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Erotica दीपस्तंभ !

GalacticGamer

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दीपस्तंभ!

नमस्कार दोस्तों, मैं नीरज। मैं कोंकण में रहने वाला हूँ। यहीं की लाल मिट्टी और समुंदर की गोद में पला-ब बढ़ा हूँ। आज मैं आपको अपनी एक कहानी सुनाने वाला हूँ। कुछ साल पहले यहीं हमारे कोंकण में घटी हुई। मेरे शहर से थोड़ी दूर बसे एक गाँव की। यह कहानी थोड़ी बड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में मेरे जीवन में जो भी घटनाएं घटीं, वही मैं आपको बताने वाला हूँ। सुरक्षा के कारणों से मैंने जगहों और व्यक्तियों के नाम और कुछ तकनीकी व प्रशासनिक बातों में थोड़ा फेरबदल किया है। कहानी लेखन का यह मेरा पहला ही प्रयास है, इसलिए आप सभी से निवेदन है कि थोड़ी धीरज के साथ यह कहानी पढ़ें। अपनी सारी यादें आपसे साझा करके मुझे थोड़ा हल्का महसूस होगा और उम्मीद करता हूँ कि आपको भी मेरी कहानी पसंद आएगी। इसी के साथ कहानी की शुरुआत करता हूँ।

मेरी आँख गाड़ी में लगे एक जोरदार झटके से खुली। मैं अपनी सीट से लगभग उछल ही गया था। हमारी बस अब मुख्य हाइवे छोड़कर ग्रामीण रास्ते पर लग चुकी थी। अब यही उबड़-खाबड़ रास्ता मुझे मेरे तय किए हुए गाँव तक ले जाने वाला था। मैंने आँखें मलते हुए बाहर देखना शुरू किया। सूर्यनारायण अपनी दिनभर की ड्यूटी खत्म करके तेजी से क्षितिज की ओर बढ़ रहे थे। पशु-पक्षी भी अपना नित्यक्रम पूरा करके अपने-अपने आशियानों की ओर लौट रहे थे। गाँव के लोग धीरे-धीरे घर लौटते दिखाई दे रहे थे, कोई पैदल, कोई साइकिल पर तो एकाध-दुक्का मोटरसाइकिल पर। किसी के हाथ में सब्जी और सामान की थैलियाँ, तो किसी के पास खाने के खाली हो चुके डिब्बे, तो किसी के सिर पर टोकरियाँ और घास के गट्ठर। रास्ते में जो थोड़ी-बहुत चहल-पहल थी, वह बस फर्लांग भर फैली बाजार जैसी छोटी दुकानों और टपरियों तक ही सीमित थी। उनके भी अब दीया-बत्ती का समय हो चुका था। कुल मिलाकर, इस गाँव का दिन खत्म होकर अब रातरानी के आगमन का इंतजार शुरू हो गया था।

करीब पौन घंटे बाद मैं अपने स्टॉप (stop) पर उतरा। अब शाम की रोशनी (सांझ) भी विदा ले रही थी। पीछे मुड़कर देखा तो थोड़ी दूर गाँव में दीये टिमटिमाते हुए जलते दिखाई दिए। मानो रात के अंधेरे का सामना करने के लिए तैयार हो रहे हों। कल के सूर्योदय तक इस छोटे से थके-हारे गाँव की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी इन्हीं टिमटिमाते दीयों पर थी। यहाँ, मैं जिस जिले के शहर से आया था, वैसी चकाचौंध नहीं थी। दिन-रात चलने वाली गाड़ियों की आवाजाही नहीं थी, शोरगुल नहीं था। यहाँ थे तो बस मवेशियों के गले की घंटियों के स्वर, घर-घर से खाना बनाने की तैयारी में बर्तनों की खट-खट और झींगुरों (रात के कीड़ों) द्वारा शुरू की गई उनकी सामूहिक महफिल। बाकी पूरा गाँव अब थोड़ी ही देर में निढाल होकर सो जाने वाला था। एक पल के लिए मुझे लगा, "कहाँ से कहाँ आकर फँस गया मैं?"

मैं जहाँ उतरा वह गाँव का आखिरी बस स्टॉप था और जिस बस से मैं आया था, वह गाँव में आने वाली आखिरी बस थी। यह बस अब यहीं से वापस मुड़कर तालुका की ओर जाने वाली थी। बस के मुड़ते ही स्टॉप के सामने वाले इकलौते चाय वाले ने भी अपनी हाथगाड़ी जैसी टपरी समेटनी शुरू कर दी। बस वापस मुड़कर चली गई और मैंने थोड़ी अंगड़ाई लेकर शरीर को ढीला छोड़ा। सामने जाते हुए सुनसान रास्ते पर नजर डाली। सामने दूर पहाड़ पर कुछ रोशनियाँ जल रही थीं। वे इस बात की गवाह थीं कि वहाँ भी कोई मानवीय हलचल है। और इन रोशनियों के उस पार से अब एक तेज प्रकाश की किरण (बीम) काले पड़ते आसमान में नियमित रूप से गश्त लगाती दिखाई दी। इसी जगह मुझे पहुँचना था। यही था मेरी नई नौकरी का ठिकाना।

उस टपरी की ओर जाकर मैंने उस टपरीवाले से पूछा,"दादा, लाइटहाउस की तरफ जाने के लिए अभी कोई साधन है क्या?"

वह मेरी तरफ देखता ही रह गया और कुछ सेकंड बाद बोला, "भाई, यह कोई वक्त है क्या उधर जाने का? कहाँ से आए हो आप?"

मैंने कहा, "यहीं से, कणकवली से आया हूँ। कोई गाड़ी-रिक्शा वगैरह मिलेगी क्या लाइटहाउस जाने के लिए?"

इस पर वह जोर से हँसकर बोला, "गाड़ी-घोड़ा कहाँ से मिलेगा अब इस गाँव में? यह सामने वाले छोटे डामर के रास्ते से पैदल गए तो भी 3 किलोमीटर का रास्ता है। बीच में सिर्फ जंगल-झाड़ी है। इस वक्त कोई अकेला-दुकेला आदमी तो छोड़ो, परिंदा भी पर नहीं मारता उधर।"

यह सुनकर तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, लेकिन मुझे कुछ भी करके पहुँचना ज़रूरी था। ज़रूरी ही नहीं, बल्कि अनिवार्य था। मैंने उससे कहा, "अरे बाप रे! पर मेरा वहाँ समय पर पहुँचना ज़रूरी है।"

इतना समझाने पर भी इस नासमझ को आगे जाना ही है, यह देखकर वह थोड़ा गंभीर होकर बोला, "इतनी क्या ज़रूरत आ पड़ी?"

मैंने कहा, "दादा, लाइटकीपर के तौर पर मेरी पहली नौकरी कल सुबह से शुरू होनी है। कल सुबह हाजिर होकर मुझे चार्ज लेना है।"

इस पर आश्चर्य से वह बोला, "अरे! ऐसा बताओ न भाई। क्या आप भी, पहले ही क्यों नहीं बोले?"

मेरी खत्म होती उम्मीद फिर से जाग उठी, और मैंने पूछा, "क्यों? क्या हुआ?"

उसने बताया, "हाँ, एक उपाय है पर कितना समय लगेगा बता नहीं सकता।"

मैंने कहा, "जो भी हो बताइए, कितना भी समय लगे, पैसा लगे। मेरा कुछ इंतज़ाम करवा दीजिये।"

उस पर वह बोला, "पैसा नहीं लगेगा। भाई आज शुक्रवार है, लाइटहाउस की गाड़ी आज दोपहर को तालुका गई है, हफ्ते भर का राशन और सामान लाने। वह अब कभी भी आएगी, उसी में बैठकर आराम से चले जाना।"

यह सुनकर मेरी जान में जान आई। जिस गाँव में रिक्शा नहीं मिलती, वहाँ मुझे रात गुजारने के लिए जगह कहाँ मिलती, यह चिंता मिट गई। और अगर जगह मिल भी जाती, तो सुबह की पैदल यात्रा टलने वाली नहीं थी।

मैंने खुशी से उसका धन्यवाद किया और पूछा, "फिर भी, कितना समय लगेगा कुछ बता सकते हैं क्या?"

वह बोला, "अरे भाई, थोड़ा समय आगे-पीछे होता रहता है। थोड़ा टिक जाओ यहीं जब तक मेरा समेटना नहीं होता।" ऐसा कहकर उसने एक हिलता-डुलता स्टूल मेरी ओर सरका दिया। अब क्या, इस नई जगह पर दूसरा कुछ करने जैसा था भी नहीं। बैठ गया मैं उसके कहे अनुसार। आदत के मुताबिक मैंने अपना मोबाइल बाहर निकाला और यूँ ही चालू करके देखा। कोई कॉल या मैसेज नहीं थे। गनीमत यह थी कि यहाँ मोबाइल नेटवर्क ठीक था। वहीं से घर पर फोन करके इस गाँव में पहुँचने की खबर दी। माँ थी फोन पर। लाइटहाउस पहुँचते ही बताता हूँ, यह कहकर फोन रख दिया।

नवंबर का महीना था। शाम से ही ठंडी हवा चल रही थी। आधे दिन का सफर करके आए शरीर पर ठंडी फुहार पड़ रही थी। फोन रखा और उस शांत, नीरव जगह पर बैठे-बैठे पुरानी यादें मन में उमड़ने लगीं। मेघना! ऐसी ठंडी हवा में उसकी याद न आती तो ही आश्चर्य होता। ऐसी सर्द हवा में जवान शरीर को दूसरे गर्म जवान शरीर के साथ की चाहत होती है। मेघना और मैंने कई बार ऐसी शीतल शामें और रातें साथ बिताई थीं। एक-दूसरे के शरीर की धधकती आग बुझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन...

मेरे विचारों का सिलसिला उस टपरीवाले की आवाज़ से टूटा, "थोड़ी देर राह देखते हैं, नहीं तो उस गाड़ी वाले को फोन करूँगा। उसका नंबर है अपने पास। अपना कस्टमर है वो।"

फिर वह अपनी टपरी समेटते-समेटते यहाँ-वहाँ की बातें करता रहा। उससे जो एक-दो बातें पता चलीं, वह यह कि उसका नाम राजा है, गाँव में उसे 'राजाभाऊ' के नाम से जानते हैं। मैंने अपना नाम-गाँव उसे बताया। गाँव में खास ऐसा कुछ नहीं था। गाँव के मुख्य बस स्टॉप के पास एक छोटा सा बाज़ार यानी एक-दो चाय-नाश्ते के होटल, एक-दो किराने वाले, एक टेलर, एक-दो सैलून, एक चक्की वाला, ऐसी रोज़मर्रा की ज़रूरत की सड़क के दोनों ओर खड़ी कुछ दुकानें, एक बैंक और पोस्ट ऑफिस। यह सब कुछ साधारणतः 500 मीटर के दायरे में सिमटने वाला मामला था। इन सबके पीछे की तरफ ग्राम पंचायत का ऑफिस और गाँव की देवी का मंदिर। वहाँ से इस स्टॉप की दूरी करीब 10-12 मिनट की थी।

मैं यह सब नाइलाज होकर सुन रहा था। अब सारी चहल-पहल थम चुकी थी। राजाभाऊ का भी सब समेटना हो चुका था। मैं स्टूल हटाकर खड़ा हो गया और एक तरफ हो गया। अब इंतज़ार था कि गाड़ी कब आएगी। तभी राजाभाऊ चलते हुए मेरे पास आया और बोला, "भाई, हो गया आपका काम।"

मैं - "मतलब?"

राजाभाऊ – "फोन किया था मैंने अभी गाड़ी वाले को, नीचे तिराहे तक आ गई है गाड़ी। 2 मिनट में यहाँ पहुँचेगी। उसे बोल दिया है मैंने कि आपके नए साहब यहाँ मेरी दुकान पर रुके हैं, उन्हें ले जाओ।"

मैंने उसे धन्यवाद दिया। न कहते हुए भी, मेरी कोई जान-पहचान न होते हुए भी उसने बहुत मदद की थी। अब अँधेरा काफी घना हो गया था। इस आखिरी स्टॉप के पास ग्राम पंचायत के आखिरी खंभे पर लगा दीया (बल्ब) जलकर टिमटिमा रहा था। तभी गाँव से हमारी तरफ आने वाले रास्ते पर हमारी दिशा में आता एक तेज़ प्रकाश दिखाई देने लगा। राजाभाऊ ने मेरी तरफ देखकर हँसते हुए कहा,

"लो भाई, आ गई तुम्हारी गाड़ी। जाओ अब आराम से। मैं भी अब निकलता हूँ। नीचे गाँव में कभी आए तो आना चाय पीने इधर।"

ऐसा कहकर वह साइकिल पर टांग मारकर जाने लगा। मैंने भी उसे हाथ दिखाकर विदा किया। तभी वह गाड़ी मेरे पास आकर रुकी। ड्राइवर ने मुझे मेरा बैग और थैली पिछली सीट पर रखकर आगे आकर बैठने को कहा। मैं आगे जाकर बैठ गया और हमारी गाड़ी शुरू होकर लाइटहाउस की दिशा में दौड़ने लगी।

एक बड़ा चक्कर काटकर गाड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर आई और दूर खड़ा लाइटहाउस दिखाई देने लगा। इस दौरान गाड़ी के ड्राइवर उस्मान ने थोड़ी-बहुत जानकारी दी। अभी जो लाइटकीपर ड्यूटी पर हैं वे के.डी. साहब और उनकी मदद के लिए उनका एक असिस्टेंट है। के.डी. साहब की कहीं और बदली हो गई थी। 6-7 साल से के.डी. यहाँ पोस्टेड हैं। वे रविवार को जाने वाले थे। इतनी बात होने तक हम लाइटहाउस के मेन गेट के पास आ पहुँचे। गेट के बगल में ही एक बड़ी सी आधारशिला (nameplate) पर बड़े और साफ़ अक्षरों में लिखा था - "दीपस्तंभ!"
 

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दीपस्तंभ... यह नाम ही कितना वजनदार है न? इस नाम में रोशनी का तेज और एक स्तंभ की दृढ़ता समाई है। दोनों मिलकर एक भव्य और गंभीर आकृति साकार करते हैं। जैसे कोई अनार्य देवता अपने माथे का एकमात्र दहकता हुआ नेत्र खोलकर अपनी भेदक नजर चारों ओर घुमा रहा हो, वैसा इसका उग्र रूप। यह धूप-बारिश, ठंड-हवा, हर परिस्थिति से टक्कर लेते हुए पहाड़ की चोटी पर निश्चल होकर, पैर जमाए खड़ा रहता है। रात के घने अंधेरे में अपनी तेजस्वी रोशनी की धार (बीम) से सैकड़ों मील दूर भटके हुए जहाजों को भी सही दिशा दिखाता है। अपनी चारों ओर घूमती नजरों से इसने कितने सावन देखे होंगे? समुद्र के कितने ज्वार और भाटे देखे होंगे? अगर यह जादू से बोलने लगे, तो इसके पेट से कितनी ही कहानियाँ बाहर निकलेंगी, ऐसे न जाने कितने विचार मेरे दिमाग में आ रहे थे।

खणणणं... इस आवाज से मैं होश में आया। सामने लाइटहाउस का गेट एक लड़के ने खोला। उस्मान ने गाड़ी तुरंत अंदर ले ली। सामने ही एक छोटा सा बंगले जैसा घर था। बरामदे में दोनों तरफ दो दीये जल रहे थे, उस प्रकाश में घर का सामने का हिस्सा थोड़ा-बहुत दिख रहा था। मैंने मन में कहा, "बेटा... फायनली... यही है वो लाइटहाउस।" घर से थोड़ी दूर आगे दीपस्तंभ अंधेरे को अपनी रोशनी की तलवार से चीरते हुए, दिशा दिखाने का अपना व्रत निभाते हुए मुस्तैदी से खड़ा था।

उस्मान ने उस नौजवान से मेरा सामान उतारकर अंदर ले जाने को कहा और मुझे खुद के साथ चलने को कहा। वह मुझे एक तरफ से अंदर के कमरे में ले गया। उसने लाइट चालू की और मुझे फ्रेश होने के लिए बाथरूम वगैरह दिखाया। तभी वह लड़का मेरा सामान लेकर कमरे में आया। मैंने उसे 'थैंक यू' कहा, उस पर वह बस मंद सा मुस्कुराया और चला गया। उस्मान भी उसके साथ जाने लगा। जाते समय उसने मुझे बताया, "के.डी. साहब अभी दीपस्तंभ की ओर होंगे। उनके आने तक फ्रेश हो जाइए, चाय वगैरह लीजिये।" उसके बाद वह निकल गया क्योंकि 8 बजने आए थे और उसे वापस जाना था। मैंने उसे धन्यवाद कहा और वह बाहर चला गया।

मैंने एक बार कमरे पर नजर डाली। कमरा वैसे ठीक-ठाक ही था। शिकायत करने जैसा कुछ नहीं था और सबसे बड़ी बात, साफ-सफाई बहुत अच्छी थी। इधर-उधर देखते हुए ही मैंने अपना मोबाइल बाहर निकाला और घर फोन करके मेरे सुरक्षित पहुँचने की खबर दे दी। बाद में मैंने अपना बैग खोलकर कपड़े और तौलिया निकाला और बाथरूम की ओर भागा। आधे दिन से रुका हुआ मैं अंदर जाकर हल्का हुआ। बाथरूम में गीजर में गर्म पानी था, तो नहा भी लिया। जिससे एकदम तरोताजा महसूस होने लगा। अंदर एक आईना भी था।

शीशे के सामने खड़े होकर खुद को देखते हुए मुझे हमेशा ही गर्व महसूस होता है। मैं कॉलेज में एक बेहतरीन खिलाड़ी था। गोलाफेंक, भालाफेंक, लंबी कूद... ये मेरे खेल थे। कसरत का शौक शुरू से ही था मुझे। इसलिए मेरा शरीर भले ही पहलवानों जैसा गठीला न हो, पर सुदृढ़ और कसिला था। इसलिए आकर्षक लगता था। कॉलेज की लड़कियों और कुछ लड़कों की चोरी-छिपे देखती नज़रों में मुझे वह महसूस होता था। लेकिन तब मैं अपने खेल और पढ़ाई में ही ज्यादा व्यस्त रहता था। इसलिए अफेयर्स वगैरह मेरे ज्यादा हुए नहीं। मेघना ही थी बस मेरी जिंदगी में। पर वह भी आखिर में दिल को दाग देकर चली गई।

