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दीपस्तंभ!
नमस्कार दोस्तों, मैं नीरज। मैं कोंकण में रहने वाला हूँ। यहीं की लाल मिट्टी और समुंदर की गोद में पला-ब बढ़ा हूँ। आज मैं आपको अपनी एक कहानी सुनाने वाला हूँ। कुछ साल पहले यहीं हमारे कोंकण में घटी हुई। मेरे शहर से थोड़ी दूर बसे एक गाँव की। यह कहानी थोड़ी बड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में मेरे जीवन में जो भी घटनाएं घटीं, वही मैं आपको बताने वाला हूँ। सुरक्षा के कारणों से मैंने जगहों और व्यक्तियों के नाम और कुछ तकनीकी व प्रशासनिक बातों में थोड़ा फेरबदल किया है। कहानी लेखन का यह मेरा पहला ही प्रयास है, इसलिए आप सभी से निवेदन है कि थोड़ी धीरज के साथ यह कहानी पढ़ें। अपनी सारी यादें आपसे साझा करके मुझे थोड़ा हल्का महसूस होगा और उम्मीद करता हूँ कि आपको भी मेरी कहानी पसंद आएगी। इसी के साथ कहानी की शुरुआत करता हूँ।
मेरी आँख गाड़ी में लगे एक जोरदार झटके से खुली। मैं अपनी सीट से लगभग उछल ही गया था। हमारी बस अब मुख्य हाइवे छोड़कर ग्रामीण रास्ते पर लग चुकी थी। अब यही उबड़-खाबड़ रास्ता मुझे मेरे तय किए हुए गाँव तक ले जाने वाला था। मैंने आँखें मलते हुए बाहर देखना शुरू किया। सूर्यनारायण अपनी दिनभर की ड्यूटी खत्म करके तेजी से क्षितिज की ओर बढ़ रहे थे। पशु-पक्षी भी अपना नित्यक्रम पूरा करके अपने-अपने आशियानों की ओर लौट रहे थे। गाँव के लोग धीरे-धीरे घर लौटते दिखाई दे रहे थे, कोई पैदल, कोई साइकिल पर तो एकाध-दुक्का मोटरसाइकिल पर। किसी के हाथ में सब्जी और सामान की थैलियाँ, तो किसी के पास खाने के खाली हो चुके डिब्बे, तो किसी के सिर पर टोकरियाँ और घास के गट्ठर। रास्ते में जो थोड़ी-बहुत चहल-पहल थी, वह बस फर्लांग भर फैली बाजार जैसी छोटी दुकानों और टपरियों तक ही सीमित थी। उनके भी अब दीया-बत्ती का समय हो चुका था। कुल मिलाकर, इस गाँव का दिन खत्म होकर अब रातरानी के आगमन का इंतजार शुरू हो गया था।
करीब पौन घंटे बाद मैं अपने स्टॉप (stop) पर उतरा। अब शाम की रोशनी (सांझ) भी विदा ले रही थी। पीछे मुड़कर देखा तो थोड़ी दूर गाँव में दीये टिमटिमाते हुए जलते दिखाई दिए। मानो रात के अंधेरे का सामना करने के लिए तैयार हो रहे हों। कल के सूर्योदय तक इस छोटे से थके-हारे गाँव की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी इन्हीं टिमटिमाते दीयों पर थी। यहाँ, मैं जिस जिले के शहर से आया था, वैसी चकाचौंध नहीं थी। दिन-रात चलने वाली गाड़ियों की आवाजाही नहीं थी, शोरगुल नहीं था। यहाँ थे तो बस मवेशियों के गले की घंटियों के स्वर, घर-घर से खाना बनाने की तैयारी में बर्तनों की खट-खट और झींगुरों (रात के कीड़ों) द्वारा शुरू की गई उनकी सामूहिक महफिल। बाकी पूरा गाँव अब थोड़ी ही देर में निढाल होकर सो जाने वाला था। एक पल के लिए मुझे लगा, "कहाँ से कहाँ आकर फँस गया मैं?"
