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Adultery उर्मिला के खानदान का गंदा राज़: एक incest की कहानी

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भाग 1 – नई शुरुआत: उर्मिला से सविता तक, धीरे-धीरे फैलती आग

ये कहानी बिल्कुल शुरुआत से शुरू होती है – सिर्फ उर्मिला और उसकी बेटी सविता से। गांव की पुरानी हवेली की वो मिट्टी-गंध वाली दीवारें, जहां बाहर से सम्मान की चादर ओढ़ी हुई थी, लेकिन अंदर निषिद्ध प्यास की आग धधक रही थी। ये वो आग थी जो सालों की अकेली रातों से जन्मी थी – प्यार की कमी, समाज की बंदिशों का दर्द, और शरीर की वो अनकही चाहत जो दिल को भी चीर देती थी।

उर्मिला, मेरी नानी, अब 58 साल की थीं। बाहर से एक सम्मानित गांव की विधवा – सूखी मिट्टी की खुशबू वाली साड़ी में लिपटी, माथे पर हल्की सिंदूर की लकीर जो उनके विधवा जीवन की याद दिलाती, हाथों में पुरानी चूड़ियाँ जो हर हल्की हलचल पर चिर-चिर की मधुर आवाज़ करतीं, लेकिन वो आवाज़ अब उनके अकेलेपन का मजाक उड़ाती लगती। लेकिन अंदर से उनका शरीर अभी भी गर्म था – 38 इंच की भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के ब्लाउज में दबकर उभरी रहतीं, पतली कमर, मोटी गांड जो चलते वक्त हल्के से लहराती, और वो गीली गुफा जो रातों को उन्हें बेचैन कर देती। ये सब उनके दिल की उदासी को छुपाने की कोशिश था – पति की मौत के बाद सालों का अकेलापन, गांव की नजरों से डर, और वो अनकही प्यास जो उन्हें रात-रात भर रोने पर मजबूर कर देती। उर्मिला सोचतीं, "क्यों भगवान ने मुझे इतनी आग दी, जब बुझाने वाला कोई नहीं?" उनका दिल टूटा हुआ था, लेकिन शरीर की चाहत ने उन्हें जीवित रखा था।

एक रात, गांव में मूसलाधार बारिश हो रही थी। छत पर पानी की टप-टप, बिजली चली गई, कमरे में सिर्फ दूर कहीं जलती एक छोटी सी मिट्टी की दीया की पीली रोशनी। हवा में गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू और बारिश की ठंडक, जो उर्मिला के दिल की ठंडक को और बढ़ा देती। पुरानी लकड़ी की चारपाई पर लेटीं, साड़ी का पल्लू सरका हुआ, पेटीकोट ऊपर चढ़ा, जाँघों पर ठंडी हवा का स्पर्श। हाथ खुद-ब-खुद अपनी चूत की तरफ बढ़ा। उँगलियाँ गर्म, नरम, गीली त्वचा पर फिसलतीं, अंदर जाते ही वो चिपचिपी गर्माहट महसूस हुई। लेकिन आज वो सिसकारी नहीं सिर्फ शारीरिक थी – दिल में एक गहरा दर्द था, सालों की कुंठा, "आह्ह... कोई मादरचोद तो आए... इस हरामखोर चूत को फाड़ दे..." उनकी साँसें तेज़, सीने की ऊपर-नीचे होती चूचियाँ, पसीने से भीगी गर्दन पर बारिश की बूँदें टपकतीं। आंसू उनकी आँखों में आ गए – ये अकेलापन उन्हें खा रहा था, लेकिन वो जानती थीं कि ये प्यास ही उनकी ताकत थी।

तभी पुराने लकड़ी के दरवाज़े की चरमराहट हुई। सविता आई – मेरी माँ, 19 साल की, कॉलेज से भीगकर लौटी। बारिश ने उसकी साड़ी को पूरी तरह शरीर से चिपका दिया था – पतला कपड़ा पारदर्शी हो गया, गोरी चूचियाँ साफ उभरीं, गुलाबी निप्पल सख्त और ठंड से खड़े। साड़ी की सिलवटों से पानी टपक रहा था, फर्श पर छोटे-छोटे पानी के छींटे। उसकी साँसें तेज़, बाल गीले, चेहरे पर बारिश की बूँदें चमक रही थीं, और हल्की ठंड से उसके होंठ काँप रहे थे। लेकिन सविता के दिल में भी एक खालीपन था – कॉलेज की दोस्तों की कहानियां सुनकर उसकी जवान उम्र की चाहतें जागी थीं, लेकिन गांव की बंदिशें, माँ की सख्ती, और पिता की मौत का दर्द उसे चुप करा देता। वो सोचती, "क्या मेरा जीवन भी माँ जैसा होगा? अकेला, बिना प्यार के?"

सविता ने माँ को देखा – उँगलियाँ अभी भी अंदर, आँखें अर्ध-बंद, होंठ काटते हुए, चेहरा कामुक लालिमा से भरा, लेकिन आँखों में वो उदासी। कमरे में बारिश की आवाज़ के साथ उनकी दबी कराहें गूँज रही थीं। सविता का दिल धड़का – डर, जिज्ञासा, और एक अनजानी करुणा। "माँ... ये क्या कर रही हो?" उसकी आवाज़ काँपती हुई, लेकिन उसमें माँ के लिए प्यार था।

उर्मिला चौंकीं, लेकिन हाथ धीरे से निकाला नहीं। आंसू पोंछते हुए वो एक गंदी, गहरी मुस्कान के साथ बोलीं, "बेटी... आ जा ना। महसूस कर... माँ कितनी तड़प रही है। सालों से अकेली... तेरे पापा गए, कोई नहीं रहा। लेकिन तू है ना?" उनकी आवाज़ में वो गांव वाली मोटी, कामुक मिठास, लेकिन नीचे दर्द छिपा था। सविता को देखकर उर्मिला के दिल में एक नई उम्मीद जागी – शायद ये बेटी उनकी उदासी मिटा सके, वो प्यार दे सके जो कभी नहीं मिला।

