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भाग 1 – नई शुरुआत: उर्मिला से सविता तक, धीरे-धीरे फैलती आग
ये कहानी बिल्कुल शुरुआत से शुरू होती है – सिर्फ उर्मिला और उसकी बेटी सविता से। गांव की पुरानी हवेली की वो मिट्टी-गंध वाली दीवारें, जहां बाहर से सम्मान की चादर ओढ़ी हुई थी, लेकिन अंदर निषिद्ध प्यास की आग धधक रही थी। ये वो आग थी जो सालों की अकेली रातों से जन्मी थी – प्यार की कमी, समाज की बंदिशों का दर्द, और शरीर की वो अनकही चाहत जो दिल को भी चीर देती थी।
उर्मिला, मेरी नानी, अब 58 साल की थीं। बाहर से एक सम्मानित गांव की विधवा – सूखी मिट्टी की खुशबू वाली साड़ी में लिपटी, माथे पर हल्की सिंदूर की लकीर जो उनके विधवा जीवन की याद दिलाती, हाथों में पुरानी चूड़ियाँ जो हर हल्की हलचल पर चिर-चिर की मधुर आवाज़ करतीं, लेकिन वो आवाज़ अब उनके अकेलेपन का मजाक उड़ाती लगती। लेकिन अंदर से उनका शरीर अभी भी गर्म था – 38 इंच की भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के ब्लाउज में दबकर उभरी रहतीं, पतली कमर, मोटी गांड जो चलते वक्त हल्के से लहराती, और वो गीली गुफा जो रातों को उन्हें बेचैन कर देती। ये सब उनके दिल की उदासी को छुपाने की कोशिश था – पति की मौत के बाद सालों का अकेलापन, गांव की नजरों से डर, और वो अनकही प्यास जो उन्हें रात-रात भर रोने पर मजबूर कर देती। उर्मिला सोचतीं, "क्यों भगवान ने मुझे इतनी आग दी, जब बुझाने वाला कोई नहीं?" उनका दिल टूटा हुआ था, लेकिन शरीर की चाहत ने उन्हें जीवित रखा था।
एक रात, गांव में मूसलाधार बारिश हो रही थी। छत पर पानी की टप-टप, बिजली चली गई, कमरे में सिर्फ दूर कहीं जलती एक छोटी सी मिट्टी की दीया की पीली रोशनी। हवा में गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू और बारिश की ठंडक, जो उर्मिला के दिल की ठंडक को और बढ़ा देती। पुरानी लकड़ी की चारपाई पर लेटीं, साड़ी का पल्लू सरका हुआ, पेटीकोट ऊपर चढ़ा, जाँघों पर ठंडी हवा का स्पर्श। हाथ खुद-ब-खुद अपनी चूत की तरफ बढ़ा। उँगलियाँ गर्म, नरम, गीली त्वचा पर फिसलतीं, अंदर जाते ही वो चिपचिपी गर्माहट महसूस हुई। लेकिन आज वो सिसकारी नहीं सिर्फ शारीरिक थी – दिल में एक गहरा दर्द था, सालों की कुंठा, "आह्ह... कोई मादरचोद तो आए... इस हरामखोर चूत को फाड़ दे..." उनकी साँसें तेज़, सीने की ऊपर-नीचे होती चूचियाँ, पसीने से भीगी गर्दन पर बारिश की बूँदें टपकतीं। आंसू उनकी आँखों में आ गए – ये अकेलापन उन्हें खा रहा था, लेकिन वो जानती थीं कि ये प्यास ही उनकी ताकत थी।
तभी पुराने लकड़ी के दरवाज़े की चरमराहट हुई। सविता आई – मेरी माँ, 19 साल की, कॉलेज से भीगकर लौटी। बारिश ने उसकी साड़ी को पूरी तरह शरीर से चिपका दिया था – पतला कपड़ा पारदर्शी हो गया, गोरी चूचियाँ साफ उभरीं, गुलाबी निप्पल सख्त और ठंड से खड़े। साड़ी की सिलवटों से पानी टपक रहा था, फर्श पर छोटे-छोटे पानी के छींटे। उसकी साँसें तेज़, बाल गीले, चेहरे पर बारिश की बूँदें चमक रही थीं, और हल्की ठंड से उसके होंठ काँप रहे थे। लेकिन सविता के दिल में भी एक खालीपन था – कॉलेज की दोस्तों की कहानियां सुनकर उसकी जवान उम्र की चाहतें जागी थीं, लेकिन गांव की बंदिशें, माँ की सख्ती, और पिता की मौत का दर्द उसे चुप करा देता। वो सोचती, "क्या मेरा जीवन भी माँ जैसा होगा? अकेला, बिना प्यार के?"