मैं जहाँ उतरा वह गाँव का आखिरी बस स्टॉप था और जिस बस से मैं आया था, वह गाँव में आने वाली आखिरी बस थी। यह बस अब यहीं से वापस मुड़कर तालुका की ओर जाने वाली थी। बस के मुड़ते ही स्टॉप के सामने वाले इकलौते चाय वाले ने भी अपनी हाथगाड़ी जैसी टपरी समेटनी शुरू कर दी। बस वापस मुड़कर चली गई और मैंने थोड़ी अंगड़ाई लेकर शरीर को ढीला छोड़ा। सामने जाते हुए सुनसान रास्ते पर नजर डाली। सामने दूर पहाड़ पर कुछ रोशनियाँ जल रही थीं। वे इस बात की गवाह थीं कि वहाँ भी कोई मानवीय हलचल है। और इन रोशनियों के उस पार से अब एक तेज प्रकाश की किरण (बीम) काले पड़ते आसमान में नियमित रूप से गश्त लगाती दिखाई दी। इसी जगह मुझे पहुँचना था। यही था मेरी नई नौकरी का ठिकाना।
उस टपरी की ओर जाकर मैंने उस टपरीवाले से पूछा,"दादा, लाइटहाउस की तरफ जाने के लिए अभी कोई साधन है क्या?"
वह मेरी तरफ देखता ही रह गया और कुछ सेकंड बाद बोला, "भाई, यह कोई वक्त है क्या उधर जाने का? कहाँ से आए हो आप?"
मैंने कहा, "यहीं से, कणकवली से आया हूँ। कोई गाड़ी-रिक्शा वगैरह मिलेगी क्या लाइटहाउस जाने के लिए?"
इस पर वह जोर से हँसकर बोला, "गाड़ी-घोड़ा कहाँ से मिलेगा अब इस गाँव में? यह सामने वाले छोटे डामर के रास्ते से पैदल गए तो भी 3 किलोमीटर का रास्ता है। बीच में सिर्फ जंगल-झाड़ी है। इस वक्त कोई अकेला-दुकेला आदमी तो छोड़ो, परिंदा भी पर नहीं मारता उधर।"
यह सुनकर तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, लेकिन मुझे कुछ भी करके पहुँचना ज़रूरी था। ज़रूरी ही नहीं, बल्कि अनिवार्य था। मैंने उससे कहा, "अरे बाप रे! पर मेरा वहाँ समय पर पहुँचना ज़रूरी है।"
इतना समझाने पर भी इस नासमझ को आगे जाना ही है, यह देखकर वह थोड़ा गंभीर होकर बोला, "इतनी क्या ज़रूरत आ पड़ी?"
मैंने कहा, "दादा, लाइटकीपर के तौर पर मेरी पहली नौकरी कल सुबह से शुरू होनी है। कल सुबह हाजिर होकर मुझे चार्ज लेना है।"
इस पर आश्चर्य से वह बोला, "अरे! ऐसा बताओ न भाई। क्या आप भी, पहले ही क्यों नहीं बोले?"
मेरी खत्म होती उम्मीद फिर से जाग उठी, और मैंने पूछा, "क्यों? क्या हुआ?"
उसने बताया, "हाँ, एक उपाय है पर कितना समय लगेगा बता नहीं सकता।"
मैंने कहा, "जो भी हो बताइए, कितना भी समय लगे, पैसा लगे। मेरा कुछ इंतज़ाम करवा दीजिये।"
उस पर वह बोला, "पैसा नहीं लगेगा। भाई आज शुक्रवार है, लाइटहाउस की गाड़ी आज दोपहर को तालुका गई है, हफ्ते भर का राशन और सामान लाने। वह अब कभी भी आएगी, उसी में बैठकर आराम से चले जाना।"
यह सुनकर मेरी जान में जान आई। जिस गाँव में रिक्शा नहीं मिलती, वहाँ मुझे रात गुजारने के लिए जगह कहाँ मिलती, यह चिंता मिट गई। और अगर जगह मिल भी जाती, तो सुबह की पैदल यात्रा टलने वाली नहीं थी।
मैंने खुशी से उसका धन्यवाद किया और पूछा, "फिर भी, कितना समय लगेगा कुछ बता सकते हैं क्या?"