सविता डरते-डरते पास आई, उसके पैरों से पानी टपक रहा था। उर्मिला ने उसका ठंडा, गीला हाथ पकड़ा, अपनी गर्म जाँघ पर रखा, फिर धीरे से ऊपर की तरफ ले गईं। "छू इसे... देख, कितनी गर्म, कितनी चिपचिपी है माँ की चूत।" सविता की उँगलियाँ स्पर्श करते ही वो गर्म, नमकीन गीलापन महसूस हुआ। उर्मिला कराहीं, लेकिन उनकी आँखों में आंसू थे – "तू भी तो करती है ना अकेले में? अपनी उँगलियाँ डालकर चूत रगड़ती है, अपनी चूचियाँ दबाती है? बेटी, ये दर्द मत सहना... माँ तेरे साथ है।"

सविता शरमा गई, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गईं। "माँ... ये... पाप है..." उसका दिल धड़क रहा था – समाज की नजरों का डर, लेकिन माँ के चेहरे पर वो उदासी देखकर उसका दिल पिघल रहा था। वो सोचती, "माँ ने कितना सहा है... शायद ये तरीका है उन्हें खुश करने का।"

उर्मिला हँसीं, लेकिन हँसी में दर्द था, "साली रंडी, ये तो औरत का हक है। आ, माँ तेरी मदद करे। तेरी भी चूत की आग बुझाऊँ। हम दोनों अकेली हैं, लेकिन साथ तो हैं ना?"

उर्मिला ने सविता की साड़ी का पल्लू धीरे से सरकाया। गीला कपड़ा फिसलकर गिरा, सविता की भरी हुई चूचियाँ बाहर – दूध जैसी गोरी, निप्पल ठंड से कड़े, बारिश की बूँदें उन पर चमक रही थीं। उर्मिला ने एक निप्पल मुँह में लिया, जीभ से चाटा – मीठा, नमकीन स्वाद, ठंड और गर्मी का मिश्रण। सविता की साँस रुक गई, "माँ... आह्ह... ये क्या..." उसकी पीठ पर सिहरन दौड़ी, लेकिन दिल में एक नई भावना – माँ के लिए प्यार, और खुद की चाहत का जागना।

"पाप नहीं, बेटी। ये खानदान का प्यार है।" उर्मिला ने सविता का हाथ अपनी चूत पर दबाया। "उँगलियाँ डाल... गहरा..." सविता की उँगलियाँ फिसलकर अंदर गईं, वो गर्म, चिपचिपी दीवारें महसूस हुईं। उर्मिला की कराहें बढ़ीं, "हाँ... ऐसे ही... घुमा... साली, तू तो कमाल की है।" लेकिन अंदर से उर्मिला रो रही थीं – खुशी और अपराधबोध का मिश्रण।

सविता का डर अब प्यास और करुणा में बदल रहा था। उर्मिला ने उसे लिटाया, दोनों की साड़ियाँ पूरी उतारीं। कमरे में गीली मिट्टी की खुशबू, बारिश की आवाज़, और उनकी तेज़ साँसें। दोनों नंगी – माँ की भरी, झुर्रियों वाली लेकिन गर्म देह, बेटी की जवान, मुलायम त्वचा। उर्मिला ऊपर चढ़ीं, अपनी चूत सविता की चूत पर रगड़ीं – गर्म, गीली, चिपचिपी स्पर्श, दोनों की कराहें मिलकर गूँजीं। लेकिन ये सिर्फ शारीरिक नहीं था – उर्मिला के दिल में बेटी के लिए एक गहरा लगाव जाग रहा था, सविता के मन में माँ की उदासी मिटाने की चाहत।

"आह्ह बेटी... तेरी चूत कितनी नरम, कितनी गर्म... रगड़ जोर से..."
सविता कमर उठाती हुई, "माँ... कितना अच्छा... मेरी चूचियाँ चूसो... आह्ह..." उसकी आँखों में आंसू – खुशी के, और थोड़े डर के।

उर्मिला नीचे गईं, सविता की चूत पर मुँह रखा। जीभ से क्लिटोरिस चाटा – मीठा, नमकीन रस, गर्माहट। सविता की कमर उछली, "आह्ह्ह... माँ... जीभ गहरा... फाड़ दो मेरी भोसड़ी..." लेकिन वो सोचती, "ये पाप है, लेकिन माँ खुश है... शायद यही रास्ता है।"

उँगलियाँ डालीं – दो, फिर तीन। सविता चीखी, शरीर काँपकर झटके लगे, "माँ... आ रहा है... चूत से पानी..." और गर्म रस बह निकला, उर्मिला ने सब चाट लिया। सविता का दिल भर आया – ये खुशी नई थी, लेकिन माँ के साथ।

फिर सविता ने माँ की चूत चाटी – पहली बार का वो स्वाद, गहरा, नशे जैसा। उर्मिला कराहीं, "हाँ बेटी... चूस... जीभ घुमा... साली रंडी..." लेकिन उनकी आँखें बंद, दिल में शांति – सालों बाद किसी ने उन्हें छुआ था।

उस रात घंटों चली – चाटना, रगड़ना, उँगलियाँ, सिसकारियाँ, पसीने की गंध, बारिश की ठंडक। कोई लंड नहीं, सिर्फ माँ-बेटी की गंदी, निषिद्ध केमिस्ट्री, लेकिन नीचे भावनाओं का तूफान – प्यार, अपराधबोध, उदासी, और नई उम्मीद।

सुबह दोनों ने कपड़े पहने। उर्मिला ने सविता के कान में फुसफुसाया, "ये राज़ हमारे बीच। रातें अब हमारी। मैं तुझे प्यार दूँगी, जो मुझे कभी नहीं मिला।" उनकी आवाज़ में भावुकता थी।

सविता मुस्कुराई, आँखों में नई चमक और थोड़ी उदासी। "हाँ माँ... मैं तैयार हूँ।" लेकिन उसके मन में सवाल थे – ये सही है? लेकिन माँ की खुशी देखकर वो चुप रही।

हवेली की रातें बदल चुकी थीं। बाहर सब नॉर्मल, लेकिन अंदर भावनाओं की आग जल रही थी।
 
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भाग 2: उर्मिला-सविता की गहरी केमिस्ट्री – आग का गहरा होना

पहली रात की वो आग अब धीरे-धीरे भड़क रही थी, जैसे कोई चिंगारी जंगल में फैलती है – चुपके से, लेकिन रोकना नामुमकिन। उर्मिला और सविता के बीच का राज़ अब दोनों की साँसों में बस चुका था।


