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Fantasy 'सुप्रीम' एक रहस्यमई सफर

DesiPriyaRai

Royal
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# 13.

“ये था तुम्हारे सवाल का जवाब।“ सुयश ने लारा के सामने लॉकेट को लहराते हुए कहा-
“इस लॉकेट में रेडियम लगा हुआ है, जिसकी वजह से कातिल ने अंधेरे में भी इतना सटीक निशाना लगा लिया। और इससे एक बात यह भी साफ हो गई, कि कातिल का निशाना कोई और नहीं लॉरेन ही थी।“

“लेकिन इससे एक बात और समझ में आयी सर।“ ब्रैंडेन ने लॉकेट को देखते हुए कहा-

“कि कातिल लॉरेन से अच्छी तरह परिचित था और हो ना हो यह लॉकेट भी उसी ने लॉरेन को गिफ्ट किया होगा। क्यों कि लॉरेन किसी अंजान से लिया गया लॉकेट अपने गले में भला क्यों डालेगी “

“अब इसके बारे में तो हमें जेनिथ ही बता सकती है।“ सुयश ने कहा-
“क्यों कि वह लॉरेन की रुम पार्टनर थी।“

सुयश यह कहकर पुनः ध्यान से उस लॉकेट को देखने लगा कि शायद उसे, उसमें कोई और क्लू मिल जाए । लेकिन रेडियम पॉलिश के अलावा उस लॉकेट में और कुछ भी खास नहीं था। काफी देर तक देखने के बाद, सुयश ने उसे अपनी जेब में डाल लिया।

“लारा, अब तुम जरा 3-4 आदमी बुलवालो। जो इस लाश को कोल्ड स्टोर रूम में रख सकें। अगले स्टापेज पर सोचेंगे कि इसका क्या करना है?“ सुयश ने कहा।

लारा ने तुरंत फोन करके चार आदमी बुलवा लिए। वह सभी लॉरेन की लाश को, एक बड़ी सी पॉलीथिन में पैक करने लगे। लॉरेन की लाश को पैक हो जाने के बाद, सुयश ने लारा को लाश ले जाने का इशारा किया। हॉल से निकलते हुए लारा ने ब्रैंडन को भी साथ आने का इशारा किया। सबके जाने के बाद सुयश ने भी पहले एक नजर स्टेज की ओर दौड़ाई और फिर सिर को झटक कर थके कदमों से अपने केबिन की ओर चल दिया।

1 जनवरी 2002, मंगलवार, 02:00;
सुयश इस समय अपने केबिन में था। रात के लगभग 2:00 बज रहे थे। लेकिन सुप्रीम पर मर्डर हो जाने के कारण, किसी की भी आंख में नींद का नामो निशान नहीं था। सुयश के सामने, वह सभी सिक्योरिटी के आदमी लाइन से खड़े थे, जिन्हें लारा ने, निशानेबाजी के सभी 28 प्रतियोगियों के रूम चेक करने के लिए भेजा था।

“क्या अब सभी लोग यहां पर आ चुके हैं?“ सुयश ने लारा से पूछा- “या फिर अभी कोई आना बाकी है?“

“यस सर!“ लारा ने तसल्ली से सभी को देखते हुए जवाब दिया- “अब कोई भी आना बाकी नहीं है।“

“हां ! तो अब आप लोग बताइए।“ सुयश ने इस बार सभी को देखते हुए पूछा- “क्या किसी को तलाशी में कोई गड़बड़ चीज दिखाई दी ? ये ध्यान रहे कि छोटी से छोटी चीज भी, अगर तुम्हें विचित्र लगी हो, तो उसके भी बारे में बता देना।“

“नहीं !“ सभी का समवेत स्वर गूंजा- “हमें तलाशी में कोई भी ऐसी चीज नहीं दिखी, जिससे हमें किसी पर शक हो।“

“1 मिनट कैप्टन!“ सिक्योरिटी के एक आदमी ने लाइन से बाहर निकलते हुए सुयश से कहा-

“मुझे जैक का रुम चेक करने के लिए भेजा गया था। मैं उसका रूम चेक कर रहा था लेकिन अभी मैं आधा रूम ही चेक कर पाया था कि तभी मुझे बगल वाले रूम से कुछ अजीब सी आवाजें सुनाई दीं । मुझे मालूम था कि इस समय सारे यात्री हॉल में है। इसलिए मैं उन अजीब सी आवाजों को सुनकर आश्चर्य में पड़ गया। मैंने कान लगा कर, दूसरे रूम से आती हुई आवाजों को सुनने की कोशिश की। पर मैं यह नहीं समझ पाया की ये आवाजें कैसी हैं?“

“कैसी आवाजें थीं वह?“ सुयश ने लगभग आतुर स्वर में पूछा।

“ठीक से तो नहीं कह सकता सर, पर वो आवाजें ऐसी लग रही थीं, जैसे कोई किसी चीज को खुरच रहा हो।“ सिक्योरिटी मैन ने दिमाग पर जोर डालते हुए कहा।

“तुरंत मेरे साथ चलो।“ सुयश ने बाहर निकलते हुए कहा। अब उसकी आंखों में ठीक वैसी ही चमक थी, जैसी एक इनामी अपराधी को पकड़ते समय इंस्पेक्टर के चेहरे पर होती है। लारा , ब्रैंडन सहित सभी लोग तेजी से सुयश के पीछे-पीछे बाहर निकल गए।

1 जनवरी 2002, मंगलवार, 02:30;

“मॉम-डैड, अब मेरा अगला सवाल सुनिये।“ शैफाली ने चहकते हुए कहा।

“अरे बेटा ! अब सो जाओ, रात के 2:30 बज रहे हैं।“ माइकल ने प्यार से शैफाली को समझाते हुए कहा।

“बस डैड! ये अंतिम प्रश्न है। उसके बाद और नहीं पूछूंगी।“ और फिर शैफाली ने बिना उनकी हां इंतजार किए, अपने सवाल का गोला दाग दिया –


“एक मेज पर, एक प्लेट में, तीन अंडे रखे हैं, जबकि खाने वाले चार हैं। बताइए वह इसे कैसे खायेंगे? जबकि शर्त यह है, कि अंडों को काटना नहीं है। और सभी को एक-एक खाना है।“

