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Incest सबकी प्यारी..गरिमा हमारी

vakharia

Supreme
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ससुर से निकटता-2


gggg2


सीधे मुद्दे पर आता हूँ.. इस अध्याय की लेखनी में जो एक अनोखा सा कच्चापन है वह बेहद ही दिलचस्प लगा.. यह साफ है कि आपने गरिमा के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की है, पर इस यात्रा को केवल शारीरिक निकटता तक सीमित न रखें, जटिलता के और भी आयाम हो सकते है..! यह बस मेरा दृष्टिकोण है, इसे अन्यथा न ले

गरिमा की खुराफात वाली सोच, यह शब्द चुनाव ही बता देता है कि वह अपने कृत्य को क्या नाम दे रही है.. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ खुराफात है? या फिर किसी गहरे अकेलेपन, किसी अनदेखी चाहत की अभिव्यक्ति? आपने पायल की नींद की गहराई और उसकी शारीरिक उपस्थिति को एक दृश्य की तरह इस्तेमाल किया है, जो नैतिकता के जटिल सवाल खड़े करता है..

यहाँ पर एक सुझाव देने की गुस्ताखी करूंगा की कहानी में गरिमा की कामुकता की अपनी यात्रा को थोड़ा और खुलने दीजिए.. वह शायद अपने अस्तित्व की कोई नई परिभाषा ढूंढ रही है..!!

मुझे लगता है आप बहुत कुछ कहना चाह रही हैं, लेकिन अभी वह बात कहानी के पन्नों में थोड़ा सिमट कर रह गई है.. इसे खुलने दीजिए.. आपकी शैली में एक ईमानदारी है, जो मन को बड़ी अच्छी लगती है..
 

Rajizexy

Love and let love
Supreme
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ससुर से निकटता-2

पिछले एपिसोड में आपने पढ़ा कि कैसे गरिमा चाय देने के बहाने से अपने ससुर के करीब जाने की कोशिश कर रही है। बुआ के घर से जाने के बाद गरिमा ससुर से नज़दीकियाँ बढ़ाने के नये बहाने ढूंढ रही है. अब आगे….



रोहित शनिवार को ही वापस ड्यूटी पर गये थे तो मेरे दिमाग में चल रहा था कि इस 3-4 दिनों में ही ससुर जी को नाश्ता-खाना वगैरह देने की पायल की आदत छुड़ा दूँ।


इसीलिए एक दिन पायल के बजाय मैं खुद ही जल्दी से ससुर जी को खाना देने चली गयी।

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पायल जैसे ही कमरे में गयी मैं ससुर जी का खाना लगाया और कमरे के बाहर जाकर आवाज दी- पापा आपका खाना।
अन्दर से ससुर जी बोले- हां बेटा आ जाओ।
मेरे अन्दर आते ही ससुर जी खुश होकर बोले- वाह बेटा, अच्छा लगा तुम खाना लेकर आयी।
मैं बस हल्का सा मुस्कुराते दी और खाना देकर वापस आते हुए बोली- कुछ चाहिए होगा तो मांग लीजिएगा।
ससुर जी बोले- ठीक है बेटा।

फिर इसी तरह मैं रोज करने लगी और धीरे-धीरे ससुर जी की सुबह की चाय से लेकर रात का खाना और पानी रखना सब मैं करने लगी।
पायल को भी लगा कि मैं कर देती हूं तो वह अब नहीं कहती थी।
एक तरीके से उसे आराम ही हो गया था।

वहीं रोहित के आने के बाद भी मैं इसी तरह करती रही।

करीब 7-8 दिन हो गये थे मुझे ससुर जी के कमरे में जाकर उन्हें चाय, खाना और पानी देते हुए।
लेकिन मामला कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रहा था क्योंकि या तो पायल या फिर रोहित घर में रहते थे तो बस खाना वगैरह देकर तुरंत चली आती थी।


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लेकिन किस्मत ने साथ दिया और एक दिन मौका मिल गया।
पायल को थोड़ा वायरल फीवर हो गया था तो शाम से ही उसके सिर में दर्द था।

उस दिन मैं अकेली ही सारा काम कर रही थी।

शाम को ऑफिस से लौटते वक्त ससुर जी उसके लिए दवाई लेकर आये।

रोहित के न रहने पर वैसे भी रात में खाना जल्दी हो जाता था।

सबसे पहले पायल को खाना दिया और जिसके बाद उसने दवाई खाई, मैंने थोड़ा बाम लगाकर उसके सिर की मालिश कर दी।
खाना खाकर और बाम लगवाने के बाद पायल सो गयी।

मैं किचन में आकर ससुर जी को खाना वगैरह देने और किचन काम निपटाने चली आयी।

अचानक मेरे दिमाग में एक खुराफात सूझी।

पायल की तबीयत पूछने के बहाने ससुर जी एक-दो बार हमारे कमरे में आ चुके थे और मुझसे भी बात कर रहे थे।
तो मैं जान रही थी कि हो सकता है पायल को देखने या उसका हालचाल लेने ससुर जी एक बार और कमरे जाएंगे ज़रूर!