दिन में सब नॉर्मल लगता – उर्मिला रसोई में खाना बनातीं, सविता कॉलेज से लौटकर किताबें पढ़ती। लेकिन शाम ढलते ही आँखें मिलतीं, और एक इशारा काफी होता। "बेटी, आज थक गई हूँ। कमरे में आ, मालिश कर दे।" उर्मिला कहतीं, और सविता मुस्कुराकर मान जाती।

दूसरी रात, बारिश फिर से थी। उर्मिला ने दरवाज़ा बंद किया, मोमबत्ती जलाई। कमरे में हल्की रोशनी, बाहर की बारिश की आवाज़। सविता बिस्तर पर बैठी, उर्मिला उसके पीछे। "बेटी, तेरी मालिश से कल रात कितना आराम मिला।

आज तू मेरी कर।" लेकिन मालिश सिर्फ बहाना थी। उर्मिला ने सविता की गर्दन पर हाथ रखा, धीरे-धीरे नीचे सरकाया। ब्लाउज का हुक खोला, चूचियाँ आज़ाद। सविता की साँस तेज़ हुई, "माँ... फिर से... लेकिन कल की तरह?"

उर्मिला के होंठ सविता की गर्दन पर लगे, चूमते हुए नीचे आए। "हाँ बेटी... लेकिन आज और गहरा। तेरी चूत में मेरी जीभ कल अधूरी रह गई थी।" सविता शरमाई, लेकिन पैर फैला दिए।

उर्मिला ने साड़ी ऊपर की, पैंटी नीचे खींची। सविता की चूत गीली चमक रही थी। उर्मिला ने जीभ से पहले क्लिटोरिस को छुआ, फिर चाटा – धीरे-धीरे, घुमाते हुए। सविता की कमर उछल गई, "आह्ह माँ... कितनी गर्म जीभ... चूसो... और चूसो..."

उर्मिला ने जीभ अंदर डाली, जैसे कोई भूखी शेरनी। सविता के हाथ उर्मिला के बालों में उलझे, दबाती हुई। "माँ... फाड़ दे... उंगली भी डाल... आह्ह... साली... कितना मजा..." उर्मिला ने दो उँगलियाँ घुसाईं, घुमाईं, बाहर निकालीं, फिर तीन।

सविता चीखी दबी आवाज़ में, "माँ हरामखोर... हाँ... ऐसे... मेरी भोसड़ी फाड़... आ रहा है... आह्ह्ह..." पानी की धार बह निकली, उर्मिला ने मुँह से पिया, चाट-चाटकर साफ किया।

अब बारी सविता की थी। वो ऊपर चढ़ी, उर्मिला की चूत पर मुँह रखा। "माँ... तेरी चूत कितनी मीठी... जैसे शहद।" सविता ने चाटा, जीभ से गहराई में उतरी।


उर्मिला कराहीं, "बेटी... हाँ... चूस... मेरी क्लिट... काट ले हल्के से... आह्ह... रंडी... तू तो माहिर हो गई..." सविता ने उँगलियाँ डालीं, तेज़-तेज़ घुमाईं। उर्मिला की कमर काँपने लगी, "आह्ह... ले... मेरे पानी का स्वाद... सविता... फाड़ दे... मादरचोद..." और उर्मिला का रस बहा, सविता ने सब चाट लिया।

दोनों थककर लेट गईं, साँसें मिलीं। उर्मिला ने सविता के कान में कहा, "बेटी, ये केमिस्ट्री अब और गहरी होगी। कल मैं तुझे कुछ नया सिखाऊँगी – गांड का खेल।" सविता की आँखें चमकीं, "माँ... गांड? लेकिन दर्द होगा..." उर्मिला हँसीं, "दर्द में ही मजा है, साली। और राज़ रहेगा – किसी को पता नहीं।"

अगली रातें और गहरी हो गईं। तीसरी रात, उर्मिला ने सविता को उल्टा लिटाया। "देख, तेरी गांड कितनी गोल... फैला इसे।" सविता ने पैर फैलाए, उर्मिला ने जीभ से पहले चूत चाटी, फिर गांड के छेद पर लगाई। सविता सिहर उठी, "माँ... वहाँ... गंदा है..." उर्मिला बोलीं, "गंदा ही तो मजेदार है।

जीभ डालूँगी अंदर।" जीभ घुसी, सविता चीखी, "आह्ह... माँ... कितना अजीब... लेकिन अच्छा... और करो..."
उर्मिला ने उंगली पर तेल लगाया, धीरे से गांड में घुसाया। सविता कराही, "दर्द... लेकिन मत रुको... गहरा..." उर्मिला ने दो उँगलियाँ डालीं, घुमाईं। सविता की चूत खुद-ब-खुद गीली हो गई। "माँ... अब तू ले..." सविता ने उर्मिला की गांड चाटी, उँगलियाँ डालीं। दोनों की सिसकारियाँ कमरे में गूँजतीं – "आह्ह... फाड़ दे... रंडी... हरामखोर..."

धीरे-धीरे ये खेल रोज़ का हो गया। कभी बाथरूम में, कभी रसोई में चुपके से। उर्मिला सिखातीं, "बेटी, चूत और गांड दोनों को मिलाकर रगड़।" सविता सीखती, "माँ, तेरी चूचियाँ चूसते हुए उंगली डालूँगी।" केमिस्ट्री गहरी हो गई – माँ-बेटी की बॉन्डिंग अब सिर्फ खून की नहीं, रस की थी। लेकिन उर्मिला जानती थीं कि ये काफी नहीं। प्यास बढ़ रही थी। "बेटी, अब कुछ और चाहिए।

लेकिन धीरे-धीरे... पहले ये राज़ मजबूत हो।"
सविता की शादी हुई, राजा पैदा हुआ। लेकिन उर्मिला का आना-जाना लगा रहा। सविता के पति बाहर काम पर जाते, तो रातें फिर वही। "माँ, आज फिर..." सविता कहती, और उर्मिला मुस्कुरातीं।

राजा छोटा था, सोता रहता। लेकिन उर्मिला सोचतीं, "जब राजा बड़ा होगा... तब उसे भी सिखाएँगी। लेकिन अभी नहीं। अभी सिर्फ हम दोनों।"

