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Incest पाप की परछाईं

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पाप की परछाईं

चैप्टर 1: वो पुरानी नफरत

आरव और अनन्या।
एक ही माँ-बाप के दो बच्चे। आरव बड़ा था, उम्र में अनन्या से तीन साल। घर में दोनों का रिश्ता कभी भाई-बहन जैसा नहीं रहा। बचपन से ही आरव अनन्या को अपनी चीज़ समझता था। उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर नज़र रखता। अगर अनन्या किसी लड़के से बात करती, तो आरव का खून खौल उठता। और अनन्या? वो आरव से चिढ़ती थी। उसकी इस हैवी पजेसिवनेस से तंग आ चुकी थी।

आज भी वही पुराना सिलसिला जारी था।

सुबह के नौ बज रहे थे। दिल्ली के एक मिडिल-क्लास अपार्टमेंट में मम्मी-पापा ऑफिस जा चुके थे। अनन्या कॉलेज के लिए तैयार हो रही थी। उसने आज नया टॉप पहना था – गले से थोड़ा गहरा, बैकलेस। दर्पण में खुद को देखकर मुस्कुराई। आज कॉलेज में उसका क्रश, रोहन, उसे देखकर ज़रूर कुछ कहेगा।

“ये क्या पहना है तूने?”

आरव का ठंडा, गुस्से भरा स्वर कमरे में गूँजा। वो दरवाजे पर खड़ा था, हाथ में कॉफ़ी का मग। सिर्फ़ ट्राउज़र और वेस्ट में। उसकी बॉडी जिम जाने की वजह से कसी हुई थी। अनन्या ने आँखें घुमाईं।

“भाई, तुझे क्या प्रॉब्लम है? मैं जो मर्ज़ी पहनूँ, तुझे क्या?”

“मर्ज़ी? ये मर्ज़ी नहीं, बेशर्मी है। कॉलेज में जाकर लड़कों को ललचाएगी क्या?”

अनन्या ने ब्रश ज़ोर से टेबल पर पटका। “तू हमेशा यही करता है ना! मेरी ज़िंदगी में घुसकर मुझे कंट्रोल करने की कोशिश। मैं तेरी प्रॉपर्टी नहीं हूँ, आरव!”

आरव ने मग साइड टेबल पर रखा और दो कदम आगे बढ़ा। उसकी आँखें खतरनाक तरीके से सिकुड़ गईं। “तू मेरी बहन है। मैं तेरी चिंता करता हूँ। बाहर के लड़के...”

“बाहर के लड़के क्या? तेरे जैसे पजेसिव नहीं होते?” अनन्या ने तंज कसा और बैग उठाकर बाहर निकलने लगी।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी, लेकिन दर्द देने वाली नहीं। “सुन। आज रोहन से दूर रहना। मैंने सुना है वो तेरे पीछे पड़ा है।”

अनन्या का चेहरा लाल हो गया। “तू मेरे पीछे जासूस लगाता है क्या? कॉलेज में मेरे दोस्तों से पूछता है?”

आरव ने कुछ नहीं कहा। बस अनन्या का हाथ छोड़ा और पीछे हट गया। अनन्या दरवाज़ा पटककर बाहर निकल गई।

आरव अकेला कमरे में खड़ा रहा। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। मन में एक अजीब सी जलन थी। वो जलन जो बचपन से थी। जब अनन्या दसवीं में थी और पहली बार किसी लड़के से बात की थी, तब भी यही जलन हुई थी। वो खुद नहीं समझता था कि ये सिर्फ़ भाई का हक है या कुछ और। बस इतना जानता था – अनन्या सिर्फ़ उसकी है। किसी और की नहीं हो सकती।

कॉलेज में दिन अच्छा गुज़रा। रोहन ने अनन्या को लंच पर बुलाया। दोनों कैंटीन में बैठे हँसते-बातें करते रहे। रोहन ने कहा, “तुम आज बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो।” अनन्या शर्मा गई। पहली बार किसी ने उसे इतने प्यार से देखा था। घर में तो बस आरव का गुस्सा और रोक-टोक।

शाम को घर लौटी तो आरव ड्राइंग रूम में बैठा था। लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। अनन्या ने उसे इग्नोर करने की कोशिश की और सीधे अपने कमरे में जाने लगी।

“रुक।” आरव का स्वर फिर ठंडा।

अनन्या रुक गई, लेकिन मुड़ी नहीं। “क्या है अब?”