मैं किचन से निकली और ससुर जी के कमरे की तरफ देखा तो वे अपने कमरे में थे।

धीरे से मैं वापस अपने कमरे की तरफ गयी, पायल वहीं सो रही थी।
उसने स्कर्ट और टीशर्ट पहना हुआ था।

मैं पायल के पास गयी तो देखा कि तबीयत की वजह से और दवाई के असर से वह बेहद गहरी नींद में सो रही थी।

मैंने धीरे से पायल की स्कर्ट को ऊपर इस तरह कर दिया कि उसकी गोरी-गोरी चिकनी जांघ नंगी हो गयी।
स्कर्ट मैंने इस तरह खिसकायी थी कि ऐसा लगे कि नींद में करवट लेने या सोने की वजह से स्कर्ट ऊपर खिसक गयी है।

पायल की स्कर्ट मैंने इतना ऊपर कर दिया था कि उसकी पैंटी भी दिख रही थी।

ट्यूबलाइट की रोशनी में पायल की गोरी सी गोल चिकनी और मांसल जांघ एकदम चमक रही थी।
इस हालत में उसे कोई 90 साल का बुड्ढा भी देख ले तो उसका लण्ड खड़ा हो जाए।

तभी मैंने सोचा कि कमरे में अन्दर क्या हुआ मुझे तो पता नहीं चल पाएगा, इसके लिए जल्दी से मैंने अपने मोबाइल का वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन किया और फ्लाइट मोड पर डाल कर कमरे में ऐसी जगह रख दिया जहाँ से सब हरकत रिकॉर्ड हो जाए।

फिर मैं धीरे से वापस किचन में आकर काम करने लगी।

करीब 15 मिनट बाद ससुर जी अपने कमरे से निकले और फिर किचन के पास आकर मुझसे बोले- खाना बन गया बेटा?
मैंने कहा- जी, बस आपका ही खाना लगा रही थी।

ससुर जी बोले- पायल कैसी है, दवाई ली उसने?
मैंने कहा- हाँ खाना खा लिया और दवाई लेकर सो गयी हैं।

फिर मैंने जानबूझकर आगे कहा- मैं देखकर आती हूँ।
ससुर जी बोले- नहीं रहने दो मैं देख लेता हूँ तुम काम करो। खाना डायनिंग टेबल पर ही लगा देना, यहीं खा लूंगा।

यह कहकर ससुर जी मेरे कमरे की तरफ गये।

तब तक मैं उनका खाना प्लेट में लगाने लगी।

मैंने हल्का सा पलट कर देखा तो ससुर जी पर्दा हटाकर कमरे के अन्दर चले गये थे।

करीब 5 मिनट हो गये … लेकिन वह कमरे से बाहर नहीं निकले।

इधर मेरी धड़कन बढ़ गयी थी।
मुझे पता नहीं था कि ससुर जी का क्या रिएक्शन होगा।
डर भी रही थी कि कहीं पायल पर नाराज न हो जाएं कि किस तरह लापरवाही से सोती है।
या फिर मुझसे कुछ न गुस्से में न कह दें।

हालांकि मैंने उनका खाना लगा दिया था लेकिन जानबूझकर उन्हें आवाज नहीं दी, उन्हें पूरा टाइम दे रही थी।

कुछ देर बाद ससुर जी कमरे से निकले और लॉबी में डायनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गये।

1 मिनट बाद मैं उनका खाना लेकर गयी और टेबल पर उनके सामने खाना लगा दिया।
मैंने देखा कि ससुर जी ने जैसे मुझ पर ध्यान ही नहीं दिया।

वे थोड़ा खोए हुए से लग रहे थे उनका चेहरा थोड़ा लाल हो रहा था।

मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम थी।
समझ में नहीं आ रहा था कि वह गुस्से में चेहरा लाल है या अपनी बेटी की नंगी जांघ देखकर उनके अंदर वासना भड़क रही है।

मैं थोड़ा माहौल भांपने के लिए बोली- कुछ चाहिए होगा तो बता दीजिएगा पापा!
ससुर जी थोड़ा संभलते हुए बोले- अ…अअ हां … हां!

फिर थोड़ा नॉर्मल होते हुए बोले- तुम भी खाना खा लो बेटा!
मैंने थोड़ा नखरा दिखाया और मना करते हुए बोली- आप खा लीजिए, मैं बाद में खा लूंगी।

जब ससुर जी ने एक दो बार और कहा तो मैं मान गयी और किचन में अपना खाना लेने आ गयी।

ससुर जी को थोड़ा नॉर्मल देखकर मेरे अंदर की घबराहट भी खत्म हो गयी थी।

तभी मेरे दिमाग में खुराफात सूझी।

वापस डायनिंग टेबल पर जाने से पहले मैंने अपना दुपट्टा किचन में ही उतार कर रख दिया।

दरअसल मेरे दिमाग में था कि बुखार और दवाई की वजह पायल भी गहरी नींद में सो रही है और वह सुबह से पहले वैसे भी उठने वाली नहीं … तो क्यों न ससुर जी के साथ आज कुछ बात आगे बढ़ा ली जाए, फिर जल्दी ऐसा मौका न मिले शायद!