वह बोला, "अरे भाई, थोड़ा समय आगे-पीछे होता रहता है। थोड़ा टिक जाओ यहीं जब तक मेरा समेटना नहीं होता।" ऐसा कहकर उसने एक हिलता-डुलता स्टूल मेरी ओर सरका दिया। अब क्या, इस नई जगह पर दूसरा कुछ करने जैसा था भी नहीं। बैठ गया मैं उसके कहे अनुसार। आदत के मुताबिक मैंने अपना मोबाइल बाहर निकाला और यूँ ही चालू करके देखा। कोई कॉल या मैसेज नहीं थे। गनीमत यह थी कि यहाँ मोबाइल नेटवर्क ठीक था। वहीं से घर पर फोन करके इस गाँव में पहुँचने की खबर दी। माँ थी फोन पर। लाइटहाउस पहुँचते ही बताता हूँ, यह कहकर फोन रख दिया।
नवंबर का महीना था। शाम से ही ठंडी हवा चल रही थी। आधे दिन का सफर करके आए शरीर पर ठंडी फुहार पड़ रही थी। फोन रखा और उस शांत, नीरव जगह पर बैठे-बैठे पुरानी यादें मन में उमड़ने लगीं। मेघना! ऐसी ठंडी हवा में उसकी याद न आती तो ही आश्चर्य होता। ऐसी सर्द हवा में जवान शरीर को दूसरे गर्म जवान शरीर के साथ की चाहत होती है। मेघना और मैंने कई बार ऐसी शीतल शामें और रातें साथ बिताई थीं। एक-दूसरे के शरीर की धधकती आग बुझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन...
मेरे विचारों का सिलसिला उस टपरीवाले की आवाज़ से टूटा, "थोड़ी देर राह देखते हैं, नहीं तो उस गाड़ी वाले को फोन करूँगा। उसका नंबर है अपने पास। अपना कस्टमर है वो।"
फिर वह अपनी टपरी समेटते-समेटते यहाँ-वहाँ की बातें करता रहा। उससे जो एक-दो बातें पता चलीं, वह यह कि उसका नाम राजा है, गाँव में उसे 'राजाभाऊ' के नाम से जानते हैं। मैंने अपना नाम-गाँव उसे बताया। गाँव में खास ऐसा कुछ नहीं था। गाँव के मुख्य बस स्टॉप के पास एक छोटा सा बाज़ार यानी एक-दो चाय-नाश्ते के होटल, एक-दो किराने वाले, एक टेलर, एक-दो सैलून, एक चक्की वाला, ऐसी रोज़मर्रा की ज़रूरत की सड़क के दोनों ओर खड़ी कुछ दुकानें, एक बैंक और पोस्ट ऑफिस। यह सब कुछ साधारणतः 500 मीटर के दायरे में सिमटने वाला मामला था। इन सबके पीछे की तरफ ग्राम पंचायत का ऑफिस और गाँव की देवी का मंदिर। वहाँ से इस स्टॉप की दूरी करीब 10-12 मिनट की थी।
मैं यह सब नाइलाज होकर सुन रहा था। अब सारी चहल-पहल थम चुकी थी। राजाभाऊ का भी सब समेटना हो चुका था। मैं स्टूल हटाकर खड़ा हो गया और एक तरफ हो गया। अब इंतज़ार था कि गाड़ी कब आएगी। तभी राजाभाऊ चलते हुए मेरे पास आया और बोला, "भाई, हो गया आपका काम।"
मैं - "मतलब?"