“यह कैसे संभव है?“ मारथा ने अपना सिर खुजाते हुए, माइकल की ओर देखते हुए कहा-
“अंडे तीन हैं और खाने वाले चार हैं। फिर वह पूरा-पूरा कैसे खा पाएंगे।“ माइकल ने भी ना समझ में आने वाले अंदाज में सिर हिला दिया।

“यह संभव है। अगर आप लोग अपनी हार मानें और मेरे लिए चॉकलेट का पैकेट व ब्रूनो के लिए बिस्किट लाने का वादा करें। तो मैं इसका उत्तर आपको बता सकती हूं।“ शैफाली ने दोनों को अपने गले से लगाते हुए, शरारत भरे स्वर में कहा। माइकल ने पहले मारथा को देखा और फिर हारे हुए स्वर में कहा-


“अच्छा मेरी माँ ! चॉकलेट लाना तो मंजूर। पर ब्रूनो का फेवरेट बिस्किट तो जितना स्टॉक में है। अभी उसी से काम चलाना पड़ेगा। क्यों कि वह इस शिप पर नहीं मिलता .......अब तो उत्तर बता दो।“

“मैं यह कहां कह रही हूं, कि अंडे 3 हैं, अंडे तो चार हैं।“ शैफाली ने अपनी नीली-नीली आंखें, गोल-गोल नचाते हुए कहा-


“एक मेज पर है और बाकी के तीन प्लेट में। तो फिर आप ही बताइए चारों लोग एक-एक अंडा खा सकते हैं या नहीं।“ माइकल ने शैफाली के प्रश्न को एक बार फिर अपने दिमाग में दोहराया और शैफाली का आशय समझ उसके चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई। मारथा भी अब मुस्कुराने लगी थी।

“अच्छा ! अब तो सो जाओ। अब तो तुम्हारे सारे प्रश्न कम्प्लीट हो गए।“ माइकल ने प्यार से शैफाली के गालों पर थपकी देते हुए कहा।

लेकिन इससे पहले कि माइकल, शैफाली को और कुछ कह पाता। बाहर लगी डोर बेल, मधुर संगीत बिखेरती हुई बज उठी।

“यह इतनी रात गए, दरवाजे पर कौन हो सकता है?“ माइकल के चेहरे पर असमंजस के भाव आ गये। माइकल ने तुरंत शैफाली को, ब्रूनो को अंदर ले जाने के लिए कहा।

“कौन?“ माइकल ने दरवाजे के पास पहुंचकर तेज आवाज में पूछा।

“सिक्योरिटी मैन!......हमें आपसे कुछ काम है? दरवाजा खोलिए।“

बाहर से आवाज आई। माइकल ने धीरे से एक नजर पीछे मारने के बाद, आगे बढ़कर दरवाजा खोल दिया। बाहर सुयश, ब्रैंडन व लारा सहित, कई सिक्योरिटी के आदमी खड़े नजर आये। दरवाजा खोलते ही सभी तेजी से अंदर आ गए।

“क्या बात है कैप्टन? आप इतनी रात गए। हमारे केबिन में क्या करने आए हैं?“ माइकल के चेहरे पर, अभी तक सोच के भाव थे। सुयश भी माइकल को देख हैरान हो गया।

“यह आपका कमरा है मिस्टर माइकल? सुयश ने आश्चर्य से कहा। उधर ब्रैंडन, सुयश को इस तरह बात करते देख, यह जान गया था, कि सुयश, माइकल से पहले से ही परिचित है।

“क्या बात है कैप्टन कोई परेशानी है? माइकल ने अपने शब्दों को दोबारा से दोहराया-“इतनी रात गए, आप हमारे रूम का दरवाजा क्यों नॉक कर रहे हैं?“

“सॉरी, मिस्टर माइकल, एक्चुली हमारे सिक्योरिटी के कुछ आदमि यों को, आपके रूम से, कुछ अजीब सी आवाज आती हुई सुनाई दी थीं। जिसकी वजह से उन्हें कुछ कनफ्यूजन हो गया था। इसलिए हम सभी आपके कमरे तक आए थे।“ सुयश ने अपनी बात क्लीयर करते हुए कहा।

“कैसी आवाजें?“ माइकल ने पूछा।

“ऐसा लग रहा था जैसे को ई कुछ खुरच रहा हो।“ अपनी बात कहते-कहते अचानक सुयश को कुछ याद आया-
"ब्रूनो कहां है मिस्टर माइकल?“ तभी शैफाली दूसरे रूम से, ब्रूनो को लिए हुए, उस कमरे में दाखिल हुई-
“यह रहा ब्रूनो, कैप्टेन अंकल। यह दूसरे कमरे में मेरे साथ था।“

“अब मैं समझ गया।“ सुयश ने मुस्कुराते हुए कहा- “शायद मेरे सिक्योरिटी वाले लोगों को ब्रूनो की ही आवाज सुनाई दी होगी।“

“हो सकता है।“ माइकल ने जवाब दिया - “क्यों कि हममें से जब कोई भी ब्रूनो के साथ नहीं रहता है, तो वह अकेला कभी-कभी दरवाजे पर खरोंच मारता है। हो सकता है, वही आवाज सिक्योरिटी के लोगों ने सुनी हो और आपको जा कर बता दी हो।“ बैंडन, आश्चर्य से ब्रूनो को देख रहा था।

“सॉरी मिस्टर माइकल ! इतनी रात में आपको डिस्टर्ब करने के लिए सॉरी।“ सुयश ने माइकल से माफी मांगते हुए कहा-

“मैं चलता हूं। आप ब्रूनो को कमरे में ही रखिएगा। नहीं तो बाकी के यात्री इसे देखकर डर जाएंगे।“

“ब्रूनो ! कैप्टन अंकल को थैंक यू बोलो।“ शैफाली ने ब्रूनो को इशारा करते हुए कहा- “इन्होंने तुम्हारे लिए इस शिप पर विशेष व्यवस्था की है।“

“भौं-भौं !“ इतना सुनते ही ब्रूनो ने, कि सी सर्कस के जानवर की तरह, दो पैरों पर खड़े हो कर, सुयश को अपनी भाषा में थैंक्यू कहा। उसकी यह हरकत देख, एक बार तो सुयश सहित सभी के चेहरों पर मुस्कान आ गई। सुयश ने एक बार फिर सब पर नजर डाली, और पलटकर दरवाजे की ओर बढ़ने लगा।