मैंने दुपट्टा उतार दिया और सिर्फ कुर्ती और लेगिंग में ही डायनिंग टेबल पर उनसे एक कुर्सी छोड़कर दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी।

ससुर जी अपने थोड़ा पास बैठने का इशारा करते हुए अपने बगल की कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए धीमी आवाज में बोले- अरे यहाँ बैठो थोड़ा मेरे पास!

बिना दुपट्टे के मेरी गोल-गोल बड़ी चूचियाँ टाइट कुर्ती में साफ पता चल रही थीं।

मैं प्लेट लेकर उनके बायीं तरफ वाली कुर्सी पर ठीक उनके बगल बैठ गयी।
ससुर जी की निगाह मेरी चूचियों की तरफ चली गयी।

हम दोनों चुपचाप खाना खाने लगे।
ससुर जी को देख कर लग रहा था जैसे उनका दिमाग में भी कुछ चल रहा था।

कुछ सेकेण्ड की चुप्पी के बाद ससुर जी बोले- अब यहाँ तो हमेशा सलवार-कुर्ता पहनना पड़ता है। तुम्हारे घर पर तो मैंने हमेशा तुम्हें स्कर्ट में ही देखा था।

मैं समझ गयी कि ससुर जी का मूड में आ रहे हैं.
मतलब सब ठीक है।

मैं मुस्कुराती हुई बोली- यहाँ भी पहनती हूँ … लेकिन रात में अपने कमरे में जाने के बाद!

मेरी इस बात पर ससुर जी मुस्कुराते हुए अपना एक हाथ धीरे से मेरी जाँघ पर रखकर सहलाते हुए बोले- अरे वाह … मुझे नहीं पता था कि तुम यहां भी स्कर्ट पहनती हो। मैंने तो शादी के पहले ही देखा था तुम्हें स्कर्ट में!

अभी ससुर जी मेरी इस बात पर कुछ बोलते … उससे पहले ही मैं फिर हंसते हुए धीरे से कमेंट में बोली- हाँ … वह तो मैं भी देखती थी आपको कि आप कहाँ देखते थे और क्या देखते थे।
ससुर जी लेगिंग के ऊपर से ही जांघ सहलाते हुए हंसकर बोले- अच्छा तो बताओ जरा मैं कहां देखता था और क्या देखता था?

उनकी इस बात पर मैं बस हँस दी और कुछ बोली नहीं।

ससुर जी बोले- अरे बताओ न … मुझसे क्या शर्माना?
मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा कर चुपचाप खाना खाती रही।

अब हम दोनों धीरे-धीरे एक दूसरे खुलना शुरू हो गये थे।

मेरे चुप रहने पर ससुर जी मेरी जांघ सहलाते हुए फिर बोले- वैसे मेरी एक बात बोलूं … मानोगी बेटा?
मैं बोली- जी बताइये।
हॉट फादर इन लॉ बोले- क्या एक बार अभी स्कर्ट पहनोगी? बहुत मन कर रहा है तुम्हें शादी से पहले वाले रूप में देखने का। उसी तरह स्कर्ट और टीशर्ट वाली गरिमा जैसी!


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ससुर जी ये डिमांड कर देंगे मुझे उम्मीद नहीं थी.
इसलिए मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या जवाब दूँ।
हाँ करूँ या ना करूँ … समझ में नहीं आ रहा था।

लेकिन तुरंत हाँ कर देना भी नहीं सही लग रहा था।

ससुर जी मेरे चेहरे के हाव-भाव से समझ गये कि मैं असमंजस में हूँ.
वे फिर बोले- प्लीज बेटा एक बार … खाना खाने के बाद मेरे लिए पहनकर आओ न स्कर्ट! पायल भी तो सो रही है। वह सुबह से पहले उठने वाली नहीं है।

हालांकि मैं यह मौका छोड़ना भी नहीं चाहती थी … इसलिए मैं धीरे से हाँ में सिर हिलाते हुए बोली- ठीक है!
ससुर जी का चेहरा खिल उठा और बोले- हाँ बेटा … खाने के बाद पहन कर आना!
मैंने कहा- जी!

इतनी देर में हम दोनों ने खाना खत्म कर लिया था।
मैं ससुर जी के खाली प्लेट उठाते हुए उठने लगी और बोली- थोड़ा पायल को देख लूँ कैसा है उसका फीवर!

मेरी इस बात पर जैसे ससुर जी को अचानक कुछ याद आया हो तो वह भी तेजी से उठते हुए बोले- मैं देख लेता हूँ पायल को … तुम किचन का काम कर लो अपना!

मैं ‘ठीक है’ बोल कर प्लेट लेकर किचन में चली आयी और ससुर जी हाथ धोने वॉश बेसिन की तरफ चले गये।

मैं समझ नहीं पायी कि आखिर सुसर जी फिर से कमरे में क्यों जाना चाह रहे हैं।
फिर भी मैं उन्हें पूरा मौका देना चाह रही थी तो मैं किचन का काम निपटाने लगी।
हालांकि मेरा ध्यान उन्हीं की तरफ ही था।

तभी मैंने देखा कि ससुर जी हाथ धोने के बाद मेरे कमरे में जाने की बजाय अपने कमरे में चले गये।

मैं सोचने लगी कि ये तो पायल को देखने की बात कह रहे थे, अभी क्यों कमरे में चले गये।
अभी मैं ये सोच ही रही थी कि तभी ससुर जी अपने कमरे से निकले और तेजी से मेरे कमरे की तरफ गये।