राजाभाऊ – "फोन किया था मैंने अभी गाड़ी वाले को, नीचे तिराहे तक आ गई है गाड़ी। 2 मिनट में यहाँ पहुँचेगी। उसे बोल दिया है मैंने कि आपके नए साहब यहाँ मेरी दुकान पर रुके हैं, उन्हें ले जाओ।"
मैंने उसे धन्यवाद दिया। न कहते हुए भी, मेरी कोई जान-पहचान न होते हुए भी उसने बहुत मदद की थी। अब अँधेरा काफी घना हो गया था। इस आखिरी स्टॉप के पास ग्राम पंचायत के आखिरी खंभे पर लगा दीया (बल्ब) जलकर टिमटिमा रहा था। तभी गाँव से हमारी तरफ आने वाले रास्ते पर हमारी दिशा में आता एक तेज़ प्रकाश दिखाई देने लगा। राजाभाऊ ने मेरी तरफ देखकर हँसते हुए कहा,
"लो भाई, आ गई तुम्हारी गाड़ी। जाओ अब आराम से। मैं भी अब निकलता हूँ। नीचे गाँव में कभी आए तो आना चाय पीने इधर।"
ऐसा कहकर वह साइकिल पर टांग मारकर जाने लगा। मैंने भी उसे हाथ दिखाकर विदा किया। तभी वह गाड़ी मेरे पास आकर रुकी। ड्राइवर ने मुझे मेरा बैग और थैली पिछली सीट पर रखकर आगे आकर बैठने को कहा। मैं आगे जाकर बैठ गया और हमारी गाड़ी शुरू होकर लाइटहाउस की दिशा में दौड़ने लगी।
एक बड़ा चक्कर काटकर गाड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर आई और दूर खड़ा लाइटहाउस दिखाई देने लगा। इस दौरान गाड़ी के ड्राइवर उस्मान ने थोड़ी-बहुत जानकारी दी। अभी जो लाइटकीपर ड्यूटी पर हैं वे के.डी. साहब और उनकी मदद के लिए उनका एक असिस्टेंट है। के.डी. साहब की कहीं और बदली हो गई थी। 6-7 साल से के.डी. यहाँ पोस्टेड हैं। वे रविवार को जाने वाले थे। इतनी बात होने तक हम लाइटहाउस के मेन गेट के पास आ पहुँचे। गेट के बगल में ही एक बड़ी सी आधारशिला (nameplate) पर बड़े और साफ़ अक्षरों में लिखा था - "दीपस्तंभ!"
नमस्कार दोस्तों, मैं नीरज। मैं कोंकण में रहने वाला हूँ। यहीं की लाल मिट्टी और समुंदर की गोद में पला-ब बढ़ा हूँ। आज मैं आपको अपनी एक कहानी सुनाने वाला हूँ। कुछ साल पहले यहीं हमारे कोंकण में घटी हुई। मेरे शहर से थोड़ी दूर बसे एक गाँव की। यह कहानी थोड़ी बड़ी है। पिछले कुछ वर्षों में मेरे जीवन में जो भी घटनाएं घटीं, वही मैं आपको बताने वाला हूँ। सुरक्षा के कारणों से मैंने जगहों और व्यक्तियों के नाम और कुछ तकनीकी व प्रशासनिक बातों में थोड़ा फेरबदल किया है। कहानी लेखन का यह मेरा पहला ही प्रयास है, इसलिए आप सभी से निवेदन है कि थोड़ी धीरज के साथ यह कहानी पढ़ें। अपनी सारी यादें आपसे साझा करके मुझे थोड़ा हल्का महसूस होगा और उम्मीद करता हूँ कि आपको भी मेरी कहानी पसंद आएगी। इसी के साथ कहानी की शुरुआत करता हूँ।