“1 मिनट रुकिये कैप्टेन अंकल।“ शैफाली की आवाज ने एकाएक ही सुयश के कदमों पर ब्रेक लगा दिया। वह रुककर पुनः शैफा ली की तरफ देखने लगा ।

“कैप्टेन अंकल! मैं आपको हॉल में हुए मर्डर के बारे में कुछ बताना चाहती हूं।“ शैफाली ने कहा।

“मर्डर के बारे में.......!“ सुयश के चेहरे पर आश्चर्य के भाव उभर आए- “मर्डर के बारे में तुम क्या बताना चाहती हो। तुम तो अंधी हो, फिर तुम मर्डर के बारे में क्या बता सकती हो।“

“अंकल! मैं बचपन से अंधी जरूर हूं। पर मेरी सुनने की शक्ति बहुत तेज है। हॉल में जिस समय मर्डर हुआ, उस समय लाइट ऑफ थी। इसलिए कोई कुछ नहीं देख पाया कि मर्डर किसने किया ? पर मैंने अपने कानों से जो कुछ सुना। मैं आपको वह बताना चाहती हूं।“
अब सुयश, शैफाली की बात सुनकर वापस कमरे में आ गया और उत्सुकता से शैफाली की ओर देखने लगा।

“सबसे पहले मैं आपको यह बता दूं कि हॉल में गोली एक नहीं, बल्कि दो चली थीं।“ शैफाली ने बिल्कुल गंभीर स्वर में कहा।

“व्हाट!“ सुयश आश्चर्य से भर उठा। सुयश सहित सभी के लिए यह शब्द किसी धमाके से कम नहीं थे।

“यह तुम क्या कह रही हो ? गोली तो एक ही चली थी, जो कि लॉरेन के लगी।“ सुयश के शब्दों में आश्चर्य के भाव थे।

“आप लोग नहीं जानते। गोली एक नहीं दो चलीं थीं, और दोनों ही अलग-अलग व्यक्तियों द्वारा चलाई गई थीं। लेकिन दोनों गोलियां एक ही समय चलने के कारण, और हॉल में अधिक शोर-शराबा होने के कारण, आप लोग यह बात जान नहीं पाए।“ शैफाली बड़े ही निश्चिंत भाव से रुक-रुक कर बोल रही थी-

“अगर आपको मेरी बात का विश्वास ना हो तो हॉल में आप लोग ध्यान से देखिए। कहीं ना कहीं दूसरी गोली लकड़ी में धंसी हुई आपको जरूर मिल जाएगी।“

शैफाली की बात सुनकर, अब सुयश के चेहरे पर उलझन के भाव थे। क्यों कि वह अभी एक ही गोली का रहस्य सुलझा नहीं पाया था। अब दूसरी गोली की बात सुनकर वह और भी परेशान हो गया।

“हम लोगों से गलती हो गई लारा।“ सुयश ने लारा की ओर देखते हुए कहा- “यदि शैफाली सही कह रही है, तो हमें उस समय तलाशी के दौरान सबके रिवाल्वर भी चेक करने चाहिए थे। लेकिन हम समझे कि गोली एक ही चली है और एक रिवाल्वर हमें मिल भी गई। इसलिए तलाशी में हमने रिवाल्वर की ओर तो ध्यान ही नहीं दिया। अब तो हमें विश्वास हो रहा है, कि जो रिवाल्वर हमें मिली, उससे लॉरेन का मर्डर नहीं हुआ है। अपराधी हद से ज्यादा चालाक निकला। उसने योजना बना कर यह मर्डर किया और हम लोग मिली हुई रिवाल्वर में ही उलझे रहे। लेकिन इससे एक बात तो कंफर्म हो गई कि अपराधी एक नहीं कई हैं। और वह सभी अलग-अलग रह रहे हैं।“ इतना कहकर सुयश पुनः शैफाली की तरफ घूमा -

“तुम कुछ और बताना चाहती हो ?“

“जी हाँ अंकल!“ शैफाली ने अंदाजे से सुयश की ओर मुंह करते हुए कहा-

“पहली गोली मैं जहां खड़ी थी, उसके 6 मीटर पीछे से किसी ने चलाई थी और दूसरी गोली, मेरे बांए तरफ से 8.5 मीटर की दूरी से किसी ने चलाई थी। अब यह सोचना आपका काम है। कि मेरे 6 मीटर पीछे और 8.5 मीटर बाएं कौन खड़ा था ?” शैफाली की बात सुनकर, माइकल व मारथा को छोड़कर, वहां खड़े सभी लोग हक्का-बक्का रह गए। लारा तो शैफाली को ऐसे देख रहा था, मानो विश्व का आठवां आश्चर्य उसके सामने खड़ा हो।

“लेकिन यह कैसे पता चलेगा कि तुम कहां खड़ी थी ? क्यों कि बिना तुम्हारी स्थिति जाने हुए, हम अगल-बगल खड़े लोगों का अंदाजा कैसे लगाएंगे?“ सुयश ने दिमाग लगाते हुए कहा।

“कैप्टेन अंकल, आप जब स्टेज पर खड़े होकर अनाउंसमेंट कर रहे थे, तो आपकी आवाज एक ही जगह से आ रही थी। इसका साफ मतलब निकलता है कि स्टेज पर जो माइक लगा है, वह एक ही जगह पर फिक्स है। मैं आपकी आवाज उस समय ध्यान से सुन रही थी। अतः आप अगर वापस स्टेज पर जाकर बोलना शुरू करेंगे, तो मैं जिस जगह खड़ी थी, उस जगह पर वापस जा कर खड़ी हो सकती हूं। जिससे आप मेरी जगह के बारे में जान सकते हैं। लेकिन इसका कोई फायदा नहीं होगा। क्यों कि अपराधी ने फायर के तुरंत बाद, अपनी वास्तविक स्थिति से जगह चेंज कर दी होगी ।“ सुयश भी शैफाली के तर्कों को सुन, उसके दिमाग का लोहा मान गया।

“बेटे, अगर ये सारी बातें, तुमने उसी समय बता दी होतीं, तो शायद कातिल अब तक हमारे शिकंजे में होता।“ ब्रैंडन ने आगे बढ़ते हुए कहा।

“आप क्या मुझे इतना बेवकूफ समझते हैं?“ शैफाली के शब्दों में इस बार थोड़ी तल्खी उभर आई-