मैंने हल्का सा पलट कर देखा तो वे पर्दा हटाकर अन्दर जा चुके थे।

मैं समझ नहीं पायी कि आखिर वे इतनी तेजी से क्यों गये हैं।
क्योंकि पैर में दिक्कत की वजह से वे तेज नहीं चलते हैं ज्यादा।

मैंने सोचा कि चलो मोबाइल पर रिकॉर्ड होगा ही बाद में देखती हूँ।

यह सोचकर जल्दी से अपना काम निपटाने लगी।

दो मिनट के बाद ससुर जी मेरे कमरे से निकले और फिर वापस उसी तेजी से अपने कमरे में चले गये।

मुझे लगा था कि कमरे से निकलने के बाद हो सकता है वे मुझसे स्कर्ट पहनने की बात दोबारा कहेंगे।
लेकिन जब वे इतनी तेजी से वापस अपने कमरे में गये बिना मुझसे कुछ बोले तो मुझे लगा कि शायद पायल जग गयी होगी इसीलिए वे मुझसे बोले नहीं होंगे।

मैं जल्दी से किचन का काम कर अपने कमरे में पायल को देखने धीरे से गयी।

लेकिन दरवाजे का पर्दा हटाया तो देखा कि पायल उसी तरह बुखार और दवाई के असर से बेसुध होकर गहरी नींद में सो रही थी।

तभी मेरा ध्यान स्कर्ट की तरफ गया तो देखा तो ऐसा लगा जैसे किसी ने स्कर्ट ठीक कर जांघ ढक दी थी।
मैं समझ गयी कि ससुर जी ने ठीक कर दिया है।

फिर मैं सोचने लगी कि जब पायल सो रही है तो फिर ससुर जी बिना मुझसे कुछ बोले तेजी से अपने कमरे में क्यों चले गये।
मैंने जल्दी से अपने मोबाइल की रिकॉर्डिंग बंद किया और सोचा कि रिकॉर्डिंग में ससुर जी की हरकत देख लूँ।


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Awesome sexy gazab 🔥 update hi c cc ccc siii
Very nice Sasur Bahu khel
💦💦💦💦💦
🌶️🌶️🌶️🌶️
☀️☀️☀️
 
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Rinkp219

DO NOT use any nude pictures in your Avatar
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Superb update.....


Kash sasur aur papa eksath milke chudai kare garima ki
 

komaalrani

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ससुर से निकटता-2

पिछले एपिसोड में आपने पढ़ा कि कैसे गरिमा चाय देने के बहाने से अपने ससुर के करीब जाने की कोशिश कर रही है। बुआ के घर से जाने के बाद गरिमा ससुर से नज़दीकियाँ बढ़ाने के नये बहाने ढूंढ रही है. अब आगे….



रोहित शनिवार को ही वापस ड्यूटी पर गये थे तो मेरे दिमाग में चल रहा था कि इस 3-4 दिनों में ही ससुर जी को नाश्ता-खाना वगैरह देने की पायल की आदत छुड़ा दूँ।


इसीलिए एक दिन पायल के बजाय मैं खुद ही जल्दी से ससुर जी को खाना देने चली गयी।

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पायल जैसे ही कमरे में गयी मैं ससुर जी का खाना लगाया और कमरे के बाहर जाकर आवाज दी- पापा आपका खाना।
अन्दर से ससुर जी बोले- हां बेटा आ जाओ।
मेरे अन्दर आते ही ससुर जी खुश होकर बोले- वाह बेटा, अच्छा लगा तुम खाना लेकर आयी।
मैं बस हल्का सा मुस्कुराते दी और खाना देकर वापस आते हुए बोली- कुछ चाहिए होगा तो मांग लीजिएगा।
ससुर जी बोले- ठीक है बेटा।

फिर इसी तरह मैं रोज करने लगी और धीरे-धीरे ससुर जी की सुबह की चाय से लेकर रात का खाना और पानी रखना सब मैं करने लगी।
पायल को भी लगा कि मैं कर देती हूं तो वह अब नहीं कहती थी।
एक तरीके से उसे आराम ही हो गया था।

वहीं रोहित के आने के बाद भी मैं इसी तरह करती रही।

करीब 7-8 दिन हो गये थे मुझे ससुर जी के कमरे में जाकर उन्हें चाय, खाना और पानी देते हुए।
लेकिन मामला कुछ ज्यादा आगे नहीं बढ़ पा रहा था क्योंकि या तो पायल या फिर रोहित घर में रहते थे तो बस खाना वगैरह देकर तुरंत चली आती थी।


IMG-8987 IMG-8982

लेकिन किस्मत ने साथ दिया और एक दिन मौका मिल गया।
पायल को थोड़ा वायरल फीवर हो गया था तो शाम से ही उसके सिर में दर्द था।

उस दिन मैं अकेली ही सारा काम कर रही थी।

शाम को ऑफिस से लौटते वक्त ससुर जी उसके लिए दवाई लेकर आये।

रोहित के न रहने पर वैसे भी रात में खाना जल्दी हो जाता था।

सबसे पहले पायल को खाना दिया और जिसके बाद उसने दवाई खाई, मैंने थोड़ा बाम लगाकर उसके सिर की मालिश कर दी।
खाना खाकर और बाम लगवाने के बाद पायल सो गयी।

मैं किचन में आकर ससुर जी को खाना वगैरह देने और किचन काम निपटाने चली आयी।

अचानक मेरे दिमाग में एक खुराफात सूझी।

पायल की तबीयत पूछने के बहाने ससुर जी एक-दो बार हमारे कमरे में आ चुके थे और मुझसे भी बात कर रहे थे।
तो मैं जान रही थी कि हो सकता है पायल को देखने या उसका हालचाल लेने ससुर जी एक बार और कमरे जाएंगे ज़रूर!

