुराते हुये, हाँ पहले तुझे जीन्स में देखा था न बस इसिलिये।
धीरे धीरे हम गांव पहुच गए और फिर अगले दिन गीतिका भी मेरे साथ खेतो में चल दी, गीतिका मेरे साथ चल रही थी और उसने आज फिर घाघरा चोली पहना हुआ था, मै उसके गले में हाथ डाल कर चल रहा था और बीच बीच मै उसके मस्त उभरे हुए चूतडो को भी सहला देता था, खेत में पहुंचने के बाद गीतिका काफी खुश होते हुये कहने लगी भैया बारिश के बाद गांव में कितनी हरियाली हो जाती है, अब तो कही भी नरम नरम घास में बैठ जाओ।
गीतिका : भैया आम का मौसम इतनी जल्दी क्यों ख़तम हो गया।
कालू : अरे तो क्या साल भर आम लगे रहेगे।
गीतिका : भैया मुझे तो बोरियत हो रही है।
कालू : चल तुझे नदी की तरफ घुमा कर लाता हूँ।
गीतिका : खुश होते हुए हाँ भैया चलो आप मुझे तैरना सीखाने वाले थे ना।
कालू : अरे ऐसे घाघरा चोली में तुझसे तैरते नहीं बनेगा कल दूसरे कपडे पहन कर आना फिर तुझे तैरना सीखा दुँगा।
गीतिका : अच्छा ठीक है, मै खुद भी घबरा रही थी की कही भैया अभी मुझे घाघरा उतार कर तैरने के लिए न कहने लगे नहीं तो उनसे क्या कहूँगी की मै अंदर चडडी
पहन कर नहीं आई हूँ।
तभी सामने से बिरजु आ गया और
बीरजु : अरे गीतिका दीदी तुम्हे मेरी माँ बुला रही है, वह नदी किनारे कपडे धो रही है जाओ चली जाओ।
उसकी बात सुन कर गीतिका मेरी ओर देखने लगी तब मैंने कहा गुड़िया जा चलि जा मै थोड़ी देर में आता हूँ। मेरे कहने पर गुड़िया वहाँ से जाने लगी और उसके चूतडो को बिरजु घुरते हये उसके पीछे पीछे जाने लगा।
कालू : ये बिरजु रुक तू कहा जा रहा है।
बीरजु : अरे दादा हमें भी नहाना है नदी किनारे माँ कपडे धो रही है हम तो सिर्फ गीतिका दीदी को बुलाने आये थे माँ पूछ रही थी।
कालू : अरे नहा लेना पहले तू मेरी बात तो सुन आ बैठ यहॉ, बिरजु मेरे बगल मै बैठ गया और मैंने उसके काँधे पर हाथ फेरते हुए कहा, अच्छा बिरजु यह बता कभी तूने चाची को मुतते हुए देखा है या नहि।
बीरजु : देखा है भेया।
कालू : कैसी है तेरी माँ की चूत, बड़ी मोटी धार के साथ मुतति होगि।
बीरजु : अरे भैया माँ की चुत तो बहुत मस्त और बिलकुल चौड़ी और गुलाबी है जब मुतती है तो बड़ी मोटी धार निकलती है लेकिन भैया।
कालू : अबे लेकिन क्या बे।
बीरजु : दादा माँ से भी ज्यादा बड़ी और मस्त फुल्ली हुई चुत है बड़ी माँ की और जब वह मुतती है तो उनकी चुत से पेशाब की धार इतनी मोटी निकलती है की क्या बताऊ।
कालू : अबे हरामि तूने कब देख ली मेरी माँ की चूत।
बीरजु : वो दादा जब बड़ी माँ और माँ दोनों खेत में बैठ कर बाते करती है तब उन्हें पेशाब लगती है तो झोपडी के पीछे जाकर मुतती है और बस मै झोपडी के अंदर से छूप कर उनकी मस्त चुत के दर्शन कर लेता हु।
कालू : तू तो बड़ा हरामि है साले, फिर क्या करता है चुत देख कर।
बीरजु : दादा वाही खड़ा होकर मुट्ठ मार लेता हु बड़ा मजा आता है।
कालू : यार मुझे भी अपनी माँ की चुत के दर्शन करवा दे।
बीरजु : क्यों बड़ी माँ की चुत नहीं देखना चाहोगे, बड़ी माँ तो और भी ज्यादा मस्त माल है, मैंने तो बड़ी माँ और माँ के मोटे मोटे चूतडो को भी पूरा नंगा देखा है, सच दादा अगर तुम बड़ी माँ को नंगी देख लो
तो तुम्हारा लंड पानी छोड़ देगा।
कल्लु : तूने मेरी माँ और चाची के चूतडो को कब देखा है।
बीरजु : अरे दादा नदी के किनारे के पेड़ के ऊपर चढ़ कर जब माँ और बड़ी माँ नहाने आती है, तब कई बार दोनों नंगी होकर ही नदी में नहा लेती है, दादा मै तो जब बड़ी माँ के मोटे मोटे चूतडो को घाघरे के उपर से मटकते देखता हु तो मुझे उनकी गाण्ड मारने का बड़ा मन करता है।
कालू : और क्या क्या देखा तूने जरा खुल के बता ना।
बीरजु : दादा मैंने तो दोनों को गन्दी बाते करते हुए भी सुना है और तो और अपनी माँ को मैंने अपनी चुत में ऊँगली पेल कर मुट्ठ मारते हुए भी देखा है।
कालू : कहा वही झोपडी के पीछे जाकर मुट्ठ मारती है क्या।
बीरजु : हाँ।
कल्लु : तूने मेरी माँ को मुट्ठ मारते हुए नहीं देखा।
बीरजु : नहीं पर एक बार बड़ी माँ को मैंने ऐसी हालत में देखा की क्या बताऊ मै तो मस्त हो गया था, जानते हो बड़ी माँ एक बार झोपडी के पीछे मुतने गई और खड़े खड़े ही अपनी चुत से मोटी धार मारने लगी
सच दादा बड़ी माँ को खड़ी खड़ी मुतते देखने पर ही मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया था।
कालू : साले तू तो बड़े मजे मार रहा है, अब मेरा भी कुछ करवा दे।
बीरजु : दादा मै क्या करवा सकता हु तुम अपने हिसाब से देख लो और वैसे भी कौन सा तुम्हारी या मेरी माँ हमसे चुदवा लेगी।
कालू : साले तू तो कोशिश कर रहा है न अपनी माँ को पटाने की।
बीरजु : अरे तुम क्या जानते नहीं मेरी माँ को वह मुझसे क्या पटेगी, उलटे मैंने कोई हरकत की तो मारेंगी अलग।
कालू : अच्छा एक बार चाची की मस्त चुत के दर्शन तो करवा दे, देख तूने तो काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की चुत को खूब फैला फैला कर देखा है एक बार हमें ही दिखा दे।
बीरजु : चलो कुछ मोका लगा तो बताऊँगा अभी तो मै जाता हु।
कालू : सुन माँ और गीतिका को भेज देना।
थोड़ी देर बाद माँ और गीतिका आ रही थी और मै खेतो के काम में लग गया, तभी माँ मेरे पास आकर बैठ गई और घास काटने लगी उसका मुह मेरी ओर था और उकडू बैठ कर घास काटते हुए जब वह थोड़ी आगे बढ़ी तो उसकी जाँघो में फसा घाघरा निचे सरक गया और माँ की मस्त फुली हुई बड़ी बड़ी फाँको वाली चुत एक दम से खुल कर मेरे सामने आ गई, बिलकुल गुलाबी और उसकी चुत का बड़ा सा दाना ऐसे तना हुआ था की दिल कर रहा था की उसकी पूरी चुत को
मुह में भर कर चूस लु और खूब कस कस कर नंगी करके चोदूं अपनी माँ को।
मा का चेहरा लाल हो रहा था और उसकी नजर मेरे धोती में छूपे हुए मस्त काला लंड पर थी, पर मै उस समय बहुत उत्तेजित हो गया जब मैंने गौर से देखा की
मा की चुत से हलके हलके पानी रिस रहा है, मेरा लंड धोती फाड कर बाहर आने को उतावला हो रहा था।
निर्माला : कल्लु तुझे चाची ने शाम को बुलाया है उसे कुछ काम था।
कालू :क्या काम था।
निर्माला : मुस्कुरा कर अब यह तो खुद ही पूछ लेना, न जाने उसे तुझसे क्या काम है दो तीन दिन से रोज तेरे बारे में पूछती है।
कालू : होगा कुछ बोझा उठाने का काम।
निर्माला : अब तेरे चाचा तो यहाँ रहते नहीं और बिरजु भी अभी छोटा ही है, हो सकता है चाची के पास तेरे लायक कोई काम हो, यह कह कर माँ मुस्कुरा दी
मेरा लंड माँ की बातो से और भी खड़ा हो रहा था, खेर माँ कोई भी काम हो करना तो पड़ेगा ही आखिर मेरी सागी चाची जो है।
निर्माला : कभी अपनी माँ का भी ख़याल आता है तुझे अपनी माँ का भी काम कर दिया कर।
कालू : माँ की मस्त फुल्ली चुत देखते हुये, तू बोल तो सही तेरे तो सारे काम सबसे पहले करुँगा।
निर्माला : कल्लु के लंड को देखते हुये, जा पहले चाची का काम तो कर दे फिर मेरा भी कर देना, उस दिन शम को मै चाची के खेतो में चला गया और सामने चाची
झोपडी के बाहर बैठ कर एक ट्यूबवेल के पानी से अपने घाघरे को जांघो तक चढ़ाये हुए अपनी गोरी गोरी जांघो और पिण्डलियों को धो रही थी, मेरा लंड चाची की गदराई जाँघो को देख कर मस्त खड़ा हो गया, चाची की जाँघे बिलकुल मेरी माँ की तरह ही खूब मोटी और गदराई हुई थी और उनकी जंघे और पिण्डलिया बिलकुल मेरी माँ की मदमस्त जांघो के जैसी गोरी और खूब चिकनी थी, हलाकि माँ की जाँघे और भी ज्यादा मोटी थी लेकिन चाची पूरी मस्ती में अपनी जांघो को रगड रगड कर धो रही थी, उसे बिलकुल भी मेरा ध्यान नहीं था।
और मै भी चाची की गदराई मोटी जांघो को देख कर पागल हो रहा था मेरा लंड धोती में बड़ा सा तम्बू बनाये खड़ा हो गया था और मै अपने लंड को हलके हलके मसल रहा था तभी चाची ने एक दम मेरी ओर देखा और उनकी नजर मेरे मस्त फौलादी लंड पर पड़ गई, चाची को देख हम दोनों की नजरे मिली और फिर मैंने लंड पर से हाथ हटा लिया लेकिन चाची ने अपने घाघरे को निचे नहीं किया और मेरी और मुसकुराकर देखति हुई बोलि, आ कल्लु क्या बात है आज कल तो तू अपनी चाची से बात भी नहीं करता है मेरे पास आना तो दुर की बात है.
कल्लु : नहीं ऐसी बात नहीं है, मेरी निगाहें चाची की मोटी चिकनी जांघो से हट ही नहीं रही थी और चाची मेरी नज़रो को ताड गई थी
चाची : आ बैठ मेरे पास मै जरा हाथ पैर धो लु बड़ी जलन हो रही थी पेरो में और फिर चाची ने अपनी जांघो को सहलाते हुए पानी डालना शुरू किया।
चाची : पानी बड़ा मस्त है कल्लु पियेगा, चाची ने मेरी ओर कातिल निगाहें मारते हुए कहा।
कालू : चाची की जवानी को ऊपर से निचे तक घुरते हुये, हाँ चाची प्यास तो मुझे भी लगी है पीला दो पानी।
चाची एक पत्थर पर बैठी थी और उसके सामने एक गड्ढ़ा था जिस्मे पानी इकठ्ठा होता था। चाची ने पानी की नली पकड़ कर मुझे सामने आने को कहा और उस पत्थर पर ऐसे बैठ गई जैसे मुतने बेठती है।
जब मै सामने आकर बेठा और अपने मुह को झुका कर पानी पिने लगा तब चाची की जांघो की जडो में मेरी नजर गई और मेरी साँसे वही थम गई चाची का मस्त फुला हुआ भोस देख कर मेरा लंड झटके देने लगा मेरी पानी पिने की रफ़्तार धीमी हो गई और मै चाची की फुल्ली हुई फाँके और फ़ाँको के बीच के गहरे कटाव को देख कर मस्त हो गया।
चाची : मुस्कुराते हुए कहने लगी तू तो बड़ा प्यासा है कालू, लगता है सारा पानी पी जाएगा।
कालू : क्या करू चची गर्मी भी तो इतनी है।
चेची : आराम से पी ले कल्लु तेरी चाची की टूबवेल का पानी बड़ा मीठा है।
पानी पिने के बाद मै वही बैठा रहा और चाची की मस्त चुत को देखता रहा।
चाची : और बता मैंने सुना है आज कल तो दिन भर गीतिका तेरे ही आगे पीछे घुमति रहती है।
कालू : हाँ वो तो है आखिर इतने दिनों बाद जो मिलति है मेरी गुडिया।
चेची : लगता है बहुत चाहता है अपनी बहना परी को लेकिन जब वह शादी करके चलि जायेगी तब क्या करेंगा।
कालू : अरे चाची अभी तो वह छोटी है कहा अभी से उसकी शादी कर रही हो।
चाची : अरे क्या बात करता है बेटा, इतनी भरी पूरी जवान तो हो गई है, साल भर पहले ब्याहि होती तो अभी उसकी गोद में बच्चा खेल रहा होता, कभी गौर से देखा नहीं क्या अपनी बहन को।
पुरी तेरी माँ पर गई है, तेरी माँ से कम न पडेगी।
कल्लु : लेकिन चाची माँ तो बहुत मोटी और भारी है, और गुड़िया तो कमसीन लड़की है।
चाची : अरे तेरी माँ शादी के बाद इतनी फैल गई है, अभी गीतिका को देखना जब वह अपने पति के पास से होकर आएगी तो उसका भी अंग अंग खूब फ़ैल जाएगा।
चाची की बाते सुन कर मेरा लंड खूब मस्त हो रहा था और चाची अपनी मस्त चुत फ़ैलाये मुझसे बाते कर रही थी।
चाची : वैसे पिछ्ली बार जब गुड़िया आई थी तब तूने उसे आम चुसाये थे की नहीं या फिर गुड़िया तुझसे केला खाने की जिद कर रही थी, यह बात बोल कर चाची हॅसने लगी, मै भी उनके साथ मुस्कुरा दिया।
कालू : नहीं चाची मैंने उसे खूब आम चुसाये थे, केला तो मैंने पूछा ही नहीं की उसे पसंद है की नही।
चाची : वैसे केला तेरी माँ को बहुत पसंद है, गुड़िया को भी केला खिलायेगा तो उसे भी पसंद आएगा, हर लड़की को केला बहुत पसंद होता है।
कालू : आपको भी केला बहुत पसंद है क्या।
चेची : हाँ रे केला खाने का बड़ा मन करता है लेकिन अब मुझे कौन केला खिलायेंगा।
कालू : मै हु न चाची मुझसे कहो मै केला खिलाऊँगा आपको।
चाची : अपनी जांघो को हिलाते हुये, अरे बेटा कल्लु मै तो तुझसे केला खाने के लिए कब से बेठी हूँ, पर तू अपनी चाची को क्यों खिलायेगा, तू तो लगता है बस अपनी माँ और बहन को ही केला खिलायेंगा।
कालू : अरे चाची मै आपको भी खिलाउंगा, किसी दिन मेरे साथ बाजार तक चलो।
चाची : तो ले चलेगा मुझे अपनी साईकल पर बेठा कर।
कालू : क्यों नहीं जब कहो तब चल देता हूँ। चाची मै जरा पेशाब करके आता हूँ।
चाची : कल्लु : वहाँ झोपडी के पीछे जा कर कर ले।
चाची ने झोपडी के पीछे जाकर मुझे मुतने को कहा तो मुझे कुछ अजीब लगा फिर मै झोपडी के पीछे चला गया और मुझे झोपडी के अंदर से परछाइ नजर आई तो मै समझ गया की चाची छूप कर मेरा लंड देखने वाली है।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाला वह पूरी तरह खड़ा था और खूब मोटा और काला नजर आ रहा था, उधर चाची ने जैसे ही मेरे खड़े लंड को और उसकी मोटाई और लम्बाई को देखा तो वह अपनी चुत को रगडते हुये गहरी साँसे लेने लगी, यह वही जगह थी जहा से बिरजु अपनी माँ और मेरी माँ को मुतते हुए देखता था, मै अपने लंड को खूब सहलाते हुए रगड रहा था और चाची अपनी चुत सहलाते हुए मेरे लंड को खा जाने वाली नज़रो से देख रही थी।
जब मै मूत कर वापस आया तो चाची जल्दी से वापस बहार आ चुकी थी मेरे मुतने के बाद चाची ने कहा मै भी पेशाब करके आती हु कल्लु और फिर चाची अपनी घाघरे में से मटकती गाण्ड को हिलाती हुई जाने लगी और मैंने देखा चाची अपनी गाण्ड मेरे
सामने ही खुजलाती हुई जा रही थी, चाची जैसे ही पीछे गई मै झोपडी में घुस गया और जब मैंने बाहर झाँका तो चाची अपने दोनों हांथो से अपने घाघरे को ऊपर चढा चुकी थी रंडी अंदर से पूरी नंगी बड़ी मस्त लग रही थी उसकी चुत का उभार मुझे पागल कर रहा था।
चाची खड़ी खड़ी अपनी बुर सहलाती जा रही थी और फिर सामने बैठ कर अपनी मस्त भोस में दो उंगलिया पेलने के बाद अंदर बाहर करने लगी, उसके मुह को देख कर लग रहा था की वह मेरे मस्त लंड को सोच सोच कर अपनी बुर सहला रही है।
उसकी भोस बहुत मस्त लग रही थी, ऐसी रसीली चुत देख कर मै भी पागल हुआ जा रहा था, अब तो मेरा मन कर रहा था की चाची को खूब कस कस कर चोदुं। लेकिन मै अभी जल्दीबाज़ी करना नहीं चाहता था।
कुछ देर बाद चाची वापस आ गई और फिर अपने घाघरे से मुझे मुसकुराकर देखते हुए अपनी चुत पोछते हुए कहने लगी, कल तू पक्का मुझे अपनी साईकल पर बेठा कर बाजार ले चलेगा ना।
कालू : हाँ पक्का चाची।
मै वहाँ से खेत में आ गया गीतिका खाट पर लेटी कोई किताब पढ़ रही थी, खेत में माँ और बाबा काम में लगे हुए थे, गीतिका ने एक फ्राक पहनी हुई थी जो उसकी गोरी जांघो को भी दिखा रही थी, गुड़िया ने मुझे देखा नहीं और मै धीरे से उसके पास पहुच गया।
गडिया को बिलकुल भी ध्यान नहीं था और वह एक नंगे फोटो की किताब थी जिस्मे एक औरत एक आदमी के लंड के ऊपर चढ़ कर बेठी थी, गीतिका बड़े गौर से उसके काले लंड और उसकी खुली हुई गुलाबी चुत देख रही थी, गीतिका का एक हाथ उसकी पेंटी के अंदर था और वह अपनी चुत को खूब दबा दबा कर उस रंगीन फोटो को देख रही थी, लेकिन जैसे ही गीतिका की नजर मुझ पर पड़ी वह एक दम से हडबडा
कर उठ बेठी उसे यह समझ नहीं आया की किताब सम्भाले या अपनी चुत से अपने हाथ को बाहर निकाले।
फिर भी मैंने अन्जान बनते हुए न किताब की ओर ध्यान दिया और न ही उसकी चुत की ओर और कहने लगा गुड़िया माँ और बाबा काम में लगे है चल तुझे तैरना सीखना था न, चल इस समय नदी में कोई नहीं होगा बढ़िया मस्त तरीके से तुझे तैरना सीखा दुँगा।
गुडिया खुश होते हुए मानो उसे मन की मुराद मिल गई हो वह मेरे पीछे पीछे चल दी और किसी को फ़ोन लगाने लगी, मै थोड़ा आगे आगे चल रहा था और गुड़िया अपनी सहेली से दबी आवाज में बात कर रही थी।
गुडिया : हाय रंडी खुद चुद रही है या अपनी मम्मी को चुदवा रही है।
मोनिका : अरे मै तो अपनी माँ की चुत में बड़े बड़े लंड खुद पकड़ पकड़ कर पेल रही हु और पिलवा रही ह, पर तू क्यों आज गरम नजर आ रही है।
गुडिया : हाँ गुड न्यूज़ है।
मोनिका : क्या।
गुडिया : नदी में नहाने जा रही ह, आज भैया मुझे तैरना सिखाएगे।
मोनिका : हाय रंडी परी तेरे तो खूब मजे है अपने भैया के मोटे लंङे पर चढ़ चढ़ कर तैरना, और सुन बार बार डुबने का बहाना करके अपने भैया के नंगे बदन से पूरी तरह चिपक जाना, देखना तेरे भैया का मोटा लंड जब तेरी मस्त पाव रोटी की तरह फुली चुत में जब घुसेगा
तो तुझे बड़ा मजा मिलेगा, अपने भैया के मोटे लँड को खूब अपनी चुत से दबा दबा कर चुदवाना, वैसे भी तेरे भैया तेरे जैसी रसीली बहन की चुत तो पहले से ही मारने के बारे में सोचते होगे।
गुडिया : पता नहीं पर उनका कसरती बदन देखते ही मुझे उनके मोटे लंड की कल्पना होने लगती है मेरी भोस खूब मराने के लिए तडपने लगती है।
मोनिका : मेरी रंडी परी आज मोका अच्छा है खूब मरा ले अपने भैया से अपनी चूत, एक बार तबियत से चुद गई तो फिर तेरे मजे हो जाएगे फिर तो दिन भर खेतो में अपने भैया के सामने नंगी ही घुमना बड़ा मजा आएगा, जब तू झुक कर अपने भैया को अपनी मोटी गाण्ड और मस्त उभरी हुई पाव रोटी जैसी चुत दिखाएगी तो तेरे भैया खड़े खड़े ही तेरी चुत में लंड पेल देंगे।
गुडिया : चल अब रख नदी आ गई है।
मोनिका : बेस्ट ऑफ़ लक।
गुडिया : थैंक्स बिच।
नदी में कोई नहीं था और मेरे बदन पर सिर्फ धोती थी, मैंने गुड़िया की तरफ देखा बहुत मस्त लग रही थी एक छोटी सी फ्राक मे।
गुडिया : भैया मुझे तो डर लग रहा है।
कालू : मुस्कुराते हुये, अरे डरती क्यों है तेरा भैया है न तेरे पास।
गुडिया : पर भैया मैंने तो फ्राक पहना है मुझसे तैरते बन जाएगा।
कालू : बन तो जाएगा, वेसे तुझे दिक्कत हो रही है तो अपनी फ्राक उतार दे, निचे तूने चड्ढी तो पहनी होगी ना.