“जो मैं इतनी भीड़ में, सबके सामने कातिल का नाम बताती। और वैसे भी असली कातिल के पास उस समय तक रिवाल्वर थी। क्या पता उसका अगला निशाना मैं ही बन जाती ? और उसका निशाना तो आप लोग देख ही चुके हैं।“ ब्रैंडन ने भी हालात को समझ कर सिर हिलाया।

“वैसे आप उस समय कहां थे?“ शैफाली का इशारा, इस बार सीधे ब्रैंडन की ओर था।

“मैं......मैं......तो उस समय सिक्योरिटी के आदमियों के साथ था।“ एकाएक पूछे गए प्रश्न से ब्रैंडन एकदम हड़बड़ा सा गया उसकी हालत का अंदाजा लगाकर, शैफाली के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गई।

“उसको छोड़ो।“ सुयश किसी मचलते बच्चे की तरह बोला – “तुम मुझे यह बताओ, कि क्या तुम मुझे कातिल के बारे में भी कुछ बता सकती हो ?“





जारी रहेगा.....….✍️
बड़े समय बाद कहानी को वापिस शुरू किया हे पढ़ना, ये अपडेट बहुत ही बढ़िया ओर रहस्य से भरा बनाया गया हे।

लॉकेट वाला खुलासा सस्पेंस को आगे बढ़ाता है। रेडियम वाला क्लू साधारण होते हुए भी प्रभावी है, क्योंकि वह यह साबित करता है कि निशाना पहले से तय था।

शैफाली का किरदार इस एपिसोड की जान है। उसका अंधा होना उसे कमजोर नहीं बल्कि असाधारण बनाता है। जिस आत्मविश्वास से वह दो गोलियों की बात कहती है, वह पूरे घटनाक्रम को उलट देता है। खासकर जब वह दूरी तक नापकर बताती है, यह ट्विस्ट बहुत प्रभावी है क्योंकि यह पहले से सुलझती हुई गुत्थी को फिर से उलझा देता है।

देखते है आगे क्या होता हे🤔
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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बड़े समय बाद कहानी को वापिस शुरू किया हे पढ़ना, ये अपडेट बहुत ही बढ़िया ओर रहस्य से भरा बनाया गया हे।

लॉकेट वाला खुलासा सस्पेंस को आगे बढ़ाता है। रेडियम वाला क्लू साधारण होते हुए भी प्रभावी है, क्योंकि वह यह साबित करता है कि निशाना पहले से तय था।

शैफाली का किरदार इस एपिसोड की जान है। उसका अंधा होना उसे कमजोर नहीं बल्कि असाधारण बनाता है। जिस आत्मविश्वास से वह दो गोलियों की बात कहती है, वह पूरे घटनाक्रम को उलट देता है। खासकर जब वह दूरी तक नापकर बताती है, यह ट्विस्ट बहुत प्रभावी है क्योंकि यह पहले से सुलझती हुई गुत्थी को फिर से उलझा देता है।

देखते है आगे क्या होता हे🤔
Are waah tum laut aayi? 🫠 welcome back . waise aapne sahi kaha , Shefali ka character is poori story ki jaan hai, iske dimaak ki barabari koi nahi kar sakta :nana:
Baki is kahani me ek se ek dimaak ko hila dene wali cheeje aapko padhne ko milegi, and mera daawa hai ki aapne aisi kahani aaj se pahle na padhi hogi.:declare: Aapka keemti samay bekar nahi jayega. Thank you very much for your wonderful review and support :hug:
 

sunoanuj

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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️
Bahut hee badhiya adhbhut update
 

sunoanuj

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#181.

नटखट हनुका:
(20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"


“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।


जारी रहेगा………✍️
बहुत ही शानदार अपडेट
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Ajju Landwalia

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#180.

“राक्षसलोक?" इंद्र यह सुनकर डर गये- “इन नामों में तो राक्षसलोक भी है। तो क्या राक्षसों के पास अद्भुत शक्तियां रखी जायेंगी? अगर उन राक्षसों ने उन शक्तियों को हमारे विरुद्ध ही प्रयोग करना शुरु कर दिया तो?"

“आप व्यर्थ ही चिंता कर रहें हैं देवराज।” महानदेव ने कहा- “आपने अभी कुछ दिन पहले ही महा दानव वृत्रा का वद्ध किया था, आपको तो पता ही है कि कोई भी राक्षस अभी आपसे बहुत दिनों तक युद्ध करने नहीं आयेगा। वैसे भी अब आपके पास वृत्रा की मायावी तलवार और ढाल तो है ही। फिर आप अकारण ही चितिंत हो रहे हैं?"

देव की बात सुन इंद्र शांत हो कर बैठ गये। अब वह महानदेव को कैसे बताते? कि वृत्रा की तलवार और ढाल तो कब की, उनके पास से गायब हो गई है। वह तो स्वयं उसे ढूंढने में लगे हैं।

“मुझे, बस एक चीज की और चिंता है देव। इंद्र ने पुनः बोलते हुए कहा- “माया तो स्वयं दैत्यराज मयासुर की पुत्री हैं, ऐसे में उनके सुपुर्द सभी देवशक्तियों को करना क्या उचित निर्णय होगा?" यह कहकर इंद्र ने अपना दाँव खेलने की कोशिश की।

यह सुनकर महानदेव मुस्कुराते हुए बोले- “क्या आपको पता भी है इंद्रदेव? कि माया वास्तव में कौन है?... कोई बात नहीं? यह तो एक ऐसा रहस्य है, जिसका रहस्योद्घाटन अभी करने का उचित समय नहीं है। समय आने पर आप स्वयं इस रहस्य को जान जायेंगे। लेकिन तब तक आपकी दुविधा के लिये, मैं आपको वचन देता हूं कि माया से इस प्रकार की कोई गलती नहीं होगी।"

देव के शब्द सुन इंद्र के चेहरे पर गहरी सोच के भाव उभर आये। अब इंद्र के दिमाग में शक का कीड़ा घुस चुका था और वह यह सभा समाप्त होते ही, माया के बारे में पता लगाने के लिये पूर्ण तत्पर हो चुके थे।

“किसी को और कुछ पूछना है? या फिर अब हम शक्तियों की बात करें।” ब्रह्म… ने सभी देवताओं की ओर देखते हुए पूछा।

पर इस बार किसी और ने कुछ ना पूछा। अब भला त्3देवों की योजना पर प्रश्नचिंह कोई कैसे उठा सकता था ?