मैं किचन से निकली और ससुर जी के कमरे की तरफ देखा तो वे अपने कमरे में थे।

धीरे से मैं वापस अपने कमरे की तरफ गयी, पायल वहीं सो रही थी।
उसने स्कर्ट और टीशर्ट पहना हुआ था।

मैं पायल के पास गयी तो देखा कि तबीयत की वजह से और दवाई के असर से वह बेहद गहरी नींद में सो रही थी।

मैंने धीरे से पायल की स्कर्ट को ऊपर इस तरह कर दिया कि उसकी गोरी-गोरी चिकनी जांघ नंगी हो गयी।
स्कर्ट मैंने इस तरह खिसकायी थी कि ऐसा लगे कि नींद में करवट लेने या सोने की वजह से स्कर्ट ऊपर खिसक गयी है।

पायल की स्कर्ट मैंने इतना ऊपर कर दिया था कि उसकी पैंटी भी दिख रही थी।

ट्यूबलाइट की रोशनी में पायल की गोरी सी गोल चिकनी और मांसल जांघ एकदम चमक रही थी।
इस हालत में उसे कोई 90 साल का बुड्ढा भी देख ले तो उसका लण्ड खड़ा हो जाए।

तभी मैंने सोचा कि कमरे में अन्दर क्या हुआ मुझे तो पता नहीं चल पाएगा, इसके लिए जल्दी से मैंने अपने मोबाइल का वीडियो रिकॉर्डिंग ऑन किया और फ्लाइट मोड पर डाल कर कमरे में ऐसी जगह रख दिया जहाँ से सब हरकत रिकॉर्ड हो जाए।

फिर मैं धीरे से वापस किचन में आकर काम करने लगी।

करीब 15 मिनट बाद ससुर जी अपने कमरे से निकले और फिर किचन के पास आकर मुझसे बोले- खाना बन गया बेटा?
मैंने कहा- जी, बस आपका ही खाना लगा रही थी।

ससुर जी बोले- पायल कैसी है, दवाई ली उसने?
मैंने कहा- हाँ खाना खा लिया और दवाई लेकर सो गयी हैं।

फिर मैंने जानबूझकर आगे कहा- मैं देखकर आती हूँ।
ससुर जी बोले- नहीं रहने दो मैं देख लेता हूँ तुम काम करो। खाना डायनिंग टेबल पर ही लगा देना, यहीं खा लूंगा।

यह कहकर ससुर जी मेरे कमरे की तरफ गये।

तब तक मैं उनका खाना प्लेट में लगाने लगी।

मैंने हल्का सा पलट कर देखा तो ससुर जी पर्दा हटाकर कमरे के अन्दर चले गये थे।

करीब 5 मिनट हो गये … लेकिन वह कमरे से बाहर नहीं निकले।

इधर मेरी धड़कन बढ़ गयी थी।
मुझे पता नहीं था कि ससुर जी का क्या रिएक्शन होगा।
डर भी रही थी कि कहीं पायल पर नाराज न हो जाएं कि किस तरह लापरवाही से सोती है।
या फिर मुझसे कुछ न गुस्से में न कह दें।

हालांकि मैंने उनका खाना लगा दिया था लेकिन जानबूझकर उन्हें आवाज नहीं दी, उन्हें पूरा टाइम दे रही थी।

कुछ देर बाद ससुर जी कमरे से निकले और लॉबी में डायनिंग टेबल पर खाने के लिए बैठ गये।

1 मिनट बाद मैं उनका खाना लेकर गयी और टेबल पर उनके सामने खाना लगा दिया।
मैंने देखा कि ससुर जी ने जैसे मुझ पर ध्यान ही नहीं दिया।

वे थोड़ा खोए हुए से लग रहे थे उनका चेहरा थोड़ा लाल हो रहा था।

मेरी तो सिट्टी-पिट्टी गुम थी।
समझ में नहीं आ रहा था कि वह गुस्से में चेहरा लाल है या अपनी बेटी की नंगी जांघ देखकर उनके अंदर वासना भड़क रही है।

मैं थोड़ा माहौल भांपने के लिए बोली- कुछ चाहिए होगा तो बता दीजिएगा पापा!
ससुर जी थोड़ा संभलते हुए बोले- अ…अअ हां … हां!