मेरी आँख गाड़ी में लगे एक जोरदार झटके से खुली। मैं अपनी सीट से लगभग उछल ही गया था। हमारी बस अब मुख्य हाइवे छोड़कर ग्रामीण रास्ते पर लग चुकी थी। अब यही उबड़-खाबड़ रास्ता मुझे मेरे तय किए हुए गाँव तक ले जाने वाला था। मैंने आँखें मलते हुए बाहर देखना शुरू किया। सूर्यनारायण अपनी दिनभर की ड्यूटी खत्म करके तेजी से क्षितिज की ओर बढ़ रहे थे। पशु-पक्षी भी अपना नित्यक्रम पूरा करके अपने-अपने आशियानों की ओर लौट रहे थे। गाँव के लोग धीरे-धीरे घर लौटते दिखाई दे रहे थे, कोई पैदल, कोई साइकिल पर तो एकाध-दुक्का मोटरसाइकिल पर। किसी के हाथ में सब्जी और सामान की थैलियाँ, तो किसी के पास खाने के खाली हो चुके डिब्बे, तो किसी के सिर पर टोकरियाँ और घास के गट्ठर। रास्ते में जो थोड़ी-बहुत चहल-पहल थी, वह बस फर्लांग भर फैली बाजार जैसी छोटी दुकानों और टपरियों तक ही सीमित थी। उनके भी अब दीया-बत्ती का समय हो चुका था। कुल मिलाकर, इस गाँव का दिन खत्म होकर अब रातरानी के आगमन का इंतजार शुरू हो गया था।
करीब पौन घंटे बाद मैं अपने स्टॉप (stop) पर उतरा। अब शाम की रोशनी (सांझ) भी विदा ले रही थी। पीछे मुड़कर देखा तो थोड़ी दूर गाँव में दीये टिमटिमाते हुए जलते दिखाई दिए। मानो रात के अंधेरे का सामना करने के लिए तैयार हो रहे हों। कल के सूर्योदय तक इस छोटे से थके-हारे गाँव की सुरक्षा की सारी जिम्मेदारी इन्हीं टिमटिमाते दीयों पर थी। यहाँ, मैं जिस जिले के शहर से आया था, वैसी चकाचौंध नहीं थी। दिन-रात चलने वाली गाड़ियों की आवाजाही नहीं थी, शोरगुल नहीं था। यहाँ थे तो बस मवेशियों के गले की घंटियों के स्वर, घर-घर से खाना बनाने की तैयारी में बर्तनों की खट-खट और झींगुरों (रात के कीड़ों) द्वारा शुरू की गई उनकी सामूहिक महफिल। बाकी पूरा गाँव अब थोड़ी ही देर में निढाल होकर सो जाने वाला था। एक पल के लिए मुझे लगा, "कहाँ से कहाँ आकर फँस गया मैं?"
मैं जहाँ उतरा वह गाँव का आखिरी बस स्टॉप था और जिस बस से मैं आया था, वह गाँव में आने वाली आखिरी बस थी। यह बस अब यहीं से वापस मुड़कर तालुका की ओर जाने वाली थी। बस के मुड़ते ही स्टॉप के सामने वाले इकलौते चाय वाले ने भी अपनी हाथगाड़ी जैसी टपरी समेटनी शुरू कर दी। बस वापस मुड़कर चली गई और मैंने थोड़ी अंगड़ाई लेकर शरीर को ढीला छोड़ा। सामने जाते हुए सुनसान रास्ते पर नजर डाली। सामने दूर पहाड़ पर कुछ रोशनियाँ जल रही थीं। वे इस बात की गवाह थीं कि वहाँ भी कोई मानवीय हलचल है। और इन रोशनियों के उस पार से अब एक तेज प्रकाश की किरण (बीम) काले पड़ते आसमान में नियमित रूप से गश्त लगाती दिखाई दी। इसी जगह मुझे पहुँचना था। यही था मेरी नई नौकरी का ठिकाना।
उस टपरी की ओर जाकर मैंने उस टपरीवाले से पूछा,"दादा, लाइटहाउस की तरफ जाने के लिए अभी कोई साधन है क्या?"
वह मेरी तरफ देखता ही रह गया और कुछ सेकंड बाद बोला, "भाई, यह कोई वक्त है क्या उधर जाने का? कहाँ से आए हो आप?"
मैंने कहा, "यहीं से, कणकवली से आया हूँ। कोई गाड़ी-रिक्शा वगैरह मिलेगी क्या लाइटहाउस जाने के लिए?"