सविता ने माँ को देखा – उँगलियाँ अभी भी अंदर, आँखें अर्ध-बंद, होंठ काटते हुए, चेहरा कामुक लालिमा से भरा, लेकिन आँखों में वो उदासी। कमरे में बारिश की आवाज़ के साथ उनकी दबी कराहें गूँज रही थीं। सविता का दिल धड़का – डर, जिज्ञासा, और एक अनजानी करुणा। "माँ... ये क्या कर रही हो?" उसकी आवाज़ काँपती हुई, लेकिन उसमें माँ के लिए प्यार था।
उर्मिला चौंकीं, लेकिन हाथ धीरे से निकाला नहीं। आंसू पोंछते हुए वो एक गंदी, गहरी मुस्कान के साथ बोलीं, "बेटी... आ जा ना। महसूस कर... माँ कितनी तड़प रही है। सालों से अकेली... तेरे पापा गए, कोई नहीं रहा। लेकिन तू है ना?" उनकी आवाज़ में वो गांव वाली मोटी, कामुक मिठास, लेकिन नीचे दर्द छिपा था। सविता को देखकर उर्मिला के दिल में एक नई उम्मीद जागी – शायद ये बेटी उनकी उदासी मिटा सके, वो प्यार दे सके जो कभी नहीं मिला।
सविता डरते-डरते पास आई, उसके पैरों से पानी टपक रहा था। उर्मिला ने उसका ठंडा, गीला हाथ पकड़ा, अपनी गर्म जाँघ पर रखा, फिर धीरे से ऊपर की तरफ ले गईं। "छू इसे... देख, कितनी गर्म, कितनी चिपचिपी है माँ की चूत।" सविता की उँगलियाँ स्पर्श करते ही वो गर्म, नमकीन गीलापन महसूस हुआ। उर्मिला कराहीं, लेकिन उनकी आँखों में आंसू थे – "तू भी तो करती है ना अकेले में? अपनी उँगलियाँ डालकर चूत रगड़ती है, अपनी चूचियाँ दबाती है? बेटी, ये दर्द मत सहना... माँ तेरे साथ है।"
सविता शरमा गई, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गईं। "माँ... ये... पाप है..." उसका दिल धड़क रहा था – समाज की नजरों का डर, लेकिन माँ के चेहरे पर वो उदासी देखकर उसका दिल पिघल रहा था। वो सोचती, "माँ ने कितना सहा है... शायद ये तरीका है उन्हें खुश करने का।"
उर्मिला हँसीं, लेकिन हँसी में दर्द था, "साली रंडी, ये तो औरत का हक है। आ, माँ तेरी मदद करे। तेरी भी चूत की आग बुझाऊँ। हम दोनों अकेली हैं, लेकिन साथ तो हैं ना?"
