निषिद्ध अग्नि: अध्याय २३ – भोर की रोशनी में निषिद्ध स्पर्श
भोर की मद्धम रोशनी छत के कमरे की खिड़की से दाखिल होती है, दीये की क्षीण रोशनी के साथ घुल जाती है। बाहर बाँस की झाड़ियों में हवा की सनसनाहट, दूर मुर्गे की बाँग है। रमा नींद से आँखें खोलती है, उसके तन पर एक गर्म भारीपन है। वह देखती है, वह...