मैं तौलिया लपेटकर उघड़े बदन ही बाहर आ गया। अभी वाला वह लड़का कमरे में आकर मेरे बाहर आने का इंतजार कर रहा था। मेरे बाहर आते ही उसने मुझे कुछ पल गौर से देखा और पूछा कि चाय लाऊँ क्या? मैंने भी कह दिया, चलेगा। तो वह चाय लाने गया। मैं कपड़े बदलकर पास ही रखी कुर्सी पर बैठकर मोबाइल पर कुछ टाइमपास करने लगा। इतने में वह चाय लेकर आया। मैंने उसे कहा, "अरे दोस्त थैंक यू और सॉरी भी, मैंने तुमसे तुम्हारा नाम ही नहीं पूछा।" उस पर उसने "दीपक", बस इतना ही जवाब दिया। मैंने भी उसे अपना नाम बताया। यह सुनकर वह एक प्यारी सी मुस्कान देकर अपने काम पर चला गया। मैंने चाय पीकर खत्म की और फिर मोबाइल लेकर बैठ गया। 15-20 मिनट बाद दीपक कमरे में आया और बोला, "सर, साहब आ गए हैं। मिलना हो तो आ जाइए।" मैं तुरंत उठा और उसके साथ कमरे से बाहर निकला।

वह मुझे लिविंग रूम में ले आया। वहाँ सोफे पर पचास के आसपास की उम्र के एक सज्जन बैठे थे। यही थे के.डी. साहब। दीपक ने हमारी कामचलाऊ पहचान करवा दी। के.डी. साहब ने हँसकर मेरा स्वागत किया। सफर कैसा रहा वगैरह सामान्य पूछताछ की। शुरुआती बातचीत होने के बाद वे बोले, "नीरज, तुझे कल सुबह चार्ज दिया कि फिर परसों निकलने के लिए मैं आजाद। उससे पहले कल दिन भर मैं तुझे अपना सारा एरिया दिखा दूँगा, तुझे कुछ डाउट हों तो वो भी मैं क्लियर कर दूँगा और फिर हम अपनी सारी फॉर्मेलिटीज (formalities) पूरी करेंगे।"

मैंने हाँ में सिर हिलाया, आगे वे बोले, "और दीपक को यहाँ के परिसर और काम की काफी जानकारी है। वह मेरे हाथ के नीचे ही यहाँ जॉइन हुआ था। अब करीब डेढ़-दो साल से वह मेरे साथ है। बाजार जाने से लेकर खाना बनाने तक सब वही करता है, इसलिए तुझे जो भी मदद लगेगी वह करेगा।" यह सुनकर मुझे तसल्ली हुई। एक तो मेरी नई-नई नौकरी, ऊपर से इस सुनसान जगह पर अकेले भूत की तरह रहना मतलब मुश्किल काम था।

इतनी बात करते-करते उन्होंने दीपक को आवाज दी। उसके आने पर उन्होंने पूछा कि आज के सामान में उनकी 'चीज' आई है क्या? उस पर उसने हाँ कहा। वे बोले, "लेकर आ फिर सारी तैयारी करके। वक्त मत गँवा। नीरज साहब भी सफर करके आए हैं। उनकी भी आज की यात्रा की थकान कम होने दे।" वे आगे मुझसे बोले, "स्कॉच चलेगी न तुझे? मुझे हेड ऑफिस से पिछले ही हफ्ते पता चला था कि नया लाइटकीपर आने वाला है। इसलिए उस्मान को बोलकर आज तेरे स्वागत की तैयारी करवाई।"

तभी दीपक अंदर से एक स्कॉच की बोतल और खाने-पीने की अन्य चीजें (चखना) लेकर आया। मुझे हार्ड लिकर का ज्यादा शौक नहीं था। मैं कभी-कभार बीयर पी लेता था। मैंने उनसे कहा, "सर, मैं हार्ड लिकर नहीं लेता। मैं कभी-कभार बीयर पीता हूँ वो भी ज्यादा नहीं। आप एन्जॉय कीजिये। मैं थोड़ा कोल्ड ड्रिंक ले लेता हूँ आपको कंपनी देने के लिए।"

उस पर वे बोले, "वेरी गुड, पर कल तेरी एक नहीं चलेगी। कल मैं ही अपनी सेंड ऑफ (send off) पार्टी रखने वाला हूँ यहाँ। तुझे हमें जॉइन करना पड़ेगा।" मैंने हँसकर उनसे कहा, "कल की कल देखेंगे सर। अभी तो हम जल्दी निपटकर खाना खा लेते हैं। सफर की थोड़ी थकान है।"

फिर उन्होंने अपना ड्रिंक लिया। मैंने भी कोल्ड ड्रिंक लिया और थोड़ा चखना वगैरह खाया उनके साथ। पेट में आग लगनी शुरू हो ही गई थी। यहाँ-वहाँ की गप्पें चालू ही थीं हमारी। दीपक किचन में ही काम कर रहा था। थोड़ी देर में उसने आकर बताया कि खाना तैयार है। हम अपना, (सच कहूँ तो के.डी. साहब का) प्रोग्राम खत्म करके अंदर गए। हम तीनों एक साथ ही डाइनिंग टेबल पर खाना खाने बैठे। खाना अच्छा था। दीपक से मैंने कहा, "खाना बढ़िया बना है रे दीपक।" उस पर वह हँसकर थैंक यू बोला। उस पर के.डी. साहब बोले, "नीरज साहब, हमारा दीपक सब में उस्ताद है। आगे-आगे देखोगे उसकी तैयारी। खुश रखेगा तुम्हें। मेरे नीचे ही तैयार हुआ है वो सारे कामों में। है न रे दीपू?" ऐसा कहकर शरारतपूर्ण हँसते हुए उन्होंने दीपक की ओर देखकर आँख मारी। उस पर दीपक ने शर्माते हुए सिर झुका लिया। मुझे थोड़ा अजीब लगा वो। पर मैंने सोचा कि के.डी. साहब के पेट में गई उनकी 'प्रेयसी' (शराब) यह सारी लीला करवा रही थी। लेकिन उस हालत में भी मुझे एक बात शिद्दत से महसूस हुई, वो था दीपक का वो शर्माना और उसका वो मन में घर कर जाने वाला प्यारा सा खयाल।

ऐसा प्यारा सा खयाल और शर्माना पहले एक बार ही मेरे दिल में काँटे की तरह चुभ गया था। मेघना! हमारी कॉलेज की गर्ल्स टीम की फेमस कबड्डी खिलाड़ी। फर्स्ट ईयर में रहते हुए कुछ कॉमन फ्रेंड्स के ज़रिए ग्राउंड में एक-दो बार हम मिले थे। पर उसकी उस प्यारी सी मुस्कान को देखकर मैं एकदम फ़िदा हो गया था। फिर मैंने अपनी एक सहेली के ज़रिए उसकी जानकारी निकाली। पता चला कि मेघना का कोई बॉयफ्रेंड नहीं था। जवानी के दिनों में मेरे मन में उस वक़्त उम्मीदों के अंकुर फूटने लगे। पर मुझे पहल करने की हिम्मत नहीं हो रही थी। फिर भी एक मौका जल्द ही चलकर आया। उसे उसके कोच ने जिम ट्रेनिंग बढ़ाने को कहा। तब उसने मेरी सहेली से मेरा नंबर लिया और मुझे फोन करके पूछा कि क्या मैं उसे जिम में कुछ मदद कर सकता हूँ? मुझे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि यह फल अपने आप मेरी झोली में आ गिरा। मैंने एक सेकंड का भी विचार किए बिना उसे हाँ कह दिया।

हम खाना खाकर उठे और हाथ-मुँह धोया। के.डी. साहब बाहर बरामदे की बेंच पर जाकर बैठे। वहाँ उन्होंने एक सिगरेट सुलगाई। मुझसे भी पूछा पर मैंने विनम्रता से मना कर दिया। हम बिना कुछ बोले कुछ देर वहीं बैठे रहे। वे अपनी सिगरेट का आनंद ले रहे थे और मैं उस शांत पहर में सुनाई देने वाली समुद्र की धीमी लेकिन गहरी गूंज अनुभव करता रहा। पर अब मुझे नींद आने लगी थी। मैं साहब को शुभरात्रि कहकर अंदर चला गया। दीपक अभी भी कुछ काम निपटा रहा था। उसे भी शुभरात्रि कहकर मैं कमरे में गया। मैंने कपड़े बदलकर जरा आरामदायक टी-शर्ट और शॉर्ट्स पहनकर सोने की तैयारी की। मैं बिस्तर पर लेटने ही वाला था कि दीपक पानी की बोतल लेकर कमरे में आया।

"सर मैं बगल वाले कमरे में ही सोया हूँ, रात में कुछ लगे तो आवाज़ देना, दरवाजा खुला ही है।" ऐसा कहकर वह चला गया। जाते-जाते वह फिर शुभरात्रि कहकर अपनी वह प्यारी मुस्कान मुझ पर फेंक गया। उसके बाहर जाने तक मैं उसे जाते हुए देखता ही रहा। उसके बाहर जाने पर मैं आखिरकार लेट गया और निद्रादेवी की राह देखने लगा। 10-15 मिनट हुए पर मुझे लगा था वैसी तुरंत नींद नहीं आई। नई अनजान जगह पर वैसे भी जल्दी नींद नहीं लगती मुझे। बस यूँ ही पड़ा रहा और मन में धीरे-धीरे एक बवंडर अपने आप शुरू हो गया। एक चेहरा न जाने क्यों, बार-बार आँखों के सामने आने लगा।

दीपक! लड़का काम में अच्छा है पर कमबोल (silent type) है। मुँह से ज्यादा नहीं बोलता पर उसकी आँखें बहुत बोलती हैं। उन आँखों की भाषा थोड़ी रहस्यमयी है। हमें समझ नहीं आती वह भाषा, पर उसके मन में कुछ उथल-पुथल चल रही है, यह महसूस होता है। और उसका आज वह शर्माकर हँसना... हाय! हमें मिलकर मुश्किल से कुछ घंटे ही हुए हैं फिर भी इतना विचार क्यों कर रहा हूँ मैं एक छोटी सी बात का? क्या मैं उसकी तरफ आकर्षित हो रहा हूँ? कैसे मुमकिन है? उसका वह शर्माकर हँसना बिल्कुल मेघना जैसा ही था इसलिए क्या? वो होती अभी मेरी बाहों में तो नींद आ जाती मुझे शांति से। उसे पता है मुझे कैसे शांत करना है। क्या?? मेघना?? पर वो कैसे आएगी अब मेरी बाहों में? सच तो यह है कि अब वह कभी नहीं आएगी। मेघना का विचार दिमाग में आया और मैं बेचैन हो गया। बवंडर ने अब तूफ़ान का रूप लेना शुरू कर दिया।

जिम में अब मेघना और मैं नियमित मिल रहे थे। मैं खुशी से उसकी ट्रेनिंग में मदद कर रहा था। उसे भी वह अच्छा लग रहा था। शुरुआत में मैं सुरक्षित अंतर रखकर ही उसे ट्रेनिंग देता था। गलती से हाथ को हाथ भी लग जाए तो मैं उसे 'सॉरी' कहता था, ताकि वह मुझे गलत न समझे। पर धीरे-धीरे उसे मुझ पर भरोसा होने लगा, हमारा गलती से भी एक-दूसरे को स्पर्श हो जाता तो वह कोई संकोच नहीं करती थी। मेरी भी झिझक खुलती जा रही थी। मैं भी अब उससे खुलकर पेश आने लगा था। कभी उसका हाथ पकड़कर, कभी कमर को सहारा देकर तो कभी पैरों को आधार देकर ट्रेनिंग में मदद कर रहा था। जिम के बाद तुरंत घर भागने वाले हम दोनों अब जिम के बाहर ही एक-दूसरे के साथ यूँ ही रुककर गप्पें मारने लगे। 2-3 महीने यह हमारा ऐसे ही चल रहा था।

एक दिन बातों-बातों में मैंने उससे पूछा कि कहीं घूमने चलें क्या? उसने भी हाँ कर दी। उसी हफ्ते के रविवार को हम हमारे गाँव के पास ही एक अच्छा बीच (beach) है, उधर घूमने गए। अब हमारा साथ घूमना भी बढ़ गया, जाहिर है चोरी-छिपे। यार-दोस्त थे ही मदद के लिए। पर घर पर बताने जितने बड़े हम नहीं थे और हमारे रिश्ते की भी सही पहचान हमें नहीं हुई थी। और चोरी-छिपे घूमने पर जो होता है वही हुआ। हमारी नज़दीकियाँ अपने आप ही बढ़ गईं। एक-एक कदम आगे बढ़ रहा था हमारा। हाथ पकड़ने से शुरुआत हुई और चुंबन, आलिंगन, ऊपर-ऊपर से शरीर को स्पर्श, ऐसे चढ़ते क्रम में फोरप्ले तक हमारी गाड़ी आ गई।

वैसे उसकी फिगर का अंदाजा मुझे ट्रेनिंग के दौरान ही लग गया था। हापुस आम जैसी मस्त भरदार छाती, पतली पर मजबूत कमर, छोटा तरबूज लगे वैसा गोल-मटोल पिछवाड़ा, और सब पर कलश मतलब मुझे पसंद आने वाली उसकी भरी हुई मजबूत जाँघें और शिल्पकार द्वारा गढ़ी गई हों वैसी सुडौल और गदराई हुई पिंडलियाँ। स्त्री सौंदर्य का वह खजाना ही थी।

उसके होंठ चूसते समय एक अलग ही नशा चढ़ता था, उसके गोल गदराये आम दबाने के बाद जब उसके मुनक्के कड़क होते, उन्हें चूसते वक्त तो मैं बेहोश ही हो जाता। पर मेरा खास प्रेम था उसकी लोअर बॉडी (निचले शरीर) पर, उसकी जाँघों पर और सख्त पिंडलियों पर मैं चुम्बनों की इतनी बरसात करता कि वह मुझे ऊपर खींचकर अपनी त्रिकोणी गुफा पर मेरा चेहरा रगड़ लेती। यहाँ तक मुझे उसके बदन से खेलना जमता था। लेकिन बाद में अंदर जाने का वक्त आता तो मुझे न जाने क्यों रुक जाने का मन करता। सिर्फ उसके समाधान के लिए मैं चाटकर या उंगलियों से उसे शांत करता। उसे मुझसे सब चाहिए था पर मेरा मन गवाही नहीं देता था। उसके अंदर जाऊँ ऐसा मुझे तब तो नहीं लगता था। कहीं न कहीं कुछ गलत हो रहा है, ऐसी भावना मन में आती। फिर वही उठकर मुझे सुलाती और मेरे कपड़े उतारकर अंग से अंग रगड़कर कोशिश करती रहती। बिस्तर में शेरनी थी वह और मैं शिकार। मेरे हथियार से बेरुख़ी से खेलती, पुचकारती, उसके स्पर्श से मैं कंट्रोल नहीं कर पाता और 2-4 मिनट में ही मेरी पिचकारी छूट जाती। इसी समय मेरा दर्शनीय और गठीला बदन मेरा साथ छोड़ देता। बेचारा मैं फिर वैसे ही उससे लिपटकर शांत सो जाता। पर वह इतिहास हो चुका है अब।

रात के 11 बज चुके थे, अब मुझे नींद आनी चाहिए थी। तभी मेरे रूम के बाहर कुछ हलचल महसूस हुई। मुझे समझ नहीं आया कि वहम है या सच में कोई है बाहर? क्योंकि दीपस्तंभ की घूमती रोशनी और वहाँ की विशाल मशीन की धड़ाम-खड़ाम जैसी धीमी आवाज़ इस कमरे में लगातार आ ही रही थी। वैसा ही कुछ होगा सोचकर मैंने ध्यान नहीं दिया और करवट बदलकर सोने की कोशिश करने लगा। 5 मिनट बाद फिर कुछ हलचल महसूस हुई। मुझे लगा के.डी. साहब लाइट हाउस की तरफ तो नहीं जा रहे, कोई काम आ गया या कोई खराबी हो गई हो तो। सोचा अब उठकर देखते ही हैं। उठकर बाहर गया। बाहर जाने का मुख्य दरवाजा बंद ही था। बगल में के.डी. सर का रूम भी बंद था। मुड़कर देखा तो किचन बंद ही था। दीपक के कमरे में झाँका तो दीपक वहाँ नहीं था। यह क्या अजब मामला है मुझे समझ नहीं आया। अंदर का कॉमन बाथरूम भी खाली था। मन में कहा कल पूछेंगे क्या था, अब सोते हैं। पहले ही दिन इतना तनाव नहीं चाहिए दिमाग को।

वापस लेट गया और थोड़ी देर में नींद आने लगी मुझे। अधकच्ची नींद लगी होगी या नहीं, तभी मेरे कमरे के दरवाजे के पास कुछ खुसुर-पुसुर होने की आवाज मुझे आई। मैं दरवाजे की तरफ मुँह करके ही सोया था। मैंने आँखें मिचमिचा कर देखा। तभी दीपस्तंभ का उजाला कुछ पलों के लिए कमरे में झाँक गया और मुझे दरवाजे पर कोई खड़ा दिखा। पूरी तरह नंगा! और उस शरीर के निचले हिस्से में एक भला-बड़ा डंडा आसमान को सलामी देता झूल रहा था। मुझे अपनी आँखों पर विश्वास ही नहीं हुआ। एक से डेढ़ सेकंड का वह दृश्य मुझे ऊपर से नीचे तक हिला गया। "कौन? दीपक?" ऐसी मैंने आवाज़ दी पर कोई जवाब नहीं आया। कुछ सेकंड बाद दीपस्तंभ फिर मेरे कमरे में झाँका और मैंने सारी जान आँखों में लाकर दरवाजे पर कौन है यह देखने की कोशिश की। अब वहाँ कोई नहीं था। मेरा सिर चकरा गया। क्या करूँ सूझ नहीं रहा था। हिंदी सिनेमा के न जाने कौन-कौन से हॉरर सीन आँखों के सामने आने लगे। मैंने तुरंत उठकर दरवाजा खींच (बंद कर) लिया। अब मुझे थोड़ा सुरक्षित लगने लगा था पर आँखों के सामने से वह दृश्य हट नहीं रहा था। उल्टा, वही दृश्य फिर एक बार दिखेगा क्या, ऐसी कोई अनामी तलब जैसी कुछ हो रही थी। एक बार उठकर बोतल से पानी पिया और फिर लेट गया। काफी देर मेरी बेचैनी चालू रही। मैंने जो देखा वह सच में कोई था या आधी नींद में हुआ वहम, कुछ समझ नहीं आ रहा था... आखिर देर से ही सही पर निद्रादेवी मुझ पर प्रसन्न हुईं। विचारों के भंवर में मुझे कब नींद लगी पता नहीं चला।