"तो फिर ठीक है, अब हम देखते हैं कि प्रत्येक देवता अपनी कौन सी देवशक्ति माया और नीलाभ को देना चाहते हैं?" ब्र..देव ने कहा- “सबसे पहले मैं सूर्यदेव से आग्रह करूंगा कि वह अपनी कोई देवशक्ति माया और नीलाभ को प्रदान करें।'

ब्र..देव के वचनों को सुनकर सूर्यदेव अपने स्थान से खड़े हो गये और उन्होंने अपनी आँख बंदकर किसी मंत्र का आहवान किया। इसी के साथ एक सुनहरे रंग का रत्न सूर्यदेव के हाथ में चमकने लगा।

“यह सूर्यशक्ति है माया।” सूर्यदेव ने सूर्यशक्ति को माया को देते हुए कहा- “यह जिसके पास रहेगी, उसे सूर्य का तेज और उसकी ज्वाला प्रदान करेगी। सूर्य का तेज उस व्यक्ति के भाव को पराक्रम से भर देगा और सदैव उसकी सुरक्षा के लिये तत्पर रहेगा " यह कहकर सूर्यदेव ने, सूर्यशक्ति माया को प्रदान कर दिया।

माया ने सूर्यशक्ति को लेकर उसे अपने मस्तक से लगाया और उसे अपने हाथ में पकड़े, एक सुनहरे रंग के धातु के डिब्बे में रख लिया।

सूर्यशक्ति मिलने के बाद अब ब्र..देव ने अग्निदेव की ओर इशारा किया। इशारा पाकर अग्निदेव अपने स्थान से खड़े हो गए।

उन्होंने भी आँख बंदकर को ई मंत्र पढ़ा, उनके हाथ में अब बैंगनी रंग का एक चमकता हुआ रत्न प्रकट हुआ।

“ये अग्नि शक्ति है माया, यह शक्ति जो भी मनुष्य धारण करेगा, उसके पास अग्नि की समस्त शक्तियां आ जायेंगीं और अग्नि की शक्ति, उस मनुष्य को धैर्यता और दिव्यता प्रदान करेगी।" यह कहकर अग्नि देव ने भी अपनी अग्नि शक्ति को माया के सुपुर्द कर दिया।

माया ने अग्नि शक्ति को भी अपने मस्तक से लगाकर उसी सुनहरे डिब्बे में रख लिया।

इस बार ब्देव को इशारा करने की कोई जरुरत नहीं पड़ी, वरुणदेव स्वयं ही अपने स्थान से खड़े हो गये।

वरुणदेव ने नीले रंग के रत्न को माया को देते हुए कहा- “यह जलशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे जल की समस्त शक्तियां प्राप्त होंगी और यह जलशक्ति उस मनुष्य को गंभीरता प्रदान करते हुए, उसे सभी समावेशों में रहने की अद्भुत शक्ति देगी।"

इसके पश्चात् पवनदेव ने माया को गाढ़े नीले रंग का रत्न प्रदान करते हुए कहा- “यह वायुशक्ति है माया, यह जिसके पास रहेगी, उसे वायु की सभी शक्तियां प्राप्त हो जायेंगी और यह वायु शक्ति उस मनुष्य को चंचल बनाते हुए, उसे विज्ञान की अद्भुत समझ प्रदान करेगी।"

अब बारी हनुरमान की थी। सभी को अपनी तरफ देखते पाकर ह..मान अपने स्थान से खड़े हुए और बोले“ मेरे पास स्वयं की ऐसी कोई विशेष शक्ति नहीं है, मैं तो सदैव से ही, धरती पर रहकर ईश्वर की आराधना करता आया हूं। परंतु इस विशेष पर्व पर, मैं भूदेवी की दी हुई धरा शक्ति को प्रदान करना चाहूंगा, जिसकी शक्ति से मैं पृथ्वी पर रहते हुए, स्वयं ऊर्जा ग्रहण करता हूं। यह धरा शक्ति जिसके पास रहेगी, उसे धरा के कणों को नियंत्रित करने का अधिकार होगा। यह धरा शक्ति उस मनुष्य को चट्टान सा कठोर बनायेगी, जिससे उसका अपनी प्रत्येक भावना पर नियंत्रण होगा। यह कहकर हनु ने एक हरे रंग का रत्न माया को प्रदान कर दिया।

इसके बाद शनि देव ने खड़े होकर माया को एक नीले रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह मानस शक्ति है माता, यह जिसके पास रहेगी, उसके पास विचित्र मानस शक्तियां आ जायेंगी। वह इन मानस शक्तियों से अपने हाथों से मानस तरंगें छोड़कर, उसे किसी भी वस्तु में परिवर्तित कर सकेगा। यह मानस शक्तियां सदैव मस्तिष्क को दृढ़ बनाती हैं।
माया ने शनिदव की मानस शक्ति को भी उसी सुनहरे डिब्बे में डाल दिया।

फिर शेषनाग ने उठकर माया को नागशक्ति प्रदान की। वह नाग शक्ति एक काले रंग के रत्न के अंदर थी।

"यह नागशक्ति है माया।” शेषनाग ने कहा- "इस शक्ति में सभी नागों, सर्पो को नियंत्रित करने की शक्ति है। इसको धारण करने वाले मनुष्य पर, किसी भी प्रकार का विष का प्रभाव नहीं होगा और सभी नाग जाति इस नागशक्ति के प्रभाव से, धारक का कहना मानेंगे। साथ ही साथ यह नागशक्ति धारक को, जल में साँस लेने के योग्य भी बना देगी।"

शेषनाग के पश्चात कार्ति..य खड़े हो गये- “मैं माता माया को हिमशक्ति प्रदान करता हूं, यह हिमशक्ति, धारण करने वाले मनुष्य को, हिम की शक्तियों से सुशोभित करेगी और उसमें हिम के समान स्थायित्व और सुंदरता सदा ही शोभायमान रहेगी।"यह कहकर उन्होंने ने एक सफेद रंग का रत्न माया के हाथों पर रख दिया। माया ने आशीष के तौर पर अपना हाथ उन्होंने के सिर पर रख दिया।

अब बारी थी यम की। यम ने गाढ़े लाल रंग का रत्न माया को देते हुए कहा- “यह जीव शक्ति है माता, यह जीव शक्ति जिसके पास रहेगी, वह सभी जीवों की बात को भलि-भांति समझ सकेगा और किसी भी जीव का आकार ग्रहण कर सकेगा।"