मुझे भैया की बात सुन कर हसी आ गई और मैंने शरमाते हुए मुह निचे करके कहा। भैया मै आपके सामने कैसे फ्राक उतार सकती हूँ।
कालू : क्यों मेरे सामने क्या दिक्कत है।
गुडिया : भैया मुझे आपके सामने शर्म आएगी मैंने अंदर ब्रा नहीं पहनी है।
कालू : अरे पागल यह गांव है माँ और चाची भी जब यहाँ नहाने आती है तो अपने ब्लाउज को पूरा उतार कर ही नहाती है, तूने देखा है ना।
मा तो घर पर भी जब नहाती है तो अपना पूरा ब्लाउज उतार लेती है।
गुडिया : पर भैया इतना कहते ही मेरी नजर भैया के धोती मै खड़े लंड पर पड़ गई और मैंने मन में सोचा भैया मुझे नंगी देखने के लिये मरे जा रहे है तभी उनका लंड इतना बड़ा हो रहा है, मुझे तो समझ नहीं आ रहा था की भैया नाटक कर रहे है जैसे की कुछ नहीं जानते ही नहीं या सचमुच भैया बहुत भोले है, वैसे तो भैया ने कभी ऐसी वैसी कोई हरकत कभी की नहीं पर उनका लंड क्यों इतना खड़ा हो रहा है खेर जो भी हो
मै तो खुद भी अपने बड़े भाई को अपनी मादक नंगी जवानी दिखाने के लिए तड़प रही थी।
वैसे भी भैया मेरे कसे हुए बड़े बड़े दूध को बड़े प्यार से देख रहे थे।
मेरे देखते देखते भैया पानी में उतर गए और मुझसे कहने लगे आजा गीतिका इस गर्मी में नदी में नहाने का मजा ही कुछ और है।
गीतिका : भैया क्या मै सचमुच फ्राक उतार दू कोई आ गया तो।
कालू : अरे पागल इस घाट पर मेरे और चाची के परिवार के अलावा कोई नहीं आता है बाकि गांव के दूसरे तरफ वाले घाट पर जाते है।
अब जल्दी से आ जा, मैंने भैया की बाते सुन कर कहा भैया मै पानी में घूसने के बाद उतार दूंगी।
कालू : तेरी जैसी मरजी अब जल्दी से आजा, गीतिका धीरे धीरे पानी में उतरने लगी उसकी मोटी मोटी छातिया खूब ऊपर निचे सांसो के साथ हो रही थी, जब वह कमर तक पानी में आ गई तो मुझसे कहने लगी भइया मुझे डर लग रहा है आप आओ न ईधर, गुड़िया की आवाज सुन कर मै उसकी ओर गया और उसका हाथ पकड़ कर गहरे पानी की ओर जाने लगा और गुड़िया बस भैया और गहरे में नहीं ओह भैया रुको न।
गीतिका बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ रही थी की उसका पैर एक दम से गहराई में गया और वह मुझसे एक दम से चिपक गई और दोनों पेरो को मेरी कमर में लपेट कर मेरे ऊपर चढ़ गई।
गुडिया : भैया प्लीज निचे मत उतारो मै डूब जॉउंगी, मैंने अपने दोनों हांथो से उसकी गुदाज मोटी गाण्ड को दबोच रखा था, उसकी फ्राक तो न जाने कब की ऊपर हो गई थी और मेरी गदराई बहन पेंटी पहने मेरी कमर में अपनी गुदाज मोटी जाँघे लपेटे हुए मुझसे चिपकी हुई थी।
उसकी मोटी छतियो के नुकीले चुचे मुझे चुभ रहे थे, मेरा मन गुड़िया के मोटे मोटे खरबूजों को खूब कस कर मसलने का कर रहा था।
कालू : गुड़िया तू धीरे से पानी में उतर कर तैर और हाथ और पैर ऐसे चला।
गुडिया : नहीं भैया मुझसे नहीं होगा।
कालू : अरे पागल मै तेरे कमर और पेट को अपने हांथो से सहारा देकर तुझे धीरे धीरे तैरना सिखाउंगा और तू डुबेगी भी नही।
और फिर गुड़िया को धीरे से मैंने उतारा और उसके मुलायम गुदाज पेट को पकड़ कर एक हाथ से उसकी गुदाज मोटी गाण्ड को थामे उसे धीरे धीरे हाथ पैर हिलाने के लिए कहने लगा लेकिन गुड़िया बार बार डुबने लग जाती और जब उसकी सांसे भर गई तो कहने लगी नहीं भैया बस अब मै डूब जॉंउगी।
कालू : अरे तो एक काम कर इस फ्राक के कारन तू फ्री होकर नहीं तैर पा रही है इसे उतार दे।
गुड़ीया : नहीं भैया मै डूब जॉऊंगी।
कालू : अरे मै तुझे ऐसे ही पकडे रहूँगा तो आराम से उतार ले मै तुझे अपनी गोद में उठाये रहुंगा, गुड़िया ने मेरी ओर देखा उसके गुलाबी होंठ पानी में भीग कर और भी सेक्सी लग रहे थे फिर गुड़िया को मैंने पीछे से पकड़ लिया अब गुड़िया ने फ्राक उतारना शुरू किया।
गुड़िया जब फ्राक उतार रही थी तो भैया ने उसे पीछे से पकड़ रखा था और उसके नंगे पेट को धीरे से सहलाते जा रहे थे, उनका लंड तो गुड़िया की पेंटी के ऊपर से उसकी गाण्ड में घुसा जा रहा था, और गुड़िया उनके मस्त मोटे डण्डे का एह्सास साफ साफ अपनी गाण्ड और चुत में महसूस कर रही थी।
तभी गुड़िया ने फ्राक उतार दी और भैया ने उसकी नंगी पीठ को चुमते हुए उसे अपनी ओर घुमा लिया इस बार गुड़िया खुद अपने भैया के नंगे चौड़े सिने को देख कर अपनी दोनों टांगो को फैला कर भैया की कमर से चिपक गई और उसके मोटे मोटे कठोर दूध भैया के सिने से दब गये।
भैया ने गुड़िया को कस कर अपनी बांहो में भर लिया और उसे अपनी गोद में लिए उसकी मोटी जांघो को सहलाते हुए कहने लगे गुड़िया अब तू धीरे से जमीन पर पैर रख पानी तेरे गले तक ही आएगा, गुड़िया ने धीरे से निचे कदम रखा और अचानक उसका पैर एक पत्थर पर पड़ कर फिसल गया।
और गुड़िया ने मेरे हाथ को पकडने की कोशिश की तभी उसके हाथ में मेरा खड़ा लंड आ गया और फिर जल्दी से मैंने गुड़िया को पकड़ कर ऊपर उठाया और जब मैंने उसे अपनी ओर खिंचा तो गुड़िया के तरबुज मेरे हाथो से दब गये, हाय क्या ठोस चूचिया थी मै अपनी बहन के मोटे मोटे दूध के मस्त एह्सास से रोमांचित हो गया और मैंने गुड़िया के गालो को चुमते हुए कहा।
इतनी बड़ी हो गई है लेकिन किसी छोटे से बच्चे की तरह अपने भैया की गोद में चढ़ी है।
गुडिया : हाँ आप से तो छोटी ही हूँ, तो क्या आप अपनी बहन को अपनी गोदी में भी नहीं उठा सकते।
कालू : अच्छा उठा लुँगा पहले तू अच्छे से तैरना तो सीख।
गुडिया : मुझे नहीं सीखना तैरना आप तो मुझे अपनी गोद में उठाये हुए ही नहला दो।
कल्लु : अपने भैया के हाथ से नहा लेगी तु।
गुडीया : क्यों नहीं पहले जब मै छोटी थी तब भी आप मुझे नहलाते थे की नही।
कालू : गुड़िया के दूध को देखता हुआ गुड़िया की गुदाज जांघो को अपनी हंथेली में भर कर मसलता हुआ कहता है, अब तो तू पूरी जवान हो गई है।
अब भला मै तुझे कैसे नहला सकता हूँ।
गडिया : क्यों कभी कभी आप माँ को नहीं नहलाते हो। तो क्या माँ जवान नहीं है, वह तो और भी ज्यादा जवान है।
कालू : अरे कहा मै तो सिर्फ कभी कभी उनकी पीठ रगड देता हु बस।
गुडिया : भले ही पीठ रगडते हो पर माँ है तो मुझसे भी ज्यादा जवान और बड़ी है, गुड़िया ने महसूस किया की भैया से जब वह माँ की बात कर रही थी
तो वह अपने लंड को खूब तेजी से उसकी गाण्ड की दरार में दबा देते थे ऐसा लग रहा था जैसे अपनी बहन की गाण्ड चुत सब फाड देंगे।
कल्लु : अच्छा तू कहती है तो चल तेरी भी पीठ रगड देता हूँ। मै गुड़िया की नंगी पीठ को सहलाने लगा और जब मै उसकी बगल में पहुचता तो वह जान बूझ कर अपने हाथो को ऊपर कर देती और मै उसकी काँख को सहलाने लगता उसकी बगल में बारीक़ बारीक़ बाल उगे हुए थे।
गुडिया : भैया क्या माँ को भी तैरना आता है।
कालू : नहीं लेकिन थोड़ा बहुत तैर लेती है।
गुडिया : आपने माँ को क्यों नहीं सिखाया।
कालू : पहले कई बार सिखाया है।
गुडिया : क्या माँ को सीखने का मन नहीं करता था।
कालू : करता था मुझसे कहती भी थी लेकिन मै कभी उसके साथ नदी आता और कभी नहीं आता।
गुड़िया को भैया की बातो से भोंदुपने की झलक नजर आ रही थी, वैसे भी भैया की गोद में गुड़िया जैसा गरम माल थी। लेकिन वह ज्यादा कुछ कर नहीं रहे थे, पर यह तो था की लंड उनका यह सब समझ रहा था इसीलिए तबियत से तना हुआ था।
गुडिया : भैया अब पीठ ही रगडते रहोगे या यहाँ वह भी रगडोगे, लो मेरे सिने पर रगड़ो बहुत मैल हो गया है। और गुड़िया ने भी अन्जान बनते हुए अपने मोटे मोटे दूध भैया के मुह के सामने रख दिए, भैया काँपते हाथो से गुड़िया के दूध को छु रहे थे तभी गुड़िया ने उनके हाथ को अपने दूध पर दबा कर कहा भैया जरा रोज से रगड़ो नहीं तो मैंल कहा से निकलेगा।
गुड़िया का कहना था की भैया अब थोड़ा जोर से उसके मोटे मोटे थनो को रगडते हुए सहलाने लगा, पर फिर भी उनके हाथ में वह मर्दाना पकड़ नजर नहीं आ रही थी जो उसे चाहिये थी वह तो चाहती थी की भैया उसके मोटे मोटे आमो को खूब दबा दबा कर चुसे और खूब मसले, तभी उसने भैया से कहा भैया तुम माँ को तो बड़ी जोर जोर से रगडते हो फिर आज क्या हुआ है
जरा तेज रगडो।
कालू : गुड़िया तेरे दूध में मेल है ही कहा जो उन्हें रगड कर निकालूं।
भैया की बाते सुन कर गुड़िया को हसी आ गई और उसने कहा दूध के ऊपर का मेल नजर नहीं आता है जब रगडोगे तभी निकलेगा और यह रगडने से जब लाल हो जाएगे तो समझ लेना की इनका मैंल निकल गया है।
कालू भैया अब गीतिका के मोटे मोटे दूध को अब कस कस कर दबा रहे थे और कहने लगे गुड़िया वैसे मैंने माँ के दूध को कभी नहीं रगडा है मै तो सिर्फ उनकी पीठ कभी कभी रगड देता हु बस ।
गुडिया : आह हाय भैया अब तुम सही रगड रहे हो देखना कुछ देर में यह पूरे लाल हो जाएगे और इनका सारा मैल निकल जायेगा पर आप जरा अपने दोनों हांथो से रगडो, उसकी बात सुन कर कल्लु भैया उसके दूध को अब तबियत से मसलने लगा था।
अरे कल्लु कहा चल दिया सूरज सर पर है और तू है की बार बार नदी की तरफ जा रहा है सुबह से तीन दफ़ा जा चूका है।
आज क्या तेरा पेट ख़राब है।
मेरे बाबा ने मुझे खेत से नदी की और जाते हुए देख कर कहा।
मैंने कहा हाँ बाबा आज तो सुबह से पेट गड़बड़ हो रहा है क्या करू बार बार लग रही है।
बाबा ने हँसते हुए कहा जा जल्दी करके आ जा और जरा सोच समझ कर खाया कर फिर तो जब खाने को मिलता है तो तबियत से पेल लेता है और आगा पीछा कुछ नहीं सोचता।
मेरी गाण्ड फ़टी जा रही थी और बाबा था की लैक्चर मार रहा था मै जल्दी से नदी के पास पंहुचा और निचे उतरने लगा।
दरअसल हमारे खेत के पास की नदी गर्मियो में सुख जाती थी और उसमे इतना ही पानी बचता था की लोग अपनी गाण्ड धो सके, मै झाड़ियो के बीच जाकर अपनी धोती खोल कर बैठ गया तभी मुझे कुछ आवाज सी सुनाइ दी।
आवाज किसी औरत की थी, लेकिन आह बीरजु
क्या कर रहा है बेटा की आवाज सुनते ही मेरी तो टट्टी बंद हो गई मैंने जल्दी से अपनी गाण्ड धोइ और चुपके से झाड़ियो के पीछे जहा से आवाज आ रही थी उस तरफ बैठे बैठे ही आगे बढ़ने लगा।
मेरे रोंगटे तो बिरजु शब्द सुनते ही खड़े हो गये थे क्यों की मै उस औरत की आवाज पहचान चूका था वह मेरी चाची संतोष की आवाज थी और मेरे चचेरे भाई का नाम बिरजु था।
बीरजु से मेरी बिलकुल नहीं बनती थी वह मुझसे एक साल छोटा था, लेकिन था मेरा भाई ही पर उसका बाप शहर में पंचायत में नौकर था तो दोनों माँ बेटो के भाव कुछ ज्यादा ही था, घमण्ड सर चढ़ कर बोलता था, लेकिन वही मेरी माँ और चाची में काफी जमती थी, वैसे भी सुना जाता है की पहले माँ बहुत सीधी साधी थी लेकिन जब से चाची से मिली तब से काफी तेज तरार हो गई थी।
अब मै जरा अपने बारे में बता दू फिर कहानी की ओर चलते है।
मेरा नाम कल्लु है मै 20 साल का हु मेरे दादा जी मेरे लिए काफी जमीन छोड़ कर गए जिसमें हम बाप बेटे खेती करते है।
हल चलाते है, खेती किसानी के काम के चलते मेरा शरीर काफी बलिश्त और लम्बा है, मेरे पिता जी की दूसरी शादी हुई है पहली के मरने के बाद मेरे पिता जी ने मेरी माँ निर्मला से शादी कर ली, मेरे पिता जी 50 पार कर चुके है जबकि मेरी माँ उनसे बहुत छोटी केवल 38 साल की है याने मुझसे सिर्फ 18 साल ही बड़ी है, गांव में लड़कियो की शादी कम उम्र में ही हो जाया करती है इसलिए कम उम्र में ही माँ की शादी हो गई और 18 की उम्र में मै पैदा हो गया, मेरी माँ बहुत खूबसूरत और सेक्सी नजर आती है, मेरी एक छोटी बहन भी है 18 साल की जिसका नाम गीतिका है लेकिन प्यार से हम सब उसे गुड़िया भी कहते है, मेरे बाबा का बड़ा मन था उसे डॉक्टर बनाने का इस्लिये उनहोने उसे शहर भेज दिया था पढने के लिये, वह काफी सुन्दर और बिलकुल मेरी माँ के जैसी गदराई हुई और सेक्सी है।
वह पढने में बड़ी तेज है शहर में हॉस्टल में रह कर पढाई करती है और एक महिने में एक बार गांव जरुर आती है।
लेकिन अभी मेरी माँ की तो यह हालत है की उसको देख कर हर किसी का मन उसे चोदने का होता है यह बात मैंने गांव के लोगो की जो नजर मेरी माँ पर
पडती है उससे मैंने जाना। माँ बहुत गदरा गई है और उसके बदन पर चर्बी भी बढ़ गई है जिसके कारन उसका पेट काफी उभरा हुआ नजर आता है वह घाघरा भी नाभि के निचे ही पहनती है, हमारे यहाँ घाघरा और चोली पहनने का ही चलन है माँ का घाघरा घुटनो तक और बहुत घेरे वाला होता है, उनके चुचे और उनकी गाण्ड बहुत उठि हुई और मोटी है, उनकी गाण्ड देखते ही लौंडा खड़ा हो जाये इस बात की ग्यारंटी है, वह भी हमारे साथ खेतो में काम करती है।
हाँ तो जब मैंने देखा की आवाज पास की झाड़ियो के पीछे से आ रही है तब मै झाड़ियो के पास जाकर पीछे देखने लगा, लेकिन खोदा पहाड और निकली चुहिया वाली बात थी, संतोष चाची के पैर में कान्टा लगा हुआ था और उसका बेटा बिरजु उसके पैरो से काँटे
को निकाल रहा था संतोष चाची अपने दोनों हांथो को जमीन पर पीछे टेके हुए अपनी एक टाँग उठा कर अपने बेटे के मुह की ओर देख रही थी।
