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Incest माँ और बेटे ने घर बसाया(सच्ची घटनाओं पर आधारित)

Esac

Maa ka diwana
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Update 44 Posted
Next update soon...


if anyone have any ideas, they want me explore you are allowed to tell them


Note :- "Writer is busy that's why he was not able to update

Updates will be coming as soon as he gets time.
No one other than the writer is allowed to post updates on this thread. If you want to write, or feel you can write better than this writer, start your own thread and post updates there, not here. Everyone is free to write their own stories, but this thread is solely the domain of its writer. "

"लेखक अभी व्यस्त हैं, इसलिए वे अपडेट नहीं दे पाए हैं।
जैसे ही उन्हें समय मिलेगा, अपडेट आ जाएँगे।
इस थ्रेड पर लेखक के अलावा किसी और को अपडेट पोस्ट करने की अनुमति नहीं है। अगर आप लिखना चाहते हैं, या आपको लगता है कि आप इस लेखक से बेहतर लिख सकते हैं, तो अपना अलग थ्रेड शुरू करें और वहाँ अपडेट पोस्ट करें, यहाँ नहीं। हर कोई अपनी कहानियाँ लिखने के लिए स्वतंत्र है, लेकिन यह थ्रेड पूरी तरह से इसके लेखक का ही क्षेत्र है।"
 
Last edited:

Esac

Maa ka diwana
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Behad romantic update...isse kamukta se bhar dena bhai..plz continue
Thanks bhai, puri koshish rahegi ki aane wale update aur bhi jyada kamuk ho.
 
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Esac

Maa ka diwana
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Shukriya bhai...maa ki mamta aur bete ki kamukta ka milan, apne asli rishte ko yad rakhkar aur pukarte huye, behad romanchak hoga...plz update soon.
Aane wale updateds me sabhi ki ichhao ka dhyan rakha jaega, Maa apni Mamta ke sath bete ke sath Milan bhi karegi aur Biwi ban kar bhi kamukta ko hawa degi.
 
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Esac

Maa ka diwana
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sandy4hotgirls

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Lovely update...bhai , ek guzarish hai, plz plz suhagraat maa-bete ke bich manaayi jaye, na ki pati patni ke bich... maa bete ko beta aur beta maa ko maa kehkar pukare jab bhi aapas mein dher saari kamuk baatein aur harkatein karein aur suhagraat ke sarvochch kshan mein bhi..
 

Napster

Well-Known Member
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Update 41




आज माँ के कदमों की आहट और उनके हाथों की छाया से यह पूरा घर चमक उठा था। ऐसा लग रहा था मानो यह निर्जीव मकान भी, मेरी ही तरह, अपनी मालकिन की छुअन से जी उठा हो। माँ बड़ी फुर्ती से पैकेटों से सामान निकालकर रख रही थी। तभी काम के बीच उन्होने एक बार मेरी तरफ देखा और बोली—

"ज़रा देखिये तो... यह फ्रिज ऑन क्यों नहीं हो रहा?"

मैं वहीं खड़ा उन्हे और इस नए आशियाने को निहार रहा था। उनकी आवाज़ सुनकर मैं फौरन होश में आया और फ्रिज की तरफ बढ़ते हुए पूछा, "क्यों? क्या हो गया?"

मैंने झुककर फ्रिज का दरवाज़ा खोला तो देखा कि अंदर अंधेरा है। माँ पीछे से ही बोली, "पता नहीं क्या बात है... स्टेबलाइजर में तो करंट दिख रहा है।"

मैंने गौर से देखा और मेरी हंसी छूट गई। माँ ने गर्दन घुमाकर, होंठों पर एक नन्हीं सी मुस्कुराहट सजाए मुझसे पूछा, "अरे! अब हँस क्यों रहे हैं?"