“रोहन के साथ लंच किया ना आज?”

अनन्या का दिल धक से रह गया। वो धीरे से मुड़ी। “तुझे कैसे पता?”

आरव ने लैपटॉप बंद किया और उठ खड़ा हुआ। “मुझे सब पता चल जाता है, अनन्या। मैंने तुझे पहले भी बोला था – उससे दूर रह।”

“और अगर मैं ना रहूँ तो? तू क्या करेगा?” अनन्या ने चुनौती दी।

आरव उसके करीब आया। इतना करीब कि अनन्या उसकी साँसें महसूस कर रही थी। “मैं उसे तोड़ दूँगा। और तुझे... तुझे घर में बंद कर दूँगा।”

अनन्या की आँखों में आँसू आ गए। गुस्से के। “तू पागल है, आरव। बिलकुल पागल। मैं तेरी बहन हूँ, तेरी गर्लफ्रेंड नहीं कि तू मुझे कंट्रोल करे!”

आरव का चेहरा अचानक बदल गया। जैसे कोई तीर लगा हो। वो पीछे हटा। “हाँ... बहन ही तो है तू।” उसने धीरे से कहा और अपने कमरे में चला गया।

रात को खाना खाते वक्त दोनों चुप थे। मम्मी-पापा ने पूछा भी तो दोनों ने कहा – कुछ नहीं।

खाना खत्म होने के बाद अनन्या अपने कमरे में गई। दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर लेट गई। आँखों में आँसू थे। वो आरव से नफरत करती थी। उसकी इस पजेसिवनेस से। लेकिन कहीं बहुत गहरे में एक अजीब सा डर भी था। अगर आरव सच में रोहन को कुछ कर दे तो?

दूसरी तरफ आरव अपने कमरे में था। छत को घूर रहा था। मन में बार-बार अनन्या का चेहरा आ रहा था। वो टॉप। वो हँसी जो रोहन के साथ हँसी थी। उसका खून फिर खौल उठा। उसने तकिया मुट्ठी में भींचा।

“मेरी है वो। सिर्फ़ मेरी।” उसने धीरे से बड़बड़ाया।

फिर खुद को रोकते हुए बोला, “नहीं... वो मेरी बहन है।”

लेकिन दिल मान नहीं रहा था।

अगले कुछ दिन ऐसे ही गुज़रे। अनन्या रोहन के और करीब आती गई। आरव और चिढ़ने लगा। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगे। कभी अनन्या के देर से आने पर, कभी उसके फोन पर मैसेज आने पर।

एक रात अनन्या देर से लौटी। रोहन उसे ड्रॉप करके गया था। आरव बालकनी में खड़ा सब देख रहा था। जैसे ही अनन्या अंदर आई, आरव ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

“कहाँ थी इतनी रात तक?”

“रोहन के साथ डिनर किया था।” अनन्या ने बेधड़क कहा।

आरव का चेहरा पत्थर हो गया। “घर में आ। अभी।”

अनन्या हँस दी। “क्यों? जल रही है क्या?”

आरव ने उसका हाथ पकड़ा और उसे दीवार से सटा दिया। उसकी आँखें लाल थीं। “मैंने बोला था ना – दूर रह उससे।”

अनन्या डर गई। पहली बार आरव इतना गुस्से में था। “छोड़ मुझे, आरव। दर्द हो रहा है।”

आरव ने हाथ ढीला किया, लेकिन छोड़ा नहीं। दोनों की साँसें तेज़ थीं। चेहरे करीब। बहुत करीब।

एक पल को दोनों ठिठक गए।

अनन्या की आँखों में डर था, लेकिन कुछ और भी। आरव की आँखों में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के नीचे कुछ और छिपा था।

फिर आरव ने अचानक हाथ छोड़ दिया और पीछे हट गया। “जा। सो जा।” उसने कहा और खुद बाहर बालकनी में चला गया।