लेकिन मैंने देखा बिरजु का ध्यान काँटा निकालने की बजाय अपनी माँ के घाघरे के अंदर उसकी जांघो की जोडो की ओर देख रहा था।
संतोष : क्या हुआ मुये कितनी देर लगाएगा तुझसे एक कांटा भी नहीं निकाला जाता है, जल्दी कर मेरा पैर उठाये उठाये दर्द करने लगा है।
बीरजु : अरे माँ काँटा भी तो देखो कितनी बीच में घुसा है जरा चुप चाप बैठो निकाल रहा हु और अपने पैर न हिलाओ।
संतोष चाची आँखे बंद किये हुए अपने चहरे पर सारा दर्द समेटे आह ओहः कर रही थी और बिरजु था की अपनी माँ की बुर देखने की कोशिश कर रहा था, तभी बिरजु ने अपनी माँ की टाँगो को थोड़ा चौड़ा कर दिया और बिरजु तो बिरजू, संतोष चाची की चुत की फटी हुई फाँक
मुझे भी साफ नजर आ गई, वह दोनों नहीं जानते थे की मै बिरजू के जस्ट पीछे वाली झाडी के पीछे बेठा था, अब संतोष चाची की फुली हुई बड़ी बडी फांको वाली बुर साफ नजर आ रही थी, कुछ देर बाद बिरजु ने कहा ले माँ निकल गया तेरा काँटा और फिर संतोष चाची उठ गई और लंगड़ाते लंगडाते चलने लगी।
बिरजु उसके पीछे पीछे जाने लगा और मै चाची की घाघरे में उठि लहराती गाण्ड को देख कर मस्त हो रहा था, यह पहली दफ़ा था जब मैंने चाची की गुदाज
गाँड पर ध्यान दिया था।
चाची के जाने के बाद मै वहाँ से अपने खेतो में आ गया और अपने बाबा के साथ खेत के कामो में हाथ बटाने लगा।
बाबा : कल तो बेटा गीतिका आएगी तू बस स्टैंड जाकर उसे ले आना, मैंने कहा ठीक है बाबा, कुछ देर हमने काम किया उसके बाद दुर से हमें माँ आती हुई दिखाई दी।
मा खाना बना कर हमारे लिए लेकर रोज दोपहर तक आ जाती है, उसके बाद बाबा खाना खा कर फिर से खेती में लग जाता है और मुझे एक दो घंटे अपने खेत की झोपडी में आराम करने को कह देता है, माँ एक दो घंटे काम करती है और फिर वह भी झोपडी में आकर लेट जाती है, शाम को मै और माँ घर आ जाते है और अगले दिन फिर वही खेत किसानी का काम बस हमारी लाइफ ऐसे ही चल रही थी, अभी तक मेरा ध्यान औरतो पर कम ही रहता था लेकिन एक तो संतोष चाची की चुत जबसे मैंने देखा तब से मेरा लंड बहुत परेशान करने लगा था यही वजह थी की आज जब खेत से मै और माँ लौट रहे थे तो अनायास ही मेरी नजर अपनी माँ के बड़े बड़े मटकते गदराए चुतडो पर चलि गई जो की घाघरे में बहुत उछल रहे थे और समा नहीं रहे थे, सच बताऊ माँ को चलते हुए उसके मटकते भारी भरकम चूतडो को देखने पर चलते चलते ही मेरा लंड खड़ा हो गया था।
आज मुझे महसूस हुआ था की मेरी माँ को लोग गांव में क्यों घुरते रहते है और जब वह उनके सामने से अपनी भारी गाँड मटकाते हुए गुज़रती है तब लोग अपने लंड को क्यों मसलने लगते थे।
मा का घाघरा इतना छोटा था की उसके घुटने साफ नजर आते थे और अगर वह बैठती थी तो कई बार
उसकी मोटी मोटी गुदाज जाँघे भी नजर आ जाती थी, उस रात मै ठीक से सोया नहीं मुझे कही चाची की फुली हुई चुत और कभी माँ के लहराते हुए मोटे मोटे चूतड़ नजर आ जाते थे, मै यह भी सोचने लगा था की जब चाची की चुत इतनी फुली और बड़ी नजर आ रही थी तो माँ तो चाची से कई गुणा ज्यादा सुन्दर और तगडे बदन की है फिर उसकी चुत कितनी फुली हुई होगी, मेरे विचार अभी पनपे ही थे जिनमे किसी चिंगारी लगने के बाद उठते धुएं को आग देने का काम मेरी बहन गीतिका ने पूरा कर दिया और मै अपनी चाची माँ और बहन को चोदने के लिए तडपने लगा।
मै बस स्टैंड पर खड़ा शहर से आने वाली बस का इंतजार कर रहा था, तभी बस स्टैंड पर एक किताब बेचने वाला आया और मेरे पास आकर कहने लगा बाबू जी मेहँदी की बच्चो की और गानो की शायरी की बताइये कौन सी बुक लेना पसंद करेंगे, मैंने कहा कहानियो की बुक है, उसने कहा है बाबू जी अकबर बीरबल के चुटकुली, पुराणी दंतक कथाए,
पंचतन्त्र बोलो कौन सी दूँ, मैंने उससे धीरे से कहा चुदाई की कहानियो की किताब है क्या, तब उसने भी धीरे से कहा बाबूजी २० रु की आएगी, मैंने कहा कहानी मस्त है न उसने कहा बाबू जी एक बार पढोगे तो बार बार मुझसे लेकर जाओगे, मैंने उससे वह किताब ले ली और इतने में सामने से बस आ गई और मैंने वह किताब अपनी धोती में कमर पर खोस ली, तभी गीतिका बस से उतरी, मै तो उसे देखता ही रह गया, सच बताऊ गीतिका को ऊपर से निचे तक देखने भर से मेरा लंड खड़ा हो गया था, गीतिका तो बहुत मॉडर्न हो गई थी, उसके खुले हुए बाल होठो पर लिप्स्टीक, एक रेड कलर की टीशर्ट और टाइट जीन्स है क्या लग रही थी,
जब उसने अपनी गुदाज गाण्ड मेरी ओर की तो मै तो उसके जीन्स में न समा सकने वाले चौड़े सी भारी चूतडो को देख कर पागल हो गया और सच पुछो तो मेरे मन में उस समय यह आया की गीतिका की इतनी चौड़ी गाण्ड जीन्स में इतनी मस्त नजर आ रही है तो अगर यह जीन्स मेरी माँ पहने तो उसके चौड़े चूतड़ तो और भी बडे बड़े है जीन्स में माँ की मोटी गाण्ड कैसे नजर आएगी, मै अभी कुछ सोच ही रहा था की मुझे दुसरा झटका तब लगा जब गीतिका, एक दम से भैया कहती हुई मेरे सिने से लग गई मुझे और कुछ एह्सास तो नहीं हुआ पर मेरे सिने से जब उसकी एक झीनी सी टीशर्ट में कसे हुए मोटे मोटे दूध जब दबे तो ऐसा लगा जैसे मेंरा लंड पानी छोड़ देगा।
कल्लु : अरे गुड़िया इतना कह कर मैंने भी उसकी पीठ को और कस कर अपने सिने की ओर दबोचा और उसके मोटे मोटे मस्त दूध के मस्त एह्सास का खूब मजा लिया।
गीतिका अभी भी मुझसे चिपकी हुई थी इसलिए मैंने धीरे से उसकी मस्त गुदाज मोटी गाण्ड पर जीन्स के ऊपर से हाथ फेरा और क्या बताऊ उसके चूतडो के नरम माँस के उठाव ने मुझे पागल कर दिया दिल कर रहा था की अपनी बहन गीतिका के भारी चूतडो और उसके मोटे मोटे दूध को यही खूब कस कस कर दबा डालूं।
कुछ देर बाद गीतिका ने मुझे छोड़ा और कहने लगी अब चलिये भी या यही खड़े रहेगे।
कल्लु : अरे गुड़िया तू तो हर एक दो महिने में बढ़ने लगी है अभी पिछ्ली बार देखा था तो तो काफी छोटी थी और अब एक दम से जवान लड़की के जैसे लगने लगी है,
अगर तू साड़ी पहन कर आती तो मै तो तुझे पहचान ही नहीं पाता।
गीतिका : मुसकुराकर मुझे देखति हुई, भैया मै तो उतनी ही बड़ी हूँ, पर मुझे इस बार ऐसा लग रहा है जैसे आपका अपनी बहन को देखने का नजरिया बदल गया है।तभी तो आपको अपनी बहन बड़ी नजर आ रही है
कल्लु : पता नहीं गुड़िया पर तूने यह कैसे कपडे पहने है भला अपने गांव मै लड़किया ऐसे पेंट शर्ट में कहा रहती है, गांव के लोग कैसी कैसी बाते करने लगते है
गीतिका : मै जानती हु भैया तुम फिकर न करो चलो हम पहले उस सामने वाले काम्प्लेक्स में चलते है वहां मै ड्रेस चेंज कर लेती हु।
कालू : मै अपनी बहन की गुदाज जवानी को देखते हुए कहने लगा, वैसे गुड़िया तू मुझे तो इन कपडो मै अच्छी लग रही है, पर मै सोचता हु गांव घर में कोइ तूझसे कुछ कहे न इसलिए मै कह रहा था।
गीतिका : भैया आप नहीं भी कहते तो भी मै यह ड्रेस चेंज करके गांव जाती क्योंकि मै जानती हु गांव के लोगो को उन्हें बात का बतंगड बनाते देर नहीं लगती है,
पर मुझे यह जान कर अच्छा लगा की आपको मेरी यह ड्रेस अछि लगी है
कालू : अरे पगली तेरी ड्रेस तो ठीक है तू तो कुछ भी पहन लेगी तो अच्छी लगेगी, आखिर मेरी गुड़िया परी है जो इतनी खुबसुरत।
गीतिका : मुस्कुराते हुए चलिये अब इतना भी झूठ मत बोलिये।
कालू : नहीं गुड़िया मै सच कह रहा ह, मैंने तुझसे सुन्दर लड़की आज तक नहीं देखी।
गीतिका : अरे क्या भैया, आप कभी शहर में नहीं रहे हो न इसलिए ऐसी बाते करते हो कभी शहर की लड़कियो को देखते तो पागल हो जाते।
कल्लु : क्यों शहर में तुझसे भी सुन्दर लड़कियाँ रहती है।
गीतिका : लड़किया तो ठीक है भैया पर उनकी ड्रेस जब आप देख लोगे तो आपका तो बस।।।।।।।।।।यह कह कर गीतिका जोर जोर से हॅसने लगी।
कालू : क्या गोल मोल बाते कर रही है, साफ साफ बता ना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, बाद मै बताऊँगी अब चलो भी, उसके बाद गीतिका ने काम्प्लेक्स में जाकर कपडे बदले और अब वह एक येलो सलवार कमीज मे नजर आ रही थी।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, अब कैसी लग रही हु भैया,
कालू : अच्छी लग रही हो।
गीतिका : अच्छा भैया मै आपको पहले ज्यादा अच्छी लग रही थी या अब।
कालू : मुस्कुराते हुए सच कहु तो तू जीन्स और टॉप में मुझे ज्यादा सुन्दर लग रही थी।
गीतिका : मै जानती हु भैया और गीतिका फिर मुस्कुराने लगी, कुछ भी कहो गीतिका इस बार और बार की अपेक्षा कुछ बदली हुई लग रही थी।
गीतिका : भैया अब तो यह खटारा साइकिल बेच दो और कोई बाइक का जुगाड़ करो।
कल्लु : अरे वह तो ठीक है पर यहाँ गाड़ी चलाना आती किसे है।
गीतिका : वह तो मै आपको सीखा दूंगी।
मैने साईकल के पीछे गुड़िया का बैग बांध दिया और फिर साईकल पर चढ़ कर उसे साईकल का डंडा दिखाते हुए कहा, आजा गुड़िया डण्डे पर बैठ जा
गीतिका मेरी बात सुन कर खिलखिला कर हँस पड़ी इस बार तो मै भी उसकी हँसी का मतलब समझ गया था, गीतिका का चेहरा कुछ लाल हो रहा था और वह साईकल के आंगे के डण्डे पर बैठ गई जब वह बेठी तो उसके मोटे मोटे चूतडो से मेरा लंड जो की खड़ा हो गया था टकराने लगा और मै एक दम से सिहर गया,
उपर से गीतिका के बदन से बहुत ही मस्त खुशबु आ रही थी, मै धीरे धीरे साइकिल चलाने लगा और गुड़िया से बात करने लगा।
कल्लु : गुड़िया इस बार कितने दिनों की छुट्टी पर आई है
गीतिका : भैया ८-१० दिन तो रहुँगी।
कालू : तेरी पढाई का क्या पुछु वह तो अच्छी ही चल रही होगी, आखिर तू इतनी होशियार तो है।
गीतिका : आखिर बहन किसकी हूँ।
कालू : अरे इसमें तेरे भैया का क्या बड़प्पन हुआ यह तो सब तेरी मेहनत का नतीजा है, पर यह तो मर्दो जैसे कपडे कब से पहनने लगी, क्या वह सब ऐसे ही कपडे
पहनती है।
गीतिका : भैया आज कल ऐसा ही जमाना है, सब या तो मिनी स्कर्ट या फिर जीन्स पहनती है।
कालू : मिनी स्कर्ट मतलब।
गीतिका : भैया जो स्कर्ट घटनो से भी ऊपर रहती है। उसे मिनी स्कर्ट कहते है।
कालू : तो क्या बड़ी उम्र की औरते भी जीन्स या वह मिनी स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भैया तुम देख लो तो कहोगे की कैसे यह औरते अपने भारी शरीर पर जीन्स पहन कर निकलती है।
कल्लु : क्या हमारी माँ जैसी औरते भी जीन्स या स्कर्ट पहनती है।
गीतिका : हाँ भइया, आज कल सब औरते ऐसे ही कपडे पहनती है।
कालू : तो गुड़िया उन्हें शर्म नहीं आती होगी, ऐसे कपडो में तो बड़ी उम्र की औरते न जाने कैसी दिखती होगी।
गीतिका : क्यों मै जीन्स में आपको अच्छी नहीं लग रही थी।
कालू : नहीं तू तो बहुत अच्छी लग रही थी।
गीतिका : तो फिर अब यह बताओ अगर वह जीन्स माँ पहनेगी तो क्या अच्छी नहीं लगेगी।
कल्लु : पता नही।
गीतिका : पता नहीं क्या अगर तुम माँ को जीन्स और टीशर्ट में देख लो तो तुम तो उन पर मर मिटोगे।
कालू : मतलब।
गीतिका : ओह भैया आप भी न बहुत भोले हो यही नुकसान है गांव में रहने के, अरे बाबा माँ जब यह कपडे पहनेगी तो बहुत सेक्सी नजर आएगी।
अच्छे अच्छे पागल हो जाएगे उन्हें देख कर।
कालू : ये सेक्सी का क्या मतलब होता है गुडिया, मै जानता था लेकिन गीतिका मुझे कुछ ज्यादा ही भोला समझती थी लेकिन वह यह नहीं जानती थी की मेरा भी
एक दोस्त है गोपी जो शहर में रहता था और
वह मुझे नई नई बाते बताता रहता था, सेक्स की बाते भी उसने मुझे बताइ थी इसलिए मुझे उसका मतलब पता था, मै यह तो समझ गया था की गीतिका
जितनी दिखाई दे रही है वह उससे कही ज्यादा सेक्सी है पर इस बार उसमे कुछ ज्यादा ही बदलाव दिखाई दे रहा था।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, भैया अब मै आपको सेक्स का मतलब कैसे बताऊ।
कालू : अरे बोलने वाली चीज न हो तो कर के दिखा दे मै समझ जाऊँगा
मेरी बात सुन कर गीतिका ठहाके लगा कर हॅसने लगी और कहने लगी भैया आप बहुत बुद्दू हो, आपको तो सच में कुछ भी नहीं पता, अगर यह बात
आप शहर में मेरे दोस्तों के सामने बोलते तो लोग आपका मजाक उड़ा उड़ा कर इतना हँसते की उनका पेट् दुखने लगता।
कालू : अरे हमने ऐसा क्या कह दिया, हमको अब उसका मतलब पता नहीं है तो हम क्या करे।
गीतिका : सच भैया आप भी ना।
कालू : अब हँसती ही रहोगी या हमें उसका मतलब भी बतायेगी।
गीतिका : हस्ते हुए भैया मै आपको बाद में उसका मतलब बताऊँगी, मै पगडण्डी से होता हुआ गांव के रास्ते पर पहुच गया। वहाँ आम का बगीचा था और पके हुए आम नजर आ रहे थे, तभी गीतिका ने इशारा करते हुए कहा भैया वो देखो कितना मस्त पका हुआ आम है प्लीज उसे तोड़ो ना।
कल्लु : मैंने साईकल रोकी और फिर गीतिका अपने भारी चूतडो को डण्डे से हटा कर उतर गई, मैंने साईकल खड़ी कर दी और उचक कर उस पके आम को तोड़ने लगा लेकिन वह मेरे हाथ से थोड़ा ऊपर था, मै बार बार ऊपर उचक कर उस आम को तोड़ने की कोशिश कर रहा था लेकिन वह मेरे हाथ से टच होकर रह जाता था।