हवेली की रातें अब रस से भरी थीं – गंध, सिसकारियाँ, और वो गहरी केमिस्ट्री जो कभी नहीं बुझती। उर्मिला और सविता की जोड़ी – माँ-बेटी की गंदी दुनिया, रहस्यमयी और अमर।
 
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Part 3: भानु की आग – तिकड़ी का राज़ और नई प्यास

सविता की शादी के कुछ साल बाद, हवेली की रातें अब भी वही जादू बिखेरती थीं। राजा अब थोड़ा बड़ा हो चुका था – स्कूल जाता, खेलता, लेकिन रात को जल्दी सो जाता। सविता का पति शहर में नौकरी करता, अक्सर बाहर रहता।

उर्मिला का आना-जाना लगा रहता, और दोनों की वो गुप्त केमिस्ट्री कभी कम नहीं हुई। लेकिन अब प्यास और बढ़ गई थी।

उर्मिला सोचतीं, "बेटी, सिर्फ हम दोनों से काम नहीं चलेगा। कुछ नया चाहिए – मर्द की ताकत, वो गर्म लंड जो हमें फाड़ दे।" सविता भी सहमत थी, "माँ, हाँ... लेकिन कौन? घर का राज़ रहना चाहिए।"

तभी एक दिन, अचानक भानु आया। भानु – सविता का नंदोई, उर्मिला का दामाद। उर्मिला की छोटी बेटी का पति, जो राजा का फूफा था। भानु गाँव से काम के सिलसिले में आया था – कोई ज़मीन का झगड़ा सुलझाने। वो हवेली में रुकने आया, क्योंकि उसकी पत्नी (सविता की बहन) शहर में थी।

भानु एक हट्टा-कट्टा मर्द – लंबा, चौड़ा सीना, और वो आँखें जो औरतों को घूरती रहतीं। उर्मिला ने उसे देखते ही मन में ठान लिया, "ये साला हमारी प्यास बुझाएगा। बेटी, इसे फंसाओ।"

शाम को डिनर के वक्त, उर्मिला ने सविता को इशारा किया। सविता ने टाइट ब्लाउज पहना, जिसमें उसकी चूचियाँ उभरी हुईं। उर्मिला ने साड़ी नीचे बाँधी, कमर दिखाती हुई। भानु टेबल पर बैठा, बातें करता।

"सासू माँ, आप तो जवान लगती हो। और सविता जी, आपकी तो कमाल की फिगर है।" उर्मिला हँसीं, "भानु बेटा, तू भी कम नहीं। इतना मजबूत... फूफा जी, राजा को देखो, कितना प्यारा है। लेकिन रात को सो जाता है, हम बोर हो जाते हैं।" सविता ने पैर से भानु की टांग छुई, "नंदोई जी, आज रात बातें करेंगे? नींद नहीं आ रही।"

भानु की आँखें चमकीं, लेकिन वो संभला। रात हुई, राजा सो गया। हवेली में सन्नाटा। उर्मिला ने भानु को अपने कमरे में बुलाया, "बेटा, थक गया होगा। आ, मालिश कर दूँ।" भानु आया, बिस्तर पर लेटा।

उर्मिला ने तेल लिया, उसकी पीठ पर हाथ फेरा। सविता चुपके से अंदर आई, दरवाज़ा बंद किया। "नंदोई जी, मैं भी मदद करूँ?" भानु चौंका, लेकिन उर्मिला ने उसके कंधे दबाए, "शांत रह, बेटा। हम तेरी देखभाल करेंगी।"

उर्मिला ने भानु की कमीज उतारी, छाती पर हाथ फेरा। सविता नीचे बैठी, उसकी पैंट पर हाथ रखा। भानु की साँस तेज़ हुई, "सासू माँ... सविता जी... ये क्या? अगर किसी को पता चला..." उर्मिला ने उसके होंठ पर उंगली रखी, "चुप, साले।

राजा सो रहा है, और राज़ रहेगा। तू हमारी प्यास बुझा, हम तेरी।" सविता ने पैंट खोली, लंड बाहर निकाला – वो मोटा, लंबा, खड़ा हो रहा था। "वाह नंदोई जी... कितना बड़ा... मुँह में लूँ?" भानु कराहा, "आह्ह... सविता... तू रंडी है क्या?"

उर्मिला ऊपर चढ़ी, अपनी चूचियाँ भानु के मुँह पर रगड़ीं। "चूस साले... मेरी चूचियाँ... काट ले।" भानु ने चूसा, निप्पल काटा।

सविता नीचे लंड चाट रही थी – जीभ से टोपे पर घुमाती, अंडे चूसती। "नंदोई... तेरे लंड का स्वाद... कितना नमकीन... गहरा चूसूँ?" भानु की कमर उछली, "आह्ह... साली... चूस... पूरा मुँह में ले..." उर्मिला ने अपनी चूत भानु के मुँह पर रखी, "चाट साले... मेरी चूत... जीभ डाल अंदर।" भानु ने चाटा, जैसे भूखा कुत्ता। सविता ने लंड पर चूत रगड़ी, फिर अंदर लिया – "आह्ह... फाड़ दे... नंदोई... तेरा लंड मेरी भोसड़ी में..."
उर्मिला ने सविता को देखा, "बेटी, अब मैं... तू उसका मुँह ले।

" वे जगह बदलीं। उर्मिला भानु के लंड पर बैठी, ऊपर-नीचे कूदने लगी। "आह्ह... दामाद जी... फाड़ दे अपनी सास की चूत... हाँ... गहरा..." भानु ने कमर उठाई, ठोकता हुआ। सविता ने अपनी चूत भानु के मुँह पर रखी, "चाट फूफा जी... तेरी जीभ कितनी लंबी... क्लिट चूस..." भानु ने चाटा, उँगलियाँ डाली। कमरा सिसकारियों से भर गया – "आह्ह... रंडी... साले... फाड़... चूस... मादरचोद..."

