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Horror KAATIL DRAWING (horror, suspence, triller, mystry)

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gauravrani

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भूत, प्रेत, साया, डायन आदि पर आप चाहे विश्वास करते हो या नहीं हो लेकिन उनके अस्तित्व को आप पूरी तरह नाकार भी नहीं सकते हैं। यह एक ऐसा विषय है जिसपर काफी बातचीत होती है लेकिन इसका सच केवल वही जानता है जो इसे महसूस करता है। इस कहानी में आपको क्राइम, हॉरर, सस्पेंस और थ्रिलर के साथ साथ मिस्ट्री को सुलझाने का मौका मिलेगा
 

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मधुकर चौधरी अपने इलाके के जाने माने ड्राइंग के शिक्षक हैं | उनके कला की चर्चा काफी दूर दूर तक है | उनके द्वारा बनाई गयी हर ड्राइंग अपने आप में ही अनमोल है | मधुकर बाबू द्वारा बनाई गई हर चित्र इतनी ज्यादा जीवंत होती है की पहली नजर में कोई भी उनके चित्र को देखकर धोखा खा जाये | मधुकर बाबू अगर चाहे तो अपनी एक एक ड्राइंग की नीलामी से लाखों कमा सकते हैं पर उन्हें धन की लोभ नहीं है | गांव के पास ही एक ड्राइंग स्कूल है | मधुकर बाबू वही अपने और आस पास के गांव के बच्चों को ड्राइंग सिखाया करते हैं | और उन बच्चों से जो फीस मिल जाती है उसी से उनका घर संसार चलता है | घर की हालात को देखते हुए मधुकर बाबू की पत्नी मीनाक्षी अकसर ही मधुकर बाबू से कुछ ड्राइंग को बेचने
 

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की जिद करती रहती है पर मधुकर बाबू ने हर बार मीनाक्षी को मना कर देते हैं | और इसी कारन ही मीनाक्षी भी मधुकर बाबू से दुखी रहा करती थी | और हमेशा की तरह आज भी उन दोनों के बीच इसी बात पर बहस हो रही है –
मीनाक्षी :- “जब भगवान ने आपको इतना अच्छा कला दी है तो आप उसे छुपा कर क्यों रखते हैं | अगर आपकी एक दो ड्राइंग को सहर में बेच दिया जाये , तो इससे आपका क्या नुकसान हो जायेगा |”
मधुकर बाबू :- “छुपा कर ही रखना होता तो बच्चों को ड्राइंग नहीं सीखता | और तुम जो यह ड्राइंग बेचने की बात लगाई रखती हो तो मैं तुम्हें एक बार और यह बता देता हूँ | मैं अपनी कला को पैसों के मोल पर कभी नहीं बेचूंगा |”
मीनाक्षी :- “महीने ख़त्म होते होते तो घर में खाने की किल्लत पर जाती है पर आपको तो इसकी कोई परवाह नहीं | सब कुछ तो मेरे उपर से जाता है | एक दिन यही सब करते करते मैं मर ही जाऊंगी |”
 

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उन दोनों में बहस चल ही रही थी की इसी बीच अचानक घर की डोर बेल बज उठती है | मधुकर बाबू खुद जाकर दरवाजा खोलते हैं | पर दरवाजे पर उन्हें कोई भी नहीं दिखाई देता है | मधुकर बाबू ने दरवाजे से मुंह बढ़ाकर दोनों तरफ देखा पर तब भी उन्हें कोई नहीं दिखा | किसी को ना देखकर मधुकर बाबू ने आवाज लगाया –
मधुकर बाबू :- “कौन है ? किसने मेरे घर की डोर बेल बजाई ?” लेकिन जवाब में उन्हें केवल मात्र सन्नाटा ही मिला | और जबाव दे भी तो कौन वहां तो कोई था ही नहीं | किसी बचे की शरारत समझ कर वे दरवाजा बंद करने ही वाले थे की अचानक मधुकर बाबू की नज़र उनके घर के बाहर जमीन पर परे हुए एक सफ़ेद लिफाफे पर परती है | मधुकर बाबू ने घर से बाहर आकर जब उस लिफाफे को जमीन से उठाया तो देखा की उस सफ़ेद लिफाफे के एक तरफ लिखा है मधुकर बाबू को मेरी तरफ से एक तौफा |
 

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मधुकर बाबू उस सफ़ेद लिफाफे को उठाकर अपने घर में ले आये | मीनाक्षी और उनके दो (2) साल का बेटा सुमित मधुकर बाबू के हाथ में लिफाफा देख कर उनके पास आकर खरे हो गए और सुमित तो उनके हाथ से लिफाफा खींचने की जिद्द करने लगा | मीनाक्षी ने सुमित को शांत करते हुए मधुकर बाबू से पूछा
 