मैंने फ्रिज का प्लग हाथ में लेकर उन्हे दिखाते हुए कहा, "जाने वाले दिन सुबह मैकेनिक इसे रिप्लेस करके गया था। उनके बाद से यह चला ही नहीं, और प्लग तब से यूँ ही बाहर पड़ा था।"

जैसे ही मैंने प्लग लगाया, फ्रिज के अंदर की लाइट जल उठी। मैंने मुस्कुराकर माँ की तरफ देखा। वह वहाँ से बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ा चुकी थी। चलते-चलते बोली, "ठीक है, इसे चलने दीजिये। मैं आकर सामान भरती हूँ।"

मुझे बखूबी पता था कि वह नहाने जा रही है, फिर भी एक अजीब सी बेवकूफी—या शायद उन्हे थोड़ा और रोकने की चाहत में—मेरे मुँह से निकल गया, "कहाँ जा रही हो?"

माँ मेरे पास तक आई। मुझे क्रॉस करते हुए वह रुकी, मुड़कर मुझे देखा और मुस्कुरा दी।


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उन्होने अपने कंधे से तौलिया हटाया और उसे बड़े सलीके से अपने हाथ पर रख लिया। फिर अपनी आँखों में एक शरारती चमक और होंठों पर उस हया भरी मुस्कान को दबाते हुए मद्धम आवाज़ में बोली—

"नहाने..."

और फिर वही जादुई नज़र मुझ पर डालते हुए वह किचन से बाहर निकल गई। मेरे उस बेतुके सवाल में उन्हे शायद मेरी वही बेताबी महसूस हुई थी, जिसका जवाब वह अपनी नज़रों से दे गई। उनकी उस एक नज़र ने जैसे बिना कहे कह दिया था— "अब मैं कहाँ जाऊंगी? अब तो मैं पूरी तरह तुम्हारी ही हो चुकी हूँ, और हमेशा तुम्हारे पास ही रहूँगी।"


उनका वो इशारा मेरे दिल की धड़कनें तेज़ कर गया। मैंने देखा, माँ बेडरूम की तरफ चली गई। हमारे इस घर में बेडरूम वाला बाथरूम काफी बड़ा और लग्ज़री है, जबकि हॉल वाला थोड़ा छोटा और बेसिक सा है।

मैं बाहर आया, रैक से फूलों वाला वो पैकेट उठाया और सीधा बेडरूम की तरफ बढ़ा। कमरे में घुसते ही मेरी नज़रें चारों तरफ घूमीं—माँ ने कितनी जल्दी सब कुछ सेट कर दिया था। कपड़े अलमारी में सलीके से सजे थे और हर चीज़ अपनी सही जगह पर थी। लेकिन जैसे ही मेरी नज़र बेड पर पड़ी, मेरे सीने के अंदर एक हलचल सी मच गई। माँ ने हमारे नए डबल बेड पर एक ब्रांड न्यू बेडशीट बिछा दी थी, और सिरहाने की तरफ दोनों तकियों पर भी नए कवर्स चढ़े हुए थे।


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ये बिस्तर... आज से ये सिर्फ मेरा और माँ का था।

बेड के एक कोने पर माँ ने मेरे लिए पजामा और टी-शर्ट निकाल कर रखी थी, और पास ही उनकी अपनी साड़ी भी पड़ी थी। वो अपने साथ सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट लेकर बाथरूम के अंदर गई थी। अंदर से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी और बीच-बीच में उनकी चूड़ियों की वो हल्की सी 'छन-छन' भी सुनाई दे रही थी।

तभी अचानक मेरे फोन की रिंगटोन बजी। ऑफिस के सीनियर कलीग का फोन था। मैंने रिसीव किया और बात करने के लिए कमरे से बाहर जाने लगा। जाने से पहले मैंने फूलों वाला पैकेट कंप्यूटर टेबल के नीचे सावधानी से छिपा दिया।

कलीग का फोन दरअसल कल की जॉइनिंग कन्फर्म करने के लिए था ताकि कल का 'Plan of action' तैयार किया जा सके। मैंने उन्हें कह दिया कि मैं आज आ चुका हूँ और कल सुबह ऑफिस पहुँच जाऊँगा। कुछ देर काम की और इधर-उधर की बातें हुईं और फिर 'बाय' बोलकर मैंने फोन रख दिया।