अनन्या कमरे में गई। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वो नहीं समझ रही थी कि अभी क्या हुआ।

उस रात दोनों सो नहीं पाए।

आरव बालकनी में सिगरेट पीता रहा। मन में एक तूफ़ान था। वो जानता था कि जो वो अनन्या के लिए महसूस करता है, वो गलत है। बहुत गलत। लेकिन रोक नहीं पा रहा था।

अनन्या बिस्तर पर करवटें बदलती रही। आरव का वो गुस्सा, वो पकड़, वो नज़दीकी... सब बार-बार याद आ रहा था। वो डर गई थी, लेकिन कहीं एक अजीब सी गर्मी भी महसूस हुई थी।

और यही वो शुरुआत थी।
उस नफरत के बीच पनप रहे एक गलत एहसास की।
 

vihan27

Blood Makes Empire Not Tear
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पाप की परछाईं

चैप्टर 1: वो पुरानी नफरत

आरव और अनन्या।
एक ही माँ-बाप के दो बच्चे। आरव बड़ा था, उम्र में अनन्या से तीन साल। घर में दोनों का रिश्ता कभी भाई-बहन जैसा नहीं रहा। बचपन से ही आरव अनन्या को अपनी चीज़ समझता था। उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर नज़र रखता। अगर अनन्या किसी लड़के से बात करती, तो आरव का खून खौल उठता। और अनन्या? वो आरव से चिढ़ती थी। उसकी इस हैवी पजेसिवनेस से तंग आ चुकी थी।

आज भी वही पुराना सिलसिला जारी था।

सुबह के नौ बज रहे थे। दिल्ली के एक मिडिल-क्लास अपार्टमेंट में मम्मी-पापा ऑफिस जा चुके थे। अनन्या कॉलेज के लिए तैयार हो रही थी। उसने आज नया टॉप पहना था – गले से थोड़ा गहरा, बैकलेस। दर्पण में खुद को देखकर मुस्कुराई। आज कॉलेज में उसका क्रश, रोहन, उसे देखकर ज़रूर कुछ कहेगा।

“ये क्या पहना है तूने?”

आरव का ठंडा, गुस्से भरा स्वर कमरे में गूँजा। वो दरवाजे पर खड़ा था, हाथ में कॉफ़ी का मग। सिर्फ़ ट्राउज़र और वेस्ट में। उसकी बॉडी जिम जाने की वजह से कसी हुई थी। अनन्या ने आँखें घुमाईं।

“भाई, तुझे क्या प्रॉब्लम है? मैं जो मर्ज़ी पहनूँ, तुझे क्या?”

“मर्ज़ी? ये मर्ज़ी नहीं, बेशर्मी है। कॉलेज में जाकर लड़कों को ललचाएगी क्या?”

अनन्या ने ब्रश ज़ोर से टेबल पर पटका। “तू हमेशा यही करता है ना! मेरी ज़िंदगी में घुसकर मुझे कंट्रोल करने की कोशिश। मैं तेरी प्रॉपर्टी नहीं हूँ, आरव!”

आरव ने मग साइड टेबल पर रखा और दो कदम आगे बढ़ा। उसकी आँखें खतरनाक तरीके से सिकुड़ गईं। “तू मेरी बहन है। मैं तेरी चिंता करता हूँ। बाहर के लड़के...”

“बाहर के लड़के क्या? तेरे जैसे पजेसिव नहीं होते?” अनन्या ने तंज कसा और बैग उठाकर बाहर निकलने लगी।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी, लेकिन दर्द देने वाली नहीं। “सुन। आज रोहन से दूर रहना। मैंने सुना है वो तेरे पीछे पड़ा है।”

अनन्या का चेहरा लाल हो गया। “तू मेरे पीछे जासूस लगाता है क्या? कॉलेज में मेरे दोस्तों से पूछता है?”