मेघना और मैं करीब 2 साल साथ थे। हम कितने भी करीब आ रहे थे फिर भी अभी तक एक-जान (intercourse) नहीं हुए थे। आखिरी मौके पर मेरा घोड़ा (लिंग) जवाब दे जाता था। शर्म आए ऐसा कुछ नहीं था पर मलाल था। मेरा घोड़ा एक पूर्ण पुरुष को गर्व हो ऐसा अच्छा 7 इंच का और मोटा-तगड़ा था। उछल भी पड़ता था उसके पास आते ही, वह पानी तक ले जाती उसे पर आखिर में वह पानी पीने को तैयार नहीं होता था। अचानक गर्दन डालकर सो जाता। यह ऐसा क्यों हो रहा है कुछ समझ नहीं आता था।

ऐसे ही हम एक बार बाहर घूमने गए थे। सांझ का वक्त था। यहाँ के जैसी ही ठंडी हवा चल रही थी। उस सुनसान समुद्र किनारे हम दोनों ही थे। समुद्र की गूंज, ऊपर चमचमाते तारे, धीमी हवा और पूरा एकांत, यह सब हमारे शरीर की आग भड़काने के लिए काफी था। कुछ ही पलों में हम एक-दूसरे की बाहों में थे। बदन से बदन रगड़ते हुए एक-दूसरे की गर्मी ले रहे थे। हमारे होंठ एक-दूसरे में चिपका दिए हों वैसे भिड़े थे। हाथ एक-दूसरे के कामुक अंगों को टटोल रहे थे। धीरे-धीरे हमारे कपड़े अपने आप ही गिर पड़े। हम दोनों निर्वस्त्र उस ठंडी रेत में एक-दूसरे को कसकर जकड़े हुए थे। आज मेघना कुछ ज्यादा ही जोश में थी। उसने मुझे चित लिटा दिया और मेरे बदन पर सवार हो गई। उसकी वह गीली हुई त्रिकोणी गुफा मेरे घोड़े पर रगड़ रही थी। मेरा घोड़ा भी उछलकर उसे सलामी देने लगा। जैसे ही मैं जोश में आया, उसने मेरा घोड़ा हाथ में कसकर पकड़ा और उससे कुश्ती की तरह खेलने लगी। मेरा पानी निकलने वाला है यह मुझे महसूस होने लगा। मैं एक हाथ से उसका हाथ जोर से पकड़कर उसे रोकने की कोशिश कर रहा था। उसे उस पर गुस्सा आया और वह ज्यादा ही जोर लगाने लगी। उसने अब मेरा घोड़ा छोड़ दिया और मेरी छाती पर आकर बैठ गई और मेरे कंधों को पकड़कर मुझे जोर-जोर से हिलाकर पूछने लगी, "क्यों नहीं देता मुझे जो चाहिए? क्या कमी है मुझमें? या तुझमें ही कोई कमी है? अलग है क्या तू सब से? बता मुझे... बता..."

उसका वह खुरदुरापन इतना जानलेवा था कि कुछ ही देर में मेरे घोड़े की लगाम टूट गई और एक जोरदार पिचकारी मारकर वह निढाल होकर गिरने लगा... पर वह मुझ पर चिल्लाती ही रही... "बता मुझे... बता... साहब उठिए अब... उठ रहे हैं न..?"
 

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"साहब उठिए... उठ रहे हैं न?" इस आवाज़ से मैं एकदम हड़बड़ाकर जाग गया। दीपक मेरे कंधे को पकड़कर हिला रहा था। मुझे जगाने के लिए आवाज़ दे रहा था। आवाज़ देते वक्त उसकी वह प्यारी मुस्कान उसके चेहरे पर तैर रही थी, लेकिन आँखें कुछ और ही कह रही थीं। उसके चेहरे के वे मिले-जुले भाव देखकर मैं एक पल के लिए चकरा गया। मतलब थोड़ी देर पहले मेघना नहीं हिला रही थी मुझे? लेकिन स्पर्श तो उसी का था। उसी का था या 'उसके जैसा'? क्या इस दीपक का स्पर्श मेघना जितना ही तीव्र था? क्योंकि आँखें खोलीं तब दीपक ही सामने था... बाप रे... मतलब मेरे घोड़े की लगाम टूटी, वो... अरे देवा...

यह विचार दिमाग में आते ही उसकी नज़रों में कैद हुई अपनी नज़र मैंने हटा ली। मैं झट से बेड पर उठकर बैठ गया। सिर एक बार झटका और नींद उड़ाने की कोशिश की। मैंने हिम्मत जुटाकर दीपक से पूछा, "कितने बज गए रे?"

उस पर वह बोला, "सर 9:30 होने को आए।"

मैं - "अरे बाप रे, बहुत देर हो गई। के.डी. साहब उठ गए क्या?"

वह - "हाँ, वे उठकर तैयार हैं। आपकी राह देख रहे हैं।"

मैं - "अच्छा, उनसे कहो मैं आता हूँ बस।"

इस पर वह "ठीक है" कहकर फिर एक बार प्यार से मुस्कुराया और बाहर चला गया। उसके जाते समय मैं उसे देखता रहा। कल रात मैं जब यहाँ आया तब वह टी-शर्ट और ट्राउजर में था। अभी सुबह आया तब हाफ चड्डी और बनियान में था। उसके बाहर जाने तक मेरी नज़र उसका पीछा करती रही पर मन अभी भी थोड़ी देर पहले वाले सवाल में उलझा था... दीपक कितनी देर से मुझे जगा रहा था? कितनी देर खड़ा था वह मेरे पास? देखा क्या उसने सब कुछ? मैंने सपने में मेघना का और हकीकत में उसी का हाथ तो नहीं पकड़ा था न? न जाने कितने शक मन में आ रहे थे। सबसे ज़रूरी बात... मैं झटके से उठा और बाथरूम की तरफ भागा। अंदर जाते ही मैंने अपनी लोअर नीचे की। जो दिखा उससे मैं शर्म से लाल हो गया। जो नहीं होना चाहिए था, वही हुआ था। मेरी लोअर पूरी सन गई थी। सपने में उड़ी पिचकारी हकीकत में मेरी लोअर भिगो गई थी। कैसे मुँह दिखाऊँगा मैं दीपक को? उसने अगर सब देख लिया होगा तो क्या सोचा होगा उसने? पर वह तो हमेशा की तरह प्यार से मुस्कुरा रहा था। उससे तो यही लगा कि उसने आपत्तिजनक कुछ देखा नहीं होगा, ऐसा मानकर मैंने अपने मन को तसल्ली दे दी।

तसल्ली पूरी नहीं हुई थी फिर भी के.डी. साहब के सामने हाजिर होना ज़्यादा ज़रूरी था। ज़्यादा वक़्त न गँवाते हुए मैं फटाफट नित्यकर्म से निवृत्त हुआ और बाहर निकला। के.डी. साहब बाहर ही लिविंग रूम में थे। 'सुप्रभात' कहकर उन्होंने मेरा स्वागत किया। मैंने भी उनका अभिवादन करके उनके पास वाली कुर्सी पर बैठ गया। चाय आ ही चुकी थी। चाय निपटाकर हम ऑफिस की तरफ जाने को निकले। जाते-जाते उन्होंने दीपक को कुछ निर्देश दिए और हम बाहर निकल पड़े। बाहर सुबह की मस्त धूप खिली थी। समुद्र की ओर से आने वाली हवा उस धूप की तीव्रता कम कर रही थी। सामने खड़ा दीपस्तंभ अब विश्राम कर रहा था। कल रात उसने पूरा समय पहरा दिया था। ऑफिस हमारे रहने की जगह से 3-4 मिनट पैदल चलने की दूरी पर था। कल रात के अंधेरे में न दिखीं आस-पास की कई चीजें अब दिख रही थीं। सबसे पहले तो यह कि दीपस्तंभ का एरिया बहुत बड़ा था और चारों तरफ से उसे पत्थर की दीवार (बाँध) से घेरा गया था। उस पर लोहे की तारों की बाड़ थी। आने-जाने के लिए एक ही गेट था। गेट से अंदर आने पर पहले हमारे रहने की जगह। उसके बाद आगे ऑफिस। ऑफिस से आगे कुछ दूरी पर जनरेटर यूनिट और सबसे आखिर में वह व्रतस्थ खड़ा दीपस्तंभ। कुल मिलाकर पौन किलोमीटर का इलाका। दीपस्तंभ की दिशा में दीवार के उस पार गहरी खाई थी, जहाँ समुद्र आकर इस समुद्री सीमा के पैर धोता था।

अभी भी कुछ ज़रूरी चीजें यहाँ थीं। एक ऊँचे टावर पर पानी की टंकी थी। एक तरफ कार शेड थी। उस कार शेड में कार न हो पर एक स्कूटर खड़ी थी। दीपक उसे बाहर आने-जाने के लिए इस्तेमाल करता था। कभी उस्मान को देर हो जाने से यहीं रुकने की नौबत आती तो वह अपनी गाड़ी वहाँ खड़ी करता था। उसी के साथ हमारे रहने की जगह के थोड़ा पीछे की तरफ पानी का एक छोटा सा तालाब था। यह प्राकृतिक रूप से ही बना था। ज़्यादा गहरा नहीं था पर पानी लबालब भरा था। इस तालाब के चारों ओर एक पत्थर का चबूतरा बनाकर वह जगह सुरक्षित कर दी गई थी। पेड़-पौधे वगैरह यहाँ कुछ नहीं थे। पूरा खुला पथरीला मैदान ही था। हमारे यहाँ इसे 'कातळ' (चट्टानी पठार) कहते हैं।

पूरा एरिया घूमकर आने में हमें एक से डेढ़ घंटा लगा। घूमते-घूमते के.डी. साहब मुझे ज़रूरी जानकारी दे ही रहे थे। यहाँ के काम करने का तरीका, समय, परिसर, समय-समय पर बरती जाने वाली सावधानियाँ, यह सब उन्होंने अच्छे से समझाया। अब हम ऑफिस में आकर बैठे। कल से मैं यहाँ का लाइटकीपर बनकर आधिकारिक रूप से कार्यभार संभालने वाला था। अंदर आने पर के.डी. साहब ने मुझसे पूछा, "तो मिस्टर नीरज, कैसा लगा हमारा लाइटहाउस?"

मैं - "सर बढ़िया है सब यहाँ का और आपने देखभाल भी काफी अच्छी की है सारी चीजों की।"

साहब - "काम के बारे में कोई शक? हो तो अभी पूछ लो। कल से तुम ही तुम हो यहाँ।"

मैं - "कोई शक नहीं सर, ट्रेनिंग में काफी कुछ सीखा ही हूँ मैं और बाकी आपने अच्छी जानकारी दी।"

एक पल मैंने उनकी तरफ स्थिर नज़र से देखा और कहा, "और सर कल से मैं अकेला कैसे यहाँ? दीपक है न मदद के लिए। और आपकी मदद लगी तो फोन है ही न।"

इस पर उनके चेहरे की मुस्कान थोड़ी फीकी पड़ गई, वे बोले, "नीरज, यह जगह ऐसी है न कि यहाँ इंसान दुनिया से बहुत दूर होता है पर खुद के बहुत करीब रहता है। यहाँ की शांति जो हमसे बात करती है, उससे हमारी खुद से असली पहचान होती है।"

मैं - "मतलब सर?"

अब उनके चेहरे पर वह शरारती मुस्कान फिर तैरने लगी, "अरे आज ही जॉइन हुए हो। थोड़े दिन रहोगे यहाँ तो तुम्हें खुद ही समझ आ जाएगा।"

मैं - "पर दीपक है ही न साथ में। मैं कहाँ अकेला बैठा रहने वाला हूँ यहाँ?"

साहब - "सही है तुम्हारा, दीपक है ही यहाँ। अच्छा लड़का है वो। मेरी खास मर्जी का है। तुम्हें कभी किसी चीज की कमी नहीं होने देगा। जो मांगोगे मिलेगा। दीपक न होता तो मैं अकेले क्या करता यहाँ? मैं कल्पना भी नहीं कर सकता।" इस पर वे किसी ख्यालों में खोए से लगे।

उनका ध्यान तोड़ते हुए मैंने पूछा, "कितने दिन हो गए उसे यहाँ जॉइन हुए?"

साहब - "डेढ़-दो साल होने को आए अब उसे। वह रहने वाला यहीं पास के गाँव का है। उसके पिताजी यहाँ छोटी-मोटी मरम्मत और रखरखाव के काम के लिए आते थे। यह भी उनके साथ आता था मदद के लिए। तब 18-19 साल का था। बीच में उसके पिताजी बीमार पड़कर भगवान को प्यारे हो गए। तब माँ और यह, दो ही घर में। कमाने वाले इकलौते पिता नहीं रहे, ऐसी हालत। एक बार इसकी माँ इसे लेकर आई कि कुछ काम दे दो लड़के को। तब मैंने थोड़ी पूछताछ की तो पता चला कि यह 10वीं पास है। यहाँ भी हेल्पर की जगह खाली थी। फिर हेड ऑफिस फोन करके सब बताया और इसे यहाँ रख लिया। बूढ़ी माँ को मदद हो जाती है, बस।"

मैं - "अच्छा है सर, अपनी वजह से अगर किसी गरीब का भला होता है तो।"

साहब - "उसका भला हुआ कि नहीं हुआ, वह जाने। पर पिछले जो भी डेढ़-दो साल वह यहाँ है, उसने मेरे लिए बहुत कुछ किया है।"

मैं - "हम्म्म्म.. वह लगता तो है मिलनसार और आपकी वजह से उसे नौकरी भी मिल ही गई।"

साहब - "सिर्फ मिलनसार नहीं, वह बहुत कुछ है। अभी बताने बैठूँ तो शाम हो जाएगी। अरे हाँ, शाम से याद आया। आज अपनी पार्टी है। सो हम अपना चार्ज देने का काम खत्म करते हैं।"

ऐसा कहकर उन्होंने कुछ ज़रूरी कागज और फाइलें निकालीं। कुछ कागजातों पर हस्ताक्षर और हेड ऑफिस से संबंधित कुछ कागजी कार्यवाही पूरी होने पर के.डी. साहब ने इंटरकॉम से दीपक को फोन किया और बताया कि हम थोड़ी देर में खाना खाने आ रहे हैं। उस पर उधर से जो जवाब आया उस पर वे मन ही मन मुस्कुराए और फोन रख दिया। हमारा ऑफिस का काम खत्म करके हमने औपचारिक हाथ मिलाया (handshake) और बाहर निकलकर घर की ओर चल दिए।

हम घर के पास पहुँचे, तभी दीपक बाहर आता दिखाई दिया। हाथ में कुछ थैले और स्कूटर की चाबी थी। साहब उससे बोले, "आराम से जाना रे और आने में ज़्यादा देर मत करना।" उस पर वह सिर हिलाकर मुस्कुराया और कार शेड की ओर चल दिया। हम घर पहुँचे तब तक स्कूटर स्टार्ट करके दीपक के निकल जाने की आवाज़ आई। मैंने पूछा, "अब कहाँ गया यह?"

साहब - "अरे मिस्टर आज अपनी पार्टी है भाई। उसे कुछ सामान लाने भेजा है। यहीं तालुका जाकर आएगा वह। सच कहूँ तो मैं ही जाने वाला था पर तुझे साथ देने के लिए आज मैं रुक गया। बाकी अब कल से तुम दोनों हो ही। यहाँ का कामकाज ठीक से सँभालोगे, ऐसी उम्मीद करता हूँ।"

मैं - "हाँ ज़रूर सर। पर वह बहुत कम बोलता है। हमारा बोला हुआ उसे पसंद आता है या नहीं, पता नहीं चलता।"

साहब - "नीरज, अरे थोड़े दिन जाने दो। अभी तो आए हो। थोड़े दिनों में तुम दोनों की अच्छी दोस्ती होती है या नहीं, देखना। मुझे अच्छा अनुभव है उसका। वह बोलता भले ही कम हो, पर अपने लिए बहुत कुछ करता है और वो भी बिना कहे।" इस पर वे हँसे और बोले, "चलो, अभी तो हमें अपने हाथ से ही परोसकर खाना है। शाम को वह आ गया तो बाकी सब करेगा।"

मैंने भी कहा, "चलो तो फिर।"

इतना बोलकर हम डाइनिंग टेबल पर जाकर बैठे और खाना परोसकर खाना शुरू किया। खाते-खाते इधर-उधर की गप्पें हुईं और हम दोपहर का आराम करने अपने-अपने रूम में चले गए। मैं जाकर सीधा बिस्तर पर लेट गया। सुबह की सैर अच्छी हुई थी और खाना भी पेट भरकर हुआ था, इसलिए मेरी आँख लग गई। दीपस्तंभ के परिसर और काम को दोहराते-दोहराते अच्छी गहरी नींद लग गई।
 
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मुझे नींद दरवाजे पर हुई खटखटाने की आवाज़ से आई। दरवाजे पर के.डी. साहब खड़े थे। "बढ़िया सोए थे?" उन्होंने कहा।

मैं - "हाँ, अभी अच्छी नींद आई।"

साहब - "रात को ठीक से सो नहीं पाए क्या?"

मैं - "हाँ, थोड़ी देर से नींद लगी। नई जगह और ऊपर से ऐसी एकांत जगह।"

साहब - "हो जाएगी आदत धीरे-धीरे। चल फ्रेश होकर आ जा बाहर। आज मेरा यहाँ का आखिरी सनसेट (सूर्यास्त) है। मैं जा रहा हूँ देखने। तू भी चल।"

मैं भी मौके का फायदा उठाते हुए उठा और फ्रेश होकर बाहर आया। चलते-चलते हम दीपस्तंभ तक पहुँचे। के.डी. साहब के इशारे के मुताबिक हम अंदर की लोहे की सीढ़ियों से स्तंभ के शिखर की ओर जाने लगे। साहब आगे और पीछे-पीछे मैं। बाहर निकलने के बाद से साहब थोड़े कम बोल रहे थे। सीढ़ियाँ चढ़ते हुए एक हाथ से वे स्तंभ की दीवार पर धीरे-धीरे हाथ फेरते चल रहे थे। मानो जिस जगह की उन्होंने इतने साल सेवा की, उस जगह से उन्हें भी मोह हो गया था। उसी जगह को अब अलविदा कहने का पल करीब आ रहा था। दोपहर में साहब की बातों से लग रहा था कि उन्हें इस जगह की रत्ती-रत्ती खबर थी। वैसे ही इस जगह को भी उनकी होगी। उनके कहने के मुताबिक क्या सच में इस एकांत जगह ने उन्हें उनकी पहचान करवाई थी?