तभी गुड़िया ने कहा भैया ऐसे नहीं टूटेगा आप एक काम करो मुझे अपनी गोद में उठाओ मै तोड़ती ह, मैंने गीतिका की बात सुन कर उसे अपनी गोद में उठाया, गुड़िया की सलवार इतनी पतले कपडे की थी की मुझे तो ऐसा लगा जैसे मै गुड़िया को नंगी करके उठा रहा हूँ।
मैने गुड़िया की मोटी जांघो पर दोनों हाथो का
घेरा डाल कर उसे ऊपर उठाया, गुड़िया काफी हेल्दी हो गई थी 55 के जी के लगभग वजन होगा मेरे हाथ उसकी जांघो से गुजरते हुए जब गुड़िया के भारी चूतडो
पर पहुचे तो गुड़िया की जांघो और भारी चूतडो के गर्म मांस के एह्सास ने मुझे पागल कर दिया था मै गुड़िया को उठाये हुए उसके मोटे मोटे चूतडो को खूब कस कर दबोचे हुए था और मेरे लंड महराज धोती में टनटना चुके थे, मै गुड़िया के चूतडो को दबाये ऊपर देखने लगा तभी गुड़िया ने मुझे हँसते हुए देखा उसके हाथ में पका हुआ आम था और वह कहने लगी अब उतारो भी आम तो मैंने तोड़ लिया, मैंने धीरे से गुड़िया को छोडना चालु किया।
आउर गुड़िया मेरे बदन से रगड ख़ाति हुई निचे आई और मेरा लैंड गीतिका के चुत वाले हिस्से से रगड खाता गया, गुड़िया ने आम की ख़ुश्बू लेते हुए कह
वाह भैया क्या मस्त पका है।
गीतिका : आओ न भैया थोड़ी देर इस आम की छाया में बेठते है फिर चलते है, मै वही बैठ गया और गीतिका भी बैठ गई और आम के ऊपर के हिस्से को अपने
दान्तो से थोड़ा सा काट कर उसने आम को दबाया और उसका रस चुसते हुए कहने लगी।
गीतिका : वह भैया कितना रसीला और मीठा आम है, मेरी नजर गीतिका के रसीले होठो पर चलि गई और मै उसके रस भरे होठो को हसरत भरी निगाहॉ
से देखने लगा।
गीतिका : लो भैया तुम भी चुसो बड़ा मस्त टेस्ट है इसका।
मै आम चुसना तो नहीं चाहता था लेकिन गीतिका के रसिले होठो और उसकी गुलाबी जीभ को देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया और मैंने सोचा गीतिका का
जूठा आम चुसने का मेरा मन हो गया और मैंने भी गीतिका से आम लेकर चुसने लगा, गीतिका ने कहा भैया चीटिंग नहीं एक बार आप चुसो एक बार मैं।
बस फिर बारी बारी से गुड़िया और मै आम को चुसने लगे।
गीतिका : भैया गांव का माहौल बड़ा अच्छा लगता है यहाँ कितनी शांति है ऐसे में तो कोई कुछ भी करे कोई देखने वाला नहीं है।
कालू : मतलब।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मतलब की मुझे और आम चुसना है और तोड़ो न भैया और फिर गीतिका खड़ी होकर इधर उधर देखने लगी और फिर उसने उछलते
हये एक आम दिखाया और उसे तोड़ने के लिए कहने लगी।
वाह आम भी ऊँचाई पर था और गीतिका ने मेरी ओर देखा और बड़ी स्टाइल में अपने हाथ ऊपर कर दिए की आओ और मुझे गोदी में उठाओ, मेरा लंड तो खड़ा ही था।
इस बार गुड़िया को मैंने पीछे से उठाया, लेकिन आम थोड़ा ऊपर था तब गुड़िया कहने लगी भैया थोड़ा और ऊपर उठाओ न, आप भी न इतने बालिश्त शरीर है आपका और आप अपनी कमसीन और नाजुक बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहे है।
मेरा इतना सुनना था की मैंने गुड़िया को ऊपर किया इस बार गुड़िया की मोटी गाँड बिलकुल मेरे मुह पर दबी थी और मै अपने मुह से गुड़िया के भारी चूतडो को महसूस कर रहा था, इतने में गुड़िया ने कहा भैया बस थोड़ा और उपर, गुडिया का इतना कहना था की मैंने गुड़िया की गाण्ड में हाथ भर कर उसे और ऊपर उठा दिया, मेरा लंड झटके मारने लगा मेरा हाथ गुड़िया की मस्त उभरी हुई चूत और गाण्ड की जडो में फसा हुआ था।
उसकी भरी गदराई जवानी ऐसी थी मनो मैंने किसी बड़ी औरत को ऊपर उठा रखा हो, कुल मिला कर यह था की गीतिका एक मस्त पका हुआ माल हो चुकी थी जिसे अब चुसना बहुत जरुरी हो गया था, मैंने गीतिका के चूतडो और चुत को इस दौरान अपने हाथो से दबा कर देख लिया था, तभी गीतिका ने आम तोड़ लिया और मैं उसे धीरे से निचे उतारने लगा लेकिन वह एक दम से निचे सरक गई और मेरे दोनों हाथो में गुड़िया के सुडौल खूब मोटे मोटे और कसे हुये
मस्त दूध दब गए और तब मुझे एह्सास हुआ की गीतिका के मस्त बड़े बड़े आम खूब मोटे मोटे और खूब कसे हुए है जब मेरा हाथ अपनी बहन के पके
आमो पर पड़ा तो मुझे एक अजीब सा आननद आया और गीतिका मजे से आम चुसने लगी।
वह बीच बीच में मुझे भी आम चुस्ने को दे देति थी।
कुछ देर हम वही आम खाते रहे और फिर गुड़िया को मैंने साईकल पर बैठा लिया और गांव की ओर चल दिया।
हम जब घर पहुचे तो गुड़िया माँ से लिपट गई और फिर मै वहाँ से खेतो में चला गया कुछ देर बाबा के साथ काम किया।
उसके बाद मैं झोपड़ी में चला गया और बाबा खेतो में काम में लगे रहे वहाँ जाकर मैंने अपनी धोती से किताब निकाल कर पढना शुरू किया।
जब मैंने पहली कहानी पढ़ी तो पहली कहानी ही अपनी सगी बहन को चोदने की थी जिसे पढ़ कर मै मस्त हो रहा था, लेकिन किताबे तो मै बहुत बार पढ चूका था पर इस बार मुझे बार बार गुड़िया ही याद आ रही थी गुड़िया की गदराई जवानी रह रह कर मेरे लंड को खड़ा कर रही थी।
कहानी पढने के बाद मै थोड़ी देर लेट गया
शाम को घर पर जब मै पंहुचा अभी मै दरवाजे के बाहर ही था दरवाजे से एक रास्ता घर के अंदर और दुसरा पास के बाथरूम में जाता था।
बाथरूम ऐसा था की उसमे दरवाजा नहीं था और वह तीन तरफ लकड़ी के पटिये लगा कर बनाया गया था।
निर्माला : अरे गीतिका जल्दी नहा ले खाना बन गया है।
गीतिका : बस माँ आती हूँ।
मै समझ गया की गुड़िया बाथरूम में नहा रही है, मेरे मन में गीतिका को नंगी देखने का ख़याल आ गया, जबकि इससे पहले भी उस बाथरूम में माँ या गीतिका
नहाती रही है पर पहले ऐसा ख़याल नहीं आया, मै धीरे से बाथरूम के पीछे की तरफ चला गया और जैसे ही मैंने लकड़ी के गैप से झाँका ।
क्या बताऊ सीधे मेरी आँखों के सामने गुडिया के मोटे मोटे गोरे गोरे चूतड़ थे और क्या उठे हुए और क्या मस्त गांड थी उसकी गाण्ड की दरार में मेरा लंड तो पूरी तबियत से खड़ा हो गया।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाल कर मसलते हुए गीतिका को देखना शुरू किया गीतिका जब भी थोड़ा झुकती तो उसकी फुली चुत की फाँके पीछे से नजर आ जाती और मेरा लंड उसकी फांको
को और फाडने के लिये मचलने लगता था तभी गीतिका मेरी और मुह करके घुम गई और जब मैंने उसके मस्त बड़े बड़े कलमी आमो को देखा तो ऐसा लगा की यह कठोर आम मुझे निचोडने के लिए मिल जाये तो मजा आ जाए, फिर गुड़िया जल्दी जल्दी अपने नंगे बदन पर पानी ड़ालने लगी, उसकी चुत के ऊपर हलके हलके बाल नजर आ रहे थे और चुत का उभार मुझे बहुत उत्तेजित कर रहा था।
कुछ देर में गीतिका ने एक लाल रंग की पेंटी पहन ली और ऊपर उसने ब्रा नहीं पहनी बल्कि एक ब्लू कलर की टी शर्ट पहन लिया और निचे एक टाइट लेगी पहन ली।
उसकी मोटी मोटी जाँघे लेगी में बड़ी मुश्किल से समां रही थी और उसके चुतड़ तो लेगी में और भी चोदने लायक नजर आ रहे थे, गीतिका ने अपनी उत्तरी हुई ब्रा और पेंटी वही छोड़ कर बाथरूम से बाहर आई और घर के अंदर घुस गई।
मै कुछ देर बाद घर के अंदर गया तब माँ खाना बना रही थी और गीतिका बैठ कर खा रही थी, मुझे देखते ही माँ ने कहा कल्लु आजा तू भी हाथ मुह धो कर खा ले।
मैने भी खाना खा लिया उसके बाद बाबा आ गए और माँ उन्हें खाना देने लगी ।
गर्मी ज्यादा थी मै बहार खटिया डाल कर लेता हुआ था और गीतिका माँ और बाबा के पास बेठी थी, मै आँखे बंद किये लेटा था तभी पायल की आवाज सुनाइ दी छन छन छ्न छ्न।
मैंने धीरे से आँखे खोल कर देखा। माँ बाथरूम की तरफ जा रही थी।
मेरा लंड माँ के भारी उठे हुए चूतडो की मतवाली थिरकन देख कर खड़ा हो गया और मै चुपके से बाथरूम के पीछे चला गया, माँ के भरे चूतङ मेरी तरफ थे तभी माँ ने अपने घाघरे को ऊपर चढ़ाया और जब मैंने माँ के चौड़े चौड़े मस्त चूतडो को देखा तो लगा पानी निकल जाएगा।
आज पहली बार मैंने माँ के गोरे गोरे चौड़े चौड़े चूतडो के दर्शन किये थे, माँ वही मुतने बैठ गई और रात के सन्नाटे में मुतने की तेज आवाज ने मुझे पागल कर दिया, माँ काफी देर तक मुतती रही फिर खड़ी होकर अपने घाघरे से चुत पोछती हुई बाहर आ गई।
मै वापस खटिया पर जाकर लेट गया, थोड़ी देर बाद गीतिका मेरे बगल में आकर बैठ गई और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे कमर से टच होने लगी।
गीतिका : क्या भैया सो गए क्या।
कालू : अरे नहीं अभी कहा नींद आएगी, और बता तुझे तो शहर में अच्छा लगता होगा।
गीतिका : हाँ भैया बड़ा मजा आता है काश आप भी मेरे कॉलेज में होते तो मस्त मजा आता।
कल्लु : हाँ मजा तो आता लेकिन गांव में खेती का काम भी तो सम्भालना पड़ता है। इसीलिए तो मै पढने नहीं गया।
गीतिका : भैया रात को आप बाहर यही खटिया पर ही सोते हो क्या।
कालू : हाँ गर्मी में बाहर ठण्डी हवा में सोने का मजा ही कुछ और है।
गीतिका : भैया मै भी यही सो जाउ।
कालू : नहीं तू अंदर ही सो बाबा ग़ुस्सा होंगे, तभी गीतिका के मोबाइल पर कोई फ़ोन आया और वह बातें करने लगी और मै उसकी बात सुनने लगा।
गीतिका : हेलो
मोनिका : क्यों राजकुमारी पहुच गई अपने गाँव।
गेटिका : हाँ यार बड़ा मस्त माहौल है गांव में बड़ी सुहानी हवा चल रही है।
मोनिका : क्या यार तू वहाँ चलि गई यहाँ अब मुझे अकेले ही टाइम पास करना पड़ रहा है, आज एक मस्त डीवीडी ले कर आई हूँ, एक निग्रो एक गोरी को मस्त चोद रहा है।
उस निग्रो का लंड तो बड़ा मस्त है।
गीतिका : अरे यार अभी नहीं बाद में बात करते है।
मोनिका : क्यों क्या हुआ।
गीतिका : मै भैया के पास बेठी हूँ।
मोनिका : मुस्कुराते हुये, भैया के पास बेठी है या भैया की गोद में बेठी है।
गीतिका : चुप कर जो मुह में आया बक देति है।
मोनिका : सच कह रही हु रानी, एक बार अपने भैया की गोद में बैठ कर देख ले तेरे जवान चौड़े चूतडो के वजन से तेरे भैया का लंड न डगमगा जाए तो कहना।
गीतिका : मंद मंद मुस्कुराते हुये, मै फ़ोन रख रही हु।
मोनिका : अच्छा मेरी बात तो सुन।
गीतिका :क्या।
मोनिका : अच्छा तो कुछ मत बोल मै तुझे मूवी का लाइव शो बताती हूँ।
गीतिका : चल तेरे पास ज्यादा बैलेंस है तू बोल मै तो चुपचाप यही बेठी हु।
मोनिका : वो गोरी उस निग्रो के काले काले मस्त मोटे लंड को लोलीपोप की तरह चूस रही है, तू देखति तो तेरा भी मन चुसने का होने लगता।
गीतिका : और वह निगरो।
मोनिका : वह निग्रो उस गोरी की चुत की तरफ मुह करके लेटा हुआ है और अपनी लम्बी जीभ निकाल कर उस गोरी की मस्त चुत को चाट रहा है दोनों ६९ की पोजीशन में एक दूसरे के लंड और चुत को खूब कस कस कर चूस चाट रहे है।
गीतिका : बस कर मोनिका मै अब फ़ोन रख रही हूँ। तुझसे बाद में बात करती हूँ।
मोनिका : अच्छा चल जब फ्री हो तो मिस कॉल कर देना।
कल्लु : तेरी दोस्त थी क्या गुडिया।
गीतिका : हाँ भैया मेरी सबसे पक्की सहेली है
मै केवल धोती पहने हुए था और गीतिका की नजरे मेरे चौड़े सिने की तरफ बार बार चलि जाती थी लेकिन मै कुछ समझ नहीं पाया फिर रात को सब सो गए और
सूबह वही दिनचर्या।
सूबह सुबह गीतिका मस्त घाघरा चोली पहन कर नजर आई मै तो उसकी गोरी गोरी टाँगो को देखता ही रह गया।
जीतिका : भैया मै भी आपके साथ खेतो में चल रही हु।
कालू : ठीक है चल पर खेत दुर है तू थक जायेगी तो।
गीतिका : निकालो न अपनी खटारा साईकल उसी पर बैठ कर चलते है।
कालू : ठीक है चल और मैंने अपनी साईकल निकाली और गीतिका को फिर से कहा चल बैठ डण्डे के उपर, मेरे इतना कहने पर गीतिका मुस्कुराते हुए डण्डे पर
बैठ गई और कहने लगी, भैया आराम से चलाना आपका डंडा मुझे बहुत चुभता है।
गीतिका की बात सुन कर मेरा लंड अकडने लगा था, पर मजा भी बहुत आ रहा था।
कालू : तू क्यों तैयार हो गई सुबह।
गीतिका : भैया कल के रसीले आमो ने बड़ा मजा दिया, आज फिर मुझे ऐसे ही रसीले आम खाना है।
कालू : हाँ हाँ क्यों नहीं अपने खेतो के पास तो बहुत बड़ा बगीचा है वैसे तुझे आम खाता देख मेरा भी मन आम चुसने का होने लगा था नहीं तो मैं
वेसे आम चुसता नहीं हूँ।
गीतिका ; मुस्कुराते हुये, भैया जब आपको अच्छे मस्त रसीले आम चुसने को मिलेँगे तो आप भी नहीं छोडोगे।
कालू : गांव में आम तो बहुत है पर चुसने का समय कहा मिलता है।
गीतिका : फिकर न करो भैया मै आ गई हु न अब मस्त आम चुसाउंगी आपको।
कालू : तू तो दो चार दिन रहेगी और फिर चलि जाएगी, अगली बार कुछ ज्यादा दिनों की छुटटी लेकर आ तो मजा आएगा तब तक शायद बारिश भी हो जाये तो नदी में पानी भी आ जायेगा और फिर मस्त नदी में नहाने का मजा ही अलग होगा।
जीतिका : भैया आपको तैरना आता है।
कालू : हाँ मै तो एक साँस में इस छोर से उस छोर तक तैर कर जा सकता हूँ।
गीतिका : भैया मुझे भी तैरना सीखा दोगे क्या।
कालू : क्यों नहीं पर पहले नदी में पानी तो आने दे।
गीतिका : अगली बार जब आउंगी तब तक बारिश हो ही जायेगी।
कालू : हाँ वह तो है।
जब हम खेतो में पहुच गए तो कुछ देर मैंने काम किया और फिर गीतिका ने रट लगा दी की चलो भैया आम के बगीचे में।