इस पर वह जोर से हँसकर बोला, "गाड़ी-घोड़ा कहाँ से मिलेगा अब इस गाँव में? यह सामने वाले छोटे डामर के रास्ते से पैदल गए तो भी 3 किलोमीटर का रास्ता है। बीच में सिर्फ जंगल-झाड़ी है। इस वक्त कोई अकेला-दुकेला आदमी तो छोड़ो, परिंदा भी पर नहीं मारता उधर।"
यह सुनकर तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई, लेकिन मुझे कुछ भी करके पहुँचना ज़रूरी था। ज़रूरी ही नहीं, बल्कि अनिवार्य था। मैंने उससे कहा, "अरे बाप रे! पर मेरा वहाँ समय पर पहुँचना ज़रूरी है।"
इतना समझाने पर भी इस नासमझ को आगे जाना ही है, यह देखकर वह थोड़ा गंभीर होकर बोला, "इतनी क्या ज़रूरत आ पड़ी?"
मैंने कहा, "दादा, लाइटकीपर के तौर पर मेरी पहली नौकरी कल सुबह से शुरू होनी है। कल सुबह हाजिर होकर मुझे चार्ज लेना है।"
इस पर आश्चर्य से वह बोला, "अरे! ऐसा बताओ न भाई। क्या आप भी, पहले ही क्यों नहीं बोले?"
मेरी खत्म होती उम्मीद फिर से जाग उठी, और मैंने पूछा, "क्यों? क्या हुआ?"
उसने बताया, "हाँ, एक उपाय है पर कितना समय लगेगा बता नहीं सकता।"
मैंने कहा, "जो भी हो बताइए, कितना भी समय लगे, पैसा लगे। मेरा कुछ इंतज़ाम करवा दीजिये।"
उस पर वह बोला, "पैसा नहीं लगेगा। भाई आज शुक्रवार है, लाइटहाउस की गाड़ी आज दोपहर को तालुका गई है, हफ्ते भर का राशन और सामान लाने। वह अब कभी भी आएगी, उसी में बैठकर आराम से चले जाना।"
यह सुनकर मेरी जान में जान आई। जिस गाँव में रिक्शा नहीं मिलती, वहाँ मुझे रात गुजारने के लिए जगह कहाँ मिलती, यह चिंता मिट गई। और अगर जगह मिल भी जाती, तो सुबह की पैदल यात्रा टलने वाली नहीं थी।
मैंने खुशी से उसका धन्यवाद किया और पूछा, "फिर भी, कितना समय लगेगा कुछ बता सकते हैं क्या?"
वह बोला, "अरे भाई, थोड़ा समय आगे-पीछे होता रहता है। थोड़ा टिक जाओ यहीं जब तक मेरा समेटना नहीं होता।" ऐसा कहकर उसने एक हिलता-डुलता स्टूल मेरी ओर सरका दिया। अब क्या, इस नई जगह पर दूसरा कुछ करने जैसा था भी नहीं। बैठ गया मैं उसके कहे अनुसार। आदत के मुताबिक मैंने अपना मोबाइल बाहर निकाला और यूँ ही चालू करके देखा। कोई कॉल या मैसेज नहीं थे। गनीमत यह थी कि यहाँ मोबाइल नेटवर्क ठीक था। वहीं से घर पर फोन करके इस गाँव में पहुँचने की खबर दी। माँ थी फोन पर। लाइटहाउस पहुँचते ही बताता हूँ, यह कहकर फोन रख दिया।
नवंबर का महीना था। शाम से ही ठंडी हवा चल रही थी। आधे दिन का सफर करके आए शरीर पर ठंडी फुहार पड़ रही थी। फोन रखा और उस शांत, नीरव जगह पर बैठे-बैठे पुरानी यादें मन में उमड़ने लगीं। मेघना! ऐसी ठंडी हवा में उसकी याद न आती तो ही आश्चर्य होता। ऐसी सर्द हवा में जवान शरीर को दूसरे गर्म जवान शरीर के साथ की चाहत होती है। मेघना और मैंने कई बार ऐसी शीतल शामें और रातें साथ बिताई थीं। एक-दूसरे के शरीर की धधकती आग बुझाने की कोशिश भी की थी, लेकिन...