हम ऊपर पहुँचे और ऊपर की एक छज्जे (balcony) में खड़े हो गए। सामने अथाह समुद्र फैला हुआ था। यहाँ से उस समुद्र के पार का क्षितिज और भी विस्तृत और गोलाकार दिख रहा था। आमतौर पर विशाल और डरावनी लगने वाली लहरें अब समुद्र किनारे पर नाजुक कढ़ाई (zari work) की तरह दिख रही थीं। शाम की सुनहरी किरणें उस कढ़ाई को और चमक दे रही थीं। समुद्र की धीमी-धीमी सुनाई देने वाली गूंज किसी गायक के गहरे सुर लगाने जैसी लग रही थी और आस-पास उड़ते समुद्री पक्षियों की आवाज़, किसी साथ में बैठे सारंगी वाले की अप्रतिम तान की तरह उस गहरे सुर को सजा रही थी। काफी देर हम बिना कुछ बोले वैसे ही खड़े रहे। सूर्यबिंब अब तेजी से क्षितिज की गोद में समाने लगा। सुनहरी किरणों की जगह अब लालिमा ने लेनी शुरू कर दी। वह आतुर सूरज धीरे-धीरे कब गोद में समा गया पता ही नहीं चला। अब बस क्षितिज पर लाल-तांबिया आभा थी और दूसरी दिशा से अपना हक जताने आ रही नीली-काली रात दिखाई देने लगी थी।

हमारा खोया हुआ मन स्कूटर के हॉर्न से होश में आया। हमने पीछे मुड़कर देखा तो नीचे के टेढ़े-मेढ़े रास्ते से एक टिमटिमाती रोशनी ऊपर आती दिखी। वह दीपक ही था। साहब बोले, "चलो नीरज राव, निकलते हैं। कैसा लगा हमारा सनसेट?"

मैं - "बहुत ही बढ़िया। कितनी देर खड़े रहे पता ही नहीं चला।"

साहब - "हम्म्म्म... इस जगह में कुछ तो जादू ज़रूर है। यह आखिरी पल हमेशा भारी होता है, नीरज। सात साल... मतलब एक बड़ा चक्र पूरा होता है। यहाँ आया तब मैं कौन था, और अब जाते वक्त कौन हूँ, यह मुझे इस दीपस्तंभ ने दिखाया। यह जगह सिर्फ जहाजों को नहीं, बल्कि यहाँ रहने वालों को भी दिशा दिखाती है। हर किसी को यहाँ एक 'सत्य' मिलता है। मेरा सत्य मुझे मिला... अब तुझे तेरा सत्य जल्द ही मिलेगा।"

इतना बोलकर वे सीढ़ियाँ उतरने लगे। उनकी वह अंतिम विदाई वाली बातें सुनकर मुझे मन ही मन यकीन हो रहा था कि इस जगह में कुछ न कुछ जादू ज़रूर होगा। साहब के हाथ ज़रूर ऐसा कुछ लगा है जिसकी उन्हें पहले कल्पना नहीं थी। जो उन्हें मिला है वह किसी भी प्रमोशन, पैसा, मान-सम्मान से कहीं ज़्यादा कीमती है। वरना सरकारी नौकरी में कौन खुद को इतना उलझा लेता है? मैं तो यहाँ साफ इरादे से आया था, वह था पैसा कमाना और आगे की जिंदगी का इंतज़ाम करना।

हम नीचे उतरकर घर की तरफ चलने लगे। जाते-जाते साहब ने मुझे याद दिलाया, "नीरज अब तेरी ड्यूटी शुरू। चल आज सारी मशीनरी चालू कर, बत्ती जलाकर फिर घर चलते हैं।" मैं एकदम चौंका। अरे हाँ। अपना काम है आज से यह। मैं साहब के उन विचारों से अब तक बाहर ही नहीं आया था। मैं तुरंत अंदर गया, सारी प्राथमिक जाँच करके सही स्विच चालू किए। एक बादलों की गरज जैसी आवाज़ करके जैसे कोई जानवर जाग जाए, वैसे वह विशाल दीपस्तंभ जाग उठा और अपनी आँख खोलकर अपने काम पर लग गया। के.डी. साहब बगल में खड़े होकर सब देख रहे थे। उनके चेहरे की सुकून भरी मुस्कान बता रही थी कि मैंने पहली बार में अच्छा काम किया था। वे बोले, "अब मुझे चिंता नहीं। तू ज़रूर इस दीपस्तंभ को कुशलता से संभालेगा।" मैंने आदरपूर्वक हँसकर उन्हें विश्वास दिलाया और हम घर की ओर चल दिए।

घर की बत्तियाँ दीपक ने आते ही जला दी थीं। वह किचन में कुछ काम कर रहा था। हम घर पहुँचे तब वह बाहर आया और सारी व्यवस्था ठीक है, ऐसा के.डी. साहब को बताकर वापस काम पर लग गया। के.डी. साहब प्रसन्नता से मुस्कुराए और मुझसे बोले, "जा कपड़े बदलकर आ जल्दी। अब नेक काम में देरी नहीं।" ऐसा कहकर वे किचन में दीपक को कुछ निर्देश देने गए। मैं अपने रूम में गया। कपड़े बदलकर बाहर आया तब बाहर दीपक सारा तामझाम लगा ही रहा था। मैंने उससे कहा, "देर हो गई क्या तुझे आने में? कोई दिक्कत तो नहीं आई न?"

उस पर वह हँसकर बोला, "हाँ सर, थोड़ी देर ही हुई। पर हमारे साहब का ऑर्डर था इसलिए सारा इंतज़ाम करके ही आया।"

हमारी इतनी बात होने तक के.डी. साहब बाहर आकर बैठ गए। बोले, "दिप्या (दीपक) बेटा कितनी देर लगाई? मुझे चिंता होने लगी थी।"

दीपक - "साहब कल से आप नहीं हैं न यहाँ, इसलिए आज सारी व्यवस्था करके ही आया। कुछ बाकी न रह जाए इसलिए।"

इस पर वे दोनों खुलकर हँसे। दीपक को इतना खुलकर बोलते और हँसते हुए मैं अभी ही देख रहा था। पर वह भी सही था। उसका वह चुप रहना मुझे थोड़ा खटक ही रहा था। चुप रहने से अच्छा थोड़ा हँस-बोल ले तो हम ठीक रहेंगे यहाँ, ऐसा मुझे लग रहा था। साहब अब पार्टी के पूरे मूड में आ रहे थे। उन्होंने ऐलान कर दिया कि आज पहला जाम तीनों साथ पियेंगे। उस पर दीपक ने 2 गिलास और एक बीयर मग बाहर निकाला। के.डी. साहब एकदम हैरान हुए और बोले, "अरे बीयर कौन पीने वाला है? स्कॉच है न?"

उस पर दीपक ने मेरी ओर इशारा करके जवाब दिया, "साहब, बीयर इनके लिए। कल वे बोले थे न कि उन्हें बीयर चलती है। उनकी भी व्यवस्था की है आज।"

साहब उसकी पीठ थपथपाते हुए बोले, "वाह रे पठ्ठ्या (शेर), नए साहब की सेवा में लग गया कि तुरंत।" उस पर हम तीनों हँसे।

दीपक ने टेबल पर सारा सामान सजाया। अंदर जाकर मेरे लिए फ्रिज से ठंडी बीयर भी लेकर आया। अब हम तीनों के जाम भर गए। बत्तियाँ धीमी कीं और वक़्त जाया न करते हुए सबने जोर से 'चीयर्स' किया और अपने-अपने गिलास मुँह से लगा लिए। वह ठंडी और गले में चुभती हुई पेट में जाती बीयर अच्छी लगी। हमारा पहला राउंड खत्म होने को आया वैसे दीपक जाने के लिए उठा। के.डी. साहब ने उसे हाथ पकड़कर नीचे बिठाया और बोले, "दीपू मेरी जान, एक और उड़ा (पी) और फिर जा काम पर।" के.डी. साहब रंग में आने के लक्षण दिखने लगे थे। पर दीपक अभी ठीक लग रहा था। वह बोला, "साहब अंदर थोड़ा काम है, बस वो करके आता हूँ नहीं तो खाने में और सबको देर होगी।" पर वे कुछ सुनने को तैयार नहीं थे। उनके मुताबिक आज फुल पार्टी एन्जॉय करनी थी सबको। नाइलाज होकर दीपक ने अपना गिलास भरा। हमने भी अपने भरे। दूसरा राउंड सबने और भी जोश में खत्म किया।

दीपक उठकर अंदर गया और कुछ देर में चिकन और फिश फ्राई खाने को लेकर आया। वह देखकर साहब बहुत खुश हुए। उन्होंने दीपक को पास खींचा और उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे अपने पास बिठाया। "दीपू यार, तेरी वजह से मेरे यहाँ के दिन बहुत अच्छे बीते। आज अभी भी तूने कुछ बाकी नहीं रखा है मेरे लिए। तेरा शुक्रिया कैसे अदा करूँ?" ऐसा कहकर वे दीपक की ओर एकटक देखते रहे। मैं कान लगाकर यह सुन रहा था और देख रहा था। दीपक ने भी साहब की ओर देखा और बोला, "कैसा शुक्रिया साहब? आज आपकी वजह से ही मैं हूँ। नहीं तो कौन था मुझे सहारा देने वाला?" उन दोनों का स्वर थोड़ा भर्राया हुआ था क्या? आँखें नम थीं क्या? यह उस चढ़ती बीयर और धीमी रोशनी की वजह से मुझे ठीक से समझ नहीं आ रहा था। पर एक बात ध्यान में आई, वो यह कि दीपक के बोलने पर साहब ने उसका कंधा जोर से दबाया और उसे और करीब खींचने की कोशिश की।

पर दीपक अभी भी सतर्क था। मैं उन दोनों को देख रहा हूँ, यह उसे महसूस हो गया था। उसने दूसरे हाथ से साहब का अपने कंधे पर रखा हाथ हटाया और बोला, "साहब बुरा मत मानिएगा। मैं हमेशा आपका अच्छा साथी और सेवक बनकर था और रहूँगा। कभी भी लगा तो आइएगा मिलने यहाँ। यह जगह आपको पराया नहीं मानती।" यह बोलते वक्त वह धीरे से मेरी तरफ देख रहा है क्या, ऐसा आभास मुझे हो रहा था। उसकी बात पर साहब जोर से हँसे और बोले, "दीपू और नीरज दोनों सुनो। यह जगह अभी भी मेरी ही है। जब तक मैं यहाँ से नहीं जाता तब तक यह दीपस्तंभ और यह दीपक मेरा ही है। वो जो बाहर जल रहा है न, वो दीपस्तंभ मेरा दीपक है और यह जो सामने बैठा है न, वो दीपक मेरा दीपस्तंभ है। बहुत लाड़-प्यार दिया है इन्होंने मुझे।" माहौल थोड़ा ज़्यादा भावुक न हो जाए इसलिए फिर मैं ही बीच में बोला, "हाँ साहब यह सब आपका ही है। किसी को उस बारे में शक नहीं।" और दोस्ती के लिए हाथ आगे बढ़ाया। उन्होंने भी खुले दिल से हाथ मिलाया और बोले, "इसलिए अब मैं जो कहता हूँ वो सुनो। अगला राउंड शुरू किया जाए।" यह सुनकर मेरी आँखों के सामने तारे चमक गए। पर मुझे 'बस' कहने की हिम्मत नहीं हुई। दीपक ने हमारे अगले जाम भरे और खाने की तैयारी करने अंदर खिसक गया।

दीपक खाना लेकर बाहर आया। खाते-खाते हमारा तीसरा राउंड भी पूरा हुआ। अब मैं पूरा 'फुल' (टुन्न) हो गया था। अब और पीने की मेरी क्षमता खत्म हो गई थी। पर के.डी. साहब अभी भी विकेट टिकाए हुए थे। उन्होंने अपना चौथा पेग भरा... मैं अब साहब और दीपक दोनों की ओर देख रहा था... दीपक भी सीधे मेरी नज़रों से नज़रें मिलाते हुए मेरी ओर देख रहा था... इस बार उसकी नज़रों में और चेहरे पर थोड़ी चिंता महसूस हो रही थी। मेरे ध्यान में आया कि हालात हाथ से बाहर जा रहे हैं।

मैंने साहब से कहा, "सर बस कीजिये अब... बहुत हो गई।"

साहब - "अरे नीरज आज की रात मुझे मज़ा करने दे। कल से यह जगह और मैं अलग होने वाले हैं। मुझे बोलने दे उससे। उसे भी बहुत बोलना है मुझसे..." ऐसा कहकर वे शून्य में देखकर बोलने लगे... "अरी रानी मत रो... मैं कोई हमेशा के लिए नहीं जा रहा हूँ कहीं... मैं तेरा ही हूँ और तू भी मेरी ही है... इन बच्चों को क्या समझ आएगा तेरा-मेरा रिश्ता? ... तूने मुझे क्या-क्या दिया कैसे बताऊँ किसी को? मैं कहीं चूका हूँगा तो मुझे माफ़ कर..." यह बोलते हुए उनके शब्द लड़खड़ा रहे थे पर उन्हें आया हुआ रुलाई का आवेग एकदम सच्चा था। यह बोलते-बोलते उनके हाथ का आखिरी निवाला वैसे ही थाली में गिर गया। अब मुझे भी चिंता होने लगी।

मैं उठकर खड़ा हो गया और बोला, "सर चलिए आपको नींद आ रही है ऐसा लग रहा है।" ऐसा कहकर मैंने उनके कंधे पर हाथ डाला। दीपक भी हड़बड़ाहट में उठा और दूसरी तरफ से उन्हें सहारा दिया। के.डी. साहब भी लड़खड़ाते हुए उठे। हम उन्हें बेसिन के पास ले गए, उन्होंने मुँह धोया। फिर हम उन्हें उनके रूम में ले जाकर बिस्तर पर सुला दिया। सोते-सोते भी वे कुछ असंगत (बहकी-बहकी बातें) बोल रहे थे... "दीपू... तेरा स्तंभ... मेरी जगह... और दारू है क्या? ... मैं नहीं जाऊँगा यहाँ से... तू भी चल मेरे साथ... नहीं हम यहीं रहेंगे और..." उनकी ऐसी दिशाहीन बकबक शुरू थी... दीपक बहुत गंभीर दिख रहा था... आखिर कुछ देर बाद वे शांत हो गए और हम दोनों उनके रूम से बाहर आए।

दीपक बोला, "सर आप जाइए सोने। मैं सब समेटकर सोता हूँ।"

मैं - "अरे नहीं अकेले करेगा सब, मैं मदद करता हूँ तुझे।"

ऐसा कहकर मैं टेबल पर रखीं थालियाँ उठाने लगा। तभी दीपक ने मेरा हाथ पकड़ लिया। मेरे बदन में एक बिजली दौड़ गई। उस स्पर्श में एक अधिकार था, आत्मविश्वास था। वह बोला, "रहने दीजिये सर, मैं समेट लूँगा सब। आपको भी कल से काम है। और थोड़ी देर पहले मेरी मानी वो अच्छा हुआ। जाइए आप सोने।" अभी भी उसने मेरा हाथ पकड़ा हुआ था, जो उसने अब छोड़ा और काम पर लग गया। मैंने कहा, "दीपक अरे क्यों अकेले कर रहा है सब? मैं भी समेटता हूँ थोड़ा-बहुत।"

उस पर उसने के.डी. साहब के बचे हुए पेग की तरफ उंगली दिखाई और हमेशा की तरह प्यारा हँसकर बोला, "उतना समेट लीजिये चाहिए तो। बाकी मैं देख लूँगा।"

मैं - "नहीं रे। बहुत हो गई है मुझे पहले ही।"

दीपक - "लग नहीं रहा आपको देखकर। चलिए एक काम करते हैं। दोनों मिलकर खत्म कर देते हैं।"

ऐसा कहकर उसने वह गिलास उठाया और होठों से लगाया... उसमें से आधी दारू खत्म करके बचा हुआ गिलास मेरे सामने कर दिया। मेरे पास अब विकल्प नहीं था। मैंने वह गिलास लिया और एक घूँट में वह जलती हुई दारू गले उतारने की कोशिश की। पर आदत न होने से मुझे जोर का ठसका लगा। मुझे ठसका लगते ही दीपक ने मेरी पीठ पर हाथ रखा, "रहने दीजिये सर, नहीं चाहिए तो खामखा मत लीजिये।" ऐसा कहकर उसने वह गिलास मेरे हाथ से लिया और बची हुई दारू एक झटके में खत्म कर दी। इस बार उसने जिस तरफ से मैंने वह गिलास अपने होठों से लगाया था, उसी तरफ अपने होंठ लगाए थे। मैं यह सब दृश्य आँखें फाड़कर देख रहा था।

खाली हुआ गिलास दीपक ने टेबल पर रखा और बोला, "चलिए सर, खत्म हुई पार्टी।" ऐसा कहकर फिर वह प्यारा हँसा और मेरी पीठ पर रखा हाथ धीरे से हटाते हुए बोला, "आप जाकर आराम कीजिये अब। मैं सब समेटकर आज साहब के साथ उनके रूम में ही रुकूँगा। उन्हें बहुत ज्यादा हो गई है। बीच में कुछ लगा उन्हें तो मेरा वहाँ रहना ठीक।"

मुझे भी अब भारीपन लगने लगा था... मैं "ठीक है" कहकर अपने रूम की तरफ जाने को निकला। मैं रूम में जाकर दरवाजा बस भिड़ (सटा) दिया और लेट गया। थोड़ी देर में बाहर की धीमी बत्तियाँ भी बंद हो गईं। शायद दीपक ने सब समेट दिया था। मैं बस छत की ओर देखता पड़ा था। नींद की राह देखते हुए। कुछ देर बाद के.डी. साहब के कमरे का दरवाजा अंदर से बंद होने की आवाज़ आई। और फिर सब शांत हो गया। पर वह दीपस्तंभ और मैं, दोनों अभी भी जागे थे। वह एक आँख से अपनी नज़र हर तरफ घुमा रहा था। और मैं उसकी नज़र बचाकर नींद आने की राह देख रहा था।