अब भानु ने दोनों को घोड़ी बनाया। पहले सविता की गांड में उंगली डाली, "साली... तेरी गांड टाइट है... लंड डालूँ?" सविता कराही, "हाँ नंदोई... फाड़ दे... लेकिन धीरे..." भानु ने तेल लगाया, लंड घुसाया। सविता चीखी, "आह्ह... दर्द... लेकिन मजा... ठोक साले..." उर्मिला सामने बैठी, सविता की चूत चाट रही थी। फिर बारी उर्मिला की – भानु ने उसकी गांड में लंड डाला,

"सासू माँ... तेरी गांड कितनी गर्म... फाड़ दूँ?" उर्मिला बोलीं, "हाँ दामाद... फाड़... तेरी सास की गांड तेरी है..."
रात भर खेल चला। भानु का पानी पहले सविता के मुँह में, फिर उर्मिला की चूत में। दोनों ने चाट-चाटकर साफ किया। सुबह होने से पहले भानु थककर सो गया।

उर्मिला और सविता एक-दूसरे को देखकर मुस्कुराईं, "बेटी, ये साला अब हमारा गुलाम है। राजा को कुछ पता नहीं चला।" सविता बोली, "माँ, अगली बार और... लेकिन राज़ रहेगा।"

भानु का आना अब बढ़ गया। काम के बहाने हवेली आता, और रातें आग लगातीं। उर्मिला, सविता और भानु की तिकड़ी – माँ, बेटी और दामाद की गंदी केमिस्ट्री। राजा बाहर खेलता रहता, अनजान।

हवेली की दीवारें अब और राज़ छिपातीं – वो रस, वो सिसकारियाँ, और वो अमर प्यास जो कभी नहीं बुझती। लेकिन उर्मिला सोचतीं, "अब राजा बड़ा हो रहा है... शायद एक दिन उसे भी... लेकिन अभी नहीं। अभी ये तिकड़ी काफी है।"
 
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भाग 4 - खुशबू का राज - नानी के उगलियां

हवेली में अब रातें थोड़ी शांत हो चली थीं, क्योंकि भानु काम के सिलसिले में दूर चला गया था। लेकिन उसकी कमी उर्मिला और सविता को और प्यासी बना रही थी। वे दोनों अब एक-दूसरे के साथ ज्यादा समय बितातीं, गुप्त बातें करतीं, और रात को अपनी पुरानी आदतों में खो जातीं। राजा दिन में कॉलेज में व्यस्त रहता, लेकिन घर लौटते ही उसका मन उन रहस्यों में उलझ जाता। वो जानता था कि माँ और नानी की दुनिया अलग है, लेकिन वो खुद को रोक नहीं पाता था।
एक दोपहर, राजा घर लौटा। सविता रसोई में थी, उर्मिला अपने कमरे में आराम कर रही थीं। राजा ने अपना बैग रखा और कुछ ढूंढने के बहाने उर्मिला के कमरे में घुसा – शायद कोई किताब, लेकिन असल में वो उत्सुकता थी। बिस्तर के नीचे झाँका, और वहाँ पड़ी थी उर्मिला की गंदी पैंटी – रात की बची हुई, गीली, चिपचिपी, रस से सनी हुई। राजा का दिल धड़क उठा। वो झुका, उसे उठाया, और चुपके से अपने कमरे में ले गया। "नानी की... वही गंध," मन में फुसफुसाया। किसी ने नहीं देखा – हवेली की दीवारें चुप रहीं।
रात हुई। राजा बिस्तर पर लेटा, लाइट बंद। पैंटी उसके तकिए के नीचे छिपी थी। वो बाहर निकाला, नाक से लगाया। वो तीखी, मादक खुशबू – चूत का रस, पसीना, और कुछ और जो उसे पागल कर देता। "आह्ह... नानी की चूत की गंध... कितनी गर्म," सोचते हुए उसका लंड खड़ा हो गया। वो पैंट खोलकर लंड पकड़ा, धीरे-धीरे मुठ मारने लगा। मन में विचारों का सैलाब – 'रात को माँ और नानी क्या करती होंगी? भानु फूफा चोदकर गया, लेकिन ये पैंटी... नानी की चूत से टपका रस... अगर मैं सूंघता रहा तो...'
अचानक, वो खुशबू उसे पुरानी यादों में ले गई। बचपन में, जब वो छोटा था, नानी उर्मिला उसे गोद में लेतीं। नींद न आने पर वो अपनी उंगली उसके नाक के पास ले जातीं, "सूंघ ले बेटा, अच्छी खुशबू है... नींद आएगी।" वो उंगली गीली होती, वही तीखी गंध। राजा सूंघता, और अजीब सा मजा आता। अब सब साफ हो गया – नानी अपनी उंगली चूत में डालकर निकालतीं, फिर उसे सूंघातीं। "बचपन से... नानी मुझे ये सिखाना चाहती थीं... चूत की गंध, रस का स्वाद... वो मुझे तैयार कर रही थीं... आह्ह... साली नानी... रंडी... मुझे चोदना सिखाना चाहती थीं?" विचार और तेज़ हुए। वो पैंटी मुँह में दबाया, जीभ से चाटा – नमकीन, चिपचिपा रस। लंड पर हाथ तेज़ चला, "नानी... तेरी चूत... मुझे बचपन से ललचा रही थीं... माँ को भी... अगर मैं अब... नहीं, अभी नहीं..."
दीवार के पार से आवाजें आईं – सविता और उर्मिला की। भानु नहीं था, लेकिन वे दोनों अपनी प्यास बुझा रही थीं। उर्मिला बोलीं, "बेटी, भानु की याद... लेकिन तेरी जीभ काफी है... चाट मेरी चूत..." सविता कराही, "माँ... गहरा... उंगली डाल... आह्ह..." राजा ने कान सटाया, पैंटी सूंघता रहा। उसके विचार उन्माद में – 'नानी की उंगली... वही जो मुझे सूंघातीं... अब माँ की चूत में... वे दोनों रंडियाँ... मुझे नहीं पता, लेकिन मैं जानता हूँ... उनका राज़ मेरा है।' वो तेज़ी से मुठ मारा, कमर उछाली, और झड़ गया – गर्म रस हाथ पर, बिस्तर पर। थककर लेटा रहा, पैंटी छिपा ली।
सुबह सब सामान्य। सविता ने नाश्ता दिया, उर्मिला ने पूछा, "बेटा, रात अच्छी नींद आई?" राजा मुस्कुराया, "हाँ नानी... बहुत अच्छी।" लेकिन उसकी आँखें उनकी उँगलियों पर टिकीं – वही उँगलियाँ जो रात को चूत में थीं, बचपन में उसके नाक पर। वे अनजान रहीं, हवेली का रहस्य और गहरा हो गया। राजा अब हर रात वैसा ही करता – पैंटी सूंघता, याद करता, मुठ मारता। बचपन की वो खुशबू अब उसके दिमाग में बस चुकी थी, और वो सोचता, 'वे कभी नहीं जानेंगी... लेकिन मैं जानता हूँ... बचपन से ये खेल चल रहा है।' हवेली की रातें अब उसके लिए और रहस्यमयी हो चलीं, प्यास जो कभी नहीं बुझती।
 