आरव ने कुछ नहीं कहा। बस अनन्या का हाथ छोड़ा और पीछे हट गया। अनन्या दरवाज़ा पटककर बाहर निकल गई।

आरव अकेला कमरे में खड़ा रहा। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। मन में एक अजीब सी जलन थी। वो जलन जो बचपन से थी। जब अनन्या दसवीं में थी और पहली बार किसी लड़के से बात की थी, तब भी यही जलन हुई थी। वो खुद नहीं समझता था कि ये सिर्फ़ भाई का हक है या कुछ और। बस इतना जानता था – अनन्या सिर्फ़ उसकी है। किसी और की नहीं हो सकती।

कॉलेज में दिन अच्छा गुज़रा। रोहन ने अनन्या को लंच पर बुलाया। दोनों कैंटीन में बैठे हँसते-बातें करते रहे। रोहन ने कहा, “तुम आज बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो।” अनन्या शर्मा गई। पहली बार किसी ने उसे इतने प्यार से देखा था। घर में तो बस आरव का गुस्सा और रोक-टोक।

शाम को घर लौटी तो आरव ड्राइंग रूम में बैठा था। लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। अनन्या ने उसे इग्नोर करने की कोशिश की और सीधे अपने कमरे में जाने लगी।

“रुक।” आरव का स्वर फिर ठंडा।

अनन्या रुक गई, लेकिन मुड़ी नहीं। “क्या है अब?”

“रोहन के साथ लंच किया ना आज?”

अनन्या का दिल धक से रह गया। वो धीरे से मुड़ी। “तुझे कैसे पता?”

आरव ने लैपटॉप बंद किया और उठ खड़ा हुआ। “मुझे सब पता चल जाता है, अनन्या। मैंने तुझे पहले भी बोला था – उससे दूर रह।”

“और अगर मैं ना रहूँ तो? तू क्या करेगा?” अनन्या ने चुनौती दी।

आरव उसके करीब आया। इतना करीब कि अनन्या उसकी साँसें महसूस कर रही थी। “मैं उसे तोड़ दूँगा। और तुझे... तुझे घर में बंद कर दूँगा।”

अनन्या की आँखों में आँसू आ गए। गुस्से के। “तू पागल है, आरव। बिलकुल पागल। मैं तेरी बहन हूँ, तेरी गर्लफ्रेंड नहीं कि तू मुझे कंट्रोल करे!”

आरव का चेहरा अचानक बदल गया। जैसे कोई तीर लगा हो। वो पीछे हटा। “हाँ... बहन ही तो है तू।” उसने धीरे से कहा और अपने कमरे में चला गया।

रात को खाना खाते वक्त दोनों चुप थे। मम्मी-पापा ने पूछा भी तो दोनों ने कहा – कुछ नहीं।

खाना खत्म होने के बाद अनन्या अपने कमरे में गई। दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर लेट गई। आँखों में आँसू थे। वो आरव से नफरत करती थी। उसकी इस पजेसिवनेस से। लेकिन कहीं बहुत गहरे में एक अजीब सा डर भी था। अगर आरव सच में रोहन को कुछ कर दे तो?

दूसरी तरफ आरव अपने कमरे में था। छत को घूर रहा था। मन में बार-बार अनन्या का चेहरा आ रहा था। वो टॉप। वो हँसी जो रोहन के साथ हँसी थी। उसका खून फिर खौल उठा। उसने तकिया मुट्ठी में भींचा।

“मेरी है वो। सिर्फ़ मेरी।” उसने धीरे से बड़बड़ाया।

फिर खुद को रोकते हुए बोला, “नहीं... वो मेरी बहन है।”

लेकिन दिल मान नहीं रहा था।

अगले कुछ दिन ऐसे ही गुज़रे। अनन्या रोहन के और करीब आती गई। आरव और चिढ़ने लगा। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगे। कभी अनन्या के देर से आने पर, कभी उसके फोन पर मैसेज आने पर।

एक रात अनन्या देर से लौटी। रोहन उसे ड्रॉप करके गया था। आरव बालकनी में खड़ा सब देख रहा था। जैसे ही अनन्या अंदर आई, आरव ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

“कहाँ थी इतनी रात तक?”

“रोहन के साथ डिनर किया था।” अनन्या ने बेधड़क कहा।

आरव का चेहरा पत्थर हो गया। “घर में आ। अभी।”

अनन्या हँस दी। “क्यों? जल रही है क्या?”