जब मैं वापस बेडरूम में आया, माँ अब भी बाथरूम में ही थी। मैंने अपना मोबाइल और पर्स निकालकर मेज़ पर रखा। तभी पीछे से बाथरूम का दरवाज़ा अनलॉक होने की आवाज़ आई। मैं पलटा, तो देखा माँ ने दरवाज़ा हल्का सा खोला था और वो मेरी तरफ ही देख रही थी। हमारी नज़रें मिलते ही हम दोनों के चेहरे पर एक मुस्कुराहट तैर गई।


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उन्होने अपने मेहंदी लगे हुए दाएं हाथ से दरवाज़ा थाम रखा था। दरवाज़ा बस थोड़ा सा खुला था, जिसकी वजह से उनका पूरा चेहरा तो नहीं दिख रहा था, लेकिन उनकी भीगी हुई ज़ुल्फें उनके गालों पर लटक रही थीं। उस छोटी सी 'Gap' से उनके कंधे का कुछ हिस्सा नज़र आ रहा था—उस गोरी और मखमली स्किन पर पानी की दो-चार बूंदें किसी मोती की तरह चमक रही थीं।

उन्होने टॉवल को अपने आर्म्स के नीचे से लपेटकर बूब्स के पास कसकर पकड़ा हुआ था। वो ब्लाउज और पेटीकोट साथ तो लेकर गई थी, पर शायद अभी पहना नहीं था। उनके उस भीगे और आधे-अधूरे रूप ने मेरे भीतर एक अजीब सी तड़प और 'Excitement' पैदा कर दी।

मैं वहीं खड़ा मुस्कुराते हुए उन्हे निहारे जा रहा था। माँ की आँखों में जो प्यार और हया का मेल दिख रहा था, वो किसी को भी दीवाना कर दे। उन्होने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा—

"जाइए यहाँ से... मुझे बाहर आना है।"

अब धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के साथ सहज (Comfortable) हो रहे थे। मेरे दिमाग में एक शरारत सूझी। मैंने होठों पर एक हल्की सी बदमाशी वाली मुस्कान ली और वहीं टेबल से टेक लगाकर खड़ा हो गया। माँ मेरा इरादा समझ गई। उन्होने अपनी आवाज़ में एक मीठा सा अनुरोध भरते हुए, बिल्कुल एक प्यारी बीवी की तरह फिर से कहा—

"जाइए ना आप!"

सच कहूँ तो उन्हे इस तरह सताने में मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था। मुझे पता था कि जब तक मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो बाहर नहीं आएगी, और उन्हे बाहर आना भी था। आखिर वो मेरी बीवी है, उन्हे टॉवल में देखने में क्या हर्ज है? ये ख्याल दिमाग में आते ही मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल मच गई। उन्हे उस भीगे रूप में, टॉवल लपेटे हुए देखकर मेरी कल्पनाएं और भी गहरी होने लगी थीं।

हम पति-पत्नी तो बन चुके थे, पर अभी भी हमारे बीच एक बारीक सा पर्दा था। हम दोनों ही कोशिश कर रहे थे कि वो दूरी खत्म हो जाए और हम रूह से एक हो जाएँ। मुझे पता था कि ये शुरुआती झिझक बस कुछ ही वक्त की मेहमान है।

जब उन्होने देखा कि मैं टस से मस नहीं हो रहा, तो माँ ने अपनी अदाओं में और भी नरमी भरते हुए कहा, "आप यहाँ ऐसे खड़े रहेंगे तो मैं बाहर नहीं आ पाऊँगी।"

मैंने भी चुटकी लेते हुए धीरे से कहा, "क्यों? तुमने टॉवल तो पहना ही है, आ जाओ बाहर।"

मेरी बात सुनते ही उनका चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हो गया। उन्होने अपनी नज़रें झुका लीं और दरवाज़े पर रखे अपने मेहंदी वाले हाथ की उंगलियों को धीरे-धीरे रगड़ने लगी। उन्होने लगभग फुसफुसाते हुए कहा—