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मीनाक्षी :- “क्या है इस लिफाफे में ?” मधुकर बाबू :- “पता नहीं घर के बाहर परा हुवा था | वैसे इसपर मेरा ही नाम लिखा हुवा है पर भेजने वाले ने अपने बारे में कुछ भी नहीं लिखा है | बस घर की डोर बेल बजाकर कहीं चला गया | पता नहीं क्या है और किसने भजे हैं ?” मीनाक्षी :- “जरूर आपके किसी चाहने वाले ने आपकी गरीबी को देखते हुए पैसे भेजे होंगे | लाइये इधर मैं खोल के देखती हूँ |” मीनाक्षी मधुकर बाबू से वो लिफाफा लेकर खोलना शुरू करती है | मधुकर बाबू भी सुमित को गोद में लेकर वही खरे रहकर सब देखते रहते हैं | यह जानने की जिज्ञासा तो उनमें भी थी की आखिरकार इस लफाफे में क्या है ? पहली बार किसी अज्ञात व्यक्ति ने उन्हें कोई तौफा दिया है | लिफाफा खोलते ही मीनाक्षी का मुहँ पूरी तरह से लटक गया | वह गुस्से मधुकर बाबू से बोलती है –
 

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मीनाक्षी :- “लीजिये और आपसे उम्मीद भी क्या की जा सकती है, आपसे तो किसी चीज़ की उम्मीद रखना भी गलत है |” इतना बोलकर वह एक कागज मधुकर बाबू की हाथ में थमा देती है और सुमित को गोद में लेकर वहां से चली जाती है | मधुकर बाबू उस कागज को खोल कर देखते हैं | उस कागज पे एक ड्राइंग बना हुवा था | हलाकि वह ड्राइंग कम बल्कि किसी बचे की शरारत ज्यादा लग रही थी | जैसे किसी नौसिखिया बच्चे ने जल्दबाजी में इस इस ड्राइंग को बनाया हो | और फिर उस बदमाश बच्चे ने मधुकर बाबू को परेशान करने के लिए उस ड्राइंग को उनके घर के बाहर रख दिया हो | ड्राइंग को काफी ध्यान से देखने के बाद मधुकर बाबू को ऐसा लगा की जैसे उस नौसिखिये बच्चे ने एक छोटे बच्चे की ड्राइंग बनाने की कोशिश की है, जो बिस्तर पर खेलते खेलते बिस्तर से जमीन पर गिर परा है और उसके माथे से खून की नदी बह रही है |
 

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मधुकर बाबू को यह मजाक बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा | उन्होंने उसी समय उस शरारती बच्चे को उस के इस मजाक के लिए दंड देने का निश्चय कर लिया | पर दंड देना तो तभी संभव होगा जब उन्हें यह पता चलेगा की यह किस बच्चे की शरारत है | ड्राइंग देख कर यह समझ पाना की इसे किस बच्चे ने बनाया है यह काफी मुश्किल भरा काम था | ऊपर से उनके स्कूल में तो 200 से अधिक छात्र छात्राएं हैं | मधुकर बाबू ने उस ड्राइंग को मोरकर अपने शर्ट के उपर वाले पॉकेट में रख लिया | और स्कूल जाकर बच्चों को इसके बारे में बच्चों से पूछने की सोची | स्कूल पहुंचकर मधुकर बाबू ने यह पाता लगाने की काफी कोशिश की, की यह ड्राइंग किसने उनके घर के सामने राखी पर उन्हें कुछ भी पता नहीं चला | फिर अंत में तंग आकर वे उस ड्राइंग के बारे में पता लगाना छोरकर बच्चों की क्लास लेने में व्यस्त हो गए |
 

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दोपहर के समय वे क्लास में कुछ बच्चों को पढ़ा ही रहे थे की तभी अचानक उनकी फ़ोन की घंटी बज उठती है | फोन को पॉकेट से निकाल कर वे देखते हैं की घर से मीनाक्षी का फ़ोन है | थोड़े विरक्ती के साथ ही मधुकर बाबू ने फोन को उठाया | वैसे देखा जाये तो मीनाक्षी किसी विशेष प्रयोजन के बिना उन्हें कभी फोन नहीं करती पता नहीं अभी कोण सी जरूरत आन पड़ी हो – मधुकर बाबू :- “हेल्लो, हाँ बोलो क्या हुआ ?”
 

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लेकिन बदले में दूसरी तरफ से उन्हें कुछ भी जवाब मिलने की जगह मीनाक्षी के रोने की आवाज सुनाई दी | मीनाक्षी फुट फुट कर रो रही थी |
मधुकर बाबू :- “तुम रो क्यों रही हो ? क्या हुवा सब ठीक तो है ना ?” मीनाक्षी के रोने की आवाज सुनकर धीरे धीरे मधुकर बाबू की पैरों की निचे की जमीन खिसकती जा रही थी | वह महिला जो की इतनी कठोर है वह आज फोन करके मधुकर बाबू के सामने रो रही है | उधर से रोते रोते ही मीनाक्षी बोलती है – मीनाक्षी :- “आप जितनी जल्दी हो सके घर पर आ जाईये, सुमित .........” मधुकर बाबू :- “क्या हुवा सुमित को ? क्या हुवा है उसे ?”
 
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