इसके बाद गुरु बृहस्पति का नंबर था। उन्होंने ने माया को हल्के हरे रंग का रत्न देते हुए कहा- “यह वृक्षशक्ति है पुत्री, इसको धारण करने वाले के पास, सभी वृक्षों की भावनाओं को समझने की अद्भुत शक्ति आ जायेगी। वह इस शक्ति के माध्यम से वृक्षों से बात भी कर सकेगा और उनके खुशी व दर्द को महसूस भी कर सकेगा।”

माया ने श्रद्धा स्वरुप यह भेंट भी स्वीकार कर ली। गुरु माया को वह रत्न देकर वापस अपने स्थान पर बैठ गये।

अब ..णेश अपने स्थान से उठे और अपनी आँखें मटकाते हुए माया के पास आ गये। ..णेश को देखते ही माया के चेहरे पर स्वतः ही मुस्कान आ गयी।

"हमें आपसे रत्न की जगह आपका मूषक चाहिये। कहां है वह? कहीं दिखाई नहीं दे रहा?" माया ने हास्य भरे शब्दों में ..णेश का कान पकड़ते हुए कहा।


“मूषक को डर था, कि आप उन्हें मांग सकती हो, इसलिये वह डर के कारण आये ही नहीं।" उन्होंने अपना कान छुड़ाते हुए कहा- “और माता, आप ये हर समय मेरे कान खींचकर और लंबा क्यों करना चा हती हैं?”

"जिससे आपके कान और बड़े हो जायें, फिर आप बड़े कान की सहायता से आसमान में उड़ भी सको। ऐसी स्थिति में आपको आपके मूषक की आवश्यकता ही नहीं रह जायेगी।" माया ने मुस्कुराते हुए कहा।

सभी देवता गण माया और ..णेश के इस परिहास को देख पूर्ण आनन्दित हो रहे थे।

“मैं अपने कान से उड़ सकूँगा। अरे वाह कितना अच्छा लगेगा आसमान में उड़कर।" गमणेश ने भी खुशी भरे स्वर में कहा- “ठीक है माता, जब ये सभा पूर्ण हो जायेगी, तो मैं रोज आपके पास, अपने कान खिंचवाने आया करूंगा।

माया ने भी गमणेश की भोली बातें सुन अपना सिर हिला दिया। अब गणेश ने भी अपनी आँखें बंदकर, माता पा…र्वत का ध्यान किया। अब उनके हाथ में एक लाल रंग का रत्न चमकने लगा, जिससे तीव्र प्रकाश उत्पन्न हो रहा था।

“माता, यह प्रकाश शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य के पास, ब्रह्मांड के हर प्रकार के प्रकाश को उत्सर्जित एवं परा वर्तित करने की क्षमता आ जायेगी। इसे धारण करने वाले मनुष्य के मस्तिष्क में, असीम ज्ञान का संचार होगा और इस ज्ञान से वह पृथ्वी की दशा और दिशा दोनों ही परिवर्तित कर सकेगा। यह शांति का भंडार भी है और रचनाओं का संसार भी।" यह कहकर उन्होंने उस रत्न को माया के सुपुर्द कर दिया।

सभी देवताओं के बाद इंद्र अपने सिंहासन से खड़े हो गये। इंद्र ने भी मंत्र पढ़कर, हवा से एक हल्के बैंगनी रंग के रत्न को उत्पन्न किया और उसे माया को देते हुए बोला-

“देवी माया, यह वशीन्द्रिय शक्ति है, इसे धारण करने वाले मनुष्य का, अपनी सभी इन्द्रियों पर नियंत्रण हो जायेगा। वह एक साधारण मनुष्य से बढ़कर, देवताओं की तरह व्यवहार करने लगेगा। एक बार इसका वरण करने के बाद, इसके प्रभाव को कम तो किया जा सकता है, परंतु पूर्णतया समाप्त नहीं किया जा सकता। यह अपने धारक में मेरी ही भांति देवगुण उत्पन्न कर देगा।"

अब देवसभा में बैठे सभी देवगणों ने अपनी कोई ना कोई शक्ति माया को दे दी थी। माया ने अपने हाथ में पकड़े सुनहरे डिब्बे को देखा, जिसमें अब 12 अलग-अलग रंगों के रत्न चमक रहे थे।

“अब हमारी बारी है। "ब्र…देव ने कहा और अपनी आँख बंदकर उन्होंने भी एक शक्ति का आहवान किया। कुछ ही देर में ब्रह्देव के हाथ में भी, एक पीले रंग का रत्न दिखाई देने लगा।


“यह ब्रह्मशक्ति है पुत्री, यह जिसके पास भी रहेगा, उसके पास तुम्हारे समान, शक्तिशाली निर्माण शक्ति आ जायेगी। उस निर्माण शक्ति से वह कल्पना के माध्यम से, किसी भी चीज का निर्माण कर सकेगा। ब्रह्मशक्ति जिसके पास भी रहेगी, वह ब्रह्मांड के हर रहस्य को समझने में सक्षम होगा। उसके निर्माण के समान पृथ्वी पर कोई भी निर्माण कर्ता नहीं होगा।" यह कहकर उन्होंने ब्रह्मशक्ति को भी माया के सुपुर्द कर दिया।

अब भगवान ..ष्णु आगे आये। उन्होंने अपने हाथ में पकड़े पांचजन्य शंख से एक नारंगी रंग के रत्न को निकालकर माया को देते हुए कहा- “यह ध्वनि शक्ति है माया, यह जिसके पास भी रहेगी, उसके पास हर प्रकार की ध्वनि को उत्पन्न करने और उसे नियंत्रित करने की शक्ति होगी। वह किसी भी पुरानी ध्वनि को भी सुनने में सक्षम होगा और वह सदैव ईश्वरीय शक्ति के सानिध्य में रहेगा।"

अब सभी की निगाह महानदेव की ओर थी ।
उन्होंने माया को एक छोटी सी डिबिया पकड़ाते हुए कहा“ इस डिबिया में देवी गंगा की पहली बूंद है माया, जिसे मैंने गुरुत्व शक्ति से बांध रखा है, यह बूंद जिसके भी सिर पर गिरेगी, उसे वह गुरुत्व शक्ति प्राप्त हो जायेगी। जिस मनुष्य के पास ये गुरुत्व शक्ति रहेगी, वह ब्रह्मांड के किसी भी ग्रह पर गुरुत्वाकर्षण को नियंत्रित कर सकता है। उस मनुष्य में उड़ने की शक्ति स्वतः आ जायेगी और वह बहुत सी शक्तियों को अपने शरीर पर रोकने में सक्षम हो जायेगा।