उर्मिला ने सविता की साड़ी का पल्लू धीरे से सरकाया। गीला कपड़ा फिसलकर गिरा, सविता की भरी हुई चूचियाँ बाहर – दूध जैसी गोरी, निप्पल ठंड से कड़े, बारिश की बूँदें उन पर चमक रही थीं। उर्मिला ने एक निप्पल मुँह में लिया, जीभ से चाटा – मीठा, नमकीन स्वाद, ठंड और गर्मी का मिश्रण। सविता की साँस रुक गई, "माँ... आह्ह... ये क्या..." उसकी पीठ पर सिहरन दौड़ी, लेकिन दिल में एक नई भावना – माँ के लिए प्यार, और खुद की चाहत का जागना।
"पाप नहीं, बेटी। ये खानदान का प्यार है।" उर्मिला ने सविता का हाथ अपनी चूत पर दबाया। "उँगलियाँ डाल... गहरा..." सविता की उँगलियाँ फिसलकर अंदर गईं, वो गर्म, चिपचिपी दीवारें महसूस हुईं। उर्मिला की कराहें बढ़ीं, "हाँ... ऐसे ही... घुमा... साली, तू तो कमाल की है।" लेकिन अंदर से उर्मिला रो रही थीं – खुशी और अपराधबोध का मिश्रण।
सविता का डर अब प्यास और करुणा में बदल रहा था। उर्मिला ने उसे लिटाया, दोनों की साड़ियाँ पूरी उतारीं। कमरे में गीली मिट्टी की खुशबू, बारिश की आवाज़, और उनकी तेज़ साँसें। दोनों नंगी – माँ की भरी, झुर्रियों वाली लेकिन गर्म देह, बेटी की जवान, मुलायम त्वचा। उर्मिला ऊपर चढ़ीं, अपनी चूत सविता की चूत पर रगड़ीं – गर्म, गीली, चिपचिपी स्पर्श, दोनों की कराहें मिलकर गूँजीं। लेकिन ये सिर्फ शारीरिक नहीं था – उर्मिला के दिल में बेटी के लिए एक गहरा लगाव जाग रहा था, सविता के मन में माँ की उदासी मिटाने की चाहत।
"आह्ह बेटी... तेरी चूत कितनी नरम, कितनी गर्म... रगड़ जोर से..."
सविता कमर उठाती हुई, "माँ... कितना अच्छा... मेरी चूचियाँ चूसो... आह्ह..." उसकी आँखों में आंसू – खुशी के, और थोड़े डर के।
उर्मिला नीचे गईं, सविता की चूत पर मुँह रखा। जीभ से क्लिटोरिस चाटा – मीठा, नमकीन रस, गर्माहट। सविता की कमर उछली, "आह्ह्ह... माँ... जीभ गहरा... फाड़ दो मेरी भोसड़ी..." लेकिन वो सोचती, "ये पाप है, लेकिन माँ खुश है... शायद यही रास्ता है।"
उँगलियाँ डालीं – दो, फिर तीन। सविता चीखी, शरीर काँपकर झटके लगे, "माँ... आ रहा है... चूत से पानी..." और गर्म रस बह निकला, उर्मिला ने सब चाट लिया। सविता का दिल भर आया – ये खुशी नई थी, लेकिन माँ के साथ।
फिर सविता ने माँ की चूत चाटी – पहली बार का वो स्वाद, गहरा, नशे जैसा। उर्मिला कराहीं, "हाँ बेटी... चूस... जीभ घुमा... साली रंडी..." लेकिन उनकी आँखें बंद, दिल में शांति – सालों बाद किसी ने उन्हें छुआ था।
उस रात घंटों चली – चाटना, रगड़ना, उँगलियाँ, सिसकारियाँ, पसीने की गंध, बारिश की ठंडक। कोई लंड नहीं, सिर्फ माँ-बेटी की गंदी, निषिद्ध केमिस्ट्री, लेकिन नीचे भावनाओं का तूफान – प्यार, अपराधबोध, उदासी, और नई उम्मीद।
सुबह दोनों ने कपड़े पहने। उर्मिला ने सविता के कान में फुसफुसाया, "ये राज़ हमारे बीच। रातें अब हमारी। मैं तुझे प्यार दूँगी, जो मुझे कभी नहीं मिला।" उनकी आवाज़ में भावुकता थी।
सविता मुस्कुराई, आँखों में नई चमक और थोड़ी उदासी। "हाँ माँ... मैं तैयार हूँ।" लेकिन उसके मन में सवाल थे – ये सही है? लेकिन माँ की खुशी देखकर वो चुप रही।
हवेली की रातें बदल चुकी थीं। बाहर सब नॉर्मल, लेकिन अंदर भावनाओं की आग जल रही थी।