उधर बाबा उसकी रट सुन रहे थे और फिर मुझसे कहने लगे अरे बेटा कल्लु दो दिनों के लिए बिटिया आई है जाता क्यों नहीं उसे मस्त मीठे आमो का रस तो चखा दे।
मै वहाँ से गीतिका को लेकर पास के बगीचे में चल दिया और फिर गीतिका आम देखने लगी तभी वह चिल्लाइ वाह भैया क्या मस्त बड़ा सा पका हुआ आम लगा है।
उसको तोड़ो न, मैंने कहा गुड़िया वह तो बहुत ऊपर है।
गीतिका : तो मुझे उठाओ न अपनी गोद में, मैंने गीतिका के पीछे आकर उसकी कमर पकड़ कर उसे उठाया और जब उसके गुदाज चोदने लायक चूतडो का स्पर्श मेरे लंड से हुआ तो वह गीतिका के घाघरे में घूसने को तैयार हो गया, लेकिन गीतिका को ऊपर उठाने पर भी आम उसके हाथो से थोड़ी दुर ही रह गया और मैंने गीतिका को थक कर निचे उतार दिया।
कल्लु : गुड़िया वह बहुत ऊपर है कोई दुसरा देख ले
गीतिका : पैर पटकते हुए नहीं भैया मुझे तो वही वाला चहिये, आप कैसे उठा रहे हो मुझे आपको तो सचमुच कुछ नहीं आता।
कालू : तो तू ही बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका : मेरे सामने आकर खड़ी हो गई और मेरे नंगे चौड़े सिने को और मेरी बाजुओ को हाथ लगा कर कहने लगी, मेरा भाई इतना बलिश्त है और अपनी कमसिन सी बहन को अपनी गोद में नहीं उठा पा रहा है।
मैने गीतिका के खूब मोटे मोटे कसे हुए दूध पर नजर डालते हुए अपनी नज़रो को निचे फिसलाया और गीतिका के भारी चूतडो और मोटी मोटी गदराई जांघो को देखते हुए कहा ।अब तू कमसीन कहा रही अब तो भरपूर जवान हो गई है 55 के जी तो वजन होगा तेरा फिर कैसे मै तुझे आसानी से उठा लु।
गीतिका : क्या भैया आपके बराबर मरद तो बड़ी बड़ी औरतो को उठा लेते है मै तो फिर भी लड़की हूँ।
कालू : अच्छा बता कैसे उठाऊ तुझे।
गीतिका मेरे सामने आकर मेरे हाथो को पकड़ कर अपनी कमर में रखते हुए कहने लगी पहले झुक कर मेरी जांघो पर अपने हाथ का घेरा डालो और मुझे
उपर उठाओ।
मैने गीतिका की मोटी जांघो को अपनी बांहो में भर कर उसे ऊपर उठाया अब उसके मोटे मोटे चोली में कसे दूध मेरे मुह से टकराने लगे और मै अपने आपको रोक न सका और मैंने अपने मुह को गीतिका के मोटे मोटे बोबो में दबा दिया और उसकी मस्त सुगंध लेने लगा, हाय क्या मतवाली मस्त महक थी मेंरा
लंड तो ऐसा लग रहा था की धोती फाड कर बाहर आ जाएगा।
गीतिका ने अपनी बांहे मेरी गर्दन पर डाले हुए एक हाथ ऊपर बढ़ाया लेकिन आम उसकी पहुच से दुर था,
गीतिका : भैया ऐसे ही उठाये रहना उतारना मत, बस थोड़ा सा और ऊपर उठाओ, अब की बार मैंने अपने हाथो से गीतिका के चौड़े चौड़े मोटे चूतडो को
दबोचते हुए अपने पंजो को उसकी मस्त गुदाज गाण्ड में भर कर और भी ऊपर उठाया।लकिन गीतिका का हाथ आम तक नहीं पहुच रहा था, गीतिका भैया बस
थोड़ा सा और ऊपर करो न, गीतिका का घाघरा ऊपर हो गया और मेरे हाथ गीतिका की नंगी जांघो से होते हुये, जैसे ही उसकी गाण्ड की दरार में पहुचे मै चौक गया और मेरा लंड झटके देने लगा।
गीतिका घाघरे के अंदर पूरी नंगी थी जिसकी मैंने कभी कल्पना भी नहीं की थी, मै तो एक दम से मस्त हो गया और न जाने कहा से मेरे हांथो में इतनी ताकत आ गई की मैंने गीतिका को और ऊपर करते हुए उठा दिया और गीतिका की चुत वाला हिस्सा मेरे मुह के सामने आ गया।
मैने अपनी आँखे बंद कर ली और गीतिका की चुत को अपने मुह पर दबाने लगा, लेकिन घाघरे का अगला हिस्सा चुत को ढके हुए था और मै गीतिका की बुर को
सूँघने की कोशिश कर रहा था, और फिर अचानक मैंने अपने मुह को गीतिका की चुत के ऊपर दबाते हुए उसकी फुली चुत को घाघरे के ऊपर से ही पप्पी लेनी
शुरु कर दी, तभी गीतिका के मुह से आवाज निकली यस और मैंने जब ऊपर देखा तो उसके हाथ में आम आ चूका था।
गीतिका : भैया अब उतारो भी लेकिन आराम से मैंने गीतिका पर पकड़ ढिली की और वह धीरे धीरे निचे की तरफ फ़िसलने लगी, जब वह निचे फ़िसलने लगी तो पहले उसका नंगा पेट मेरे मुह के सामने आया और मैंने भरपूर उसके नंगे पेट पर अपने होठो को फेरा और फिर जब वह और निचे सरकी तो उसके मोटे मोटे दूध मेरे
मुह के सामने आ गये।
लेकिन मुझे यह ध्यान नहीं था की गीतिका जब और निचे सरकेगी तो मेरा खड़ा लंड उसकी चुत को रोक लेगा और जैसे ही गीतिका की चुत मेरे लंड के पास पहुची लंड से उसकी बुर घिस गई और मेरे डण्डे की वजह से शायद गीतिका की फाँके एक बार खुल कर बंद हो गई या फिर उसके भग्नाशे से मेरे लंड
का घर्षण हो गया और गीतिका के मुह से आह जैसे शब्द निकल पड़े और गीतिका अब जमीन पर खड़ी थी।
उसकी नजर मेरी नज़रो से बच कर मेरे खड़े लंड
पर जा रही थी जो धोती के अंदर से तम्बू बनाये खड़ा था और गीतिका के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान फैल गई थी लेकिन उसका चेहरा कुछ लाल हो गया था और
सच कहु तो गीतिका मुझे बहुत चुदासी चुत नजर आ रही थी उसका चेहरा देख कर ही लग रहा था की उसकी बुर जरुर लंड के लिए पानी छोड़ रही होगी, फिर भी मै जानना चाहता था और ऊपर से वह अपनी चड्डी भी पहन कर नहीं आई थी मतलब उसके अंदर कुछ चल जरुर रहा था, गीतिका ने उस आम को चुसना शुरू कर दिया और मै उसके रसीले होठो को देखने लगा फिर जब उसने मेरी ओर नजरे उठा कर देखि तो उसकी नशीली आँखे ऐसी लग रही थी जैसे कह रही हो की भइया अपनी बहन की कुंवारी चुत में अपना मस्त लंड पेल दोगे क्या।
कल्लु : गुड़िया तू आम चूस तब तक मै और दूसरे आम देखता ह, गुड़िया पेड़ के निचे बैठ गई और मै इधर उधर के पेडो पर आम देखने लगा तभी गुड़िया ने आवाज देकर मुझे बुलाया और एक दुसरा आम दीखाते हुए कहने लगी भैया वो वाला तोड़ो देखो कितना मस्त पका है, मै गुड़िया की बात सुन कर उसके मोटे मोटे चोली में कसे उरोजो को देखने लगा, फिर मैंने कहा गुड़िया वह भी बहुत ऊपर है, तब गुड़िया ने झट से अपना हाथ मेरी ओर लम्बा करते हुए कहा तो फिर उठाओ अपनी बहन को अपनी गोद में।
गुडिया की बात सुन कर मेरे लंड की नशे और भी तन गई और गुड़िया जैसे ही मेरे पास आई उसकी मादक ख़ुश्बू ने अलग पागल कर दिया मै झुका और गुड़िया के भारी भरकम चूतडो को अपनी बांहो में कस कर
उसे ऊपर उठा दिया, जब गुड़िया का चिकना पेट मेरे मुह के पास पहुच गया तब गुड़िया ने मेरे सर को पकड़ते हुए कहा भैया और ऊपर करो न अभी तो आम
बहुत दुर है।
मैने गुड़िया की मोटी जांघो को पकड़ा और दुसरा हाथ गुड़िया की गुदाज चौड़ी गाण्ड के निचे लगा दिया, मुझे ऐसा लग रहा था की मेरा लंड फट जाएग, गुड़िया क
गुदाज चूतडो के नरम नरम माँस को दबोचने में बड़ा मजा आ रहा था, तभी मेरी ऊँगली गुड़िया की गाण्ड के जडो में घुस गई और मै तब चौक गया जब गुड़िया की गाण्ड के गैप में उसका घघरा गीला हो रहा था, मै समझ गया की गुड़िया की रसीली बुर खूब पानी छोड़ रही है, मै बिना घबराये गुड़िया की दोनों जांघो की जडो में अपने हाथ को भर कर गुडिया को और ऊपर उठाने लगा।
मेरे हाथ का पूरा जोर गुड़िया की जांघो की जडो में यानि उसकी फुली हुई बुर और गाण्ड के छेद पर लगा हुआ था, जहा से मैंने गुड़िया को दबा रखा था वही उसका घाघरा काफी गीला लग रहा था, अब मुझे गुड़िया की नीयत पर शक होने लगा था, क्या गुड़िया जानबूझ कर चड्ढी पहन कर नहीं आई थी, क्या गुड़िया भी लंड लेने के लिये तडपने लगी है, पर मै तो उसका भाई हु फिर वह.
मैं सोच में डूबा हुआ था तभी गुड़िया ने कहा भैया अब उतारो भी और मैंने फिर से उसे नीचे उतारा और इस बार फिर उसका गुदाज रसीला बदन मेरे बदन से रगड खाता हुआ निचे आया और फिर से गुड़िया की चुत में मेरे खड़े लंड का एह्सास हुआ, गुड़िया के चेहरे पर मंद मंद मुस्कान
थी। जिसे वह दबाते हुए कहने लगी वाह भैया क्या मस्त आम है, उसके बाद एक दो आम और तोड़ने के बाद मैं और गुड़िया खेत में आ गये, गुड़िया खाट पर बैठ कर आम चुस्ने लगी और मै बाबा के साथ काम में
लग गया, मै दुर से गुड़िया को देख रहा था लेकिन वह मोबाइल में न जाने क्या कर रही थी, तभी मुझे ध्यान आया की मैं किताब झोपड़ी में ही मै भूल गया था
जाकर उसे कही छुपा देता हु नहीं तो गुड़िया के हाथ न लग जाए, जब मै गुड़िया की ओर जाने लगा तब गुड़िया को मैंने फ़ोन पर यह कहते सुना की चल रंडी मै तुझसे बाद में फ़ोन करती हूँ।।
गुडिया : मुस्कुराते हुए क्या हुआ भैया काम में मन नहीं लग रहा क्या या फिर भूख लगी है, अगर भूख लगी हो तो आम चूस लो काफी पके और बड़े बड़े है,
मैने गुड़िया के तने हुए आमो को देखते हुए कहा
हाँ भुख तो लगी है पर तू अपने आम मुझे कहा चुसने देगी।
गुडिया : मुस्कुराते हुये, तुम मुझसे कहते ही नहीं।
नहीं तो मै क्या अपने भाई को अपने आम न चुसा दूँ।
कालू : चल ठीक है जब मुझे चुसना होगा मै तुझसे कह दुँगा।, इतना कह कर मै झोपड़ी के अंदर गया लेकिन जहा मैंने किताब रखी थी वह वहाँ नहीं थी, अब तो
मै पक्का समझ गया की किताब गुड़िया ने ली है, तभी आज वह पूरी रंडी की तरह मेरे ऊपर चढ़ चढ़ कर मजे ले रही थी, जरुर उसने भाई और बहन की चुदाई वाली कहानी पढ ली थी इसीलिए आज उसकी चुत इतनी गरमा रही है।
मै बाहर आया और गुड़िया की ओर देखा तो वह मुसकुराकर मुझे देखते हुए पहले आम को दबा कर उसका रस बाहर निकाली और फिर मुझे देखते हुए अपनी रसीली जीभ बाहर निकाल कर उसे चाटने लगी, मेरा मन तो किया की अपनी रंडी बहना को वही नंगी करके खूब कस कस कर उसकी मस्त फुली चुत में लंड पेल दू लेकिन मै मन मार कर रह गया और गुड़िया कहने लगी, आओ भइया बैठो।
कल्लु : नहीं गुड़िया बाबा अकेले काम कर रहे है मुझे भी उनकी मदद करना होगा।
गुडिया : माँ कब आएगी खाना खाने का टाइम तो हो गया बड़ी भुख लगी है।
कालू : बस आती ही होगी थोड़ी देर और राह देख ले और फिर मै बाबा के साथ काम में लग गया, कुछ देर बाद माँ नजर आई, और फिर मै और बाबा हाथ मुह धोकर पेड़ की छाँव मै बैठ गए सामने गुड़िया और माँ बैठी थी और उनके सामने मै और बाबा, हमने खाना खाया और फिर बाबा कहने लगे की भाई मेरी तो आज तबियत ठीक नहीं लग रही है इसलिए मै तो घर जाकर आराम करुँगा।
निर्मला तु और कल्लु वो सामने की घास बची है उसे मिल कर काट लेना और उधर गट्ठर बना कर रख देना।
बाबा के जाने के बाद वह बिरजु आ गया और माँ के पैर छुता हुआ कहने लगा पाय लागूं बड़ी माँ।
निर्माला : क्यों रे बिरजु आज कल तो तू इधर का रास्ता ही भूल गया, कहा है तेरी माँ।
बीरजु : बड़ी माँ वहाँ खेत में है, संतोष चाची का खेत नदी के उस पार था और चूँकि नदी में पानी न के बराबर था इसलिए माँ ने गुड़िया से कहा चल गुडिया
तूझे चाची के खेत दिखा कर लाती हु और फिर माँ ने मेरी ओर देखते हुये कहा कल्लु मै अभी एक घंटे में आती हु तब तक तू वहाँ की घास काटना शुरू कर दे फिर मै भी आकर कटवाती हु और माँ गुड़िया के साथ जाने लगी।,
बीरजु बराबर गुड़िया के बोबो को देख रहा था और जब गुड़िया जाने लगी तो वह उसके चूतडो को घुरने लगा, मैंने बिरजु को देखा और जब मैंने गुड़िया के चूतडो
को देखा तो वह बहुत मटक रहे थे, लेकिन तभी मेरी नजर माँ के चूतडो पर पडी तो मुझे मजा आ गया माँ के चूतड़ गुड़िया से काफी बड़े और हैवी नजर आ रहे थे, जिन्हे देखते ही लंड अकड गया था।
कल्लु : क्यों रे आज कल दिन भर अपने खेतो में ही घुसा रहता है गांव में भी कम नजर आता है।
बीरजु : तुझे क्या करना है दादा मै घर में रहु या बाहर।
कालू : अच्छा बिरजु मैंने सुना है तू चुदाई की कहानी की किताब पढता है।
बीरजु : सकपकाते हुये, तुम ।।।।तुमसे किसने कह दिया, मै ऐसे काम नहीं करता हूँ।
कालू : झूठ न बोल मुझे सुख लाल ने सब बता दिया है जब तुम दोनों शहर गए थे और वह तुमने किताब ख़रीदी थी
बीरजु : अरे दादा तुम उसकी बात कहा मान गए वह तो पक्का मादरचोद है।
कालू : अच्छा सुख लाल तो तेरा दोस्त है ना।
बीरजु : अरे दोस्त तो है दादा लेकिन है पक्का मादरचोद।
कालू : वह भला क्यो।
बीरजु : अरे दादा एक दिन मै उसके घर गया तो उसकी माँ ऑंगन में नंगी होकर नहा रही थी और सुख लाल छूप कर अपनी माँ को पूरी नंगी देख रहा था और अपना लंड मुठिया रहा था।
कालू : इस हिसाब से तो तू भी पक्का मादरचोद है।
बीरजु : मुझे देख कर सकपकाते हुये, मै क्यों मादरचोद होने लगा।
कालू : अच्छा कल तो नदी के अंदर झाड़ियो के पास चाची के साथ क्या कर रहा था।
मेरी बात सुन कर बिरजु का गला सूखने लगा और वह हकलाने लगा और कहने लगा वो तो ।।।। वो तो दादा माँ के पांव में काँटा लगा था मै उसे ही निकाल रहा था।
कालू : झूठ न बोल तू समझता है मै कुछ जानता नही, मैंने सब देखा था की तो काँटा निकालने के बहाने क्या देख रहा था।
बीरजु : अपने माथे का पसीना पोछते हुये, नहीं तुम्हे धोखा हुआ है दादा मै कुछ नहीं देख रहा था मै तो बस माँ के पैर में लगे काँटे को निकाल रहा था।
कल्लु : अबे भोसडी के मुझसे नखरे न चोद, नहीं तो समझ लो मै कहा कहा ढिंढोरा पिटूंगा।
बीरजु : तुम गलत सोच रहे हो दादा।