आरव ने उसका हाथ पकड़ा और उसे दीवार से सटा दिया। उसकी आँखें लाल थीं। “मैंने बोला था ना – दूर रह उससे।”

अनन्या डर गई। पहली बार आरव इतना गुस्से में था। “छोड़ मुझे, आरव। दर्द हो रहा है।”

आरव ने हाथ ढीला किया, लेकिन छोड़ा नहीं। दोनों की साँसें तेज़ थीं। चेहरे करीब। बहुत करीब।

एक पल को दोनों ठिठक गए।

अनन्या की आँखों में डर था, लेकिन कुछ और भी। आरव की आँखों में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के नीचे कुछ और छिपा था।

फिर आरव ने अचानक हाथ छोड़ दिया और पीछे हट गया। “जा। सो जा।” उसने कहा और खुद बाहर बालकनी में चला गया।

अनन्या कमरे में गई। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वो नहीं समझ रही थी कि अभी क्या हुआ।

उस रात दोनों सो नहीं पाए।

आरव बालकनी में सिगरेट पीता रहा। मन में एक तूफ़ान था। वो जानता था कि जो वो अनन्या के लिए महसूस करता है, वो गलत है। बहुत गलत। लेकिन रोक नहीं पा रहा था।

अनन्या बिस्तर पर करवटें बदलती रही। आरव का वो गुस्सा, वो पकड़, वो नज़दीकी... सब बार-बार याद आ रहा था। वो डर गई थी, लेकिन कहीं एक अजीब सी गर्मी भी महसूस हुई थी।

और यही वो शुरुआत थी।
उस नफरत के बीच पनप रहे एक गलत एहसास की।
Update padha, to start se hi mujhe thoda uneasy feel hua. Ye story light ya normal nahi hai, balki dark aur intense hai. Aarav ka Ananya ke liye itna zyada possessive hona mujhe kaafi azib laga, aur baar-baar mann me doubt aata raha ki uske emotions sirf bhai jaise nahi lag rahe. I know story incest category me hai to kya hona hai.
Ananya jo freedom chahti hai, apni life jeena chahti hai, lekin Aarav ke behaviour ki wajah se emotionally aur mentally trapped lagti hai. Uska fear aur confusion clearly feel hota hai.
Poore chapter me ek constant tension bani rehti hai, jaise kuch galat hone hi wala ho. Dialogues simple hain, isliye scenes real lagte hain aur impact zyada strong ho jata hai.
As a reader, mujhe ye chapter acha laga, thoda dark bhi, lekin saath hi curiosity bhi jagi ki aage story kis direction me jaayegi. Overall, ye ek strong aur dark start hai jo mann me heaviness chhod kar next chapter ke liye wait karne par majboor kar deta hai.
Chhodampatti wale kaam jitne kam ho utna hi story ke liye acha hoga
Good luck 🤞
 

Shivraj Singh

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अनन्या सिर्फ आरव की हो। न किसी चूतिए की। सच में यार बहेन के साथ जो प्यार जो अपनापन जो फीलिंग होती है। राम कसम दुनिया में कही नहीं। भाई बहेन में अगर जिस्मानी हो तो वो जीवन का सर्वोत्तम चरमोत्कर्ष और आनंद की अनुभूति है। ऐसा नहीं कि चूत चोदी इसीलिए बल्कि अपनी बहेन को सुख दिया और किसी गलत आदमी के हाथ में जाने से रोका। और परिवार की इज्जत बीच बाजार नीलाम नहीं होने दी।
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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चैप्टर 1: वो पुरानी नफरत

आरव और अनन्या।
एक ही माँ-बाप के दो बच्चे। आरव बड़ा था, उम्र में अनन्या से तीन साल। घर में दोनों का रिश्ता कभी भाई-बहन जैसा नहीं रहा। बचपन से ही आरव अनन्या को अपनी चीज़ समझता था। उसकी हर छोटी-बड़ी बात पर नज़र रखता। अगर अनन्या किसी लड़के से बात करती, तो आरव का खून खौल उठता। और अनन्या? वो आरव से चिढ़ती थी। उसकी इस हैवी पजेसिवनेस से तंग आ चुकी थी।