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भाग - 5 कंडोम का रस।

समय गुजरता रहा, हवेली की रातें अब सावधानी से भरी हो चली थीं। उर्मिला और सविता को अब एक डर सताने लगा था – कहीं सविता फिर से प्रेग्नेंट न हो जाए। पहले की तरह, भानु का रस अंदर छोड़ने से खतरा था। उर्मिला ने सविता से कहा, "बेटी, अब सावधानी बरतनी होगी। भानु को बोलो, कंडोम लाए। हमारी प्यास तो बुझेगी, लेकिन घर का राज़ सुरक्षित रहेगा।" सविता सहमत थी, "माँ, हाँ... राजा बड़ा हो रहा है, लेकिन अभी वो अनजान है। हमारा खेल जारी रहे।"

अगले दिन भानु आया, काम का बहाना लेकर। लेकिन इस बार उसके पास कंडोम का पैकेट था – शहर से खरीदा, मजबूत और सुरक्षित। शाम को डिनर के बाद, राजा सो गया। उर्मिला ने भानु को कमरे में बुलाया, "दामाद जी, आज सावधानी से... कंडोम लगा ले।" भानु हँसा, "सासू माँ, तुम्हारी चिंता ठीक है। सविता, तैयार हो?" सविता ने साड़ी उतारी, "नंदोई, लगा ले... फिर फाड़ दे हमें।" भानु ने कंडोम निकाला, लंड पर चढ़ाया – मोटा लंड अब चमकदार कवर में लिपटा। पहले उर्मिला की चूत में घुसाया, "आह्ह... सासू माँ... टाइट है... ठोकूँ?" उर्मिला कराही, "हाँ साले... गहरा... लेकिन पानी अंदर मत छोड़ना।" भानु ठोकता रहा, सविता नीचे से अंडे चूस रही थी। फिर बारी सविता की – भानु ने उसे घोड़ी बनाया, कंडोम लगे लंड से चोदा। "साली... तेरी चूत गर्म... आह्ह..." सविता चीखी, "फाड़ दे... लेकिन कंडोम मत उतारना।"

रात भर खेल चला – जगहें बदलीं, गांड मारी, चूत चाटी, लेकिन पानी कंडोम में ही। आखिरकार भानु झड़ा, कंडोम भरा हुआ। वो निकाला, बाँधा, और बिस्तर के नीचे फेंक दिया – थकान में भूल गया। सुबह भानु चला गया, उर्मिला और सविता संतुष्ट, लेकिन कंडोम का ख्याल नहीं आया।

अगले दिन राजा घर लौटा। उर्मिला और सविता बाहर गईं थीं, बाजार। राजा कमरे में कुछ ढूंढने लगा – शायद पुरानी किताब, लेकिन बिस्तर के नीचे नजर पड़ी। वहाँ पड़ा था वो कंडोम – भरा हुआ, गर्म रस से लबालब, भानु का। राजा का दिल धड़का। वो झुका, उसे उठाया – चिपचिपा, गंधदार। "फूफा का... लंड का पानी... वाह," मन में फुसफुसाया। चुपके से अपने कमरे में ले गया, छिपा लिया। रात हुई, राजा लेटा। पैंटी की तरह, अब ये नया खिलौना। वो कंडोम खोला, रस सूंघा – नमकीन, तीखा, मर्दाना। लंड खड़ा हो गया। वो मुठ मारने लगा, कंडोम मुँह के पास। "आह्ह... फूफा का रस... कितना टेस्टी... पहले माँ-नानी की गंध, लेकिन ये... ज्यादा नमकीन, गाढ़ा।" वो चाटा – जीभ से रस चाटा, फिर पी गया पूरा। "उम्म... अब ये ज्यादा अच्छा लगता है... माँ की चूत से बेहतर... फूफा का लंड... अगर मैं चूसूँ तो?"

विचारों का तूफान – 'फूफा को पटाऊँ... पहले उसे, फिर देखूँगा। माँ-नानी को पता नहीं चलने दूँगा... मेरा राज़। वो सोचती हैं मैं अनजान हूँ, लेकिन अब मैं अपना खेल शुरू करूँगा।' वो तेज़ी से मुठ मारा, रस निकाला, और थककर लेट गया। कंडोम साफ चाट लिया, छिपा दिया।

अब राजा की रातें बदल चलीं। वो चुपके से भानु की चीजें ढूंढता, सूंघता, चाटता। मन में योजना – फूफा को ललचाना, लेकिन बिना किसी को पता चले। उर्मिला और सविता अनजान, अपनी तिकड़ी में मग्न। लेकिन हवेली का राज़ अब और पेचीदा हो रहा था – राजा का गुप्त इरादा, वो नई प्यास जो मर्द के रस की थी। समय बताएगा, कब फूटेगा ये बम। लेकिन अभी, सब शांत।
 

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भाग - 6 हवेली की गुप्त आग: फूफा और राजा का पहला राज़

हवेली में सर्द हवाएँ चलने लगी थीं, और राजा का बुखार जैसे किसी आग की तरह फैल गया था। सुबह उठते ही शरीर जल रहा था, सिर भारी, आँखें लाल। सविता ने घबराकर उसका माथा छुआ, "बेटा, इतना तेज़ बुखार... माँ, क्या करें?" उर्मिला ने ठंडी पट्टी रखी, लेकिन दोनों को लगा कि घर में अकेले नहीं संभाल पाएँगी। "बेटी, शहर जाना पड़ेगा – अच्छी दवाई और डॉक्टर... राजा को अकेला छोड़ना नहीं चाहिए।" सविता ने सुझाव दिया, "भानु को बुलाओ... वो देखभाल कर लेगा। हम एक-दो दिन में लौट आएँगी।" उर्मिला ने तुरंत भानु को फोन किया, "दामाद जी, राजा बीमार है... तुम आ जाओ। हम बाहर जा रहे हैं, तुम संभाल लेना।" भानु ने हामी भरी, "सासू माँ, चिंता मत करो... मैं आ रहा हूँ।"