कालू : ज्यादा होशियारी नहीं बेटा, खा जा अपनी माँ की कसम की तू चाची की मस्त फुली हुई चुत नहीं देख रहा था।
बीरजु : बिना कुछ बोले अपने मुह को निचे झुकाये खड़ा था।
कालू : अब क्यों बोलति बंद हो गई।
बीरजु : दादा मुझे माफ कर दो आगे से ऐसा नहीं करुँगा।
कालू : मुस्कुराते हुये, एक शर्त पर माफ़ कर सकता हूँ।
बीरजु : वह क्या।
कालू : तो मुझे वचन दे की आज से मै जो कहुंगा मेरी हर बात मानेगा।
बीरजु : मेरे पांव पकड़ते हुये, दादा तुम तो वैसे भी बड़े भाई हो, आज से यह बिरजु तुम्हरा दास हो गया पर दादा तुम यह बात किसी को नहीं बताओगे ना।
कालू : नहीं बताउंगा, लेकिन तुझे मेरा एक काम करवाना पडेगा।
बीरजु : कौन सा काम।
कालू : मुझे भी चाची की फुली हुई चुत देखना है।
बीरजु : लेकिन दादा यह सब मुझसे कैसे होगा वो तो उस दिन इतफ़ाक़ से मुझे माँ की चुत के दर्शन हो गये, नहीं तो माँ तो मुझे छोटा बच्चा ही समझती है।
और बापु तो शहर में नौकरी करता है और महिने भर में आता है और माँ अपनी चुत कभी कभी खुद ही रगड लेती है।
कल्लु : अच्चा यह बता तेरा मन भी होता है न अपनी माँ संतोष को नंगी करके चोदने का।
बीरजु : मुस्कुराते हुये, अरे दादा मन होने से माँ चोदने को थोड़े ही मिल जयेगी ।
कालू : अगर तू मेरी मदद कर दे तो मै तुझे तेरी माँ को चोदने की व्यवश्था कर सकता हूँ।
बीरजु : लेकिन कैसे।
कालू : कल दोपहर को मै तेरे खेतो में आउंगा तब वही बात करेगे लेकिन यह बात हम दोनों के बीच ही रहनी चाहिये।
बीरजु : ठीक है दादा लेकिन तुम भी वह नदी वाली बात किसी से न कहना।
कालू : हाँ ठीक है चल अब तो यहाँ से कट ले कल मिलेगे उसके जाने के बाद मै खेतो में जमी घास काटने लगा और उधर माँ और गीतिका चाची के खेतो की ओर पहुच गई थी।
संतोष चाची : और सुनाओ दीदी तुम्हे तो आजकल मेरे पास बेठने की भी फुर्सत नहीं है।
निर्माला : नहीं रे ऐसी बात नहीं है, बस काम में ही लगी रहती हूँ।
संतोष : गीतिका को सामने टहलते हुए उसके मोटे मोटे लहराते चूतडो को देख कर, क्यों दीदी अब तो गीतिका भी बड़ी हो गई है, इसकी शादी वादी के बारे मे
सोचा है की नही।
निर्माला : अरे अभी तो वह और आगे पढना चाहती है कहती है अभी तो मै छोटी हूँ।
सन्तोष : अरे कहा छोटी है उसके चूतडो का उठाव तो देख, इसकी उम्र में तुम और मै तो बच्चे जन चुकी थी और वह कहती है की छोटी है, अच्छा तुम ही
बाताओ अभी बुढों के सामने नंगी करके खड़ी कर दो तो उनका लंड खड़ा हो जाए।
निर्माला : चुप कर रंडी, अभी वो सुन लेगी तो क्या सोचेगी।
संतोष : अरे दीदी सुन लेगी तो कुछ न सोचेगी, आज कल तो लड़किया आपस में यही सब बाते करती ही है, और सुनाओ जब से भैया ने तुम्हे चोदना बंद किया है तब से तुम कुछ ज्यादा ही गदरा गई हो, अब तो चलने पर भी तुम्हारे चूतड़ खूब मटकने लगे है।
निर्मला : तू भी तो लंड के लिए तरसती रहती है, तेरा आदमी भी तो शहर में ही पड़ा रहता है, इसीलिए तुझे दिन रात यह सब बाते ही सूझती है।
संतोष: अरे दीदी, सुबह से घाघरे से चुत का पानी पोछना शुरू करती हु तो घाघरा पूरा गीला हो जाता है, कई बार तो बिरजु भी कहने लगता है, माँ तेरा घघरा
कहा से गीला हो गया।
निर्माला : लो तो अब हालत इतनी ख़राब है की बेटा खुद माँ को बता रहा है की तेरे चुत से रस बह बह कर तेरे घाघरे को गीला कर रहा है, कही तेरे घाघरे की
गंध सूँघ कर तेरा बेटा समझ न जाये की यह पानी तो उसकी अपनी माँ की फुली चुत से रह रह कर रिस रहा है।
संतोष : अरे दीदी आज कल के लोंडो का कोई भरोषा नहीं हम उन्हें बच्चा समझते है और वह हमें नंगी करके चोदने का सोचने लगते है।
निर्माला : ऐसा क्या हो गया।
संतोष : अरे क्या बताऊ दीदी कल नदी पार करते हुए मेरे पेरो में काँटा लग गया तब मैंने बिरजु से कहा बेटा देख जरा काँटा कहा लगा है तो उसने मेरी टाँगो
को उठा कर देखना शुरू किया और फिर मैंने उसे ध्यान से देखा तो मुआ मेरे घाघरे के अंदर से मेरी चुत देखने की कोशिश कर रहा था।
निरमला : तूने कुछ कहा नही।
संतोष : मैंने कहा क्या कर रहा है जल्दी निकाल, तो कहने लगा माँ निकाल तो रहा हु बहुत गहरा लगा है थोड़ा पैर और ऊपर उठाओ, मुझे तो लगता है उसने मेरी पुरी फटी हुई चुत को खूब अच्छे से देखा है।
निर्माला : वह तो मस्त हो गया होगा तेरी फुली चुत देख कर।
संतोष : हाँ दीदी वह तो मेरा पैर छोड़ ही नहीं रहा था और मेरी टांगो को कस कर पकडे हुए ऊपर उठा रहा था।
निर्माला : तेरा बेटा अब जवान हो गया है उसे भी चोदने का मन करता होगा अब उसके लिए लुगाई का बंदोबस्त कर ले नहीं तो वह कही तुझे ही न छोड़ दे,
यह कहते हुए निर्मला हँस पडी।
संतोष : हसो मत दीदी, जिसके घर खुद शीशे के होते है उसे दूसरो के घरो में पथ्थर नहीं फ़ेकना चहिये।
निर्माला : क्या मतलब।
संतोष : मतलब की केवल मेरे ही घर जवान बेटा नहीं है, तुम्हारे भी एक जवान बेटा है और वह तो और भी मुस्टंडा हो गया है, कही ऐसा न हो की तुम मुझ पर हसो और वह तुम्हे ही चोद दे।
निर्माला : नहीं मेरा बेटा बड़ा भोला है वह ऐसी नजरे मुझ पर डाल ही नहीं सकता।
संतोष : अरे दीदी ऐसे भोले ही तो ज्यादा खुराफ़ाती होते है, कभी गौर करना अपने बेटे की नज़रो पर, जरुर तुम्हारे चूतडो को घूरता होगा।
निर्माला : चुप कर गीतिका आ रही है।
गीतिका : कहो चाची कैसी हो।
संतोष : मै तो ठीक हु गीतिका तू बता जब से शहर पढने गई है अपनी चाची को तो भूल ही गई।
गीतिका : अरे चची भूली होती तो माँ को ले कर यहाँ क्यों आती, अब तो कभी आप आ जाओ तो आपको शहर घुमा देति हूँ।
सन्तोष : अरे बिटिया अपने ऐसे भाग्य कहा, तेरे चाचा रहते तो है पर मुझे ले जाने की उनको फुर्सत कहा है।
गीतिका : अरे वो नहीं ले जाते तो क्या हुआ आप ही चलो मेरे साथ।
संतोष : देख कभी मोका लगा तो जरुर चलुंगि।
निर्माला : चल संतोष अब मै चलती हु बड़ा काम पड़ा है और कल्लु अकेले लगा होगा आज तो उसके बाबा की भी तबियत ठीक नहीं लग रही थी तो वह भी घर
चले गए है।
थोड़ी देर बाद माँ वहाँ से वापस आ गई और फिर गुड़िया आराम से खटिया पर लेट गई और माँ अपनी गुदाज मोटी गाण्ड मेरे मुह की ओर करके निचे बेठी और घास काटने लगी।
थोड़ी देर बाद घास काटते काटते हम दोनों एक दूसरे के सामने आ गए तभी मेरी नजर माँ की दोनों जांघो की गैप में पड़ी तो मेरी आँखे खुली रह गई, मेरी माँ की मस्त फुली हुई चिकनी चुत अपनी फांके
फैलाये मेरी और देख रही थी, माँ की भोसडी पर एक भी बाल नहीं था और बहुत चिकनी लग रही थी, उसकी चुत की फाँके बहुत फुली हुई नजर आ रही थी, और माँ का ध्यान जमीन पर घास काटने में लगा हुआ था।
मा की मस्त बुर देख कर मेरा लंड खड़ा हो गया था और धोती में बड़ा भारी तम्बू बनाये हुए था, मै टक टकी लगा कर माँ की मस्त चुत देख रहा था, घास
काटते हुए माँ जब बैठे बैठे आगे बढ़ती तो उसकी फुली चुत की फाँके और भी खुल जाती और माँ की चुत का गुलाबी रसीला छेद भी नजर आ रहा था, तभी माँ ने मुझे अपनी मस्त चूत को घुरते हुए देख लिया और पहले तो माँ ने ध्यान नहीं दिया फिर जब उसे मेरे लंड का तम्बू नजर आया तो उसकी नजरे मेरी नज़रो से मिली और मा मंद मंद मुस्कुराते हुए दूसरी ओर घुम गई और घास काटने लगी, मेरा लंड अकड़ा जा रहा था और मैंने अपने लंड को धोती के ऊपर से मसलते हुए माँ की चूत की कल्पना करने लगा।
निर्माला : मन ही मन में मुस्कुराते हुए अपनी गर्दन झुका कर अपनी फटी चुत और उसकी फुली फाँको को देखति हुई, सोचने लागि, बाप रे कल्लु का लंड कितना मोटा और बडा लग रहा है, कैसे मेरी भोस को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, उसका लंड मेरी भोस को देख कर कैसे किसी डण्डे की तरह खड़ा हो गया था, संतोष सच ही कहती है आज कल के लड़को का कोई भरोषा नहीं है।
पर मेरी बुर क्यों फूल रही है, और निर्मला ने अपनी बुर को हाथ लगा कर देखा तो उसके हाथ में पानी आ गया, उसके अपनी बुर को रगडा और फिर कुछ सोच कर, खड़ी हो गई और कल्लो की ओर देख, और उसकी नजर कल्लु के तने हुए लंड पर पडी, तो वह सोचने लगी हाय राम यह तो और भी बड़ा हो गया, कितना मस्त लंड है कल्लु का।
निर्माला : बेटे मै वहा का गठ्ठर इसमें मिला देती हु तू यही बैठ कर बांध लेना और निर्मला अपने भारी चूतडो को मटकाते हुए जाने लगी, उसकी घुटनो तक के घाघरे में उसकी गोरी पिण्डलिया और मोटी जांघो की झलक दिखाई दे रही थी, और वह यह देखना चाहती थी की कल्लु उसके भारी चौड़े चौड़े चूतडो को देखता है की नही, जब उसने पीछे मुड कर देखा
तो कल्लु अपनी माँ की मोटी लहराती गाण्ड को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, और निर्मला की साँसे तेज चलने लगी, निर्मला गठ्ठर लेकर वापस कल्लु की ओर आने लगी और उसकी निगाहें कल्लु के मोटे लोडे पर ही थी।
निर्माला को तभी संतोष की काँटा लगने वाली बात याद आ गई और निर्मला को यह भी याद आया की कैसे संतोष का बेटा काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की
गुलाबी रसीली बुर को खा जाने वाली नज़रो से देख रहा था, क्या सोच रहा होगा बिरजु अपनी गदराई माँ की मस्त चुत देख कर, जरुर उसका मन अपनी माँ की चुत में मुह डाल कर चुस्ने का कर रहा होगा।
या फिर वह अपनी माँ की फुली हुई चुत देख कर अपने मोटे लंड को ड़ालने के बारे में सोच रहा होग, पर यह सब मै क्यों सोच रही ह, मेरी चुत इतनी क्यों मस्त हो रही है।
मै भी बिलकुल ध्यान नहीं रखती हु कैसे मैंने अपने ही बेटे को अपनी मस्त गदराई चुत दिखा दी, पूरी खुल के फ़ैली हुई थी मेरे बेटे ने तो मेरा गुलाबी छेद भी देख लिया होगा।
पर मेरा मन ऐसा क्यों कर रहा है की मै उसे फिर से अपनी भोस दिखा दूँ, तभी मेरे पैरो में कुछ थोड़ा सा चुभा और न जाने क्यों मैंने जोर से कहा आह राम काँटा लग गया।
और मै वही अपनी मोटी जांघे फैला कर जमीन पर बैठ गई।
कल्लु : क्या हुआ माँ।
निर्माला : देख तो बेटा मेरे तलवो में काँटा घुस गया है और फिर मैंने अपनी टांगे उसके मुह की ओर उठा दी।हाय क्या टांगे थी माँ की बहुत चिकनी गोरी और गदराई लग रही थी मैंने उसकी गुदाज पिण्डलियों को
पकड़ कर काँटा देखते हुए कहा, कहा लगा है माँ मुझे तो दिखाई नहीं दे रहा, माँ ने अपनी जांघो को और फ़ैलाते हुए कहा जरा झुक कर अच्छे से देख बेटे, मैंने जैसे ही झुक कर माँ की टांगो को और ऊपर किया। उसकी मस्त फुल्ली चुत अपनी फाँके फ़ैलाये मुझे देख रही थी और उसकी चुत का गुलाबी छेद पूरा पानी से भरा नजर आ रहा था, क्या मस्त भोस थी माँ की।
निर्माला : कल्लु की ओर देखते हुए सोचने लगी कैसे किसी प्यासे सांड़ की तरह देख रहा है अपनी माँ की चुत को ऐसा लगता है मुह डाल कर मेरी चुत को खा जाएगा।
उसका लंड कितना बड़ा है, पूरा काला और खूब मोटा होग, मेरी चुत को तो पूरी फाड् कर रख देगा, हे भगवन मै यह सब क्या सोच रही हु और अपने बेटे को अपनी चुत खोल कर दीखाते हुये मेरी चुत इतना मस्ता क्यों रही है, कितना पानी रिस रहा है बुर से।
निर्माला : दिखा बेटे।
कालू : माँ की भोस को ताड़ते हुये, हाँ माँ नजर तो आ गया है पर तू पीछे हाथ टीका कर आराम से बैठ जा मै अभी निकालता ह, माँ मुझे देखति हुई पीछे अपने हाथ टीका कर बैठ गई और उसकी जाँघे अपने आप और
भी खुल कर चौड़ी हो गई अब माँ की भोस की फाँके पूरी खुली हुई थी और मै उसकी एक टाँग पकडे बस उसके तलवे सहला रहा था, कुछ देर तक माँ की मस्त चुत घुरने के बाद मैने देखा माँ भी कनखियों से मेरे लंड के उठाव को देख रही है, पर माँ की बुर कितनी मस्त और रसीली है, कल बिरजु भी चाची की यानि अपनी माँ की बुर को ऐसे ही देख देख कर मजे ले रहा था।
लागता है बिरजु अपनी माँ को खूब चोदना चाहता है, पर मेरी माँ की गुदाज चुत है कितनी चौड़ी और फटी हुई चुत है माँ की इसमें मेरा लोडा पूरा समां जाय तो कितना मजा आयेगा।
निर्माला : निकला बेटे, मेरे पैर ऊपर उठाये उठाये दर्द करने लगे है।
कालू : बस माँ निकलने वाला है तू अपने पैर को ऊपर ही उठाये रहना बस अभी तेरे अंदर घुसा काँटा निकल जाएगा।
कुछ देर तक मै माँ की चुत घूरता रहा फिर मैंने पैर निचे रखते हुए कहा माँ काँटा निकल गया है।
निर्माला : आह बड़ा दर्द हुआ रे।
कालू : ज्यादा मोटा था ना।
निर्माला : मंद मंद मुस्कुराते हुये, हाय रे बहुत ही मोटा था क्या।
उस दिन पूरा दिन मेरे सामने माँ के मोटे मोटे चूतड़ और मस्त फुली चुत ही घूमते रहा, अगले दिन गुड़िया जाने को तैयार हो गई।
कालू : गुड़िया अब कब आयेगि।
गीतिका : भैया अब तो जल्दी ही आउंगी और कुछ दिनों की छुटटी लेकर आउंगी, मैंने गीतिका को साईकल पर बेठा लिया और उसकी गुदाज गाण्ड मेरे लंड से सट गई फिर साईकल चलाते हुये मै उससे बाते करने लगा, और फिर बस स्टैंड आ गया और गुड़िया एक दम से मेरे सिने से लग गई, आज पहली बार मुझे गीतिका के मोटे मोटे कसे हुए दूध का मस्त सा