ये कहानी बिल्कुल शुरुआत से शुरू होती है – सिर्फ उर्मिला और उसकी बेटी सविता से। गांव की पुरानी हवेली की वो मिट्टी-गंध वाली दीवारें, जहां बाहर से सम्मान की चादर ओढ़ी हुई थी, लेकिन अंदर निषिद्ध प्यास की आग धधक रही थी। ये वो आग थी जो सालों की अकेली रातों से जन्मी थी – प्यार की कमी, समाज की बंदिशों का दर्द, और शरीर की वो अनकही चाहत जो दिल को भी चीर देती थी।
उर्मिला, मेरी नानी, अब 58 साल की थीं। बाहर से एक सम्मानित गांव की विधवा – सूखी मिट्टी की खुशबू वाली साड़ी में लिपटी, माथे पर हल्की सिंदूर की लकीर जो उनके विधवा जीवन की याद दिलाती, हाथों में पुरानी चूड़ियाँ जो हर हल्की हलचल पर चिर-चिर की मधुर आवाज़ करतीं, लेकिन वो आवाज़ अब उनके अकेलेपन का मजाक उड़ाती लगती। लेकिन अंदर से उनका शरीर अभी भी गर्म था – 38 इंच की भरी हुई चूचियाँ जो साड़ी के ब्लाउज में दबकर उभरी रहतीं, पतली कमर, मोटी गांड जो चलते वक्त हल्के से लहराती, और वो गीली गुफा जो रातों को उन्हें बेचैन कर देती। ये सब उनके दिल की उदासी को छुपाने की कोशिश था – पति की मौत के बाद सालों का अकेलापन, गांव की नजरों से डर, और वो अनकही प्यास जो उन्हें रात-रात भर रोने पर मजबूर कर देती। उर्मिला सोचतीं, "क्यों भगवान ने मुझे इतनी आग दी, जब बुझाने वाला कोई नहीं?" उनका दिल टूटा हुआ था, लेकिन शरीर की चाहत ने उन्हें जीवित रखा था।
एक रात, गांव में मूसलाधार बारिश हो रही थी। छत पर पानी की टप-टप, बिजली चली गई, कमरे में सिर्फ दूर कहीं जलती एक छोटी सी मिट्टी की दीया की पीली रोशनी। हवा में गीली मिट्टी की सोंधी खुशबू और बारिश की ठंडक, जो उर्मिला के दिल की ठंडक को और बढ़ा देती। पुरानी लकड़ी की चारपाई पर लेटीं, साड़ी का पल्लू सरका हुआ, पेटीकोट ऊपर चढ़ा, जाँघों पर ठंडी हवा का स्पर्श। हाथ खुद-ब-खुद अपनी चूत की तरफ बढ़ा। उँगलियाँ गर्म, नरम, गीली त्वचा पर फिसलतीं, अंदर जाते ही वो चिपचिपी गर्माहट महसूस हुई। लेकिन आज वो सिसकारी नहीं सिर्फ शारीरिक थी – दिल में एक गहरा दर्द था, सालों की कुंठा, "आह्ह... कोई मादरचोद तो आए... इस हरामखोर चूत को फाड़ दे..." उनकी साँसें तेज़, सीने की ऊपर-नीचे होती चूचियाँ, पसीने से भीगी गर्दन पर बारिश की बूँदें टपकतीं। आंसू उनकी आँखों में आ गए – ये अकेलापन उन्हें खा रहा था, लेकिन वो जानती थीं कि ये प्यास ही उनकी ताकत थी।
तभी पुराने लकड़ी के दरवाज़े की चरमराहट हुई। सविता आई – मेरी माँ, 19 साल की, कॉलेज से भीगकर लौटी। बारिश ने उसकी साड़ी को पूरी तरह शरीर से चिपका दिया था – पतला कपड़ा पारदर्शी हो गया, गोरी चूचियाँ साफ उभरीं, गुलाबी निप्पल सख्त और ठंड से खड़े। साड़ी की सिलवटों से पानी टपक रहा था, फर्श पर छोटे-छोटे पानी के छींटे। उसकी साँसें तेज़, बाल गीले, चेहरे पर बारिश की बूँदें चमक रही थीं, और हल्की ठंड से उसके होंठ काँप रहे थे। लेकिन सविता के दिल में भी एक खालीपन था – कॉलेज की दोस्तों की कहानियां सुनकर उसकी जवान उम्र की चाहतें जागी थीं, लेकिन गांव की बंदिशें, माँ की सख्ती, और पिता की मौत का दर्द उसे चुप करा देता। वो सोचती, "क्या मेरा जीवन भी माँ जैसा होगा? अकेला, बिना प्यार के?"