"नहीं... मुझे बहुत शर्म आ रही है।"

उनकी ये बात सीधे मेरे दिल को छू गई। मैं समझ गया कि माँ मेरी बीवी तो बन गई है, पर मेरे सामने पूरी तरह खुलकर आने में उन्हे अभी थोड़ा वक्त चाहिए। अचानक माँ से बीवी बन जाना उनके लिए एक बड़ा बदलाव था पर इसके लिए उनकी कोशिश साफ दिखती है वो वाकई मे मेरी पत्नी बन कर रहना चाहती है। मुझे अहसास हुआ कि इस सफर में मुझे उनका साथ देना चाहिए, उनकी इस मासूम झिझक का सम्मान करना चाहिए।

मैं मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर जाने लगा, तभी पीछे से माँ की धीमी आवाज़ आई—

"बाहर जाकर पर्दा लगा दीजिएगा।"


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मैंने पलटकर उन्हे देखा और एक प्यारी सी स्माइल दी। हमारी नज़रें मिलीं और उन चंद पलों में उन्होने जैसे अपनी ख़ामोशी से सब कुछ कह दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे वो कह रही हो— "सॉरी जानू, मैं तुम्हारे साथ अपनी लाइफ का हर लम्हा जीना चाहती हूँ, तुम्हारे प्यार में डूब जाना चाहती हूँ, लेकिन इस नए रिश्ते में खुद को तुम्हारी पत्नी के रूप में ढालने में थोड़ा वक्त लग रहा है... please forgive me."

उनकी उन अनकही बातों ने मेरे दिल को छू लिया और उनके लिए मेरी मोहब्बत और भी बढ़ गई। मैं बाहर आया और दरवाज़े का पर्दा अच्छी तरह खींचकर बंद कर दिया। बाहर खड़े-खड़े ही मुझे समझ आ रहा था कि माँ बाथरूम से बाहर आ गई है। उनकी पायल की वो 'छन-छन' और चूड़ियों की 'रुनझुन' से मैं उनकी हर हरकत को महसूस कर पा रहा था।

अगर मैं चाहता तो उस पर्दे को हटाकर कमरे के अंदर दाखिल हो सकता था, लेकिन मैं उनका भरोसा नहीं तोड़ना चाहता था। वो चाहती तो खुद आकर दरवाज़ा लॉक कर सकती थी, पर उन्होने सिर्फ पर्दा लगाने को कहकर मुझ पर जो 'Trust' दिखाया था, वही मेरे लिए सबसे बड़ी जीत थी। उस पर्दे के पीछे वो खुद को सुरक्षित और महफूज़ महसूस कर रही थी, और मैं उस भरोसे की दीवार को कभी गिरने नहीं दे सकता था।

हर रिश्ते की बुनियाद विश्वास और यकीन के पिलर्स पर टिकी होती है, और हमारा रिश्ता तो अब उस मुकाम पर था जहाँ बिना कहे भी सब समझ आ रहा था।
बहुत ही सुंदर लाजवाब और अद्भुत मनमोहक अपडेट हैं भाई मजा आ गया
अगले रोमांचकारी धमाकेदार और चुदाईदार अपडेट की प्रतिक्षा रहेगी जल्दी से दिजिएगा
 
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kas1709

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आज माँ के कदमों की आहट और उनके हाथों की छाया से यह पूरा घर चमक उठा था। ऐसा लग रहा था मानो यह निर्जीव मकान भी, मेरी ही तरह, अपनी मालकिन की छुअन से जी उठा हो। माँ बड़ी फुर्ती से पैकेटों से सामान निकालकर रख रही थी। तभी काम के बीच उन्होने एक बार मेरी तरफ देखा और बोली—

"ज़रा देखिये तो... यह फ्रिज ऑन क्यों नहीं हो रहा?"

मैं वहीं खड़ा उन्हे और इस नए आशियाने को निहार रहा था। उनकी आवाज़ सुनकर मैं फौरन होश में आया और फ्रिज की तरफ बढ़ते हुए पूछा, "क्यों? क्या हो गया?"