एहसास हुआ क्योंकि गीतिका ने अपनी छातिया बहुत जोरो से मेरे सिने से चिपका ली थी, मैंने भी गुड़िया के गालो को चुमते हुए एक बार उसके भारी चूतडो में हाथ फेर दिया।
गुडिया : भैया मुझे आपकी सबसे ज्यादा याद आती है, मै आपको बहुत मिस करुँगी।
कालू : मुझे भी तेरे बिना अच्छा नहीं लगता तो जल्दी से एक लम्बी छुटटी लेकर आजा फिर हम खूब मजे करेगे।
गुड़िया : रोते हुए ओके भेया।
कालू : जरा एक बार मुसकुराकर कर बोल।
गुडिया : मुस्कुराते हुए बाय भैया आई लव यु, उसके बाद बस चल दी और कल्लु बुझे बुझे मन से वापस गांव की और साईकल मोड़ देता है।
होस्टल में मोनिका टी वी देख रही थी और फिर गीतिका आ गई गीतिका को देख कर मोनिका उससे चिपक गई।
मोनिका : क्यों परी क्या विचार है, अपना रसीला जूस पिलाओगी।
गीतिका : रुक जा पहले मुझे चेंज तो कर लेने दे।
मोनिका : गीतिका का हाथ पकड़ कर बेड पर खीचते हुये, मेरी जान तू तो मुझे नंगी ही अछि लगती है।
गीतिका : पहले मुझे वो निग्रो वाली मूवी तो दिखा।
मोनिका : लगता है तो भी बड़ी चुदासी है अपने गांव में किसी का तगड़ा लंड ले लेती ना।
गीतिका : यार मोका ही नहीं लगा नहीं तो लंड तो बहुत है।
मोनिका : वो देख उस निग्रो के मोटे और काला लंड की बात कर रही थी मैं।
गीतिका : हाय क्या मस्त लंड है, कितना मोटा है।
मोनिका : क्या बात है आज तेरी चुत पहले से ही पानी छोड़ रही है।
गीतिका : अरे मेरी चुत तो 4 दिन पहले से ही पानी छोड़ रही है।
मोनिका : क्यों ऐसा क्या हो गया।
गीतिका : अरे इस बार गांव में आम खाने में बड़ा मजा आया, मै अपने भैया के ऊपर चढ़ कर आम तोड़ रही थी और भैया मुझे अपनी गोद में उठाये खड़े थे।
मोनिका : क्या बात कर रही है, फिर तो तेरे भैया ने तुझे खूब मसला और दबोचा होगा।
गीतिका : हाँ पर मै भी जानबूझ कर घाघरे के निचे पेंटी पहन कर नहीं गई थी मै पहले से ही भैया के साथ घाघरे के निचे नंगी जाने को रेड्डी हो गई।
मोनिका : ऐसा क्योँ।
गीतिका : मैंने भैया की एक किताब देखी जिस्मे भाई और बहन की चुदाई की कहानिया लिखी थी बस मैंने वह पढ़ी और मुझे भैया की नीयत का अन्दाजा हो गया।
मोनिका : तेरा मतलब यह है की तुझे ऐसा लगता है जैसे तेरे भैया तुझे चोदना चाहते हो।
गीतिका : हाँ और फिर जब मै उनके ऊपर चढ़ी तो कई बात तो मैंने अपनी चुत भी उनके मुह से रगड दी।
मोनिका : तो तूने अपनी चुत मरवाया क्यों नही, वही आम के बगीचे में खूब तबियत से चुद लेती किसी को पता भी नहीं चलता।
जीतिका : नहीं यार भैया भाई बहन की चुदाई की किताबे पढ़ते है इससे यह पक्का तो नहीं होता न की वह मुझे अपनी बहन को ही चोदना चाहते है।
मोनिका : गीतिका के मोटे मोटे दूध दबाते हुये, अच्छा तो अगर मैडम के भैया उनको पूरी नंगी करके चोदना चाहे तो क्या आप चुद्वाओगि।
गीतिका : मुस्कुराते हुये, मै कैसे चुदवाऊंगी, भला कोई अपने सगे भाई से अपनी चुत मारवाता है क्या।,
मोनिका : अरे रंडी परी आज कल तो लोग अपने बाप से चुदवा लेते है वह तो फिर भी भाई है, और देखना जब तेरे भैया का लंड तेरी बुर में घुसेगा तो तुझे सबसे ज्यादा मजा आएगा।,
गीतिका : आह थोड़ा दाने को सहला न, कितना कस कस कर चोद रहा है वह काला।
मोनिका : अच्छा तूने लंड देखा है तेरे भैया का।
गीतिका : कपडे के उपर से देखा है बहुत बड़ा और मोटा नजर आता है, बिलकुल काला होगा।
मोनिका : मुस्कुरा कर यह कैसे कह सकती है।
गीतिका : मुस्कुराकार, उनके नाम पर गया होगा।
मोनिका : यार तू भी न इतना अच्छा मोका था तुझे चुद ही लेना था, बोल कब चुदेगी अपने भैया से।
गीतिका : तू ही बता यार मुझे तो कुछ समझ में नहीं आ रहा।
मोनिका : अरे इसमें समझना क्या है कॉलेज से छुटटी मार और पहुच जा अपने गांव, घर में तबियत ख़राब का बहाना कर लेना और आराम से एक महिने खूब कस कर चुत मरवा लेना अपने भैया से।
गीतिका : नहीं यार अभी जाऊंगी तो ठीक नहीं रहेगा। कुछ समय बाद जॉउगी, ले अब तो चूस कर मुझे थोड़ी राहत तो दे, उसके बाद दोनों एक दूसरे की मस्त रसीली बुर को चुस्ती हुई सो गई।
करीब 2 महिने बीत चुके थे, और फिर बारिश शुरू हो गई और इस बार गीतिका एक लम्बी छुटटी लेकर चली वह अब मस्ती के मूड में थी, और फिर गीतिका बस से उतरी और सामने कल्लु को खड़ा देखा।
मुस्कराते हुए उसके सिने से लग गई, कल्लु ने भी अपनी बहन की गुदाज जवानी को अपनी बांहो में भर लिया और फिर गीतिका को साईकल पर बेठा कर गांव की ओर चल दिया।
कल्लु : गुड़िया इस बार तो जीन्स पहन कर नहीं आई।
गीतिका : मुस्कुरा कर क्यों आपको मै जीन्स में ज्यादा अच्छी लगती हु क्या।
कालू : हाँ वो तो है, वैसे तो सभी कपडो में मस्त दिखती है।
गीतिका : पर आपने पहले से सोच रखा होगा की गीतिका जीन्स पहन कर बस से उतरेगी।
कालू : मुस्कुराते हुये, हाँ पहले तुझे जीन्स में देखा था न बस इसिलिये।
धीरे धीरे हम गांव पहुच गए और फिर अगले दिन गीतिका भी मेरे साथ खेतो में चल दी, गीतिका मेरे साथ चल रही थी और उसने आज फिर घाघरा चोली पहना हुआ था, मै उसके गले में हाथ डाल कर चल रहा था और बीच बीच मै उसके मस्त उभरे हुए चूतडो को भी सहला देता था, खेत में पहुंचने के बाद गीतिका काफी खुश होते हुये कहने लगी भैया बारिश के बाद गांव में कितनी हरियाली हो जाती है, अब तो कही भी नरम नरम घास में बैठ जाओ।
गीतिका : भैया आम का मौसम इतनी जल्दी क्यों ख़तम हो गया।
कालू : अरे तो क्या साल भर आम लगे रहेगे।
गीतिका : भैया मुझे तो बोरियत हो रही है।
कालू : चल तुझे नदी की तरफ घुमा कर लाता हूँ।
गीतिका : खुश होते हुए हाँ भैया चलो आप मुझे तैरना सीखाने वाले थे ना।
कालू : अरे ऐसे घाघरा चोली में तुझसे तैरते नहीं बनेगा कल दूसरे कपडे पहन कर आना फिर तुझे तैरना सीखा दुँगा।
गीतिका : अच्छा ठीक है, मै खुद भी घबरा रही थी की कही भैया अभी मुझे घाघरा उतार कर तैरने के लिए न कहने लगे नहीं तो उनसे क्या कहूँगी की मै अंदर चडडी
पहन कर नहीं आई हूँ।
तभी सामने से बिरजु आ गया और
बीरजु : अरे गीतिका दीदी तुम्हे मेरी माँ बुला रही है, वह नदी किनारे कपडे धो रही है जाओ चली जाओ।
उसकी बात सुन कर गीतिका मेरी ओर देखने लगी तब मैंने कहा गुड़िया जा चलि जा मै थोड़ी देर में आता हूँ। मेरे कहने पर गुड़िया वहाँ से जाने लगी और उसके चूतडो को बिरजु घुरते हये उसके पीछे पीछे जाने लगा।
कालू : ये बिरजु रुक तू कहा जा रहा है।
बीरजु : अरे दादा हमें भी नहाना है नदी किनारे माँ कपडे धो रही है हम तो सिर्फ गीतिका दीदी को बुलाने आये थे माँ पूछ रही थी।
कालू : अरे नहा लेना पहले तू मेरी बात तो सुन आ बैठ यहॉ, बिरजु मेरे बगल मै बैठ गया और मैंने उसके काँधे पर हाथ फेरते हुए कहा, अच्छा बिरजु यह बता कभी तूने चाची को मुतते हुए देखा है या नहि।
बीरजु : देखा है भेया।
कालू : कैसी है तेरी माँ की चूत, बड़ी मोटी धार के साथ मुतति होगि।
बीरजु : अरे भैया माँ की चुत तो बहुत मस्त और बिलकुल चौड़ी और गुलाबी है जब मुतती है तो बड़ी मोटी धार निकलती है लेकिन भैया।
कालू : अबे लेकिन क्या बे।
बीरजु : दादा माँ से भी ज्यादा बड़ी और मस्त फुल्ली हुई चुत है बड़ी माँ की और जब वह मुतती है तो उनकी चुत से पेशाब की धार इतनी मोटी निकलती है की क्या बताऊ।
कालू : अबे हरामि तूने कब देख ली मेरी माँ की चूत।
बीरजु : वो दादा जब बड़ी माँ और माँ दोनों खेत में बैठ कर बाते करती है तब उन्हें पेशाब लगती है तो झोपडी के पीछे जाकर मुतती है और बस मै झोपडी के अंदर से छूप कर उनकी मस्त चुत के दर्शन कर लेता हु।
कालू : तू तो बड़ा हरामि है साले, फिर क्या करता है चुत देख कर।
बीरजु : दादा वाही खड़ा होकर मुट्ठ मार लेता हु बड़ा मजा आता है।
कालू : यार मुझे भी अपनी माँ की चुत के दर्शन करवा दे।
बीरजु : क्यों बड़ी माँ की चुत नहीं देखना चाहोगे, बड़ी माँ तो और भी ज्यादा मस्त माल है, मैंने तो बड़ी माँ और माँ के मोटे मोटे चूतडो को भी पूरा नंगा देखा है, सच दादा अगर तुम बड़ी माँ को नंगी देख लो
तो तुम्हारा लंड पानी छोड़ देगा।
कल्लु : तूने मेरी माँ और चाची के चूतडो को कब देखा है।
बीरजु : अरे दादा नदी के किनारे के पेड़ के ऊपर चढ़ कर जब माँ और बड़ी माँ नहाने आती है, तब कई बार दोनों नंगी होकर ही नदी में नहा लेती है, दादा मै तो जब बड़ी माँ के मोटे मोटे चूतडो को घाघरे के उपर से मटकते देखता हु तो मुझे उनकी गाण्ड मारने का बड़ा मन करता है।
कालू : और क्या क्या देखा तूने जरा खुल के बता ना।
बीरजु : दादा मैंने तो दोनों को गन्दी बाते करते हुए भी सुना है और तो और अपनी माँ को मैंने अपनी चुत में ऊँगली पेल कर मुट्ठ मारते हुए भी देखा है।
कालू : कहा वही झोपडी के पीछे जाकर मुट्ठ मारती है क्या।
बीरजु : हाँ।
कल्लु : तूने मेरी माँ को मुट्ठ मारते हुए नहीं देखा।
बीरजु : नहीं पर एक बार बड़ी माँ को मैंने ऐसी हालत में देखा की क्या बताऊ मै तो मस्त हो गया था, जानते हो बड़ी माँ एक बार झोपडी के पीछे मुतने गई और खड़े खड़े ही अपनी चुत से मोटी धार मारने लगी
सच दादा बड़ी माँ को खड़ी खड़ी मुतते देखने पर ही मेरे लंड ने पानी छोड़ दिया था।
कालू : साले तू तो बड़े मजे मार रहा है, अब मेरा भी कुछ करवा दे।
बीरजु : दादा मै क्या करवा सकता हु तुम अपने हिसाब से देख लो और वैसे भी कौन सा तुम्हारी या मेरी माँ हमसे चुदवा लेगी।
कालू : साले तू तो कोशिश कर रहा है न अपनी माँ को पटाने की।
बीरजु : अरे तुम क्या जानते नहीं मेरी माँ को वह मुझसे क्या पटेगी, उलटे मैंने कोई हरकत की तो मारेंगी अलग।
कालू : अच्छा एक बार चाची की मस्त चुत के दर्शन तो करवा दे, देख तूने तो काँटा निकालने के बहाने अपनी माँ की चुत को खूब फैला फैला कर देखा है एक बार हमें ही दिखा दे।
बीरजु : चलो कुछ मोका लगा तो बताऊँगा अभी तो मै जाता हु।
कालू : सुन माँ और गीतिका को भेज देना।
थोड़ी देर बाद माँ और गीतिका आ रही थी और मै खेतो के काम में लग गया, तभी माँ मेरे पास आकर बैठ गई और घास काटने लगी उसका मुह मेरी ओर था और उकडू बैठ कर घास काटते हुए जब वह थोड़ी आगे बढ़ी तो उसकी जाँघो में फसा घाघरा निचे सरक गया और माँ की मस्त फुली हुई बड़ी बड़ी फाँको वाली चुत एक दम से खुल कर मेरे सामने आ गई, बिलकुल गुलाबी और उसकी चुत का बड़ा सा दाना ऐसे तना हुआ था की दिल कर रहा था की उसकी पूरी चुत को
मुह में भर कर चूस लु और खूब कस कस कर नंगी करके चोदूं अपनी माँ को।
मा का चेहरा लाल हो रहा था और उसकी नजर मेरे धोती में छूपे हुए मस्त काला लंड पर थी, पर मै उस समय बहुत उत्तेजित हो गया जब मैंने गौर से देखा की
मा की चुत से हलके हलके पानी रिस रहा है, मेरा लंड धोती फाड कर बाहर आने को उतावला हो रहा था।
निर्माला : कल्लु तुझे चाची ने शाम को बुलाया है उसे कुछ काम था।
कालू :क्या काम था।
निर्माला : मुस्कुरा कर अब यह तो खुद ही पूछ लेना, न जाने उसे तुझसे क्या काम है दो तीन दिन से रोज तेरे बारे में पूछती है।
कालू : होगा कुछ बोझा उठाने का काम।
निर्माला : अब तेरे चाचा तो यहाँ रहते नहीं और बिरजु भी अभी छोटा ही है, हो सकता है चाची के पास तेरे लायक कोई काम हो, यह कह कर माँ मुस्कुरा दी
मेरा लंड माँ की बातो से और भी खड़ा हो रहा था, खेर माँ कोई भी काम हो करना तो पड़ेगा ही आखिर मेरी सागी चाची जो है।
निर्माला : कभी अपनी माँ का भी ख़याल आता है तुझे अपनी माँ का भी काम कर दिया कर।
कालू : माँ की मस्त फुल्ली चुत देखते हुये, तू बोल तो सही तेरे तो सारे काम सबसे पहले करुँगा।
निर्माला : कल्लु के लंड को देखते हुये, जा पहले चाची का काम तो कर दे फिर मेरा भी कर देना, उस दिन शम को मै चाची के खेतो में चला गया और सामने चाची
झोपडी के बाहर बैठ कर एक ट्यूबवेल के पानी से अपने घाघरे को जांघो तक चढ़ाये हुए अपनी गोरी गोरी जांघो और पिण्डलियों को धो रही थी, मेरा लंड चाची की गदराई जाँघो को देख कर मस्त खड़ा हो गया, चाची की जाँघे बिलकुल मेरी माँ की तरह ही खूब मोटी और गदराई हुई थी और उनकी जंघे और पिण्डलिया बिलकुल मेरी माँ की मदमस्त जांघो के जैसी गोरी और खूब चिकनी थी, हलाकि माँ की जाँघे और भी ज्यादा मोटी थी लेकिन चाची पूरी मस्ती में अपनी जांघो को रगड रगड कर धो रही थी, उसे बिलकुल भी मेरा ध्यान नहीं था।
और मै भी चाची की गदराई मोटी जांघो को देख कर पागल हो रहा था मेरा लंड धोती में बड़ा सा तम्बू बनाये खड़ा हो गया था और मै अपने लंड को हलके हलके मसल रहा था तभी चाची ने एक दम मेरी ओर देखा और उनकी नजर मेरे मस्त फौलादी लंड पर पड़ गई, चाची को देख हम दोनों की नजरे मिली और फिर मैंने लंड पर से हाथ हटा लिया लेकिन चाची ने अपने घाघरे को निचे नहीं किया और मेरी और मुसकुराकर देखति हुई बोलि, आ कल्लु क्या बात है आज कल तो तू अपनी चाची से बात भी नहीं करता है मेरे पास आना तो दुर की बात है.