आज भी वही पुराना सिलसिला जारी था।

सुबह के नौ बज रहे थे। दिल्ली के एक मिडिल-क्लास अपार्टमेंट में मम्मी-पापा ऑफिस जा चुके थे। अनन्या कॉलेज के लिए तैयार हो रही थी। उसने आज नया टॉप पहना था – गले से थोड़ा गहरा, बैकलेस। दर्पण में खुद को देखकर मुस्कुराई। आज कॉलेज में उसका क्रश, रोहन, उसे देखकर ज़रूर कुछ कहेगा।

“ये क्या पहना है तूने?”

आरव का ठंडा, गुस्से भरा स्वर कमरे में गूँजा। वो दरवाजे पर खड़ा था, हाथ में कॉफ़ी का मग। सिर्फ़ ट्राउज़र और वेस्ट में। उसकी बॉडी जिम जाने की वजह से कसी हुई थी। अनन्या ने आँखें घुमाईं।

“भाई, तुझे क्या प्रॉब्लम है? मैं जो मर्ज़ी पहनूँ, तुझे क्या?”

“मर्ज़ी? ये मर्ज़ी नहीं, बेशर्मी है। कॉलेज में जाकर लड़कों को ललचाएगी क्या?”

अनन्या ने ब्रश ज़ोर से टेबल पर पटका। “तू हमेशा यही करता है ना! मेरी ज़िंदगी में घुसकर मुझे कंट्रोल करने की कोशिश। मैं तेरी प्रॉपर्टी नहीं हूँ, आरव!”

आरव ने मग साइड टेबल पर रखा और दो कदम आगे बढ़ा। उसकी आँखें खतरनाक तरीके से सिकुड़ गईं। “तू मेरी बहन है। मैं तेरी चिंता करता हूँ। बाहर के लड़के...”

“बाहर के लड़के क्या? तेरे जैसे पजेसिव नहीं होते?” अनन्या ने तंज कसा और बैग उठाकर बाहर निकलने लगी।

आरव ने उसका हाथ पकड़ लिया। उसकी पकड़ मज़बूत थी, लेकिन दर्द देने वाली नहीं। “सुन। आज रोहन से दूर रहना। मैंने सुना है वो तेरे पीछे पड़ा है।”

अनन्या का चेहरा लाल हो गया। “तू मेरे पीछे जासूस लगाता है क्या? कॉलेज में मेरे दोस्तों से पूछता है?”

आरव ने कुछ नहीं कहा। बस अनन्या का हाथ छोड़ा और पीछे हट गया। अनन्या दरवाज़ा पटककर बाहर निकल गई।

आरव अकेला कमरे में खड़ा रहा। उसकी मुट्ठियाँ भिंची हुई थीं। मन में एक अजीब सी जलन थी। वो जलन जो बचपन से थी। जब अनन्या दसवीं में थी और पहली बार किसी लड़के से बात की थी, तब भी यही जलन हुई थी। वो खुद नहीं समझता था कि ये सिर्फ़ भाई का हक है या कुछ और। बस इतना जानता था – अनन्या सिर्फ़ उसकी है। किसी और की नहीं हो सकती।

कॉलेज में दिन अच्छा गुज़रा। रोहन ने अनन्या को लंच पर बुलाया। दोनों कैंटीन में बैठे हँसते-बातें करते रहे। रोहन ने कहा, “तुम आज बहुत ख़ूबसूरत लग रही हो।” अनन्या शर्मा गई। पहली बार किसी ने उसे इतने प्यार से देखा था। घर में तो बस आरव का गुस्सा और रोक-टोक।

शाम को घर लौटी तो आरव ड्राइंग रूम में बैठा था। लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था। अनन्या ने उसे इग्नोर करने की कोशिश की और सीधे अपने कमरे में जाने लगी।

“रुक।” आरव का स्वर फिर ठंडा।

अनन्या रुक गई, लेकिन मुड़ी नहीं। “क्या है अब?”

“रोहन के साथ लंच किया ना आज?”