मैंने झुककर फ्रिज का दरवाज़ा खोला तो देखा कि अंदर अंधेरा है। माँ पीछे से ही बोली, "पता नहीं क्या बात है... स्टेबलाइजर में तो करंट दिख रहा है।"

मैंने गौर से देखा और मेरी हंसी छूट गई। माँ ने गर्दन घुमाकर, होंठों पर एक नन्हीं सी मुस्कुराहट सजाए मुझसे पूछा, "अरे! अब हँस क्यों रहे हैं?"

मैंने फ्रिज का प्लग हाथ में लेकर उन्हे दिखाते हुए कहा, "जाने वाले दिन सुबह मैकेनिक इसे रिप्लेस करके गया था। उनके बाद से यह चला ही नहीं, और प्लग तब से यूँ ही बाहर पड़ा था।"

जैसे ही मैंने प्लग लगाया, फ्रिज के अंदर की लाइट जल उठी। मैंने मुस्कुराकर माँ की तरफ देखा। वह वहाँ से बाहर निकलने के लिए कदम बढ़ा चुकी थी। चलते-चलते बोली, "ठीक है, इसे चलने दीजिये। मैं आकर सामान भरती हूँ।"

मुझे बखूबी पता था कि वह नहाने जा रही है, फिर भी एक अजीब सी बेवकूफी—या शायद उन्हे थोड़ा और रोकने की चाहत में—मेरे मुँह से निकल गया, "कहाँ जा रही हो?"

माँ मेरे पास तक आई। मुझे क्रॉस करते हुए वह रुकी, मुड़कर मुझे देखा और मुस्कुरा दी।


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उन्होने अपने कंधे से तौलिया हटाया और उसे बड़े सलीके से अपने हाथ पर रख लिया। फिर अपनी आँखों में एक शरारती चमक और होंठों पर उस हया भरी मुस्कान को दबाते हुए मद्धम आवाज़ में बोली—

"नहाने..."

और फिर वही जादुई नज़र मुझ पर डालते हुए वह किचन से बाहर निकल गई। मेरे उस बेतुके सवाल में उन्हे शायद मेरी वही बेताबी महसूस हुई थी, जिसका जवाब वह अपनी नज़रों से दे गई। उनकी उस एक नज़र ने जैसे बिना कहे कह दिया था— "अब मैं कहाँ जाऊंगी? अब तो मैं पूरी तरह तुम्हारी ही हो चुकी हूँ, और हमेशा तुम्हारे पास ही रहूँगी।"


उनका वो इशारा मेरे दिल की धड़कनें तेज़ कर गया। मैंने देखा, माँ बेडरूम की तरफ चली गई। हमारे इस घर में बेडरूम वाला बाथरूम काफी बड़ा और लग्ज़री है, जबकि हॉल वाला थोड़ा छोटा और बेसिक सा है।

मैं बाहर आया, रैक से फूलों वाला वो पैकेट उठाया और सीधा बेडरूम की तरफ बढ़ा। कमरे में घुसते ही मेरी नज़रें चारों तरफ घूमीं—माँ ने कितनी जल्दी सब कुछ सेट कर दिया था। कपड़े अलमारी में सलीके से सजे थे और हर चीज़ अपनी सही जगह पर थी। लेकिन जैसे ही मेरी नज़र बेड पर पड़ी, मेरे सीने के अंदर एक हलचल सी मच गई। माँ ने हमारे नए डबल बेड पर एक ब्रांड न्यू बेडशीट बिछा दी थी, और सिरहाने की तरफ दोनों तकियों पर भी नए कवर्स चढ़े हुए थे।


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ये बिस्तर... आज से ये सिर्फ मेरा और माँ का था।

बेड के एक कोने पर माँ ने मेरे लिए पजामा और टी-शर्ट निकाल कर रखी थी, और पास ही उनकी अपनी साड़ी भी पड़ी थी। वो अपने साथ सिर्फ़ ब्लाउज और पेटीकोट लेकर बाथरूम के अंदर गई थी। अंदर से पानी गिरने की आवाज़ आ रही थी और बीच-बीच में उनकी चूड़ियों की वो हल्की सी 'छन-छन' भी सुनाई दे रही थी।