फिर थोड़ा नॉर्मल होते हुए बोले- तुम भी खाना खा लो बेटा!
मैंने थोड़ा नखरा दिखाया और मना करते हुए बोली- आप खा लीजिए, मैं बाद में खा लूंगी।

जब ससुर जी ने एक दो बार और कहा तो मैं मान गयी और किचन में अपना खाना लेने आ गयी।

ससुर जी को थोड़ा नॉर्मल देखकर मेरे अंदर की घबराहट भी खत्म हो गयी थी।

तभी मेरे दिमाग में खुराफात सूझी।

वापस डायनिंग टेबल पर जाने से पहले मैंने अपना दुपट्टा किचन में ही उतार कर रख दिया।

दरअसल मेरे दिमाग में था कि बुखार और दवाई की वजह पायल भी गहरी नींद में सो रही है और वह सुबह से पहले वैसे भी उठने वाली नहीं … तो क्यों न ससुर जी के साथ आज कुछ बात आगे बढ़ा ली जाए, फिर जल्दी ऐसा मौका न मिले शायद!

मैंने दुपट्टा उतार दिया और सिर्फ कुर्ती और लेगिंग में ही डायनिंग टेबल पर उनसे एक कुर्सी छोड़कर दूसरी कुर्सी पर बैठ गयी।

ससुर जी अपने थोड़ा पास बैठने का इशारा करते हुए अपने बगल की कुर्सी की तरफ इशारा करते हुए धीमी आवाज में बोले- अरे यहाँ बैठो थोड़ा मेरे पास!

बिना दुपट्टे के मेरी गोल-गोल बड़ी चूचियाँ टाइट कुर्ती में साफ पता चल रही थीं।

मैं प्लेट लेकर उनके बायीं तरफ वाली कुर्सी पर ठीक उनके बगल बैठ गयी।
ससुर जी की निगाह मेरी चूचियों की तरफ चली गयी।

हम दोनों चुपचाप खाना खाने लगे।
ससुर जी को देख कर लग रहा था जैसे उनका दिमाग में भी कुछ चल रहा था।

कुछ सेकेण्ड की चुप्पी के बाद ससुर जी बोले- अब यहाँ तो हमेशा सलवार-कुर्ता पहनना पड़ता है। तुम्हारे घर पर तो मैंने हमेशा तुम्हें स्कर्ट में ही देखा था।

मैं समझ गयी कि ससुर जी का मूड में आ रहे हैं.
मतलब सब ठीक है।

मैं मुस्कुराती हुई बोली- यहाँ भी पहनती हूँ … लेकिन रात में अपने कमरे में जाने के बाद!

मेरी इस बात पर ससुर जी मुस्कुराते हुए अपना एक हाथ धीरे से मेरी जाँघ पर रखकर सहलाते हुए बोले- अरे वाह … मुझे नहीं पता था कि तुम यहां भी स्कर्ट पहनती हो। मैंने तो शादी के पहले ही देखा था तुम्हें स्कर्ट में!

अभी ससुर जी मेरी इस बात पर कुछ बोलते … उससे पहले ही मैं फिर हंसते हुए धीरे से कमेंट में बोली- हाँ … वह तो मैं भी देखती थी आपको कि आप कहाँ देखते थे और क्या देखते थे।
ससुर जी लेगिंग के ऊपर से ही जांघ सहलाते हुए हंसकर बोले- अच्छा तो बताओ जरा मैं कहां देखता था और क्या देखता था?

उनकी इस बात पर मैं बस हँस दी और कुछ बोली नहीं।

ससुर जी बोले- अरे बताओ न … मुझसे क्या शर्माना?
मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा बस मुस्कुरा कर चुपचाप खाना खाती रही।

अब हम दोनों धीरे-धीरे एक दूसरे खुलना शुरू हो गये थे।

मेरे चुप रहने पर ससुर जी मेरी जांघ सहलाते हुए फिर बोले- वैसे मेरी एक बात बोलूं … मानोगी बेटा?
मैं बोली- जी बताइये।
हॉट फादर इन लॉ बोले- क्या एक बार अभी स्कर्ट पहनोगी? बहुत मन कर रहा है तुम्हें शादी से पहले वाले रूप में देखने का। उसी तरह स्कर्ट और टीशर्ट वाली गरिमा जैसी!


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ससुर जी ये डिमांड कर देंगे मुझे उम्मीद नहीं थी.
इसलिए मैं समझ नहीं पा रही थी कि क्या जवाब दूँ।
हाँ करूँ या ना करूँ … समझ में नहीं आ रहा था।

लेकिन तुरंत हाँ कर देना भी नहीं सही लग रहा था।

ससुर जी मेरे चेहरे के हाव-भाव से समझ गये कि मैं असमंजस में हूँ.
वे फिर बोले- प्लीज बेटा एक बार … खाना खाने के बाद मेरे लिए पहनकर आओ न स्कर्ट! पायल भी तो सो रही है। वह सुबह से पहले उठने वाली नहीं है।

हालांकि मैं यह मौका छोड़ना भी नहीं चाहती थी … इसलिए मैं धीरे से हाँ में सिर हिलाते हुए बोली- ठीक है!
ससुर जी का चेहरा खिल उठा और बोले- हाँ बेटा … खाने के बाद पहन कर आना!
मैंने कहा- जी!

इतनी देर में हम दोनों ने खाना खत्म कर लिया था।
मैं ससुर जी के खाली प्लेट उठाते हुए उठने लगी और बोली- थोड़ा पायल को देख लूँ कैसा है उसका फीवर!