अनन्या का दिल धक से रह गया। वो धीरे से मुड़ी। “तुझे कैसे पता?”

आरव ने लैपटॉप बंद किया और उठ खड़ा हुआ। “मुझे सब पता चल जाता है, अनन्या। मैंने तुझे पहले भी बोला था – उससे दूर रह।”

“और अगर मैं ना रहूँ तो? तू क्या करेगा?” अनन्या ने चुनौती दी।

आरव उसके करीब आया। इतना करीब कि अनन्या उसकी साँसें महसूस कर रही थी। “मैं उसे तोड़ दूँगा। और तुझे... तुझे घर में बंद कर दूँगा।”

अनन्या की आँखों में आँसू आ गए। गुस्से के। “तू पागल है, आरव। बिलकुल पागल। मैं तेरी बहन हूँ, तेरी गर्लफ्रेंड नहीं कि तू मुझे कंट्रोल करे!”

आरव का चेहरा अचानक बदल गया। जैसे कोई तीर लगा हो। वो पीछे हटा। “हाँ... बहन ही तो है तू।” उसने धीरे से कहा और अपने कमरे में चला गया।

रात को खाना खाते वक्त दोनों चुप थे। मम्मी-पापा ने पूछा भी तो दोनों ने कहा – कुछ नहीं।

खाना खत्म होने के बाद अनन्या अपने कमरे में गई। दरवाज़ा बंद किया और बिस्तर पर लेट गई। आँखों में आँसू थे। वो आरव से नफरत करती थी। उसकी इस पजेसिवनेस से। लेकिन कहीं बहुत गहरे में एक अजीब सा डर भी था। अगर आरव सच में रोहन को कुछ कर दे तो?

दूसरी तरफ आरव अपने कमरे में था। छत को घूर रहा था। मन में बार-बार अनन्या का चेहरा आ रहा था। वो टॉप। वो हँसी जो रोहन के साथ हँसी थी। उसका खून फिर खौल उठा। उसने तकिया मुट्ठी में भींचा।

“मेरी है वो। सिर्फ़ मेरी।” उसने धीरे से बड़बड़ाया।

फिर खुद को रोकते हुए बोला, “नहीं... वो मेरी बहन है।”

लेकिन दिल मान नहीं रहा था।

अगले कुछ दिन ऐसे ही गुज़रे। अनन्या रोहन के और करीब आती गई। आरव और चिढ़ने लगा। छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होने लगे। कभी अनन्या के देर से आने पर, कभी उसके फोन पर मैसेज आने पर।

एक रात अनन्या देर से लौटी। रोहन उसे ड्रॉप करके गया था। आरव बालकनी में खड़ा सब देख रहा था। जैसे ही अनन्या अंदर आई, आरव ने दरवाज़ा बंद कर दिया।

“कहाँ थी इतनी रात तक?”

“रोहन के साथ डिनर किया था।” अनन्या ने बेधड़क कहा।

आरव का चेहरा पत्थर हो गया। “घर में आ। अभी।”

अनन्या हँस दी। “क्यों? जल रही है क्या?”

आरव ने उसका हाथ पकड़ा और उसे दीवार से सटा दिया। उसकी आँखें लाल थीं। “मैंने बोला था ना – दूर रह उससे।”

अनन्या डर गई। पहली बार आरव इतना गुस्से में था। “छोड़ मुझे, आरव। दर्द हो रहा है।”

आरव ने हाथ ढीला किया, लेकिन छोड़ा नहीं। दोनों की साँसें तेज़ थीं। चेहरे करीब। बहुत करीब।

एक पल को दोनों ठिठक गए।

अनन्या की आँखों में डर था, लेकिन कुछ और भी। आरव की आँखों में गुस्सा था, लेकिन उस गुस्से के नीचे कुछ और छिपा था।

फिर आरव ने अचानक हाथ छोड़ दिया और पीछे हट गया। “जा। सो जा।” उसने कहा और खुद बाहर बालकनी में चला गया।

अनन्या कमरे में गई। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। वो नहीं समझ रही थी कि अभी क्या हुआ।

