मैं वो अधूरी प्यास नहीं, जो दर-दर भटकती फिरे,
मैं वो मुकम्मल समंदर हूँ, जिसमें लहरें ख़ुद गिरें।
हवाओं ने बहुत चाहा कि रुख मेरा बदल देंगी,
मगर मैं वो चिराग़ हूँ, जो आंधियों में भी खिलें।
मैं वो मुकम्मल समंदर हूँ, जिसमें लहरें ख़ुद गिरें।
हवाओं ने बहुत चाहा कि रुख मेरा बदल देंगी,
मगर मैं वो चिराग़ हूँ, जो आंधियों में भी खिलें।

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@Agasthya meri hi I'd hai
आपस में अब नहीं मिलते
ना जाने कौन कहा
दिल लगा के बैठ गया है।

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