मेरी इस बात पर जैसे ससुर जी को अचानक कुछ याद आया हो तो वह भी तेजी से उठते हुए बोले- मैं देख लेता हूँ पायल को … तुम किचन का काम कर लो अपना!

मैं ‘ठीक है’ बोल कर प्लेट लेकर किचन में चली आयी और ससुर जी हाथ धोने वॉश बेसिन की तरफ चले गये।

मैं समझ नहीं पायी कि आखिर सुसर जी फिर से कमरे में क्यों जाना चाह रहे हैं।
फिर भी मैं उन्हें पूरा मौका देना चाह रही थी तो मैं किचन का काम निपटाने लगी।
हालांकि मेरा ध्यान उन्हीं की तरफ ही था।

तभी मैंने देखा कि ससुर जी हाथ धोने के बाद मेरे कमरे में जाने की बजाय अपने कमरे में चले गये।

मैं सोचने लगी कि ये तो पायल को देखने की बात कह रहे थे, अभी क्यों कमरे में चले गये।
अभी मैं ये सोच ही रही थी कि तभी ससुर जी अपने कमरे से निकले और तेजी से मेरे कमरे की तरफ गये।

मैंने हल्का सा पलट कर देखा तो वे पर्दा हटाकर अन्दर जा चुके थे।

मैं समझ नहीं पायी कि आखिर वे इतनी तेजी से क्यों गये हैं।
क्योंकि पैर में दिक्कत की वजह से वे तेज नहीं चलते हैं ज्यादा।

मैंने सोचा कि चलो मोबाइल पर रिकॉर्ड होगा ही बाद में देखती हूँ।

यह सोचकर जल्दी से अपना काम निपटाने लगी।

दो मिनट के बाद ससुर जी मेरे कमरे से निकले और फिर वापस उसी तेजी से अपने कमरे में चले गये।

मुझे लगा था कि कमरे से निकलने के बाद हो सकता है वे मुझसे स्कर्ट पहनने की बात दोबारा कहेंगे।
लेकिन जब वे इतनी तेजी से वापस अपने कमरे में गये बिना मुझसे कुछ बोले तो मुझे लगा कि शायद पायल जग गयी होगी इसीलिए वे मुझसे बोले नहीं होंगे।

मैं जल्दी से किचन का काम कर अपने कमरे में पायल को देखने धीरे से गयी।

लेकिन दरवाजे का पर्दा हटाया तो देखा कि पायल उसी तरह बुखार और दवाई के असर से बेसुध होकर गहरी नींद में सो रही थी।

तभी मेरा ध्यान स्कर्ट की तरफ गया तो देखा तो ऐसा लगा जैसे किसी ने स्कर्ट ठीक कर जांघ ढक दी थी।
मैं समझ गयी कि ससुर जी ने ठीक कर दिया है।

फिर मैं सोचने लगी कि जब पायल सो रही है तो फिर ससुर जी बिना मुझसे कुछ बोले तेजी से अपने कमरे में क्यों चले गये।
मैंने जल्दी से अपने मोबाइल की रिकॉर्डिंग बंद किया और सोचा कि रिकॉर्डिंग में ससुर जी की हरकत देख लूँ।


IMG-8978
बहुत ही बढ़िया अपडेट है। आपकी कहानी में सिडक्शन की जो मद्धम आंच सुलगती है, जो झुलसाती तो नहीं है लेकिन तड़पा के रख देती है उसका जवाब नहीं है, और उसके बाद संशय। कभी ये लगता है की रिश्ता ससुर और गरिमा का होगा और कभी लगता है की गरिमा, पिता पुत्री के बीच की दूरी कम करने की कोशिश कर रही है।

और फिर जिस जगह आप कहानी छोड़ती हैं वो पाठको को अगले पार्ट के लिए बेचैन कर देता है, जैसे मोबाईल में क्या है सब उत्सुक हैं जानने के लिए।

और आपके चित्रों में चेहरे पर भावना भी रहती है, एकदम बोलते चित्र होते हैं आपके जैसे मोबाइल देखती हुयी महिला की रहस्यमयी मुस्कान।

और अगले भाग में सिर्फ मोबाइल का रहस्य ही नहीं है , गरिमा जब स्कर्ट पहन कर ससुर के पास जायेगी तो क्या होगा ?

कहीं पायल की नींद खुल गयी और उनसे गरिमा और अपने पापा को देखा तो ?

इसलिए कमेंट्स की बौछार लग जाती है।
 
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komaalrani

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सीधे मुद्दे पर आता हूँ.. इस अध्याय की लेखनी में जो एक अनोखा सा कच्चापन है वह बेहद ही दिलचस्प लगा.. यह साफ है कि आपने गरिमा के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश की है, पर इस यात्रा को केवल शारीरिक निकटता तक सीमित न रखें, जटिलता के और भी आयाम हो सकते है..! यह बस मेरा दृष्टिकोण है, इसे अन्यथा न ले

गरिमा की खुराफात वाली सोच, यह शब्द चुनाव ही बता देता है कि वह अपने कृत्य को क्या नाम दे रही है.. लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ खुराफात है? या फिर किसी गहरे अकेलेपन, किसी अनदेखी चाहत की अभिव्यक्ति? आपने पायल की नींद की गहराई और उसकी शारीरिक उपस्थिति को एक दृश्य की तरह इस्तेमाल किया है, जो नैतिकता के जटिल सवाल खड़े करता है..