तभी अचानक मेरे फोन की रिंगटोन बजी। ऑफिस के सीनियर कलीग का फोन था। मैंने रिसीव किया और बात करने के लिए कमरे से बाहर जाने लगा। जाने से पहले मैंने फूलों वाला पैकेट कंप्यूटर टेबल के नीचे सावधानी से छिपा दिया।

कलीग का फोन दरअसल कल की जॉइनिंग कन्फर्म करने के लिए था ताकि कल का 'Plan of action' तैयार किया जा सके। मैंने उन्हें कह दिया कि मैं आज आ चुका हूँ और कल सुबह ऑफिस पहुँच जाऊँगा। कुछ देर काम की और इधर-उधर की बातें हुईं और फिर 'बाय' बोलकर मैंने फोन रख दिया।

जब मैं वापस बेडरूम में आया, माँ अब भी बाथरूम में ही थी। मैंने अपना मोबाइल और पर्स निकालकर मेज़ पर रखा। तभी पीछे से बाथरूम का दरवाज़ा अनलॉक होने की आवाज़ आई। मैं पलटा, तो देखा माँ ने दरवाज़ा हल्का सा खोला था और वो मेरी तरफ ही देख रही थी। हमारी नज़रें मिलते ही हम दोनों के चेहरे पर एक मुस्कुराहट तैर गई।


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उन्होने अपने मेहंदी लगे हुए दाएं हाथ से दरवाज़ा थाम रखा था। दरवाज़ा बस थोड़ा सा खुला था, जिसकी वजह से उनका पूरा चेहरा तो नहीं दिख रहा था, लेकिन उनकी भीगी हुई ज़ुल्फें उनके गालों पर लटक रही थीं। उस छोटी सी 'Gap' से उनके कंधे का कुछ हिस्सा नज़र आ रहा था—उस गोरी और मखमली स्किन पर पानी की दो-चार बूंदें किसी मोती की तरह चमक रही थीं।

उन्होने टॉवल को अपने आर्म्स के नीचे से लपेटकर बूब्स के पास कसकर पकड़ा हुआ था। वो ब्लाउज और पेटीकोट साथ तो लेकर गई थी, पर शायद अभी पहना नहीं था। उनके उस भीगे और आधे-अधूरे रूप ने मेरे भीतर एक अजीब सी तड़प और 'Excitement' पैदा कर दी।

मैं वहीं खड़ा मुस्कुराते हुए उन्हे निहारे जा रहा था। माँ की आँखों में जो प्यार और हया का मेल दिख रहा था, वो किसी को भी दीवाना कर दे। उन्होने धीरे से मुस्कुराते हुए कहा—

"जाइए यहाँ से... मुझे बाहर आना है।"

अब धीरे-धीरे हम एक-दूसरे के साथ सहज (Comfortable) हो रहे थे। मेरे दिमाग में एक शरारत सूझी। मैंने होठों पर एक हल्की सी बदमाशी वाली मुस्कान ली और वहीं टेबल से टेक लगाकर खड़ा हो गया। माँ मेरा इरादा समझ गई। उन्होने अपनी आवाज़ में एक मीठा सा अनुरोध भरते हुए, बिल्कुल एक प्यारी बीवी की तरह फिर से कहा—

"जाइए ना आप!"

सच कहूँ तो उन्हे इस तरह सताने में मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था। मुझे पता था कि जब तक मैं यहाँ खड़ा हूँ, वो बाहर नहीं आएगी, और उन्हे बाहर आना भी था। आखिर वो मेरी बीवी है, उन्हे टॉवल में देखने में क्या हर्ज है? ये ख्याल दिमाग में आते ही मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल मच गई। उन्हे उस भीगे रूप में, टॉवल लपेटे हुए देखकर मेरी कल्पनाएं और भी गहरी होने लगी थीं।