उस रात दोनों सो नहीं पाए।

आरव बालकनी में सिगरेट पीता रहा। मन में एक तूफ़ान था। वो जानता था कि जो वो अनन्या के लिए महसूस करता है, वो गलत है। बहुत गलत। लेकिन रोक नहीं पा रहा था।

अनन्या बिस्तर पर करवटें बदलती रही। आरव का वो गुस्सा, वो पकड़, वो नज़दीकी... सब बार-बार याद आ रहा था। वो डर गई थी, लेकिन कहीं एक अजीब सी गर्मी भी महसूस हुई थी।

और यही वो शुरुआत थी।
उस नफरत के बीच पनप रहे एक गलत एहसास की।
Congratulations for new story aashifa ji :congrats:
 
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नई कहानी के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।

कहानी बहुत भावनात्मक और किरदारों के अंतर द्वंद से जूझती हुई नजर आ रही है!

हाय स्वीटहर्ट,
तुम्हारा मैसेज पढ़कर मुस्कुरा दी मैं।
“बहुत भावनात्मक और किरदारों के अंतर द्वंद्व से जूझती हुई” तुमने कहानी की आत्मा को एक लाइन में पकड़ लिया। आरव और अनन्या दोनों अपने अंदर की लड़ाई लड़ रहे हैं, और आगे ये लड़ाई और गहरी होगी।
तुम्हारी शुभकामनाओं के लिए ढेर सारा प्यार और थैंक यू। तुम जैसे रीडर्स की वजह से ही लिखने का मन करता है। जल्दी मिलते हैं अगले चैप्टर में। ♡
 
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Update padha, to start se hi mujhe thoda uneasy feel hua. Ye story light ya normal nahi hai, balki dark aur intense hai. Aarav ka Ananya ke liye itna zyada possessive hona mujhe kaafi azib laga, aur baar-baar mann me doubt aata raha ki uske emotions sirf bhai jaise nahi lag rahe. I know story incest category me hai to kya hona hai.
Ananya jo freedom chahti hai, apni life jeena chahti hai, lekin Aarav ke behaviour ki wajah se emotionally aur mentally trapped lagti hai. Uska fear aur confusion clearly feel hota hai.
Poore chapter me ek constant tension bani rehti hai, jaise kuch galat hone hi wala ho. Dialogues simple hain, isliye scenes real lagte hain aur impact zyada strong ho jata hai.
As a reader, mujhe ye chapter acha laga, thoda dark bhi, lekin saath hi curiosity bhi jagi ki aage story kis direction me jaayegi. Overall, ye ek strong aur dark start hai jo mann me heaviness chhod kar next chapter ke liye wait karne par majboor kar deta hai.
Chhodampatti wale kaam jitne kam ho utna hi story ke liye acha hoga
Good luck 🤞
हाय,
तुम्हारा रिव्यू पढ़कर सच में दिल छू गया। तुमने बिलकुल ठीक पकड़ा कि मैं शुरू से ही एक अनीज़ी, हैवी टेंशन क्रिएट करना चाहती थी। आरव की पजेसिवनेस को मैंने जानबूझकर भाई वाली लाइन से बाहर रखा, ताकि रीडर को भी वैसा ही संदेह और बेचैनी महसूस हो जो अनन्या को हो रही है।
तुम्हारा ये कहना कि “एक constant tension बनी रहती है, जैसे कुछ गलत होने ही वाला है” यही तो मैं चाहती थी। और तुम्हारी सलाह कि छोड़मपट्टी वाले सीन जितने कम हों उतना अच्छा मैं पूरी तरह सहमत हूँ। मैं कोशिश कर रही हूँ कि इंटिमेसी कभी सस्ती न लगे, बल्कि हमेशा इमोशन्स और गिल्ट से जुड़ी रहे।
तुम्हारी क्यूरियॉसिटी और वो heaviness जो तुम्हें लगी, वो मेरे लिए सबसे बड़ी जीत है।
बहुत-बहुत शुक्रिया इतना खूबसूरत और ईमानदार फीडबैक देने के लिए। उम्मीद है आगे की कहानी भी तुम्हें उतना ही प्रभावित करे। ♡
 
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