आज बीयर ने अपना जलवा दिखाया था। मेरे लेटने पर मुझे थोड़ा हल्का-हल्का लगने लगा। आज दिमाग में कोई उल्टे-सीधे विचार नहीं थे। अब बस आँखें भारी हो गई थीं और नींद कभी भी आने वाली थी। मैं करवट पर मुड़ा और सिर पर चादर लेकर दीवार की ओर मुँह करके सो गया। थोड़ी देर में बाहर से कल जैसी ही आवाज़ आई और मैं पूरी तरह चौकन्ना जाग गया। मन में डर और जिज्ञासा दोनों थे। मैंने करवट बदलकर दरवाजे की ओर मुँह किया। आँखें मिचमिचा कर सोया हूँ ऐसा दिखाते हुए दरवाजे की ओर देखता रहा।

थोड़ी देर में दरवाजा धीरे से खोला गया... और एक धुंधली सी आकृति दरवाजे पर खड़ी दिखी। मेरी धड़कन बहुत तेज़ होने लगी। तभी दीपस्तंभ की एक चमचमाती बीम (रोशनी) कमरे में आई और एकदम दिन के उजाले जैसा साफ़ दृश्य सामने दिखा। दीपक... पूरा नंगा खड़ा था दरवाजे पर... मेरी ओर देखते हुए... उसका वह गठीला पर सुदृढ़ शरीर और चिकनी त्वचा... सपाट पेट और कमर... मध्यम पर भरा हुआ और लुभाने वाला पिछवाड़ा... लंबी कसी हुई जाँघें... यह सब तुरंत आँखों में भरने जैसा था... और सबसे ज़रूरी यानी कड़ककर तना हुआ उसका 8 इंच का भला-बड़ा डंडा (लिंग) जो छत की दिशा में टनाटन उछल रहा था... उसका आकार देखकर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं... 8 इंच लंबा-चौड़ा ऐसा उसका आकार देखकर मैं पागल ही हो गया। मैं पत्थर की तरह जम गया। आगे क्या होगा इसका हल्का डर और उत्सुकता मन में भर गई थी।

कुछ सेकंड बाद मेरे ध्यान में आया कि उसकी नज़र मुझ पर टिकी थी ज़रूर, पर वह देखना हमेशा जैसा नहीं था। वह उस शून्य नज़र से बस मुझे निहार नहीं रहा था बल्कि वह नज़र अंदर गहराई तक किसी चीज़ की टोह ले रही थी। उसकी नज़र शून्य और चेहरे पर कोई भाव नहीं थे। यह सिर्फ शराब का नशा नहीं लग रहा था। वह किसी गहरे विचारों की खाई में गोते खा रहा था। ऐसे करीब 15-20 सेकंड गए होंगे। हम बस एक-दूसरे को देख रहे थे। सच तो यह है कि मैं उसकी तरफ देख रहा हूँ यह उसे पता नहीं चला था। क्योंकि मैं काफी अंधेरे में था और सिर पर चादर थी।

ऐसे ही कुछ सेकंड दीपक ने दरवाजे पर खड़े रहकर मुझे देखा। मेरी नज़र उस पर से एक पल भी नहीं हटी थी। क्यों पता नहीं पर मैं उसके उस नग्न देह की ओर एकटक देख रहा था। खास तौर पर उसके उस हथियार की ओर। कुछ हलचल करने की मुझमें हिम्मत नहीं हो रही थी। मेरा गला भी सूखा हुआ लग रहा था। वह अपने कमरे की ओर जाने के लिए मुड़ा। ठीक इसी वक्त उस दीपस्तंभ ने अपनी रोशनी मेरे कमरे में फैला दी।
 
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दीपक की वह पीछे मुड़ती हुई आकृति... उसका वह जवानी से भरा हुआ पुष्ट पिछवाड़ा इशारा कर रहा था। मैं बस जमे हुए (frozen) की तरह उस दृश्य को देखता रहा... बस देखता रहा... धीरे-धीरे दीपक चला गया और सामने का कैनवास खाली हो गया।

...

हमारी 12वीं की परीक्षा खत्म हुई थी। अब रिजल्ट आने तक लंबी छुट्टियाँ थीं। मेरे माँ-बाबा दोनों नौकरी करते थे। इसलिए दोपहर में मैं घर पर अकेला ही होता था। हमारा परिवार एकदम मध्यमवर्गीय था। उस समय पिताजी ने मेरे लिए नया कंप्यूटर लिया था। इसलिए दोपहर में मेरे घर दोस्तों का आना-जाना लगा रहता था। कभी गेम्स खेलना, कभी फिल्में देखना, यही नित्यक्रम था।

बचपन से किशोरावस्था शुरू हो चुकी थी। अपनी 'नूनी' (लिंग) अब 'बुल' (बड़ा/सांड) बन गई है, यह समझ आने लगा था। इस नूनी का उपयोग सिर्फ पेशाब करने से ज़्यादा भी होता है, यह ध्यान में आने लगा था। पेशाब की जगह यह गाढ़ा-चिपचिपा अलग सा क्या रसायन बाहर आता है, यह भले ही समझ न आ रहा हो, पर उसमें कुछ तो मज़ा है, यह समझ गया था। रातों-रात या सुबह-सुबह चड्डी में हलचल होती और मेरी इतने दिन छोटी लगने वाली नूनी, मोटे डंडे जैसी होकर बाहर निकलने को बेताब हो जाती। उसे किसी तरह दोनों पैरों के बीच दबाकर मैं सोने की कोशिश करने लगता।

यह सब मुझे ही हो रहा है या बाकी लड़कों को भी होता है? यह एक शक हमेशा मन में आता था। हमारे स्पोर्ट्स और जिम इसी दौरान शुरू हुए थे। मैदान से लौटने के बाद हाथ-पैर धोते समय या साथ में नहाते समय मैं धीरे से अन्य लड़कों के गठीले होते शरीरों को निहारने लगा था। क्या इन्हें भी मेरी तरह होता होगा? किसकी चड्डी में कितना उभार है? इस पर ज़्यादा ध्यान जाता था। अगल-बगल खड़े होकर नहाते समय अगर किसी के बदन से स्पर्श हो जाता तो मैं करंट लगने की तरह दूर हो जाता था।

नहाने के बाद कुछ लड़के तो तौलिया लपेटे बिना ही कपड़े बदलते थे। उनके लिए यह एकदम रोज़ की बात थी। एकदम सामान्य। उन्हें इसमें कोई शर्म वगैरह नहीं लगती थी। पर मैं अपना ध्यान नहीं है ऐसा दिखाते हुए, चोरी-छिपे उनकी हरकतें, उनके शरीर और उनके लटकते हुए हथियारों को निहारता रहता। कई बार वे आपस में किसका 'बाबू' बड़ा, किसका छोटा, इस पर हँसी-मज़ाक करते। एक-दूसरे के लिंग की तरफ उंगली दिखाकर हँसते। कौन अपनी गर्लफ्रेंड को कैसे ठोकता है, इस विषय पर उनकी कभी-कभी होड़ लग जाती। मैं कान लगाकर वह सुनता और देखता रहता। उनके लिए वह बर्ताव एकदम सामान्य था। लेकिन मेरे मन में विचारों के कई तूफ़ान उठ खड़े होते। मुझे भी कोई लड़की मिले। मैं उसे जी भरकर रगड़ूँ और ठोकूँ, ऐसा लगने लगता।

उसमें दोस्तों की मेहरबानी यह कि, किसी एक को एक बार ब्लू फिल्म्स (पोर्न) की सीडी देने वाला मिल गया। हमारा घर खाली ही था। मैदान साफ़ था। रोज़ दोपहर को इकट्ठा होकर मज़े करना रोज़ का काम हो गया। उन फिल्मों की वो गोरी-चिट्टी, भरी हुई, सुनहरे बालों वाली, नीली आँखों वाली मादक औरतें और लड़कियाँ देखकर पल भर में हमारे 'नाग देवता' फन काढ़कर डोलने लगते। उनकी हरकतें, अंग-प्रदर्शन, पुरुष-इंद्रियों के साथ चल रहे उनके खेल और नखरे, यह सब देखकर लगता कि अभी चड्डी में ही अपना काम हो जाएगा। जैसे-तैसे खुद को संभालते। मेरे कुछ दोस्त अपने-अपने बाबूराव को हाथ में कसकर पकड़कर बैठते। दोस्तों के बीच इसमें शर्माने जैसा उन्हें तो कुछ नहीं लगता था। मैं अपनी जाँघें भींचकर, उनके बीच अपने नाग देवता को दबा-दबाकर, किसी को दिखे नहीं इस हिसाब से बैठकर, कब यह सीडी खत्म होती है, इसकी राह देखता रहता।

कुछ दिन ऐसे ही बीते, अब मुझे उन सुनहरे बालों वाली औरतों-लड़कियों में मज़ा थोड़ा कम लगने लगा। और धीरे-धीरे मेरे ध्यान में आने लगा कि मेरा सारा ध्यान लड़कियों से ज़्यादा उन फिल्मों के मर्दों और उनके बड़े-बड़े डंडों पर केंद्रित हो रहा था। उनके वे विशाल डंडे जब उछलते, लड़कियों के मुँह में अंदर-बाहर होते, लड़कियों के अंदर जाकर 15-15 मिनट उन्हें ठोकते और आखिर में वह गाढ़ी सफेद लस्सी उन लड़कियों के पूरे बदन पर उड़ाते, तो मैं उसे ज़्यादा ध्यान से देखने लगा। क्या मुझे भी ऐसी लड़की मिलेगी? क्या मैं भी यह सब कर पाऊँगा? फिल्मों की उन लड़कियों को वे डंडे हाथ में, मुँह में लेकर कैसा लगता होगा? इतने बड़े-बड़े डंडे आगे-पीछे से ठोक रहे होते हैं, तो क्या उन लड़कियों को सच में उतना ही मज़ा आता होगा जितना दिखाते हैं? या उससे ज़्यादा मज़ा आता होगा? ऐसे अनेक प्रश्न मन में घूमते रहते।

जैसे-जैसे मुझे उन कृत्रिम सौंदर्य वाली औरतों में दिलचस्पी कम होने लगी, वैसे-वैसे मुझे वो फिल्में देखने में बोरियत होने लगी। ज़िंदगी में ऐसा सच में कुछ होना चाहिए, ऐसा लगने लगा। मेरा ध्यान सामने चल रही फिल्म से ज़्यादा बाजू में बैठे दोस्तों की चड्डी में बने तंबू की ओर जाने लगा। मैं स्क्रीन की तरफ देख रहा हूँ, ऐसा नाटक करके कनखियों से दोस्तों के तंबू ज़्यादा निहारने लगा। उसमें किसी ने अपना नाग काबू करने के लिए हाथ में पकड़ा कि मेरा गला सूख जाता। आगे क्या होता है, इसकी मैं बाट जोहता।

एक दिन न जाने कैसे क्या हुआ। फिल्म रंग में आई थी। एक सुनहरी औरत को तीन हट्टे-कट्टे लोग जी भरकर रगड़ रहे थे और ठोक रहे थे। उसका एक भी छेद उन्होंने बाकी नहीं रखा था। वे तीन डंडे तीनों तरफ से अंदर-बाहर हो रहे थे। मेरे बाजू में बैठे दोस्त का तंबू एकदम तन गया था... बहुत सख्त मुट्ठी में भींचकर पकड़ा था उसने। मेरी एक आँख उधर ही थी। अचानक वह दोस्त उठा और मेरे सामने खड़ा हो गया... मुझसे बोला, "क्या देख रहा है साले...? चाहिए क्या?"

मैंने कहा, "हट बाजू में... क्या बोल रहा है?"

उस पर वह हँसकर बोला, "यही देख रहा था न?" ऐसा कहकर उसने अपनी चड्डी नीचे की और उसका वह 8 इंच का मोटा-तगड़ा फुंकार भरता नाग देवता मेरे मुँह के सामने कर दिया।

मेरी एकदम फट गई... मैं पकड़ा गया था... सारे दोस्तों के सामने इज्ज़त जाने का वक्त आ गया था... भरे चौराहे पर नंगा खड़ा कर दिया हो जैसा लगने लगा... मेरा इतनी देर से तना हुआ बाबू शर्माकर कछुए की तरह गर्दन डालकर अंदर चला गया।

मैंने शर्म से सिर झुका लिया... उसने मेरा चेहरा अपने खुरदरे हाथों में पकड़ा और खुद के चेहरे की ओर घुमाया... नज़रों से नज़र भिड़ी बस... दीपक..! हाँ वही था... पर यहाँ कैसे? मेरी तरफ देखकर हँसते हुए सामने खड़ा था और उसका नाग मेरे मुँह के सामने झूल रहा था... मैंने एक झटके में उसका हाथ हटाया... मैं मना कर रहा था... पर उसका इरादा पक्का था... उसने मेरा सिर एक हाथ से पकड़ा और बोला, "लेने वाला है क्या? या दूँ?" मैंने जान छुड़ाने के लिए ना में सिर हिलाया पर तब तक उसका बाँध टूट चुका था... उसने पच-पच मेरे मुँह पर अपनी पिचकारी उड़ानी शुरू कर दी... मेरा चेहरा पूरा सन गया... मरे से भी बदतर लगने लगा... मैं उसकी पकड़ से छूटने की कोशिश कर रहा था पर उसकी मज़बूत पकड़ किसी भी तरह छूट नहीं रही थी... मेरा दम घुटने लगा...

...

मेरी आँखें एकदम झटके से खुलीं... सामने के.डी. साहब थे... मेरे मुँह पर पानी मारकर मुझे उठा रहे थे... मैं जागा तो बोले, "उठिए साहब... कितनी देर सोयेंगे?" मैं एकदम हड़बड़ा गया। मैंने कहा, "सॉरी सर।" उस पर वे हँसकर बोले, "चल उठ, मैं अब निकल रहा हूँ थोड़ी देर में।" दीपक उनके पीछे ही खड़ा था और मुझे हड़बड़ाया हुआ देखकर वह मन ही मन (गाल में) मुस्कुरा रहा था। मैं भी झेंपकर हँसा और उठा। तुरंत बाथरूम में घुसा और फटाफट तैयार होकर बाहर आया।

मैं बाहर आकर लिविंग रूम में बैठा। के.डी. साहब वहीं बैठे थे। वे अब निकलने की तैयारी में थे। हमारा चाय-नाश्ता आया। नाश्ता करते हुए वे इधर-उधर की गप्पें मार रहे थे। बीच में बोले, "नीरज, कल रात के लिए सॉरी यार।"

मुझे समझ नहीं आया ठीक किस बारे में, मैं बोला, "पर सर किसलिए?"

के.डी. साहब - "अरे कल मुझे ज़रा ज़्यादा हो गई, खामखा तुम दोनों को तकलीफ हुई।"

मैं - "इतनी कोई बात नहीं सर, सॉरी क्यों कहते हैं? आपको कोई तकलीफ तो नहीं हुई न सोते वक्त?"

के.डी. साहब - "नहीं-नहीं, नींद अच्छी आई। एकदम सुबह आँख खुली। वो भी एकदम फ्रेश।"

दीपक - "हाँ सर, कल आपको अच्छी ही नींद लगी थी। मैं आकर देख गया था आपके कमरे में।"

के.डी. साहब - "देखा नीरज? यह ऐसा है। बिल्कुल परछाई की तरह हमेशा साथ। बहुत ख्याल रखता है।"

मैं - "हाँ सर, सही कह रहे हैं आप। परछाई जैसा है सच में।"

इतनी बात हुई ही थी कि बाहर से उस्मान की गाड़ी का हॉर्न सुनाई दिया।

के.डी. साहब - "चलो, निकलने का वक़्त हो गया।"

मैं खड़ा हुआ, उनसे हाथ मिलाकर उनके आगे के सफर और जीवन के लिए शुभकामनाएँ दीं। दीपक भी आगे आया। उन्होंने हाथ मिलाए। हाथ में हाथ लेकर 2-4 सेकंड उन्होंने एक-दूसरे को देखा। पर दोनों की भावनाएँ उमड़ रही थीं। दोनों ने एक-दूसरे को कसकर गले लगा लिया। आँखों की कोरें गीली हो ही गई थीं। मैं बस देखता खड़ा था। बोलने-करने जैसा कुछ था ही नहीं। भावनाओं का ज्वार कम होने पर वे आलिंगन से अलग हुए। के.डी. साहब ने दीपक के कंधे पर हाथ रखा और बोले, "दीपक, अब दोबारा अपनी मुलाकात कब होगी पता नहीं। पर तेरी याद हमेशा मेरे साथ रहेगी। कभी कोई मदद लगे तो संकोच न करते हुए मुझे बताया कर। माँ और खुद का ख्याल रखना। और अपना मोबाइल हमेशा चालू रखना।"

ऐसा कहकर उन्होंने जेब से एक भरा हुआ लिफाफा निकाला और दीपक के हाथ में थमा दिया। दीपक ने 'नहीं-नहीं' कहा पर साहब ने सख्ती से उसे वो लेने को कहा, "तेरे लिए नहीं, तेरी माँ के लिए है। दवा-पानी ठीक से करना उनका।" दीपक का कोई बस नहीं चला। उसने वह लिफाफा जेब में रख लिया। फिर एक बार गले लगाया साहब को और "आपका सामान मैं लेकर आता हूँ। आप चलिए आगे," ऐसा कहकर वह साहब के कमरे की तरफ चला गया।

मैं और साहब बाहर आए। उस्मान गाड़ी दरवाजे के पास ही लाया था। उसने हँसकर अभिवादन किया। हमने भी किया। दीपक सामान लेकर आया। सारा सामान गाड़ी की डिक्की (पिछले हिस्से) में रखा। अगला दरवाजा खोलकर साहब को बैठने को कहा। गाड़ी स्टार्ट करते-करते उस्मान बोला, "साहब एक बार देख लीजिये जाँचकर कुछ रह तो नहीं गया न? तालुका पहुँचने पर याद आया तो मुश्किल होगी सारी।"

सवाल वैसे ऊपरी तौर पर सीधा ही था पर साहब उस पर जो बोले उसका मतलब सच कहूँ तो उन्हें और दीपक को ही ज़्यादा समझ आया था। वे बोले, "भूला कुछ नहीं रे उस्मान, जो लेना था वो सब ले लिया है और जो रखना था वो सब कुछ रखकर जा रहा हूँ।" उस्मान को उसमें छिपा अर्थ भले न समझा हो पर साहब की बात की दाद देनी चाहिए इसलिए उसने "बहुत बढ़िया" कहा और गाड़ी का गियर डाला। साहब ने हाथ से ही हमें टाटा किया। गाड़ी मुड़कर गेट की दिशा में जा रही थी। हम गाड़ी की ओर देखते हुए हाथ उठाकर उन्हें विदा कर रहे थे। गाड़ी गेट से बाहर निकली। आखिरी बड़ा मोड़ लेकर गाड़ी ओझल होने तक, के.डी. साहब का वह खिड़की से बाहर उठाया हुआ हाथ और दीपस्तंभ पर टिकी नज़र, यह चित्र हमेशा के लिए मन में छप गया।

गाड़ी ओझल हो गई पर हम दोनों वहीं खड़े थे। मैं अंदर जाने को मुड़ा। पर दीपक अभी भी वहीं खड़ा था। नज़र वैसे ही उस रास्ते पर टिकी थी। मैं उसके पास गया। उसके कंधे पर धीरे से हाथ रखा। उसे भावनात्मक सहारे की ज़रूरत थी। उसने भरी आँखों से मेरी ओर देखा। मेरे पास उसे समझाने के लिए शब्द नहीं थे। मैंने बस उसके कंधे को थपथपाकर मुझे उसके दुःख का अहसास है, यह आँखों से ही बताया। वह भी थोड़ा-बहुत सँभला और एक हाथ आँखों पर फेरकर अंदर चला गया।

मैं अपने कमरे में गया और कुर्सी पर बैठा। मुझ पर अचानक बड़ी ज़िम्मेदारी आ पड़ी थी, इसका मुझे अभी बड़ी शिद्दत से अहसास हुआ। के.डी. साहब यहाँ थे तब तक सब आसान लग रहा था। पर अब साहब के कहे अनुसार मैं अकेला ही था। इस अकेलेपन में साथ होने वाला था दीपक का। मेरे ये विचार चल ही रहे थे कि दीपक कमरे में आया। चाबियों का एक गुच्छा मेरे सामने पकड़ा। "के.डी. साहब ने आपको देने के लिए दी हैं यहाँ की सारी चाबियाँ।" मैंने "ठीक है" कहकर वह गुच्छा अपने कब्ज़े में लिया। अब मेरी असली ड्यूटी शुरू हुई थी और ज़िम्मेदारी भी।

"आपको खाना कितने बजे लगता है?" दीपक के इस सवाल से मैं विचारों से बाहर आया।

मैं - "ऐसा कुछ नहीं, तुम्हारा बनाकर हो जाए तो बताना।"

दीपक - "ठीक है सर, दोपहर 1 बजे तक खाना तैयार हो जाएगा। कल का चिकन बचा है। आपको चलेगा क्या? या और कुछ बनाऊँ?"