हम पति-पत्नी तो बन चुके थे, पर अभी भी हमारे बीच एक बारीक सा पर्दा था। हम दोनों ही कोशिश कर रहे थे कि वो दूरी खत्म हो जाए और हम रूह से एक हो जाएँ। मुझे पता था कि ये शुरुआती झिझक बस कुछ ही वक्त की मेहमान है।

जब उन्होने देखा कि मैं टस से मस नहीं हो रहा, तो माँ ने अपनी अदाओं में और भी नरमी भरते हुए कहा, "आप यहाँ ऐसे खड़े रहेंगे तो मैं बाहर नहीं आ पाऊँगी।"

मैंने भी चुटकी लेते हुए धीरे से कहा, "क्यों? तुमने टॉवल तो पहना ही है, आ जाओ बाहर।"

मेरी बात सुनते ही उनका चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हो गया। उन्होने अपनी नज़रें झुका लीं और दरवाज़े पर रखे अपने मेहंदी वाले हाथ की उंगलियों को धीरे-धीरे रगड़ने लगी। उन्होने लगभग फुसफुसाते हुए कहा—

"नहीं... मुझे बहुत शर्म आ रही है।"

उनकी ये बात सीधे मेरे दिल को छू गई। मैं समझ गया कि माँ मेरी बीवी तो बन गई है, पर मेरे सामने पूरी तरह खुलकर आने में उन्हे अभी थोड़ा वक्त चाहिए। अचानक माँ से बीवी बन जाना उनके लिए एक बड़ा बदलाव था पर इसके लिए उनकी कोशिश साफ दिखती है वो वाकई मे मेरी पत्नी बन कर रहना चाहती है। मुझे अहसास हुआ कि इस सफर में मुझे उनका साथ देना चाहिए, उनकी इस मासूम झिझक का सम्मान करना चाहिए।

मैं मुस्कुराते हुए कमरे से बाहर जाने लगा, तभी पीछे से माँ की धीमी आवाज़ आई—

"बाहर जाकर पर्दा लगा दीजिएगा।"


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मैंने पलटकर उन्हे देखा और एक प्यारी सी स्माइल दी। हमारी नज़रें मिलीं और उन चंद पलों में उन्होने जैसे अपनी ख़ामोशी से सब कुछ कह दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे वो कह रही हो— "सॉरी जानू, मैं तुम्हारे साथ अपनी लाइफ का हर लम्हा जीना चाहती हूँ, तुम्हारे प्यार में डूब जाना चाहती हूँ, लेकिन इस नए रिश्ते में खुद को तुम्हारी पत्नी के रूप में ढालने में थोड़ा वक्त लग रहा है... please forgive me."

उनकी उन अनकही बातों ने मेरे दिल को छू लिया और उनके लिए मेरी मोहब्बत और भी बढ़ गई। मैं बाहर आया और दरवाज़े का पर्दा अच्छी तरह खींचकर बंद कर दिया। बाहर खड़े-खड़े ही मुझे समझ आ रहा था कि माँ बाथरूम से बाहर आ गई है। उनकी पायल की वो 'छन-छन' और चूड़ियों की 'रुनझुन' से मैं उनकी हर हरकत को महसूस कर पा रहा था।

अगर मैं चाहता तो उस पर्दे को हटाकर कमरे के अंदर दाखिल हो सकता था, लेकिन मैं उनका भरोसा नहीं तोड़ना चाहता था। वो चाहती तो खुद आकर दरवाज़ा लॉक कर सकती थी, पर उन्होने सिर्फ पर्दा लगाने को कहकर मुझ पर जो 'Trust' दिखाया था, वही मेरे लिए सबसे बड़ी जीत थी। उस पर्दे के पीछे वो खुद को सुरक्षित और महफूज़ महसूस कर रही थी, और मैं उस भरोसे की दीवार को कभी गिरने नहीं दे सकता था।

हर रिश्ते की बुनियाद विश्वास और यकीन के पिलर्स पर टिकी होती है, और हमारा रिश्ता तो अब उस मुकाम पर था जहाँ बिना कहे भी सब समझ आ रहा था।
Nice update....
 
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