सविता ने माँ को देखा – उँगलियाँ अभी भी अंदर, आँखें अर्ध-बंद, होंठ काटते हुए, चेहरा कामुक लालिमा से भरा, लेकिन आँखों में वो उदासी। कमरे में बारिश की आवाज़ के साथ उनकी दबी कराहें गूँज रही थीं। सविता का दिल धड़का – डर, जिज्ञासा, और एक अनजानी करुणा। "माँ... ये क्या कर रही हो?" उसकी आवाज़ काँपती हुई, लेकिन उसमें माँ के लिए प्यार था।
उर्मिला चौंकीं, लेकिन हाथ धीरे से निकाला नहीं। आंसू पोंछते हुए वो एक गंदी, गहरी मुस्कान के साथ बोलीं, "बेटी... आ जा ना। महसूस कर... माँ कितनी तड़प रही है। सालों से अकेली... तेरे पापा गए, कोई नहीं रहा। लेकिन तू है ना?" उनकी आवाज़ में वो गांव वाली मोटी, कामुक मिठास, लेकिन नीचे दर्द छिपा था। सविता को देखकर उर्मिला के दिल में एक नई उम्मीद जागी – शायद ये बेटी उनकी उदासी मिटा सके, वो प्यार दे सके जो कभी नहीं मिला।
सविता डरते-डरते पास आई, उसके पैरों से पानी टपक रहा था। उर्मिला ने उसका ठंडा, गीला हाथ पकड़ा, अपनी गर्म जाँघ पर रखा, फिर धीरे से ऊपर की तरफ ले गईं। "छू इसे... देख, कितनी गर्म, कितनी चिपचिपी है माँ की चूत।" सविता की उँगलियाँ स्पर्श करते ही वो गर्म, नमकीन गीलापन महसूस हुआ। उर्मिला कराहीं, लेकिन उनकी आँखों में आंसू थे – "तू भी तो करती है ना अकेले में? अपनी उँगलियाँ डालकर चूत रगड़ती है, अपनी चूचियाँ दबाती है? बेटी, ये दर्द मत सहना... माँ तेरे साथ है।"
सविता शरमा गई, लेकिन उसकी साँसें तेज़ हो गईं। "माँ... ये... पाप है..." उसका दिल धड़क रहा था – समाज की नजरों का डर, लेकिन माँ के चेहरे पर वो उदासी देखकर उसका दिल पिघल रहा था। वो सोचती, "माँ ने कितना सहा है... शायद ये तरीका है उन्हें खुश करने का।"
उर्मिला हँसीं, लेकिन हँसी में दर्द था, "साली रंडी, ये तो औरत का हक है। आ, माँ तेरी मदद करे। तेरी भी चूत की आग बुझाऊँ। हम दोनों अकेली हैं, लेकिन साथ तो हैं ना?"