सविता और उर्मिला दोपहर तक घर से निकल गईं – शहर में दवाई, डॉक्टर, और कुछ जरूरी काम। वे दोनों पूरी तरह अनजान थीं कि हवेली में क्या होने वाला है। शाम ढलते-ढलते भानु पहुँचा, अपनी चौड़ी छाती और मुस्कान के साथ। राजा बिस्तर पर लेटा था, कमजोर लेकिन जागता। भानु ने उसके पास बैठकर माथा छुआ, "भांजे, क्या हाल बना लिया? फूफा आ गया... अब तू जल्दी ठीक हो जाएगा।" राजा ने मुस्कुराने की कोशिश की, "फूफा जी... अच्छा लगा आप आए।" भानु ने सूप बनाया, दवा खिलाई, और राजा को थोड़ा सुकून मिला।

रात गहरी हुई। हवेली में सन्नाटा छा गया। भानु राजा के कमरे में ही रुक गया। "चल भांजे, बोर मत हो... मूवी देखते हैं।" पहले तो कोई हल्की-फुल्की कॉमेडी लगाई, हँसी-मजाक चलता रहा। लेकिन बीच में एक सीन आया – फिल्म में औरत-मर्द का गहरा इंटीमेट मोमेंट, किस, छूना, सिसकारियाँ। दोनों की साँसें तेज़ हो गईं। राजा का लंड पैंट में हलचल करने लगा, भानु की आँखें चमक उठीं। "भांजे... तू भी गर्म हो गया? जवान लड़का है... चल, फूफा तुझे थोड़ी दारू पिलाता हूँ। बुखार उतारने में मदद करेगी।"

भानु ने बैग से छोटी बोतल निकाली, दो ग्लास में डाली। लेकिन चुपके से राजा के ग्लास में एक खास दवा मिला दी – वो जो गर्मी बढ़ाती है, लंड को सख्त बनाती है, प्यास जगाती है। राजा ने पहली बार पी, "फूफा जी... कड़वी है..." लेकिन पी ली। दारू का नशा चढ़ा, और दवा का असर भी – शरीर में आग लग गई। बुखार जैसे पीछे छूट गया, मन में पुरानी कल्पनाएँ जाग उठीं। राजा धीरे से बोला, "फूफा जी... मुझे वो कंडोम मिला था... भरा हुआ... आपका रस था न? कहाँ से आया वो?" भानु हँसा, नशे में खुल गया, "साले... तू जानता है? हाँ, मेरा था... तेरी माँ और नानी के साथ... लेकिन चुप रह।"

दारू और एक्साइटमेंट में दोनों करीब आ गए। भानु ने राजा की जांघ पर हाथ फेरा, "भांजे, तेरा लौड़ा तन रहा है... निकालूँ?" राजा कराहा, "फूफा... क्या कर रहे हो?" भानु ने पैंट खोली, राजा का जवान लंड बाहर – सख्त, टोपे पर चमक। "वाह रंडी... कितना मोटा है तेरा। फूफा खेलूँ?" वो सहलाने लगा, ऊपर-नीचे। राजा की कमर उछली, "आह्ह... फूफा... मजा आ रहा है..." भानु ने अपनी पैंट उतारी, मोटा लंड बाहर – नसों वाला, खड़ा। राजा ने उसे बड़े प्यार से देखा, आँखों में चमक। वो झुका, टोपे के अंदर लगी मलाई – गाढ़ी, चिपचिपी – को प्यार से जीभ से चाटा। "उम्म... फूफा... कितनी स्वादिष्ट..." भानु कराहा, "आह्ह... साले... ये तेरी माँ और तेरी नानी की मलाई है... उनकी चूत का रस जो बचा था। इसे अच्छे से चाट... जैसे वे चाटती हैं।" राजा ने और जोर से चाटा, निगला, "हाँ फूफा... कई बार इस मलाई की खुशबू पैंटी से सूँघ चुका हूँ... सच कह रहे हो, ये मेरी माँ और नानी की ही मलाई है... कितनी नमकीन, गर्म..."

भानु ने सिर पकड़ा, "चूस रंडी... पूरा अंदर... जैसे तेरी माँ चूसती है।" राजा चूसने लगा, गहरा। भानु ने राजा की गांड में उंगली डाली, "साले... तेरी गांड कितनी टाइट... उंगली से चोदूँ?" राजा चीखा, "आह्ह... दर्द... लेकिन अच्छा लग रहा..." भानु ने उंगली घुमाई, लंड मुँह में ठोका।

फिर राजा ने अपनी छिपी चीज निकाली – उर्मिला की गंदी पैंटी। "फूफा जी... ये नानी की... सूंघो।" भानु ने सूंघी, "आह्ह... तेरी नानी की चूत की गंध... रंडी की।" भानु ने पूरा राज़ खोल दिया, "भांजे, तेरी माँ सविता मेरी रंडी है... उसकी चूत फाड़ता हूँ, चूचियाँ दबाता हूँ। उर्मिला सासू माँ की गांड मारता हूँ, रस अंदर छोड़ता हूँ। अब कंडोम लगाता हूँ, प्रेग्नेंट न हो जाएँ। वे दोनों एक-दूसरे की चूत चाटती हैं, उंगली डालती हैं। तू अब हमारा हो जा... लेकिन माँ-नानी को कुछ मत बताना। ये हमारा गुप्त खेल है।"

राजा सुनता रहा, पैंटी सूंघता, लंड मुठ मारता। भानु झड़ा, गर्म रस राजा के मुँह में। "पी साले... फूफा का रस... टेस्टी है न?" राजा ने निगला, "हाँ फूफा... अब मैं भी..." वे थककर लेट गए।