मैं - "अरे नहीं-नहीं, मेरे लिए अलग कुछ मत बना। हम खत्म करेंगे जो भी बचा होगा वो।"

वह 'ठीक है' कहकर चला गया। इस बार उसके चेहरे पर वह प्यारी मुस्कान नहीं थी। के.डी. साहब के जाने से उसका दिल भर आया था। मैं समझ सकता था।

मैं उठकर ऑफिस की तरफ गया। ऑफिस में कुछ काम था वो पूरा किया। हेड ऑफिस को देने वाले रिपोर्ट तैयार किए। कंप्यूटर के ज़रिए वे भेज भी दिए। वहाँ से बाहर निकला और जनरेटर रूम की तरफ गया। वहाँ सारी मशीनों का मुआयना किया। सब ठीक-ठाक था। वहाँ से आगे दीपस्तंभ की तरफ गया। अभी ऊपर जाकर कोई काम नहीं था। बस यूँ ही उसके आस-पास घूमकर जायज़ा लिया। वापस ऑफिस की तरफ आने लगा। दूर घर पर दीपक के कुछ काम चलते हुए दिखे। घर के एक तरफ कपड़े सूखने डाले थे। एक तरफ सूखा कचरा जलने को डाला था। गीले कचरे की टोकरियाँ दूसरी तरफ व्यवस्थित ढँककर रखी थीं। अपनी ज़िम्मेदारी वह बखूबी निभा रहा था।

मैं ऑफिस में वापस आया। तभी इंटरकॉम बजा। दीपक बोल रहा था। उसने खाना तैयार होने की बात बताई। मैं थोड़ी देर में आता हूँ, बताकर फोन रख दिया। घड़ी में देखा तो ठीक 1 बजा था। मतलब वह वक़्त का पक्का था। मैं मन ही मन उसकी तारीफ करते हुए कुर्सी से उठा। ऑफिस बंद करके घर गया। मेरी थाली टेबल पर लगी थी। मेरे जाते ही दीपक खाना लेकर बाहर आया। मैंने कहा, "अरे मेरी अकेले की थाली क्यों लगाई? तू भी बैठ न खाने।"

दीपक - "सर मुझे वक़्त है अभी थोड़ा। आप खा लीजिये जब तक गरम है।"

मैं - "मैं रुकता हूँ। मुझे कोई जल्दी नहीं है।"

दीपक - "नहीं सर। अभी कचरे की गाड़ी आएगी। कचरा देकर नहाकर आने में मुझे काफी वक़्त जाएगा।"

मैंने भी 'ठीक है' कह दिया। उसके रोज़मर्रा के काम में मेरी वजह से बाधा न आए इसलिए मैं खाने बैठ गया। दीपक ने गरमा-गरम खाना परोसा और वह अपने काम के लिए चला गया। खाते-खाते वह घर के पीछे कुछ काम कर रहा था, उसकी आवाज़ें कान पर पड़ रही थीं। झाड़ू लगाना, साफ़-सफाई, पानी भरने की ऐसी आवाज़ें आ रही थीं। थोड़ी देर में एक छोटा टेम्पो बाहर घर के पीछे आया। टेम्पो वाला और दीपक के बीच कुछ बातचीत चल रही है, ऐसा सुनाई दिया। क्या बोल रहे थे समझ नहीं आया। पर 2-3 मिनट में कचरा भरकर वह टेम्पो चला गया।

मैंने अपना खाना निपटाया और अपनी थाली रखने किचन में गया। तभी बगल के कमरे से दीपक बाहर आया। उघड़ा (अर्धनग्न)... सिर्फ़ कमर पर तौलिया लपेटे हुए। नहाने जा रहा था। उसके बदन पर पसीना था। उसका वह पसीने से चमकता अर्धनग्न शरीर तुरंत मेरी नज़रों में भर गया। उसका चिकना गेंहुआ रंग। बदन पर एक भी बाल न होने वाली साफ़ त्वचा। दोनों तरफ थोड़ा उभार लेती छाती और उस पर वे लाल-काले निप्पल। पतला पेट। मेहनत से कमाई हुई उसकी भरी हुई जाँघें और उसके नीचे उसकी गढ़ी हुई और मज़बूत पिंडलियाँ। सबसे ज़्यादा आँखों में भर रहा था, वह था उसके तौलिये के नीचे से झाँकता हुआ उभार। रात के अंधेरे में जो चीजें ठीक से नहीं दिखी थीं, वो अब दिन के उजाले में मेरी आँखों में समा रही थीं।

मैं उसकी तरफ देखता ही रह गया। वह मेरे पास आया और बोला, "दीजिये सर।"

मैं अचानक होश में आया और बोला, "क्या?"

उस पर उसकी वह प्यारी मुस्कान फिर से धीरे से उसके चेहरे पर लौटी, "आपकी थाली।" ऐसा कहकर उसने मेरी थाली मुझसे ली और किचन के पीछे वाली मोरी (washing area) की तरफ चला गया। उसे पीछे से देखते हुए, उसके पिछवाड़े की गोलाई की वह लयदार हरकत मेरे मन पर हल्के से न जाने कैसी अनामी तरंगें छोड़ गई। मैंने बगल में ही बेसिन में हाथ धोए। इतने में दीपक की बाहर से आवाज़ आई, "सर आप आराम कीजिये अब। मुझे सब समेटने में थोड़ा वक़्त है। आपकी नींद हो जाए तो मुझे आवाज़ देना फिर चाय लाता हूँ।"

मैं 'ठीक है' कहकर अपने कमरे में गया। कपड़े बदलकर लेट गया। मोबाइल निकाला, घर और कुछ दोस्तों को मैसेज करके मेरी खैरियत और कामकाज शुरू होने की बात बताई। उनके बधाई के रिप्लाई आए हुए पढ़कर मोबाइल बाजू में रखा और सिर तकिये पर टिका दिया। छत के पंखे की लयबद्ध आवाज़ और ठंडी हवा लोरी की तरह मेरी आँखों पर धीरे-धीरे खुमारी ला रही थी। उस लयबद्ध लोरी के साथ मन के विचारों की परतें धीरे-धीरे खुलने लगीं।

दीपक... बहुत ही ख्याल रख रहा है मेरा। मुझे क्या चाहिए, क्या नहीं, उस पर पहले दिन से खुद ध्यान दे रहा है। के.डी. साहब उसकी इतनी मुँहभर तारीफ यूँ ही नहीं कर रहे थे। साहब और दीपक के रिश्ते में बहुत कुछ गहरी उलझन थी। जो आज साहब के निकलते वक़्त दोनों की डबडबाई आँखों में साफ़ दिख रही थी। एक-दूसरे से दूर होना दोनों को बहुत भारी पड़ा था। डेढ़-दो साल एक-दूसरे के साथ इस एकांत में बिताने पर ये भावनाएँ स्वाभाविक थीं। पर मेघना और मेरा रिश्ता अनजाने में ही सही पर बड़ी आसानी से टूट गया। कम से कम उसके चेहरे पर तो कोई अफ़सोस-तकलीफ जैसा कुछ दिखा नहीं दूर होते वक़्त। हमें भी 2 साल से ज़्यादा समय बीत चुका था साथ रहते हुए। मेरी पढ़ाई खत्म होकर 1 साल हो गया था। नौकरी की तलाश में था। कोशिश कर रहा था। सिर्फ़ प्यार से पेट नहीं भरेगा इसका अहसास हम दोनों को था। उसके घर से उस पर शादी के लिए दबाव आने लगा था। पर मेरी कमाई शुरू हुए बिना मैं उसके लिए जुबान नहीं दे सकता था।

आपको पता ही है कि आज कल नौकरियाँ मिलना कितना मुश्किल है। बिज़नेस करूँ तो उतना आर्थिक सहारा (capital) मेरे पास नहीं था। बिज़नेस के जोखिम अलग ही। इसलिए वह विचार मैंने एक तरफ ही कर दिया था। मेरी भी उम्र 26-27 थी उस वक़्त। मुझे भी नौकरी मिलकर मेरी शादी जल्दी हो जाए, ऐसा मेरे भी घरवालों का मत था। पर नौकरी का मौका कोई आ नहीं रहा था। मैं अंदर ही अंदर हताश हो रहा था। उसमें इज़ाफ़ा यह कि मेघना और मेरे झगड़े आए दिन होने लगे। एक तो मेरी नौकरी का अता-पता नहीं था। निराशा ने मुझे घेरना शुरू कर दिया था। हमारी शारीरिक नज़दीकी भी अब लगभग खत्म होती जा रही थी।

ऐसे में ही एक दिन मेघना का मुझे फोन आया कि उसके घरवालों ने उसकी शादी एक अमीर घर में तय कर दी है। उसके लिए अब ज़्यादा वक़्त रुकना मुमकिन नहीं था। मैंने एक बार मिल कर फिर से विचार करते हैं, थोड़ा वक़्त लेते हैं, ऐसी विनती करके देखी। पर उसने साफ़ मना कर दिया। उसके पीछे दो बहनें थीं। हमारा और वक़्त लेना मतलब उन दोनों की शादी में देरी होना तय था। आखिरकार नाइलाज होकर हमें अलग होना पड़ा। हमारे रिश्ते का काँच तड़ाक करके हमेशा के लिए चटक गया था।

'तड़ाक' से कुछ फूटने की आवाज़ से मेरी नींद खुली। तब शाम के लगभग 4:30 हो चुके थे। धूप ढलने लगी थी। सूर्यदेव अपने घर जाने के लिए दीपस्तंभ के उस पार झुकने लगे थे। उसकी लंबी परछाई धीरे-धीरे हमारे घर की तरफ सरकने लगी है, यह खिड़की से दिख रहा था। किस चीज़ की आवाज़ हुई यह देखने मैं बाहर गया।

लिविंग रूम में दीपक नीचे ज़मीन पर बैठकर झाड़ू से काँच के टुकड़े जमा कर रहा था। मैंने कहा, "क्या रे क्या हुआ?"

मेरी तरफ देखकर उसने हाथ से ही रुकने का इशारा किया और बोला, "यहाँ का बल्ब बदल रहा था, वो गिरकर फूट गया। ज़रा रुकिए नहीं तो काँच चुभ जाएगा पैर में।"

मैं 'ठीक है' कहकर एक तरफ ही रुक गया। दीपक अपनी बनियान और शॉर्ट्स में ही था। उसके सुडौल शरीर की हरकतें और चेहरे पर मौजूद एकाग्रता निहारता रहा। यह लड़का बहुत ही प्यारा (charming) था। थोड़ी देर में उसका काँच समेटना हो गया। मेरी तरफ देखकर वह बोला, "अब आइये सर। बैठिए। मैं चाय लाता हूँ।"

मैं जाकर सोफे पर बैठ गया। दरवाजे से बाहर का नज़ारा देखते हुए शाम के काम को दोहरा रहा था। शाम का आगमन होने वाला था कुछ देर में। पूरा गाँव अपना काम खत्म करके घर लौटने वाला था। अंधेरा अपना हक जमाते हुए सारे जड़-चेतन पर फैलने वाला था। इस अंधेरे को चुनौती देने की ताकत सिर्फ़ हमारे पीछे खड़े उस विशालकाय दीपस्तंभ में थी। चाय आई, हम दोनों ने चाय खत्म की। मैंने कहा, "दीपक, मैं थोड़ी देर में जाऊँगा काम पर।" दीपस्तंभ की ओर उंगली दिखाकर बोला, "इस महापुरुष को जगाना पड़ेगा वक़्त पर।" इस पर दीपक और मैं खिलखिलाकर हँसे। उसने हाँ में सिर हिलाकर मेरी बात की दाद दी। सुबह से वह अभी ही इतना खुलकर हँसा था। उसके वे मोती जैसे सफ़ेद दाँत उसकी उस मोहक हँसी में चार चाँद लगा रहे थे। हँसते-हँसते वह टेबल साफ़ करके अंदर जाने को निकला। जाते-जाते बोला, "मैं आऊँ क्या कोई मदद लगी तो?"

मैंने हँसकर कहा, "नहीं रे, वैसे कोई ज़रूरत पड़ेगी ऐसा लगता नहीं। दोपहर में जाँचकर आया हूँ सब। तू यहीं रुक, तेरे कुछ काम होंगे वो निपटा।" उस पर उसने सिर हिलाया और अंदर गया।

मैं सोफे पर बैठकर बाहर के दृश्य को देखता रहा। दीपस्तंभ की ओर देखते हुए मन में कई विचार आ रहे थे। पिछले कितने ही वर्षों से यह यहाँ खड़ा है। इस दीपस्तंभ ने समुद्र से आने-जाने वाले कितने ही जहाजों को और उन पर सवार इंसानों को सुरक्षित रास्ता दिखाया होगा।

मेरे मन में विचार घूम ही रहे थे कि मेरी घड़ी में 6 बजने के डंके पड़े। अब जाना चाहिए। मैं उठकर कमरे में गया। कपड़े पहने, चाबियाँ लीं और दीपस्तंभ की ओर जाने को निकला। दीपक अंदर से बोला, "मैं चाय-कॉफी कुछ रखूँ क्या वापस?"

"नहीं! वापस आने पर देखेंगे!" मैंने दरवाजे से बाहर निकलते हुए जोर से जवाब दिया।

चलते-चलते मैं ऑफिस की तरफ गया। ज़रूरी चार्ट भरे। कंप्यूटर पर कुछ एंट्रियां (entries) कीं। बाहर निकलकर जनरेटर रूम खोली। मशीनों की पूर्व-तैयारी की। वहाँ से दीपस्तंभ की ओर निकला। दीपस्तंभ की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए मेरे मन में नया उत्साह था। दीपस्तंभ के सबसे ऊपरी हिस्से में पहुँचने पर मैंने दीये (light) की तैयारी शुरू की। लाइट के लिए लगने वाली सारी तैयारी की। काँच के बड़े लेंस से बाहर देखा। क्षितिज पर अंधेरा अब धीरे-धीरे गहरा होता जा रहा था। सब ठीक होने की तसल्ली करके उतरकर नीचे आया।

मैंने लाइट के बटन दबाकर सिस्टम शुरू किया। कुछ ही पलों में वह विशालकाय दीया प्रज्वलित हुआ और उसका तेजस्वी प्रकाश दूर समुद्र पर फैलने लगा। उस प्रकाश ने पल भर में अंधेरे को दूर कर दिया और मुझे एक प्रकार का आनंद मिला। इसी रोशनी के भरोसे कितने नाविक अपने घर की दिशा में सुरक्षित सफर करने वाले थे। कुछ पल मैं गर्व से ऊँचाई पर स्थित उस तेजस्वी दीये की ओर शान से देखता खड़ा रहा।

सारे ताले वगैरह लगाकर मैं वापस घर आया, तब दीपक दरवाजे में मेरी राह देखता खड़ा था। उसके हाथ में दो कप थे।

"आइये सर, मैं राह ही देख रहा था," वह बोला।

मैं - "हाँ... तू क्यों रुका है यहाँ?"

"आपके काम में कोई दिक्कत तो नहीं आ रही न, यह देख रहा था। आपके हाथों से दीया जलते देखना था," वह हँसकर बोला। मैंने भी हँसकर उसके कंधे पर शाबाशी की थपकी दी।

हम दोनों दरवाजे में बैठकर चाय पीने लगे। दीपस्तंभ का प्रकाश हम पर नज़र डालकर जा रहा था और रात की ठंडक धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी। गहरा अंधेरा चारों ओर फैल गया। साफ़ आसमान में तारे चमकने लगे। मैंने कहा, "चलो... चलते हैं अंदर।"

ऐसा कहकर हम उठे और अंदर गए। मैं लिविंग रूम में ही बैठा। टीवी लगाया। थोड़ी देर कुछ खबरें और मनोरंजन के कार्यक्रम देखता बैठा रहा। थोड़ी देर में दीपक बाहर आया,

"बीयर वगैरह कुछ लगेगा क्या सर?" उसने पूछा।
 
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मैं चौंककर बोला, "अभी है?"