उर्मिला ने सविता की साड़ी का पल्लू धीरे से सरकाया। गीला कपड़ा फिसलकर गिरा, सविता की भरी हुई चूचियाँ बाहर – दूध जैसी गोरी, निप्पल ठंड से कड़े, बारिश की बूँदें उन पर चमक रही थीं। उर्मिला ने एक निप्पल मुँह में लिया, जीभ से चाटा – मीठा, नमकीन स्वाद, ठंड और गर्मी का मिश्रण। सविता की साँस रुक गई, "माँ... आह्ह... ये क्या..." उसकी पीठ पर सिहरन दौड़ी, लेकिन दिल में एक नई भावना – माँ के लिए प्यार, और खुद की चाहत का जागना।
"पाप नहीं, बेटी। ये खानदान का प्यार है।" उर्मिला ने सविता का हाथ अपनी चूत पर दबाया। "उँगलियाँ डाल... गहरा..." सविता की उँगलियाँ फिसलकर अंदर गईं, वो गर्म, चिपचिपी दीवारें महसूस हुईं। उर्मिला की कराहें बढ़ीं, "हाँ... ऐसे ही... घुमा... साली, तू तो कमाल की है।" लेकिन अंदर से उर्मिला रो रही थीं – खुशी और अपराधबोध का मिश्रण।
सविता का डर अब प्यास और करुणा में बदल रहा था। उर्मिला ने उसे लिटाया, दोनों की साड़ियाँ पूरी उतारीं। कमरे में गीली मिट्टी की खुशबू, बारिश की आवाज़, और उनकी तेज़ साँसें। दोनों नंगी – माँ की भरी, झुर्रियों वाली लेकिन गर्म देह, बेटी की जवान, मुलायम त्वचा। उर्मिला ऊपर चढ़ीं, अपनी चूत सविता की चूत पर रगड़ीं – गर्म, गीली, चिपचिपी स्पर्श, दोनों की कराहें मिलकर गूँजीं। लेकिन ये सिर्फ शारीरिक नहीं था – उर्मिला के दिल में बेटी के लिए एक गहरा लगाव जाग रहा था, सविता के मन में माँ की उदासी मिटाने की चाहत।
"आह्ह बेटी... तेरी चूत कितनी नरम, कितनी गर्म... रगड़ जोर से..."
सविता कमर उठाती हुई, "माँ... कितना अच्छा... मेरी चूचियाँ चूसो... आह्ह..." उसकी आँखों में आंसू – खुशी के, और थोड़े डर के।
उर्मिला नीचे गईं, सविता की चूत पर मुँह रखा। जीभ से क्लिटोरिस चाटा – मीठा, नमकीन रस, गर्माहट। सविता की कमर उछली, "आह्ह्ह... माँ... जीभ गहरा... फाड़ दो मेरी भोसड़ी..." लेकिन वो सोचती, "ये पाप है, लेकिन माँ खुश है... शायद यही रास्ता है।"
उँगलियाँ डालीं – दो, फिर तीन। सविता चीखी, शरीर काँपकर झटके लगे, "माँ... आ रहा है... चूत से पानी..." और गर्म रस बह निकला, उर्मिला ने सब चाट लिया। सविता का दिल भर आया – ये खुशी नई थी, लेकिन माँ के साथ।
फिर सविता ने माँ की चूत चाटी – पहली बार का वो स्वाद, गहरा, नशे जैसा। उर्मिला कराहीं, "हाँ बेटी... चूस... जीभ घुमा... साली रंडी..." लेकिन उनकी आँखें बंद, दिल में शांति – सालों बाद किसी ने उन्हें छुआ था।
उस रात घंटों चली – चाटना, रगड़ना, उँगलियाँ, सिसकारियाँ, पसीने की गंध, बारिश की ठंडक। कोई लंड नहीं, सिर्फ माँ-बेटी की गंदी, निषिद्ध केमिस्ट्री, लेकिन नीचे भावनाओं का तूफान – प्यार, अपराधबोध, उदासी, और नई उम्मीद।
सुबह दोनों ने कपड़े पहने। उर्मिला ने सविता के कान में फुसफुसाया, "ये राज़ हमारे बीच। रातें अब हमारी। मैं तुझे प्यार दूँगी, जो मुझे कभी नहीं मिला।" उनकी आवाज़ में भावुकता थी।
सविता मुस्कुराई, आँखों में नई चमक और थोड़ी उदासी। "हाँ माँ... मैं तैयार हूँ।" लेकिन उसके मन में सवाल थे – ये सही है? लेकिन माँ की खुशी देखकर वो चुप रही।
हवेली की रातें बदल चुकी थीं। बाहर सब नॉर्मल, लेकिन अंदर भावनाओं की आग जल रही थी।
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