सविता और उर्मिला दो दिन बाद लौटीं। "बेटा, अब कैसा है?" सविता ने पूछा। राजा मुस्कुराया, "माँ, फूफा जी ने बहुत अच्छी देखभाल की।" उर्मिला ने भानु को शुक्रिया कहा। दोनों को जरा भी शक नहीं हुआ। हवेली का राज़ अब और गहरा हो चुका था – फूफा और राजा का नया गुप्त रिश्ता, वो गंदी सिसकारियाँ, वो नई प्यास। सविता और उर्मिला अनजान रहीं, लेकिन हवेली की दीवारें अब और राज़ छिपा रही थीं। समय आगे बढ़ रहा था, और आग धीरे-धीरे फैल रही थी।
 
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भाग - 8 हवेली की गुप्त आग: फूफा और राजा की छिपी दोस्ती

दिन बीतते गए, और हवेली की जिंदगी फिर से अपनी लय में लौट आई। सविता सुबह की चाय बनाती, उर्मिला पूजा-पाठ में लगी रहतीं, और राजा अब पहले से ज्यादा मजबूत लगता। लेकिन बाहर से सब कुछ सामान्य दिखने के बावजूद, अंदर एक नई आग सुलग रही थी – भानु और राजा की वो गुप्त दोस्ती, जो अब रहस्यमय तरीके से पनप रही थी। भानु ने जाते वक्त राजा के कान में फुसफुसाया था, "भांजे, ये हमारा राज़ है... फोन पर बात करेंगे, लेकिन सावधानी से।" राजा ने हामी भरी, और उस रात से दोनों के बीच एक अजीब सा पुल बन गया।

सुबह-शाम, जब हवेली में सब व्यस्त होते, राजा अपने कमरे में अकेला फोन निकालता। भानु का मैसेज आता – कोई साधारण बात, जैसे "कैसा है स्वास्थ्य?" लेकिन असली बात कोड में छिपी होती। "सूप की रेसिपी याद है?" मतलब – वो रात की याद, वो दारू, वो छुअन। राजा जवाब देता, "हाँ फूफा, बहुत स्वादिष्ट थी... फिर बनाओगे?" और भानु हंसता, "जल्दी, लेकिन चुपके से।" वे वीडियो कॉल पर मिलते, लेकिन कैमरा ऑफ रखकर – सिर्फ आवाज़, सिसकारियाँ, और वो गंदी बातें। भानु बताता, "भांजे, आज तेरी माँ की चूत की खुशबू याद आ रही है... तू सूंघा है कभी?" राजा कराहता, "नहीं फूफा, लेकिन नानी की पैंटी से... वो गंध... आह्ह।" दोनों मुठ मारते, फोन पर एक-दूसरे को उकसाते, लेकिन कभी ज्यादा जोखिम नहीं लेते। हवेली की दीवारें जैसे सुन रही होतीं, लेकिन राज़ बाहर नहीं आता।

एक शाम, भानु ने राजा को मैसेज किया, "कल आ रहा हूँ... सासू माँ ने बुलाया है, कुछ काम है। लेकिन रात को मिलेंगे – हवेली के पीछे वाले बगीचे में, अंधेरे में।" राजा का दिल धड़क उठा। अगली शाम भानु आया, सविता और उर्मिला से मिला, हँसी-मजाक किया। "दामाद जी, शुक्रिया राजा की देखभाल के लिए," उर्मिला ने कहा। भानु मुस्कुराया, "अरे सासू माँ, भांजा है मेरा... कुछ भी करूंगा उसके लिए।" लेकिन उसकी आँखें राजा पर टिकीं, एक रहस्यमय चमक के साथ। रात को, जब सब सो गए, राजा चुपके से बगीचे में पहुँचा। अंधेरा घना था, पत्तियों की सरसराहट में भानु इंतज़ार कर रहा था। "आ गया साले... फूफा के पास।" उन्होंने एक-दूसरे को गले लगाया, लेकिन वो गले लगाना जल्दी ही गर्म हो गया। भानु ने राजा की कमीज में हाथ डाला, निप्पल्स को मसला, "भांजे, तेरा बदन कितना नरम... रंडी जैसा।" राजा ने भानु की पैंट पर हाथ फेरा, लंड को दबाया, "फूफा, ये तो हमेशा तैयार... मुझे चखाओ।"

वे झाड़ियों के पीछे छिपे, घुटनों पर बैठकर एक-दूसरे को चूसे। भानु ने राजा की गांड में उंगली डाली, धीरे-धीरे घुमाई, "साले, ये टाइट छेद... फूफा का लंड लेगा?" राजा चीखने को हुआ, लेकिन भानु ने मुँह दबा दिया, "चुप... हवेली सो रही है।" वो रस निकालते, एक-दूसरे के मुँह में, और फिर चुपके से अलग हो जाते। ये मिलन रहस्यमय था – कोई नहीं जानता, लेकिन हवेली की हवाएँ जैसे और गर्म हो गईं। भानु ने वादा किया, "भांजे, ये दोस्ती अब और गहरी होगी... लेकिन सावधानी से।"

### नया अपडेट: एक छिपा हुआ खतरा

कुछ दिनों बाद, भानु ने राजा को एक नया मैसेज भेजा – "भांजे, कुछ नया ट्राय करेंगे... लेकिन इसमें रिस्क है। तेरी माँ और नानी को शामिल करने का प्लान बनाओ, लेकिन अनजाने में। मैं एक दवा लाऊंगा जो नींद में गर्मी जगाएगी... वे सपने में हमें महसूस करेंगी, लेकिन याद नहीं रहेगा। तू तैयार है?" राजा की आँखें चमक उठीं, लेकिन डर भी लगा। "फूफा, अगर पकड़े गए?" भानु ने जवाब दिया, "नहीं पकड़ेंगे... ये हमारा नया खेल है। कल रात आ रहा हूँ – हवेली में आग और फैलेगी।" अब राज़ और खतरनाक हो रहा था, हवेली की दीवारें काँपने लगीं, और सविता-उर्मिला अनजान रहीं कि उनका अपना खून अब उन्हें जाल में फँसाने वाला था। क्या ये प्लान कामयाब होगा, या सब कुछ उजागर हो जाएगा? समय बताएगा, लेकिन आग अब बुझने वाली नहीं थी।
 
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