माया ने गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी अपने सुनहरे डिब्बे में रख लिया। अब माया के पास कुल 15 शक्तियां एकत्रित हो गईं थीं।

“माया और नीलाभ, अब इन शक्तियों को उचित पात्र तक पहुंचाने की जिम्मेदारी तुम दोनों के कंधों पर है।” देव ने कहा- “अब तुम दोनों मिलकर 15 लोकों का निर्माण करो, जब निर्माण कार्य पूर्ण हो जायेगा, तो हम तुम दोनों को बता देंगे कि कौन सी 30 अद्भुत शक्तियां, उन 15 लोकों में छिपाना है।... हमें पूर्ण विश्वास है कि तुम दोनों अपेक्षाओं पर खरा उतरोगे।" यह कहकर उन्होंने अपने हाथ को हवा में उठाया, जो कि इस बात का प्रमाण था कि यह सभा अब समाप्त हो चुकी है।

सभी देव अब अपने स्थान से खड़े हो गये। कुछ ही देर में त्र..देव, माया और नीलाभ के संग वहां से चले गये। अब सभी देवता भी एक-एक कर सभा से जाने लगे।

इंद्र ने हाथ जोड़कर सभी को विदाई दी, पर इस समय इंद्र का मस्तिष्क बहुत तेजी से चलायमान था, वह कुछ ना कुछ तो ऐसा सोच रहे थे, जो आगे जा कर एक बड़ी समस्या खड़ी करने वाला था।


जारी रहेगा_____✍️

Bahut hi gazab ki update he Raj_sharma Bhai

Sabhi devtao ne apni apni shaktiya maya aur nilabh ko saunp di he

Ab ye dono milkar 15 loko ka nirman karenge.....

Keep rocking bro
 

Ajju Landwalia

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#181.

नटखट हनुका:
(20,005 वर्ष पहले....... नीलमहल, माया लोक, हिमालय)

दिव्यशक्तियां प्राप्त करने के बाद माया ने 15 लोकों का निर्माण कार्य शुरु कर दिया था।

सबसे पहले माया ने माया लोक की स्थापना की। इस माया लोक को उसने, अपने और नीलाभ के निवास स्थान के रुप में चुना।

इस माया लोक में माया ने एक बहुत ही सुंदर नीलमहल की रचना की, जिसमें कि नीले रंग को सर्वोत्तम स्थान दिया गया था।

नीलमहल पूर्णरुप से सोने का बना था, जिसमें जगह-जगह पर नीलम रत्न जड़े हुए थे। महल के सभी पर्दे भी नीले रंग के ही थे। माया ने यह महल नीलाभ को समर्पित किया था।

हनुका अब 0x06x0 वर्ष का हो गया था। आज प्रातः काल का समय था। माया ने सुबह उठकर, बगल में सो रहे नन्हें हनुका को देखा और फिर स्नान करने चली गईं।

माया के जाते ही हनुका ने अपनी आँखें खोल दीं। आँखें खुलते ही प्रतिदिन की भांति, मस्तिष्क में शैतानियां कुलबुलाने लगीं।

अब वह उठकर बिस्तर से नीचे आ गया। हनुका की नजर अब सो रहे नीलाभ पर थी।

शांत भाव से सो रहे नीलाभ को देख हनुका से रहा ना गया, अब उसकी नजरें कमरे में चारो ओर घूमने लगीं।
तभी हनुका की नजर माया द्वारा बनाई गई, एक चित्रकारी की ओर गया, जिसमें माया ने कूची से प्रकृति के रंगों को दर्शाया था।

हनुका दबे पांव उस चित्र के पास गया और उसके बगल रखे, विभिन्न प्रकार के रंगों से भरी थाली को उठा लिया।

अब हनुका धीरे-धीरे नीलाभ के पास पहुंचा और अपने नन्हें हाथों से नीलाभ के चेहरे पर अपनी कला का प्रदर्शन करने लगा।

नीलाभ इस समय गहरी निद्रा में था, उसे पता भी ना चला, कि कब उसका चेहरा एक कला प्रदर्शनी की भांति, विविध रंगों से सज चुका है।
कुछ ही देर में हनुका अपने प्रदर्शन से संतुष्ट हो गया।

तभी हनुका को स्नान घर का द्वार खुलने का अहसास हुआ। हनुका इस आवाज को सुन तेजी से, पलंग के नीचे छिप गया।

माया स्नान करके निकली और पूजा घर की ओर चल दी, तभी उसका ध्यान नीलाभ के चेहरे की ओर गया।

नीलाभ का चेहरा देख, माया का हंसते-हंसते बुरा हाल हो गया। माया की तेज हंसी को सुन, नीलाभ भी नींद से जाग गया।

“क्या हुआ माया? आपको सुबह-सुबह इतनी हंसी क्यों आ रही है? आज कुछ विशेष है क्या?” नीलाभ ने पूछा।

"हां नीलाभ, आज बहुत विशेष दिन है। अगर आप दर्पण देखोगे, तो तुम्हें भी आज की विशेषता का आभास हो जायेगा।" माया ने हंसते हुए कहा।

माया की बात सुन, नीलाभ उछलकर पलंग से खड़ा हो गया और दर्पण की ओर लपका। पर दर्पण में चेहरा देखते ही नीलाभ की भी हंसी छूट गई।

हनुका की नन्हीं कूची ने, अभूतपूर्व प्रदर्शन करते हुए, नीलाभ के चेहरे को किसी राक्षस से पूरा मिलाने की कोशिश की थी।

“कहां गया वो हनुका? आज तो वो मेरे हाथों से मार खाएगा।” नीलाभ ने झूठा गुस्सा दिखाते हुए कहा“ अच्छे भले चेहरे को राक्षस बना दिया।"

"हनुका, इतनी अच्छी चित्रकारी कर बाहर की ओर भाग गया है।" माया ने कहा- “आप स्नान घर में जाकर अपना चेहरा साफ कर लीजिये, तब तक मैं उसे ढूंढकर लाती हूं।"