यहाँ पर एक सुझाव देने की गुस्ताखी करूंगा की कहानी में गरिमा की कामुकता की अपनी यात्रा को थोड़ा और खुलने दीजिए.. वह शायद अपने अस्तित्व की कोई नई परिभाषा ढूंढ रही है..!!

मुझे लगता है आप बहुत कुछ कहना चाह रही हैं, लेकिन अभी वह बात कहानी के पन्नों में थोड़ा सिमट कर रह गई है.. इसे खुलने दीजिए.. आपकी शैली में एक ईमानदारी है, जो मन को बड़ी अच्छी लगती है..
कई ग्रंथ मीमांसा और मीमांसकारों के लिए ज्यादा प्रसिद्ध हैं, आपकी टिप्पणी समीक्षा से भी आगे बढ़कर एक हद तक मीमांसा है जहाँ आप कहानी की परत दर परत खोल के पाठको के सामने एक नया नजरिया पेश करते हैं।

यह टिप्पणी भी उसी तरह की है।
मुझे लगता है की गरिमा की कामुकता की यात्रा जिसकी ओर आपने इंगित किया है अगले भाग में और बढ़ेगी,

और यात्रा शब्द का चुनाव भी कितना सही है, गरिमा का अपने भाई से रिश्तों में बदलाव ट्रेन के भीड़ डिब्बे में हुआ, एक स्टेशन मास्टर से संबध रेलवे स्टेशन पर एक अपरिचित से व्यक्ति से संबंध, बोल्डनेस, एडवेंचर की भावना और उस से भी बढ़कर पहल लेने की हिम्मत, फिर कजिन्स के साथ स्वैप खुले आम रेलवे प्लेटफार्म पर , पिता के साथ दूरियां कम हुईं रेलवे क्रासिंग पर और पति के साथ हनीमून फर्स्ट एसी के कूपे में।
यात्रा में देह सुख का अलग मजा है , अनजान जगह, और फिर जहाँ समय के साथ हर पल स्थान भी बदल रहा है

और गरिमा की कामुकता भी कुछ उसी तरह है, हर पल बदलती, आगे बढ़ती, नए आयाम ढूंढ़ती।

जितना मज़ा इस कहानी को पढ़ के आता है उतना ही आपकी टिप्पणी में आता है।

धन्य है वह कहानी जिस पर आपकी कलम पड़े
 
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komaalrani

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@aarushi_dayal

पढ़कर प्रतीत कुछ ऐसा हुआ जैसे किसी साहित्यिक कैफे में बैठकर आपसे सीधा संवाद हो रहा हो..!! एक कठिन विषय को केवल उत्तेजना तक सीमित न रखते हुए, उसे सूक्ष्म मनोवैज्ञानिक दस्तावेज़ में बदल दिया आपने..

सामान्य दिखते घरेलू परिवेश के भीतर असामान्य मानसिक उथल-पुथल को बिना किसी नाटकीयता के, बड़े ही शांत और सधे हुए ढंग से प्रस्तुत किया है.. गरिमा का वह आत्मविवरण, जहाँ वह पायल को उकसाती है, डराती है, और स्वयं एक योजना रचती है.. बहुत ही उमदा..!!

इस अध्याय का सबसे शानदार पहलू, मेरे विचार में, वह मौन का सौंदर्यशास्त्र है जो आपने रचा है.. ससुर जी के कमरे का वह दृश्य.. पर्दा, ट्रैक सूट, चाय की प्याली.. ये सब विवरण एक स्थूल यथार्थवादी चित्र खींचते हैं.. पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह अलिखित संवाद जो शब्दों के बीच के खालीपन में घटित होता है.. ससुर जी का पीठ पर हाथ रखना, फिर जांघ पर हाथ का स्थानांतरण, और गरिमा द्वारा जांघ हल्का फैलाकर दिया गया अनुमति का इशारा.. यह पूरा अनुक्रम एक उच्च कोटि का शब्दहीन नाटक प्रतीत होता है

लिखती रहिए.. आपकी कलम में एक ऐसी निर्भीकता है जो समकालीन हिन्दी लेखन में बहुत आवश्यक है..!!
मौन का सौंदर्यशास्त्र
ससुर जी के कमरे का वह दृश्य.. पर्दा, ट्रैक सूट, चाय की प्याली.. ये सब विवरण एक स्थूल यथार्थवादी चित्र खींचते हैं.. पर उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है वह अलिखित संवाद जो शब्दों के बीच के खालीपन में घटित होता है.. ससुर जी का पीठ पर हाथ रखना, फिर जांघ पर हाथ का स्थानांतरण, और गरिमा द्वारा जांघ हल्का फैलाकर दिया गया अनुमति का इशारा..

इसके बाद कुछ भी कहना उसके असर को कम करना है।

कम लेखक चुप्पी को लिख पाते हैं, लेकिन उससे भी कम पाठक होते हैं जो उसे सुन पाते हैं।
 
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