दीपक - "हाँ सर। थोड़ी ज़्यादा ही लाकर रखी थीं कल। के.डी. साहब ने एक्स्ट्रा पैसे देकर रखे थे।"

मैं - "अरे पर क्यों इतनी? कौन पिएगा इतनी बीयर?"

दीपक - "सर यहाँ से बार-बार तालुका जाना जमता नहीं है। अपनी चीज़ें जमा करके रखी हों तो अच्छा रहता है यहाँ।"

मैंने हँसकर कहा, "वाह.. अच्छी है सिस्टम तुम्हारी। चल ला मेरे लिए एक। तू भी ले।"

दीपक उठा, अंदर जाते-जाते बोला, "खाना भी तुरंत लाऊँ या थोड़ी देर में?"

मैं - "थोड़ी देर में चलेगा।"

वह बीयर और गिलास लेकर बाहर आया। हमारे गिलास भरे और हमारी बातें शुरू हुईं।

बोलते-बोलते हमारे विषय हमारी निजी ज़िंदगी की तरफ मुड़े। मैंने उसे मेरे घरवालों के बारे में, मेरे शहर के बारे में, मेरी पढ़ाई, स्पोर्ट्स जैसी आम बातों के बारे में बताया। वह भी अपने बारे में बता रहा था। गरीब घर का था। गाँव के स्कूल में ही 10वीं तक पढ़कर पास हुआ। आगे पिताजी को राजमिस्त्री (गवंडी) के काम में मदद करता था। वह करीब-करीब मेरी ही उम्र का था। मुश्किल से 2-3 साल छोटा होगा। के.डी. साहब की कृपा से यहाँ नौकरी मिली। वह सब उसने विस्तार से बताया।

मैंने कहा, "सुबह मैं तुम दोनों को देख रहा था। बहुत बुरा लगा न तुम दोनों को?"

उसके चेहरे की हँसी थोड़ी मुरझा गई। वह बोला, "हाँ सर। के.डी. साहब ने बहुत सँभाला मुझे। बहुत मदद हुई मुझे उनकी। उन्होंने मुझे और मेरी माँ को कभी किसी चीज़ की कमी नहीं पड़ने दी। बहुत प्यार दिया उन्होंने मुझे। उनके जितना भला आदमी मुझे कभी नहीं मिला था.. और अब आप..." ऐसा कहकर वह अचानक बोलना रुक गया। कुछ ग़लत बोल दिया ऐसा सोचकर उसने सिर झुका लिया।

मुझे सुनना था... 'और अब आप' के आगे उसे क्या बोलना था? मैं आगे कुछ पूछता, उससे पहले वह उठकर अंदर गया और दूसरी बीयर लेकर बाहर आया। मेरे सामने कुर्सी पर बैठा और अगला गिलास भरने लगा। शांति छाई थी। सिर्फ़ लहरों की दूर से आने वाली आवाज़ और दीपस्तंभ के दीये के घूमने की हल्की सी 'घर्रर्र...' जैसी नाज़ुक आवाज़ आ रही थी। अगला झागदार गिलास भरते-भरते वह धीरे से बोला, "सर आपने लगाया है कभी ऐसा दिल किसी से?"

और फिर मुझे न चाहते हुए यादों ने मेरी आँखों के सामने फेरा डालकर नाचना शुरू कर दिया। मैंने वह भरा हुआ गिलास मुँह से लगाकर एक ज़ोरदार घूँट भरा और अपने आप ही मेरे मुँह से शब्द बाहर निकलने लगे... "हाँ रे। सबकी ज़िंदगी में ऐसा होता ही है कभी न कभी। मेघना! उसका नाम..."

बहुत दिनों बाद मैंने यह नाम मुँह से निकाला था। मेघना और मेरे शारीरिक संबंधों को छोड़कर मैंने उसे अपनी कहानी (love story) बताई। बिल्कुल हमारी जुदाई कैसे हुई वहाँ तक।

दीपक शांति से सब सुनता रहा। वह बस एकटक मेरी ओर देख रहा था। कोई सलाह नहीं दे रहा था, बस सुन रहा था। उसका शांत रहकर सुन लेना मुझे बहुत सहारा दे गया।

निराश सी हँसी चेहरे पर लाकर मैंने उससे कहा, "और दीपक, किस्मत भी कैसा खेल खेलती है देख हमारे साथ। जिस नौकरी के लिए मैं जान हथेली पर रखकर बैठा था, वो मुझे मिली मेघना के छोड़कर जाने के 3-4 महीनों बाद। समय पर नौकरी मिली होती तो हम अभी साथ होते। पर जाने दे, जो हुआ अच्छे के लिए ही हुआ.. अब नौकरी भी है और तू..." मैं तुरंत जीभ काट गया (रुक गया)। क्या बोल गया मैं यह? मुझे एकदम शर्मिंदा सा महसूस हुआ।

दीपक निश्छल होकर मेरी ओर देख रहा था। उसके हाथ में आधा खाली गिलास वैसा ही था। उसकी आँखों में जबरदस्त उत्सुकता भरी थी। मैं आगे क्या बोलूँ मुझे सूझ नहीं रहा था... आखिर मैंने अपना गिलास एक झटके में खाली किया और जैसे-तैसे बोला, "चल मुझे बस हो गई अब.. थोड़ी ज़्यादा ही हो गई ज़रा। खाकर सोते हैं समय पर।"

वह वैसे ही मुझे देखते हुए उठा। हाथ का गिलास उसने खाली किया और किचन की तरफ गया। मैं अपना खाली गिलास और बोतलें लेकर उसके पीछे-पीछे गया। बोतलें कचरे के डिब्बे में डालीं और गिलास धोने को मोरी में रखा। दीपक खाने की तैयारी करते हुए पीठ किए खड़ा था। एक बार उसकी ओर देखकर मैं बाहर आकर डाइनिंग टेबल के पास बैठ गया।

दीपक थालियाँ तैयार करके ही बाहर लेकर आया और मेरे सामने बैठा। हमने खाना शुरू किया। हमारे बीच की रहस्यमयी शांति वैसे ही थी। पर यह शांति बहुत कुछ बोल रही थी। एक-दूसरे के मन की थाह ले रही थी। क्या कहना था दीपक को? उसे भी महसूस हुआ होगा क्या कि मुझे भी कुछ तो बोलना था? यह शांति बेचैन करने वाली थी। खाने में हम दोनों का ही ध्यान नहीं था। आखिर न रहा गया तो मैंने उससे कहा, "थोड़ी देर पहले के.डी. साहब के बारे में बता रहा था, वो आधा ही रह गया।"

वह अब थोड़ा संयत हो गया था। थोड़ी नाज़ुक हँसी के साथ वह बोला, "सर, बहुत बुरा तो लगा मुझे उनके यहाँ से जाने से। बहुत सहारा था उनका। सरकारी नौकरी करते वक्त कोई होता है क्या इतना अपने नज़दीक? पर वे थे। उनके जाने से एक बड़ा सहारा टूट गया।" उसने बोलते-बोलते एक गहरी साँस ली। "पर... उन्होंने मुझे एक ज़िम्मेदारी दी है। इस दीपस्तंभ की और आपके साथ-साथ इस घर का ख्याल रखने की।"

मैं - "तेरे जैसा मेहनती और अच्छा गुणी लड़का बहुत कम मिलता है। सच में, के.डी. साहब ने तुझे अपना माना इसमें कुछ ग़लत नहीं है।"

दीपक ने मेरी ओर देखा। उसकी आँखों में फिर वही उत्सुकता और एक तरह की चमक दिखी। "सर, मुझे आपके साथ यहाँ काम करना अच्छा लगेगा। आप बहुत अलग हैं।"

मेरा मन थोड़ा उलझन में पड़ गया। अलग मतलब क्या? मैंने उससे पूछा, "अलग? मतलब कैसा?"

उसने खाना एक तरफ रखा। वह थोड़ा आगे झुका और धीमी आवाज़ में बोला, "के.डी. साहब की तरह ही... आप भी बहुत शांत और दयालु हैं। और मुझे लगता है... आपकी कहानी सुनने के बाद... आपमें और के.डी. साहब में कुछ तो मिलता-जुलता है। वो दिखता नहीं पर महसूस होता है।"

मेरे मन का द्वंद्व (अंतर्विरोध) उसे महसूस हो गया था। उसने मेरी मेघना की यादों और उसके प्रति मेरे मन की भावनाओं के बीच के नाज़ुक बिंदु को छू लिया था।

"किस बारे में बोल रहा है तू दीपक?" मैंने खुद को सँभालते हुए पूछा।

उसने हँसकर सिर हिलाया। उस हँसी में एक मासूमियत और एक तरह की 'समझ' थी।

"कुछ नहीं सर। मुझे बस... आपको खुश देखना है। बहुत दिनों बाद साहब जैसा एक भला इंसान मुझे मिला।"

उसने मेरे सवाल का सीधा जवाब देना टाल दिया, फिर भी मुझे समझ आ रहा था कि वह मेरी भावनाओं का आदर कर रहा था और मुझे ज़्यादा तकलीफ नहीं देना चाहता था। खाना खत्म होने पर उसने थालियाँ उठाईं।

"मैं बर्तन समेटता हूँ, आप आराम कीजिये।" ऐसा कहकर वह अंदर गया। मैं फिर सोफे पर आकर बैठ गया। बाहर से दीपस्तंभ का प्रकाश अंदर आ रहा था और उस प्रकाश में मुझे दीपक के चेहरे पर निष्ठा, मासूमियत और मेरे प्रति खिंचाव साफ़ महसूस हुआ। मेरी ज़िंदगी के अंधेरे को यह नौजवान 'प्रकाश' (दीपक) दे सकता है क्या? यह विचार मेरे मन में घूमने लगा।

दीपस्तंभ का प्रकाश एक लय में घूम रहा था। दीये का वह सफ़ेद पट्टा कमरे से सरक रहा था और पल भर हर चीज़ पर, मेरे चेहरे पर और सोफे पर रोशनी डालकर आगे जा रहा था। यह प्रकाश मुझे के.डी. साहब की यादों और दीपक के शब्दों की याद दिला रहा था – 'दीपस्तंभ की और आपके साथ-साथ इस घर का ख्याल रखने की।'

सिर्फ दीपस्तंभ का दीया ही नहीं, बल्कि दीपक भी मेरी ज़िंदगी में रोशनी लेकर आया है क्या? मेघना के जाने के बाद आया अकेलापन अब दीपक की संगत में कम हो रहा है क्या? मेरे मन में यही विचार उमड़ रहे थे।

दीपक कुछ देर में ही बाहर आया। उसने बत्ती जलाई और मेरी तरफ देखा।

"सर, सारे काम हो गए। मैं अपने कमरे में जाऊँ?" उसने पूछा।

"हाँ जा, पूछता क्यों है? थक गया होगा तू भी दिन भर।" मैंने सहजता से कहा।

वह दरवाजे से अंदर जाते-जाते रुका। उसका चेहरा थोड़ा संकोच भरा दिख रहा था।

"सर, एक पूछूँ?"

"पूछ न," मैंने कहा।

"आप कह रहे थे न, 'अब नौकरी भी है और तू....' वो वाक्य... आपने पूरा क्यों नहीं किया?" उसने पूछा और फिर खुद ही जल्दी से जवाब दिया, "सॉरी! मैंने खामखा पूछा। आप मत बताइये।"

पर यह सवाल पूछकर उसने मेरे मन के नाज़ुक तार को फिर छेड़ दिया था। मैंने उसे तुरंत रोका।

"रुक दीपक।"

वह मेरी तरफ मुड़ा। उसकी आँखों में वही उत्सुकता फिर उमड़ आई थी।

मैंने एक गहरी साँस ली। मेरे मुँह से ठीक क्या निकलने वाला था, इसका मुझे भी अंदाज़ा नहीं था। पर मेरे मन में जो था, वो बोल देने की तीव्र इच्छा थी।

"दीपक... मेघना के जाने के बाद ज़िंदगी में एक बड़ा खालीपन (void) आ गया था। अकेलापन महसूस हो रहा था। फिर नौकरी मिली। पर यहाँ... इस सुनसान जगह पर काम करते हुए, दिन भर सिर्फ दीपस्तंभ और समुद्र से ही बातें करना... वो अकेलापन खाने को दौड़ेगा क्या, ऐसा लग रहा था।"

मैं थोड़ा रुका।
 
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"पर जब से तू मिला, मेरा बोझ थोड़ा हल्का हुआ सा लगा। अगर तू यहाँ नहीं होता, तो मैं यहाँ का काम सँभाल पाता या नहीं, कह नहीं सकता... 'और तू...' मतलब, 'और तू है, इसलिए अब मुझे यहाँ रहना और काम करना बहुत आसान लगेगा।' बस यही कहना चाहता था मैं।"

बोलते समय मेरी आवाज़ थोड़ी लड़खड़ाई। मैंने नज़रें चुराकर बाहर दीपस्तंभ की ओर देखा। वह भी मेरी ओर एकटक देख रहा था, पर उसकी नज़रों में कोई चुभन नहीं, बल्कि एक शरारती (मिस्किल) भाव था। मानो उसने मेरे मन की गहराई नाप ली हो। उसका वह शरारती भाव देखकर मेरे मन में उसके प्रति जो एक डर-मिश्रित आदर था, वह थोड़ा कम हुआ और एक गहरी दोस्ती के रिश्ते की शुरुआत हुई।

दीपक मेरी ओर एकटक देख रहा था। उसकी आँखें चमक उठीं। उसने एक हल्की मुस्कान दी। वह मुस्कान मासूम नहीं थी, पर प्यार भरी और भरोसा दिलाने वाली ज़रूर थी।

"सर, यह सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई," वह बोला। उसकी आवाज़ में एक तरह की कृतज्ञता थी। "मुझे भी... आपके साथ रहना और आपका ख्याल रखना अच्छा लगेगा। आप चिंता मत कीजिये। इस जगह पर हम ही तो हैं एक-दूसरे के लिए... मैं हमेशा आपके साथ रहूँगा।"

उसने धीरे से सिर हिलाया और "शुभरात्रि सर," कहकर वह अंदर चला गया।

मैं सोफे पर पसर गया। उस रात, दीपस्तंभ की रोशनी में और समुद्र की लहरों की आवाज़ के बीच, मेरे और दीपक के रिश्ते को एक अनचाही और नई शुरुआत मिली थी। भविष्य की चिंता नहीं थी, पर एक सुकून था। 'तड़ाक' से टूटा हुआ काँच अब 'दीपक' के रूप में एक नया, मज़बूत सहारा पाकर जुड़ रहा था।

दीपक के सोने चले जाने के बाद मैं कितनी देर वहाँ बैठा रहा, पता नहीं। बीयर के नशे में या भावनाओं के आवेग में मैंने जो कुछ भी कहा, वह सच था। दीपक की बातों की ईमानदारी और उसके चेहरे के भरोसेमंद भाव मेरे दिल में घर कर गए थे।

मैं सोफे पर वैसे ही बैठा रहा। अब मेरे दिमाग में मेघना की यादों ने नहीं, बल्कि दीपक के शब्दों ने जगह ले ली थी। 'इस जगह पर हम ही हैं एक-दूसरे के लिए...' यह वाक्य मेरे मन में बार-बार गूँज रहा था।

थोड़ी देर बाद मैं उठा और अपने बेडरूम में गया। मैं शांति से पलंग पर लेट गया। आज पेट में बीयर थी पर दिमाग एकदम हल्का और शांत लग रहा था। शांत, एकदम शांत...

सुबह हुई और मैं जल्दी उठ गया। कल रात की बातचीत के बाद दीपक का सामना कैसे करूँ, यह विचार मन में था।

मैं ब्रश कर रहा था तभी दीपक किचन से बाहर आया। वह अब नहाकर तैयार हो चुका था। उजले सफेद टी-शर्ट और नीले शॉर्ट्स में 'जनाब' बहुत उत्साही दिख रहे थे।

"सुप्रभात सर!" वह हँसकर बोला। कल रात की कोई भी बेचैनी उसके चेहरे पर नहीं थी।

"सुप्रभात दीपक। कहाँ निकले जल्दी उठकर?"

"कहीं नहीं सर। आपको जल्दी उठने की आदत है, इसलिए मैं भी जल्दी निपट गया। चाय लाता हूँ।"
 
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वह रसोईघर में गया और कुछ ही पलों में दो कप गरम चाय लेकर बाहर आया। हम दरवाजे पर खड़े होकर चाय पीने लगे। सुबह की कोमल धूप समुद्र की लहरों पर नाच रही थी। वातावरण शांत और खुशनुमा था।

दीपक ने मेरी ओर देखकर कहा, "सर, आज लाइटहाउस की कुछ जगहों की साफ-सफाई करनी है। आप आज आराम कीजिये। मैं सब निपटाकर आता हूँ।"

मैंने हँसकर उसके कंधे पर हाथ रखा। दीपक मेरे थोड़ा करीब सरका ऐसा मुझे लगा। "आज मिलकर काम करते हैं। नई नौकरी है, मुझे भी सब ठीक से समझ लेना है।"

उसने हाँ में सिर हिलाया। उसके चेहरे पर वह मासूम खुशी देखकर मेरे मन का द्वंद्व (अंतर्विरोध) कहीं शांत हो गया। मेघना का 'चटका हुआ काँच' अब अतीत की अलमारी में एक खोई हुई चीज़ की तरह पीछे छूटता जा रहा था और दीपक के रूप में मेरी ज़िंदगी को एक नया ठहराव मिलने लगा था।

मैंने दीपस्तंभ की दिशा में कदम बढ़ाया और दीपक उत्साह से मेरे पीछे-पीछे आया।

ऑफिस, जनरेटर रूम, टॉवर के नीचे की केबिन, ऐसी सारी साफ-सफाई पूरी होने के बाद मैंने ऑफिस फिर खोला। रोज़ के सुबह के काम और रिपोर्ट पूरे करके बाहर निकला। हम लौटे तब करीब 1 बज चुका था। काम के उत्साह में आज खाने की तरफ ध्यान देने का वक्त नहीं मिला था। दीपक ने सिर पर हाथ मारा, "बाप रे, सर माफ़ करना पर आज खाने का ध्यान ही नहीं रहा।" उसके चेहरे पर अपराधी भाव (guilt) भरे देखकर मुझे हँसी आ गई। मैंने कहा, "अरे इसमें इतना क्या? काम की हड़बड़ी में हम दोनों ही भूल गए।"

दीपक - "पर सर मेरी वजह से आपको खामखा देर होगी। भूख लगी होगी न आपको?"