कल्लु : नहीं ऐसी बात नहीं है, मेरी निगाहें चाची की मोटी चिकनी जांघो से हट ही नहीं रही थी और चाची मेरी नज़रो को ताड गई थी
चाची : आ बैठ मेरे पास मै जरा हाथ पैर धो लु बड़ी जलन हो रही थी पेरो में और फिर चाची ने अपनी जांघो को सहलाते हुए पानी डालना शुरू किया।
चाची : पानी बड़ा मस्त है कल्लु पियेगा, चाची ने मेरी ओर कातिल निगाहें मारते हुए कहा।
कालू : चाची की जवानी को ऊपर से निचे तक घुरते हुये, हाँ चाची प्यास तो मुझे भी लगी है पीला दो पानी।
चाची एक पत्थर पर बैठी थी और उसके सामने एक गड्ढ़ा था जिस्मे पानी इकठ्ठा होता था। चाची ने पानी की नली पकड़ कर मुझे सामने आने को कहा और उस पत्थर पर ऐसे बैठ गई जैसे मुतने बेठती है।
जब मै सामने आकर बेठा और अपने मुह को झुका कर पानी पिने लगा तब चाची की जांघो की जडो में मेरी नजर गई और मेरी साँसे वही थम गई चाची का मस्त फुला हुआ भोस देख कर मेरा लंड झटके देने लगा मेरी पानी पिने की रफ़्तार धीमी हो गई और मै चाची की फुल्ली हुई फाँके और फ़ाँको के बीच के गहरे कटाव को देख कर मस्त हो गया।
चाची : मुस्कुराते हुए कहने लगी तू तो बड़ा प्यासा है कालू, लगता है सारा पानी पी जाएगा।
कालू : क्या करू चची गर्मी भी तो इतनी है।
चेची : आराम से पी ले कल्लु तेरी चाची की टूबवेल का पानी बड़ा मीठा है।
पानी पिने के बाद मै वही बैठा रहा और चाची की मस्त चुत को देखता रहा।
चाची : और बता मैंने सुना है आज कल तो दिन भर गीतिका तेरे ही आगे पीछे घुमति रहती है।
कालू : हाँ वो तो है आखिर इतने दिनों बाद जो मिलति है मेरी गुडिया।
चेची : लगता है बहुत चाहता है अपनी बहना परी को लेकिन जब वह शादी करके चलि जायेगी तब क्या करेंगा।
कालू : अरे चाची अभी तो वह छोटी है कहा अभी से उसकी शादी कर रही हो।
चाची : अरे क्या बात करता है बेटा, इतनी भरी पूरी जवान तो हो गई है, साल भर पहले ब्याहि होती तो अभी उसकी गोद में बच्चा खेल रहा होता, कभी गौर से देखा नहीं क्या अपनी बहन को।
पुरी तेरी माँ पर गई है, तेरी माँ से कम न पडेगी।
कल्लु : लेकिन चाची माँ तो बहुत मोटी और भारी है, और गुड़िया तो कमसीन लड़की है।
चाची : अरे तेरी माँ शादी के बाद इतनी फैल गई है, अभी गीतिका को देखना जब वह अपने पति के पास से होकर आएगी तो उसका भी अंग अंग खूब फ़ैल जाएगा।
चाची की बाते सुन कर मेरा लंड खूब मस्त हो रहा था और चाची अपनी मस्त चुत फ़ैलाये मुझसे बाते कर रही थी।
चाची : वैसे पिछ्ली बार जब गुड़िया आई थी तब तूने उसे आम चुसाये थे की नहीं या फिर गुड़िया तुझसे केला खाने की जिद कर रही थी, यह बात बोल कर चाची हॅसने लगी, मै भी उनके साथ मुस्कुरा दिया।
कालू : नहीं चाची मैंने उसे खूब आम चुसाये थे, केला तो मैंने पूछा ही नहीं की उसे पसंद है की नही।
चाची : वैसे केला तेरी माँ को बहुत पसंद है, गुड़िया को भी केला खिलायेगा तो उसे भी पसंद आएगा, हर लड़की को केला बहुत पसंद होता है।
कालू : आपको भी केला बहुत पसंद है क्या।
चेची : हाँ रे केला खाने का बड़ा मन करता है लेकिन अब मुझे कौन केला खिलायेंगा।
कालू : मै हु न चाची मुझसे कहो मै केला खिलाऊँगा आपको।
चाची : अपनी जांघो को हिलाते हुये, अरे बेटा कल्लु मै तो तुझसे केला खाने के लिए कब से बेठी हूँ, पर तू अपनी चाची को क्यों खिलायेगा, तू तो लगता है बस अपनी माँ और बहन को ही केला खिलायेंगा।
कालू : अरे चाची मै आपको भी खिलाउंगा, किसी दिन मेरे साथ बाजार तक चलो।
चाची : तो ले चलेगा मुझे अपनी साईकल पर बेठा कर।
कालू : क्यों नहीं जब कहो तब चल देता हूँ। चाची मै जरा पेशाब करके आता हूँ।
चाची : कल्लु : वहाँ झोपडी के पीछे जा कर कर ले।
चाची ने झोपडी के पीछे जाकर मुझे मुतने को कहा तो मुझे कुछ अजीब लगा फिर मै झोपडी के पीछे चला गया और मुझे झोपडी के अंदर से परछाइ नजर आई तो मै समझ गया की चाची छूप कर मेरा लंड देखने वाली है।
मैने अपने लंड को धोती से बाहर निकाला वह पूरी तरह खड़ा था और खूब मोटा और काला नजर आ रहा था, उधर चाची ने जैसे ही मेरे खड़े लंड को और उसकी मोटाई और लम्बाई को देखा तो वह अपनी चुत को रगडते हुये गहरी साँसे लेने लगी, यह वही जगह थी जहा से बिरजु अपनी माँ और मेरी माँ को मुतते हुए देखता था, मै अपने लंड को खूब सहलाते हुए रगड रहा था और चाची अपनी चुत सहलाते हुए मेरे लंड को खा जाने वाली नज़रो से देख रही थी।
जब मै मूत कर वापस आया तो चाची जल्दी से वापस बहार आ चुकी थी मेरे मुतने के बाद चाची ने कहा मै भी पेशाब करके आती हु कल्लु और फिर चाची अपनी घाघरे में से मटकती गाण्ड को हिलाती हुई जाने लगी और मैंने देखा चाची अपनी गाण्ड मेरे
सामने ही खुजलाती हुई जा रही थी, चाची जैसे ही पीछे गई मै झोपडी में घुस गया और जब मैंने बाहर झाँका तो चाची अपने दोनों हांथो से अपने घाघरे को ऊपर चढा चुकी थी रंडी अंदर से पूरी नंगी बड़ी मस्त लग रही थी उसकी चुत का उभार मुझे पागल कर रहा था।
चाची खड़ी खड़ी अपनी बुर सहलाती जा रही थी और फिर सामने बैठ कर अपनी मस्त भोस में दो उंगलिया पेलने के बाद अंदर बाहर करने लगी, उसके मुह को देख कर लग रहा था की वह मेरे मस्त लंड को सोच सोच कर अपनी बुर सहला रही है।
उसकी भोस बहुत मस्त लग रही थी, ऐसी रसीली चुत देख कर मै भी पागल हुआ जा रहा था, अब तो मेरा मन कर रहा था की चाची को खूब कस कस कर चोदुं। लेकिन मै अभी जल्दीबाज़ी करना नहीं चाहता था।
कुछ देर बाद चाची वापस आ गई और फिर अपने घाघरे से मुझे मुसकुराकर देखते हुए अपनी चुत पोछते हुए कहने लगी, कल तू पक्का मुझे अपनी साईकल पर बेठा कर बाजार ले चलेगा ना।
कालू : हाँ पक्का चाची।
मै वहाँ से खेत में आ गया गीतिका खाट पर लेटी कोई किताब पढ़ रही थी, खेत में माँ और बाबा काम में लगे हुए थे, गीतिका ने एक फ्राक पहनी हुई थी जो उसकी गोरी जांघो को भी दिखा रही थी, गुड़िया ने मुझे देखा नहीं और मै धीरे से उसके पास पहुच गया।
गडिया को बिलकुल भी ध्यान नहीं था और वह एक नंगे फोटो की किताब थी जिस्मे एक औरत एक आदमी के लंड के ऊपर चढ़ कर बेठी थी, गीतिका बड़े गौर से उसके काले लंड और उसकी खुली हुई गुलाबी चुत देख रही थी, गीतिका का एक हाथ उसकी पेंटी के अंदर था और वह अपनी चुत को खूब दबा दबा कर उस रंगीन फोटो को देख रही थी, लेकिन जैसे ही गीतिका की नजर मुझ पर पड़ी वह एक दम से हडबडा
कर उठ बेठी उसे यह समझ नहीं आया की किताब सम्भाले या अपनी चुत से अपने हाथ को बाहर निकाले।
फिर भी मैंने अन्जान बनते हुए न किताब की ओर ध्यान दिया और न ही उसकी चुत की ओर और कहने लगा गुड़िया माँ और बाबा काम में लगे है चल तुझे तैरना सीखना था न, चल इस समय नदी में कोई नहीं होगा बढ़िया मस्त तरीके से तुझे तैरना सीखा दुँगा।
गुडिया खुश होते हुए मानो उसे मन की मुराद मिल गई हो वह मेरे पीछे पीछे चल दी और किसी को फ़ोन लगाने लगी, मै थोड़ा आगे आगे चल रहा था और गुड़िया अपनी सहेली से दबी आवाज में बात कर रही थी।
गुडिया : हाय रंडी खुद चुद रही है या अपनी मम्मी को चुदवा रही है।
मोनिका : अरे मै तो अपनी माँ की चुत में बड़े बड़े लंड खुद पकड़ पकड़ कर पेल रही हु और पिलवा रही ह, पर तू क्यों आज गरम नजर आ रही है।
गुडिया : हाँ गुड न्यूज़ है।
मोनिका : क्या।
गुडिया : नदी में नहाने जा रही ह, आज भैया मुझे तैरना सिखाएगे।
मोनिका : हाय रंडी परी तेरे तो खूब मजे है अपने भैया के मोटे लंङे पर चढ़ चढ़ कर तैरना, और सुन बार बार डुबने का बहाना करके अपने भैया के नंगे बदन से पूरी तरह चिपक जाना, देखना तेरे भैया का मोटा लंड जब तेरी मस्त पाव रोटी की तरह फुली चुत में जब घुसेगा
तो तुझे बड़ा मजा मिलेगा, अपने भैया के मोटे लँड को खूब अपनी चुत से दबा दबा कर चुदवाना, वैसे भी तेरे भैया तेरे जैसी रसीली बहन की चुत तो पहले से ही मारने के बारे में सोचते होगे।
गुडिया : पता नहीं पर उनका कसरती बदन देखते ही मुझे उनके मोटे लंड की कल्पना होने लगती है मेरी भोस खूब मराने के लिए तडपने लगती है।
मोनिका : मेरी रंडी परी आज मोका अच्छा है खूब मरा ले अपने भैया से अपनी चूत, एक बार तबियत से चुद गई तो फिर तेरे मजे हो जाएगे फिर तो दिन भर खेतो में अपने भैया के सामने नंगी ही घुमना बड़ा मजा आएगा, जब तू झुक कर अपने भैया को अपनी मोटी गाण्ड और मस्त उभरी हुई पाव रोटी जैसी चुत दिखाएगी तो तेरे भैया खड़े खड़े ही तेरी चुत में लंड पेल देंगे।
गुडिया : चल अब रख नदी आ गई है।
मोनिका : बेस्ट ऑफ़ लक।
गुडिया : थैंक्स बिच।
नदी में कोई नहीं था और मेरे बदन पर सिर्फ धोती थी, मैंने गुड़िया की तरफ देखा बहुत मस्त लग रही थी एक छोटी सी फ्राक मे।
गुडिया : भैया मुझे तो डर लग रहा है।
कालू : मुस्कुराते हुये, अरे डरती क्यों है तेरा भैया है न तेरे पास।
गुडिया : पर भैया मैंने तो फ्राक पहना है मुझसे तैरते बन जाएगा।
कालू : बन तो जाएगा, वेसे तुझे दिक्कत हो रही है तो अपनी फ्राक उतार दे, निचे तूने चड्ढी तो पहनी होगी ना.
मुझे भैया की बात सुन कर हसी आ गई और मैंने शरमाते हुए मुह निचे करके कहा। भैया मै आपके सामने कैसे फ्राक उतार सकती हूँ।
कालू : क्यों मेरे सामने क्या दिक्कत है।
गुडिया : भैया मुझे आपके सामने शर्म आएगी मैंने अंदर ब्रा नहीं पहनी है।
कालू : अरे पागल यह गांव है माँ और चाची भी जब यहाँ नहाने आती है तो अपने ब्लाउज को पूरा उतार कर ही नहाती है, तूने देखा है ना।
मा तो घर पर भी जब नहाती है तो अपना पूरा ब्लाउज उतार लेती है।
गुडिया : पर भैया इतना कहते ही मेरी नजर भैया के धोती मै खड़े लंड पर पड़ गई और मैंने मन में सोचा भैया मुझे नंगी देखने के लिये मरे जा रहे है तभी उनका लंड इतना बड़ा हो रहा है, मुझे तो समझ नहीं आ रहा था की भैया नाटक कर रहे है जैसे की कुछ नहीं जानते ही नहीं या सचमुच भैया बहुत भोले है, वैसे तो भैया ने कभी ऐसी वैसी कोई हरकत कभी की नहीं पर उनका लंड क्यों इतना खड़ा हो रहा है खेर जो भी हो
मै तो खुद भी अपने बड़े भाई को अपनी मादक नंगी जवानी दिखाने के लिए तड़प रही थी।
वैसे भी भैया मेरे कसे हुए बड़े बड़े दूध को बड़े प्यार से देख रहे थे।
मेरे देखते देखते भैया पानी में उतर गए और मुझसे कहने लगे आजा गीतिका इस गर्मी में नदी में नहाने का मजा ही कुछ और है।
गीतिका : भैया क्या मै सचमुच फ्राक उतार दू कोई आ गया तो।
कालू : अरे पागल इस घाट पर मेरे और चाची के परिवार के अलावा कोई नहीं आता है बाकि गांव के दूसरे तरफ वाले घाट पर जाते है।
अब जल्दी से आ जा, मैंने भैया की बाते सुन कर कहा भैया मै पानी में घूसने के बाद उतार दूंगी।
कालू : तेरी जैसी मरजी अब जल्दी से आजा, गीतिका धीरे धीरे पानी में उतरने लगी उसकी मोटी मोटी छातिया खूब ऊपर निचे सांसो के साथ हो रही थी, जब वह कमर तक पानी में आ गई तो मुझसे कहने लगी भइया मुझे डर लग रहा है आप आओ न ईधर, गुड़िया की आवाज सुन कर मै उसकी ओर गया और उसका हाथ पकड़ कर गहरे पानी की ओर जाने लगा और गुड़िया बस भैया और गहरे में नहीं ओह भैया रुको न।
गीतिका बड़ी मुश्किल से आगे बढ़ रही थी की उसका पैर एक दम से गहराई में गया और वह मुझसे एक दम से चिपक गई और दोनों पेरो को मेरी कमर में लपेट कर मेरे ऊपर चढ़ गई।
गुडिया : भैया प्लीज निचे मत उतारो मै डूब जॉउंगी, मैंने अपने दोनों हांथो से उसकी गुदाज मोटी गाण्ड को दबोच रखा था, उसकी फ्राक तो न जाने कब की ऊपर हो गई थी और मेरी गदराई बहन पेंटी पहने मेरी कमर में अपनी गुदाज मोटी जाँघे लपेटे हुए मुझसे चिपकी हुई थी।
उसकी मोटी छतियो के नुकीले चुचे मुझे चुभ रहे थे, मेरा मन गुड़िया के मोटे मोटे खरबूजों को खूब कस कर मसलने का कर रहा था।
कालू : गुड़िया तू धीरे से पानी में उतर कर तैर और हाथ और पैर ऐसे चला।
गुडिया : नहीं भैया मुझसे नहीं होगा।
कालू : अरे पागल मै तेरे कमर और पेट को अपने हांथो से सहारा देकर तुझे धीरे धीरे तैरना सिखाउंगा और तू डुबेगी भी नही।
और फिर गुड़िया को धीरे से मैंने उतारा और उसके मुलायम गुदाज पेट को पकड़ कर एक हाथ से उसकी गुदाज मोटी गाण्ड को थामे उसे धीरे धीरे हाथ पैर हिलाने के लिए कहने लगा लेकिन गुड़िया बार बार डुबने लग जाती और जब उसकी सांसे भर गई तो कहने लगी नहीं भैया बस अब मै डूब जॉंउगी।
कालू : अरे तो एक काम कर इस फ्राक के कारन तू फ्री होकर नहीं तैर पा रही है इसे उतार दे।
गुड़ीया : नहीं भैया मै डूब जॉऊंगी।
कालू : अरे मै तुझे ऐसे ही पकडे रहूँगा तो आराम से उतार ले मै तुझे अपनी गोद में उठाये रहुंगा, गुड़िया ने मेरी ओर देखा उसके गुलाबी होंठ पानी में भीग कर और भी सेक्सी लग रहे थे फिर गुड़िया को मैंने पीछे से पकड़ लिया अब गुड़िया ने फ्राक उतारना शुरू किया।
गुड़िया जब फ्राक उतार रही थी तो भैया ने उसे पीछे से पकड़ रखा था और उसके नंगे पेट को धीरे से सहलाते जा रहे थे, उनका लंड तो गुड़िया की पेंटी के ऊपर से उसकी गाण्ड में घुसा जा रहा था, और गुड़िया उनके मस्त मोटे डण्डे का एह्सास साफ साफ अपनी गाण्ड और चुत में महसूस कर रही थी।
तभी गुड़िया ने फ्राक उतार दी और भैया ने उसकी नंगी पीठ को चुमते हुए उसे अपनी ओर घुमा लिया इस बार गुड़िया खुद अपने भैया के नंगे चौड़े सिने को देख कर अपनी दोनों टांगो को फैला कर भैया की कमर से चिपक गई और उसके मोटे मोटे कठोर दूध भैया के सिने से दब गये।
भैया ने गुड़िया को कस कर अपनी बांहो में भर लिया और उसे अपनी गोद में लिए उसकी मोटी जांघो को सहलाते हुए कहने लगे गुड़िया अब तू धीरे से जमीन पर पैर रख पानी तेरे गले तक ही आएगा, गुड़िया ने धीरे से निचे कदम रखा और अचानक उसका पैर एक पत्थर पर पड़ कर फिसल गया।
और गुड़िया ने मेरे हाथ को पकडने की कोशिश की तभी उसके हाथ में मेरा खड़ा लंड आ गया और फिर जल्दी से मैंने गुड़िया को पकड़ कर ऊपर उठाया और जब मैंने उसे अपनी ओर खिंचा तो गुड़िया के तरबुज मेरे हाथो से दब गये, हाय क्या ठोस चूचिया थी मै अपनी बहन के मोटे मोटे दूध के मस्त एह्सास से रोमांचित हो गया और मैंने गुड़िया के गालो को चुमते हुए कहा।
इतनी बड़ी हो गई है लेकिन किसी छोटे से बच्चे की तरह अपने भैया की गोद में चढ़ी है।
गुडिया : हाँ आप से तो छोटी ही हूँ, तो क्या आप अपनी बहन को अपनी गोदी में भी नहीं उठा सकते।
कालू : अच्छा उठा लुँगा पहले तू अच्छे से तैरना तो सीख।
गुडिया : मुझे नहीं सीखना तैरना आप तो मुझे अपनी गोद में उठाये हुए ही नहला दो।
कल्लु : अपने भैया के हाथ से नहा लेगी तु।
गुडीया : क्यों नहीं पहले जब मै छोटी थी तब भी आप मुझे नहलाते थे की नही।
कालू : गुड़िया के दूध को देखता हुआ गुड़िया की गुदाज जांघो को अपनी हंथेली में भर कर मसलता हुआ कहता है, अब तो तू पूरी जवान हो गई है।
अब भला मै तुझे कैसे नहला सकता हूँ।
गडिया : क्यों कभी कभी आप माँ को नहीं नहलाते हो। तो क्या माँ जवान नहीं है, वह तो और भी ज्यादा जवान है।
कालू : अरे कहा मै तो सिर्फ कभी कभी उनकी पीठ रगड देता हु बस।
गुडिया : भले ही पीठ रगडते हो पर माँ है तो मुझसे भी ज्यादा जवान और बड़ी है, गुड़िया ने महसूस किया की भैया से जब वह माँ की बात कर रही थी
तो वह अपने लंड को खूब तेजी से उसकी गाण्ड की दरार में दबा देते थे ऐसा लग रहा था जैसे अपनी बहन की गाण्ड चुत सब फाड देंगे।
कल्लु : अच्छा तू कहती है तो चल तेरी भी पीठ रगड देता हूँ। मै गुड़िया की नंगी पीठ को सहलाने लगा और जब मै उसकी बगल में पहुचता तो वह जान बूझ कर अपने हाथो को ऊपर कर देती और मै उसकी काँख को सहलाने लगता उसकी बगल में बारीक़ बारीक़ बाल उगे हुए थे।
गुडिया : भैया क्या माँ को भी तैरना आता है।
कालू : नहीं लेकिन थोड़ा बहुत तैर लेती है।
गुडिया : आपने माँ को क्यों नहीं सिखाया।
कालू : पहले कई बार सिखाया है।
गुडिया : क्या माँ को सीखने का मन नहीं करता था।
कालू : करता था मुझसे कहती भी थी लेकिन मै कभी उसके साथ नदी आता और कभी नहीं आता।
गुड़िया को भैया की बातो से भोंदुपने की झलक नजर आ रही थी, वैसे भी भैया की गोद में गुड़िया जैसा गरम माल थी। लेकिन वह ज्यादा कुछ कर नहीं रहे थे, पर यह तो था की लंड उनका यह सब समझ रहा था इसीलिए तबियत से तना हुआ था।
गुडिया : भैया अब पीठ ही रगडते रहोगे या यहाँ वह भी रगडोगे, लो मेरे सिने पर रगड़ो बहुत मैल हो गया है। और गुड़िया ने भी अन्जान बनते हुए अपने मोटे मोटे दूध भैया के मुह के सामने रख दिए, भैया काँपते हाथो से गुड़िया के दूध को छु रहे थे तभी गुड़िया ने उनके हाथ को अपने दूध पर दबा कर कहा भैया जरा रोज से रगड़ो नहीं तो मैंल कहा से निकलेगा।
गुड़िया का कहना था की भैया अब थोड़ा जोर से उसके मोटे मोटे थनो को रगडते हुए सहलाने लगा, पर फिर भी उनके हाथ में वह मर्दाना पकड़ नजर नहीं आ रही थी जो उसे चाहिये थी वह तो चाहती थी की भैया उसके मोटे मोटे आमो को खूब दबा दबा कर चुसे और खूब मसले, तभी उसने भैया से कहा भैया तुम माँ को तो बड़ी जोर जोर से रगडते हो फिर आज क्या हुआ है
जरा तेज रगडो।
कालू : गुड़िया तेरे दूध में मेल है ही कहा जो उन्हें रगड कर निकालूं।
भैया की बाते सुन कर गुड़िया को हसी आ गई और उसने कहा दूध के ऊपर का मेल नजर नहीं आता है जब रगडोगे तभी निकलेगा और यह रगडने से जब लाल हो जाएगे तो समझ लेना की इनका मैंल निकल गया है।
कालू भैया अब गीतिका के मोटे मोटे दूध को अब कस कस कर दबा रहे थे और कहने लगे गुड़िया वैसे मैंने माँ के दूध को कभी नहीं रगडा है मै तो सिर्फ उनकी पीठ कभी कभी रगड देता हु बस ।
गुडिया : आह हाय भैया अब तुम सही रगड रहे हो देखना कुछ देर में यह पूरे लाल हो जाएगे और इनका सारा मैल निकल जायेगा पर आप जरा अपने दोनों हांथो से रगडो, उसकी बात सुन कर कल्लु भैया उसके दूध को अब तबियत से मसलने लगा था।