मेरे विचारों का सिलसिला उस टपरीवाले की आवाज़ से टूटा, "थोड़ी देर राह देखते हैं, नहीं तो उस गाड़ी वाले को फोन करूँगा। उसका नंबर है अपने पास। अपना कस्टमर है वो।"
फिर वह अपनी टपरी समेटते-समेटते यहाँ-वहाँ की बातें करता रहा। उससे जो एक-दो बातें पता चलीं, वह यह कि उसका नाम राजा है, गाँव में उसे 'राजाभाऊ' के नाम से जानते हैं। मैंने अपना नाम-गाँव उसे बताया। गाँव में खास ऐसा कुछ नहीं था। गाँव के मुख्य बस स्टॉप के पास एक छोटा सा बाज़ार यानी एक-दो चाय-नाश्ते के होटल, एक-दो किराने वाले, एक टेलर, एक-दो सैलून, एक चक्की वाला, ऐसी रोज़मर्रा की ज़रूरत की सड़क के दोनों ओर खड़ी कुछ दुकानें, एक बैंक और पोस्ट ऑफिस। यह सब कुछ साधारणतः 500 मीटर के दायरे में सिमटने वाला मामला था। इन सबके पीछे की तरफ ग्राम पंचायत का ऑफिस और गाँव की देवी का मंदिर। वहाँ से इस स्टॉप की दूरी करीब 10-12 मिनट की थी।
मैं यह सब नाइलाज होकर सुन रहा था। अब सारी चहल-पहल थम चुकी थी। राजाभाऊ का भी सब समेटना हो चुका था। मैं स्टूल हटाकर खड़ा हो गया और एक तरफ हो गया। अब इंतज़ार था कि गाड़ी कब आएगी। तभी राजाभाऊ चलते हुए मेरे पास आया और बोला, "भाई, हो गया आपका काम।"
मैं - "मतलब?"
राजाभाऊ – "फोन किया था मैंने अभी गाड़ी वाले को, नीचे तिराहे तक आ गई है गाड़ी। 2 मिनट में यहाँ पहुँचेगी। उसे बोल दिया है मैंने कि आपके नए साहब यहाँ मेरी दुकान पर रुके हैं, उन्हें ले जाओ।"
मैंने उसे धन्यवाद दिया। न कहते हुए भी, मेरी कोई जान-पहचान न होते हुए भी उसने बहुत मदद की थी। अब अँधेरा काफी घना हो गया था। इस आखिरी स्टॉप के पास ग्राम पंचायत के आखिरी खंभे पर लगा दीया (बल्ब) जलकर टिमटिमा रहा था। तभी गाँव से हमारी तरफ आने वाले रास्ते पर हमारी दिशा में आता एक तेज़ प्रकाश दिखाई देने लगा। राजाभाऊ ने मेरी तरफ देखकर हँसते हुए कहा,
"लो भाई, आ गई तुम्हारी गाड़ी। जाओ अब आराम से। मैं भी अब निकलता हूँ। नीचे गाँव में कभी आए तो आना चाय पीने इधर।"
ऐसा कहकर वह साइकिल पर टांग मारकर जाने लगा। मैंने भी उसे हाथ दिखाकर विदा किया। तभी वह गाड़ी मेरे पास आकर रुकी। ड्राइवर ने मुझे मेरा बैग और थैली पिछली सीट पर रखकर आगे आकर बैठने को कहा। मैं आगे जाकर बैठ गया और हमारी गाड़ी शुरू होकर लाइटहाउस की दिशा में दौड़ने लगी।
एक बड़ा चक्कर काटकर गाड़ी चढ़ाई चढ़कर ऊपर आई और दूर खड़ा लाइटहाउस दिखाई देने लगा। इस दौरान गाड़ी के ड्राइवर उस्मान ने थोड़ी-बहुत जानकारी दी। अभी जो लाइटकीपर ड्यूटी पर हैं वे के.डी. साहब और उनकी मदद के लिए उनका एक असिस्टेंट है। के.डी. साहब की कहीं और बदली हो गई थी। 6-7 साल से के.डी. यहाँ पोस्टेड हैं। वे रविवार को जाने वाले थे। इतनी बात होने तक हम लाइटहाउस के मेन गेट के पास आ पहुँचे। गेट के बगल में ही एक बड़ी सी आधारशिला (nameplate) पर बड़े और साफ़ अक्षरों में लिखा था - "दीपस्तंभ!"