मैं खिलखिलाकर हँसते हुए बोला, "हाँ तो बहुत भूख लगी है। आज भूखा मारेगा या परोसेगा कुछ खाने को?"

वह झेंपकर बोला, "सर थोड़ा वक़्त दीजिये। मैं जल्दी से कुछ बनाता हूँ।"

मैंने उसे रोका और कहा, "कोई भागदौड़ मत कर। 1 ही बजा है। चल अपनी स्कूटर निकाल। नीचे गाँव में जाकर कुछ खाकर आते हैं। मिलेगा न गाँव में कुछ या तालुका जाना पड़ेगा?"

मेरा अपनापन देखकर उसका अपराधबोध थोड़ा कम हुआ, "हाँ मिलेगा न सर, नहीं मिला तो पैदा करेंगे हम आपके लिए।"

ऐसा कहकर वह स्कूटर की चाबी लेकर आया। "ये लीजिये चाबी सर। चलिए मैं ताला लगाकर आता हूँ।" ऐसा कहकर वह घर की ओर मुड़ा और मैं स्कूटर की ओर गया। स्कूटर स्टार्ट करके आँगन में आया तब तक दीपक तैयार ही था। मेरे कंधे का सहारा लेकर टांग डालकर पीछे बैठा। मैंने गाँव की दिशा में स्कूटर दौड़ाना शुरू किया। दीपस्तंभ का अहाता छोड़कर हम उस घुमावदार उबड़-खाबड़ रास्ते पर लग गए। ऊपर से धूप तप रही थी इसलिए मैंने स्कूटर की रफ़्तार थोड़ी बढ़ाई। "सर धीरे, सर धीरे" ऐसा कहते हुए दीपक ने मेरे दोनों कंधे कसकर पकड़ लिए। मैंने हँसकर कहा, "क्या रे रोज़ के रास्ते से डरता है क्या इतना?"

वह रिरियाती आवाज़ में बोला, "सर रास्ते से नहीं डरता। मुझे पीछे बैठने की आदत नहीं है इसलिए डर लगता है।"

मैं ज़ोर से हँसकर बोला, "कसकर पकड़कर बैठ मुझे। कुछ नहीं होता। गिराऊँगा नहीं तुझे कहीं।"

उसकी बोलती ही बंद हो गई थी। वह मेरे कंधे को कसकर पकड़कर बैठा और उसकी जाँघें सिकुड़-सिकुड़कर मेरे कुल्हों को अपने आप ही जकड़ रही थीं। उस उबड़-खाबड़ रास्ते के गड्ढों की वजह से उसकी छाती और पेट मेरी पीठ से घिस रहे थे। मुझे यह स्पर्श नया होते हुए भी अच्छा (हवाहवासा) लग रहा था। दीपक की तो घिग्घी बंध गई थी। उसे अपना शरीर मेरी पीठ से घिस रहा है इसका होश नहीं था। लेकिन मैं उस नए स्पर्श का चुपचाप आनंद ले रहा था। वह सिर्फ़ डरा हुआ है, यह मुझे पता था, पर उसके डर ने मुझे नई खुशी दी थी।

मुझे मज़ा आ रहा था पर उसी के साथ मेरे मन में अपराधबोध की एक हल्की सी लहर उठी, क्योंकि मैं एक मासूम लड़के की डरी हुई हालत का मज़ा ले रहा था। पर दूसरे ही पल वह लहर गायब हो गई, क्योंकि दीपक ने मुझे इतना कसकर पकड़ा था कि वह मेरे शरीर का एक अटूट हिस्सा ही बन गया था। उसके डर ने उसके संकोच पर कब की मात कर दी थी।

आखिर उस पर दया खाकर मैंने स्कूटर की रफ़्तार धीमी की और कहा, "बस? अब तो गया क्या डर?"

दीपक की साँसें मेरी गर्दन पर महसूस हो रही थीं। वह दबी आवाज़ में बोला, "हाँ सर... अब... अब कम लग रहा है। ऐसे ही धीरे चलिए।"

मैं हँसा। मेरा एक हाथ अपने आप ही हैंडल से हटा और मुझे जकड़े हुए उसकी जाँघ पर ठहर गया। उसे तसल्ली देते हुए मैंने कहा, "डर मत। आराम से चलेंगे।" उसने भी अपना हाथ मेरे हाथ पर रखा और दूसरे हाथ से मेरी कमर को हल्के से घेरा डालकर मुझ पर भरोसा होने की गवाही दी।

आखिरी मोड़ लेकर हमारी स्कूटर गाँव के पक्के रास्ते पर पहुँचते ही हमने अपनी एक-दूसरे पर की पकड़ ढीली की और ठीक से बैठ गए। यहाँ से आगे रास्ता अच्छा था और चहल-पहल भी थी। हमने एक साधारण, पर साफ़-सुथरे होटल के सामने स्कूटर रोकी।

"बस! अब डर गया कि नहीं?" मैंने पूछा।

दीपक ने धीरे से मेरे कंधे के ऊपर से सिर बाहर निकालते हुए कहा, "हाँ सर। गया।" उसके चेहरे की लाली और आँखों की चमक छुप नहीं रही थी।

"यहाँ चलेगा न?" मैंने पूछा।

"हाँ सर। यहाँ मछलियाँ बहुत अच्छी मिलती हैं," वह उत्साह से बोला।

हम अंदर गए। खाना खाते समय हमारी यहाँ-वहाँ की और काम के बारे में बातें चालू थीं। पर मेरे मन में, उस उबड़-खाबड़ रास्ते वाले अनपेक्षित स्पर्श की याद अभी भी ताज़ा थी। शायद उसके भी मन में वही चल रहा था।

खाना खत्म होने पर वापस दीपस्तंभ की ओर जाने को निकले। इस बार उसे कोई भी डर नहीं लग रहा था, यह मुझे उसकी शांत, पर विश्वासभरी हरकतों से महसूस हुआ।

"चाबी दीजिये सर। मैं चलाता हूँ अब। आप बैठिये पीछे आराम से।" बाहर निकलते-निकलते वह बोला।

मैंने हँसकर पूछा, "क्यों रे अभी डर गया नहीं या अब मुझे डराने का प्लान है तेरा?"

वह भी जी भरकर हँसकर बोला, "सर, आप डरेंगे ऐसा लगता नहीं।"
 
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मैं - "पर क्या भरोसा कि तू मुझे डराएगा नहीं?"

दीपक - "देखते हैं क्या होता है। आप ही कह रहे थे न कि कुछ नहीं होगा?" इस पर वह शरारत से हँसा और मेरे हाथ से चाबी ले ली। उसका यह दोस्ताना मगर अदब के साथ हक जताना मुझे बहुत भाया। दो ही दिनों में इतना शांत (कम बोलने वाला) लगने वाला यह लड़का इतनी नज़दीकी बढ़ा लेगा, ऐसा नहीं लगा था।

उसने स्कूटर स्टार्ट की और मैं उसके पीछे बैठ गया। स्कूटर वापस लाइटहाउस की दिशा में चल पड़ी।

"बहुत भूख लगी थी सर, और खाना भी बहुत अच्छा मिला। आपको पसंद आया या नहीं?" दीपक स्कूटर चलाते-चलाते बोला। उसकी बातों में अब सहजता आने लगी थी। शुरुआत में शर्मीला-संकोची लगने वाला यह दीपक अब खुलकर बोलने लगा था। जिसकी मुझे सबसे ज़्यादा खुशी थी।

"हाँ, मुझे भी बहुत दिनों बाद बाहर का खाना अच्छा लगा। और तेरे साथ होने की वजह से और मज़ा आया।" मैंने सहजता से, मगर दिल से कहा।

उस पर "मुझे भी अच्छा लगा सर आपके साथ," ऐसा कहकर उसने रास्ते पर ध्यान केंद्रित किया। अब वह बेरहम रास्ता आने वाला था। गाड़ी अंदरूनी रास्ते पर लगते ही एक बड़े गड्ढे ने हमारा स्वागत किया। दीपक धीरे चला रहा था पर वह गड्ढा ही ऐसा अजीब था कि एक जोरदार झटका लगा। मैंने सहारे के लिए दीपक की दोनों जाँघें कसकर पकड़ लीं।

"लगा न डर सर?" दीपक ने चिढ़ाने वाले स्वर में कहा।

मैं - "हाँ तो बहुत ही डर गया रे मैं।"

दीपक - "फिर कसकर पकड़कर बैठिये। फिर नहीं लगेगा कुछ।"

उसके ऐसा कहते ही मेरी पकड़ और मज़बूत हो गई और मैं अपने-आप उसके और करीब सरक गया। अब मेरा शरीर उससे चिपक रहा था। मेरी जाँघों के बीच आया उसका वह गोल-मटोल पिछवाड़ा मुझे और उकसा रहा था। कुछ देर बाद उसने भी अपना एक हाथ हैंडल से हटाकर मेरे हाथ पर रख दिया। मानो मुझे 'डरो मत' कहकर तसल्ली दे रहा हो। यह स्पर्श अब केवल इत्तेफाकन या सहारे के लिए नहीं था, यह हम दोनों को महसूस हो रहा था। उसका हाथ मेरे हाथ पर स्थिर था और मेरी जाँघों की पकड़ उसकी कमर के इर्द-गिर्द कस गई थी। दीपस्तंभ की ओर जाने वाले उस उबड़-खाबड़ रास्ते पर 'डराने का' यह खेल दोनों के ही मन की अज्ञात भावनाओं को जगा रहा था। ऊपर से भले ही ऐसा दिख रहा हो, पर मन में कुछ अलग ही खेल रचा जा रहा था। शायद वह भी यह जानता था।

दीपक स्कूटर धीरे चला रहा था, पर जानबूझकर कुछ गड्ढे टाल नहीं रहा था, यह मेरे ध्यान में आया। क्या उसे भी मेरे शरीर की नज़दीकी चाहिए थी?

मैंने धीरे से अपनी हथेली उसकी जाँघ की ओर सरकाई। तुरंत दीपक ने मेरा हाथ और कसकर दबा लिया, मानो 'तू डर मत' कहने के बजाय 'तू यहीं रह', ऐसा कह रहा हो। उसका यह जवाब मेरे मन में उठे सवालों को अपने आप ही उत्तर दे रहा था।

एक बड़े मोड़ पर स्कूटर झुकी। मैं और करीब सरका और अब मेरा सिर उसकी पीठ से जा टिका। मुझे उसके टी-शर्ट में से उसके जवान, सुडौल शरीर की गर्माहट महसूस हो रही थी।

मैंने शांति से उसके कान में धीरे से पूछा, "दीपक, तू जानबूझकर गड्ढे नहीं बचा रहा है न?"
 
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मेरी साँस उसकी गर्दन पर पड़ी और उसने हल्का सा सिर हिलाया।

वह भी उतनी ही शांत आवाज़ में बोला, "सर, यह रास्ता ही ऐसा है... इसे बचाना मुमकिन है क्या, देखिये न।" उसकी बातों में एक छिपी हुई शरारत थी।

हमने दीपस्तंभ के अहाते में प्रवेश किया। अब रास्ता सपाट था, इसलिए पकड़ अपने आप ढीली हो गई। स्कूटर रुकी। मैं उतरा और दीपक स्कूटर पार्क करने गया। उसके लौटने तक मैं वहीं रुका रहा। वह वापस आया और हम घर के अंदर जाने लगे। हम दोनों ही शांत थे। बातें नहीं हो रही थीं, पर आँखों से विचारों का आदान-प्रदान शुरू था। दोनों के ही चेहरो पर एक हल्की सी लाली थी और एक रहस्यमयी मुस्कान थी, जो उस सफ़र के नए अर्थ की गवाही दे रही थी।

3 बज चुके थे। मैंने चाबी लेने के लिए हाथ आगे बढ़ाया, तब दीपक ने वह मेरे हाथ में नहीं दी। उसने वह मेरे हाथ पर रखी, पर उसी वक्त उसने अपनी उंगलियों से मेरी हथेली को हल्का सा स्पर्श किया।

"सर, आप अंदर जाकर आराम कीजिये। शाम के दीये की तैयारी मैं देख लूँगा," वह बोला। उसकी आवाज़ में अब एक तरह का अधिकार और अपनापन दोनों महसूस हो रहा था।

"नहीं रे... तू भी थक गया होगा," मैंने उसे रोकने की कोशिश करते हुए कहा।

"आपके साथ काम करने पर थकान नहीं लगती, सर," ऐसा कहकर वह हँसा।

मैंने हँसकर ताला खोला। अंदर जाकर मैंने थोड़ी देर सोफ़े पर ही पसरने का फ़ैसला किया। दीपक अपने कमरे में गया। थोड़ी देर में पानी की बोतल लेकर बाहर आया। मेरे बाजू में वह बोतल रखी। "सर अंदर जाकर सो जाइये। यहाँ सोफ़े पर अकड़न होगी।" ऐसा कहकर उसने बाहर का दरवाज़ा बंद करके कुंडी लगा दी।

मैं भी उसकी आज्ञा मानकर उठा। पानी की बोतल लेकर कमरे में जाकर बिस्तर पर फिर पसर गया। मेरे चेहरे पर एक बड़ी सी मुस्कान खिली थी।

सोकर उठा तब 5 बज चुके थे। बाप रे, बहुत ही देर हो गई, ऐसा कहकर मैं झट से बाथरूम में जाकर मुँह धोया। कपड़े पहने और दीपस्तंभ की ओर जाने को निकला। मेरी चाबियों का गुच्छा जगह पर नहीं था। दीपक को आवाज़ दी पर उसका कोई जवाब नहीं आया। अरे देवा, यह अकेला ही गया क्या, ऐसा सोचकर मैं वैसे ही बाहर निकला। दौड़ते हुए ही ऑफिस के पास पहुँचा। ऑफिस बंद था। पर जनरेटर रूम खुला दिखा। मैं तुरंत उधर भागा। दीपक वहीं काम करते हुए पीठ किए खड़ा था।

"अरे, अकेला क्यों आया? मुझे उठाता न?" मैं जल्दी से बोला।

उस पर चौंककर उसने पीछे मुड़कर देखा। "आपको अच्छी नींद लगी थी इसलिए नहीं जगाया," हँसकर उसने जवाब दिया।

मैं - "पागल है क्या? मेरा काम है यह। हट एक तरफ, मैं देखता हूँ अब।"

दीपक - "सर, हो गया है सब करके। चलिए ऊपर चलते हैं। सनसेट (सूर्यास्त) होगा अभी। देखकर आते हैं। फिर चालू कीजियेगा अपने महापुरुष को।" ऐसा कहकर वह खुलकर हँसा।

मैंने हँसकर उसके कंधे पर थपकी दी और 'चल' कहकर सीढ़ियाँ चढ़ना शुरू किया। सबसे ऊपर यानी कूप (lantern room) में जाकर दोनों खड़े हो गए। खिड़की से बाहर का विहंगम दृश्य बहुत प्यारा दिख रहा था। ठंडी हवा चल रही थी। उस हवा से बदन में सिहरन हो रही थी। मैं बिल्कुल खिड़की के पास खड़ा था और दीपक मेरे थोड़ा पीछे। ठंड की वजह से मैं हाथों की कसकर घड़ी (fold) करके थोड़ी गरमाहट लेने की कोशिश कर रहा था। वह देखकर दीपक बोला, "आज हवा थोड़ी ज़्यादा ही ठंडी चल रही है न?"

मैं - "हाँ रे.. यहाँ ऊँचाई पर ज़रा ज़्यादा ही ठंड लगती है।"

दीपक - "तो चलें क्या नीचे? कितनी देर ऐसे खुद को ही गले लगाकर खड़े रहेंगे यहाँ?"

मैं - "हाँ चलेंगे थोड़ी देर में। और गले लगाने की बात करोगे तो हमें कौन गले लगाएगा? खुद ही खुद की ठंड भगानी पड़ती है रे बाबा।"

दीपक - "मैं किसलिए हूँ फिर..?"

ऐसा कहकर उसने धीरे से मुझे पीछे से कमर पर बाहों का घेरा डाल दिया। मेरे हाथों की घड़ी अपने आप खुल गई और उसके हाथों पर टिक गई। बोलने जैसा कुछ नहीं बचा था। दीपस्तंभ के कूप (room) की शांति समुद्र की लहरों की आवाज़ और हमारे दिलों की बढ़ी हुई धड़कनों से भर गई थी। दोनों की भावनाएँ बिना साफ़ बोले ही स्पर्श से एक-दूसरे तक पहुँच गई थीं। उसने अपनी ठुड्डी धीरे से मेरे कंधे पर रखी। उसकी गर्म साँस मेरे कंधे पर महसूस हो रही थी। ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, पर दीपक की गरमाहट के आगे वह ठंड नगण्य (मामूली) थी।

दीपक की बाहों का घेरा मेरी कमर के इर्द-गिर्द कस गया था। उसका जवान शरीर मेरी पीठ से सटा था और उसकी गर्म साँस मेरे कंधे पर महसूस हो रही थी। वह धीरे से मेरे कान में बुदबुदाया, "सर, अब ठंड कम हुई न?"

उसकी आवाज़ की शरारत और अपनापन मुझे बहुत सुकून दे गया। मैंने आँखें मूंद लीं और धीरे से सिर हिलाया। मेरे मुँह से शब्द बाहर नहीं निकल रहे थे।

दीपक ने अपने होंठ मेरे कंधे से हल्के से रगड़े। उस स्पर्श से मेरे शरीर में एक मीठी लहर दौड़ गई।

"दीपक," मैंने धीरे से उसे पुकारा।

"हं?" उसने और कसकर पकड़ा।

"तू... तू मुझे बहुत अच्छा लगता है।"

मेरे मुँह से ये शब्द निकलते ही, दीपक का घेरा और भी कस गया। उसने मेरे कंधे से ठुड्डी हटाई और मुझे अपनी ओर घुमाया।

मैं पूरी तरह उसके सामने था। बाहर क्षितिज पर सूरज अब समुद्र में डूब रहा था और आसमान में केसरी-लाल रंग की एक सुंदर छटा फैली थी। उस ढलते प्रकाश में दीपक का चेहरा बेहद प्यार भरा और भरोसेमंद दिख रहा था।

"मुझे भी... आप बहुत अच्छे लगते हैं, सर," उसने बेहद ईमानदारी और धीमी आवाज़ में बताया।

उस पल मुझे मेघना की याद नहीं आई, नौकरी की चिंता नहीं लगी, या दुनिया का विचार नहीं आया। सिर्फ़ सत्य और समाधान (सुकून) महसूस हो रहा था।
 
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