माया के शब्द सुनकर नीलाभ मुस्कुराया और स्नान घर की ओर चल दिया।

नीलाभ के जाते ही माया ने पलंग के नीचे झांककर, हनुका को देखते हुए कहा- “अब पलंग के नीचे से बाहर आ जाओ हनुका, तुम्हारे पिता जी स्नान घर में चले गये हैं।”

“आप जानती थीं कि मैं पलंग के नीचे छिपा हूं?" हनुका ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा।

“प्रत्येक माँ को अपने पुत्र के बारे में सब कुछ पता रहता है। वो तो मैंने आपके पिताजी को इसलिये नहीं बताया, कि कहीं सुबह-सुबह मेरे पुत्र को मार ना पड़ जाये?” माया ने हनुका को अपनी ओर खींचते हुए कहा“ वैसे तुम्हारी चित्रकारी मुझे बहुत पसंद आयी हनुका।”

“अच्छा! फिर कल मैं आपके चेहरे पर भी ऐसी ही चित्रकारी कर दूंगा।” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“अरे नहीं-नहीं ! मुझे क्षमा करो पुत्र, तुम अपने पिताजी पर ही चित्रकारी करते रहो। मुझे अपने चेहरे पर चित्रकारी नहीं करवानी।" माया ने डरने का अभिनय करते हुए कहा।

“ठीक है माता, मैं आप पर चित्रकारी नहीं करूंगा, पर मुझे आपसे एक चीज पूछनी है माता?” हनुका ने माया को देखते हुए कहा- “आपके और पिता जी के शरीर पर तो ऐसे बाल नहीं हैं, फिर मेरे शरीर पर ऐसे बाल क्यों हैं? मैं आप दोनों की तरह क्यों नहीं दिखता माता?" हनुका अपने शरीर के बालों को दिखाते हुए बोला।

“तुम्हारे शरीर पर इसलिये इतने बाल हैं, कि तुम्हें हिमालय की बर्फ में ठंडक ना महसूस हो। महानदेव बालकों को ठंड से बचाने के लिये, उनके शरीर पर ऐसे बाल दे देते हैं।” माया ने नन्हें हनुका को समझाते हुए कहा।

"फिर महल के बाकी दास-दासियों के, पुत्रों के शरीर पर बाल क्यों नहीं हैं माता?” हनुका ने एक और प्रश्न कर दिया।

'क्यों कि देव, केवल युवराज के शरीर पर इतने बाल देते हैं और तुम तो हिमालय के युवराज हो ना? बस इसीलिये तुम्हारे शरीर पर इस प्रकार से बाल हैं।” माया ने कहा- “क्या तुम्हें ये बाल नहीं पसंद हैं हनुका?"

“नहीं माता, मुझे भी अन्य बालकों की तरह दिखना है।” हनुका ने अपना दर्द व्यक्त करते हुए कहा- “क्या मैं उनकी तरह नहीं बन सकता माता?"

“बन सकते हो, पर इसके लिये तुम्हें देवशक्तियों की आवश्यकता होगी।” माया ने हनुका को समझाते हुए कहा- “पर मुझे नहीं लगता कि तुम अन्य बालकों के समान बनकर प्रसन्न रह पाओगे?"


“आपको ऐसा क्यों लगता है माता?” हनुका के मस्तिष्क में घुमड़-घुमड़ कर नये प्रश्न आ रहे थे।

“क्यों कि हनुका, हम जैसे हैं हमें वैसी ही प्रवृति के लोग अच्छे लगते है। हो सकता है कि क्षणिक मात्र, हमारा हृदय किसी अन्य प्रवृति की कामना करे, पर कुछ देर के बाद ही, हम स्वयं पहले की ही तरह बनना चाहते हैं।" माया ने कहा।

“मैं आपके कहने का अभिप्राय नहीं समझा माता?" हनुका के चेहरे पर उलझन के भाव नजर आये।

“ठीक है, मैं तुम्हें सरल भाषा में समझाने के लिये एक छोटी सी कथा सुनाती हूं।” माया ने पलंग पर बैठते हुए हनुका को अपनी गोद में बैठा लिया।

"अरे वाह! कथा फिर तो बहुत मजा आयेगा। नन्हा हनुका खुश होते हुए बोला।

"तो सुनो, एक बार हिमालय की कंदराओं में एक ऋषि रहते थे, जो प्रतिदिन प्रातः काल, गंगा नदी के पानी में स्नान करते थे और सूर्यदेव को जल चढ़ाते थे। प्रति दिन की भांति एक दिन जब, वह नदी में स्नान कर, सूर्य को जल चढ़ाने के लिये अपनी अंजुली में पानी भर रहे थे, तभी उनकी अंजुली में एक नन्हीं सी चुहिया आ गई, जो कि शायद नदी की धारा में डूब रही थी। ऋषि ने उस चुहिया को कन्या बनाकर अपनी पुत्री के रुप में स्वीकार कर लिया। पुत्री जब बड़ी हुई तो ऋषि ने अपनी पुत्री से पूछा कि तुम्हें किस प्रकार का वर चाहिये? तो पुत्री ने कहा कि जो इस पूरे संसार में सर्वशक्तिमान हो, मुझे उससे विवाह करना है।

“ऋषि ने बहुत सोचने के बाद पुत्री को सूर्यदेव का प्रस्ताव दिया। ऋषि ने कहा कि सूर्यदेव ही इस पृथ्वी पर
सर्वशक्ति मान हैं। पर ऋषि पुत्री ने कहा कि सूर्यदेव से शक्तिशाली तो मेघ हैं, जो कि उन्हें पल भर में पूर्णतया ढक लेते हैं। तो ऋषि ने मेघों के देवता का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा, पर पुत्री ने उसे भी अस्वीकार कर दिया। पुत्री ने कहा कि मेघों के देवता से शक्तिशाली, तो पर्वतराज हिमालय हैं, जो मेघों को भी रोककर, उन्हें बरसने पर विवश कर देते हैं। यह सुनकर ऋषि ने इस बार हिमालय के विवाह का प्रस्ताव अपनी पुत्री के सामने रखा। तभी उस पुत्रि को हिमालय में छेद करता हुआ एक चूहा दिखाई दिया।

“उसे देख पुत्री ने कहा कि हिमालय से शक्तिशाली तो यह चूहा है, जो हिमालय में भी छेद कर सकता है, मैं तो इस चूहे से ही शादी करूंगी। फिर ऋषि समझ गये कि इस चुहिया को पूरी पृथ्वी पर, चूहा ही सबसे
शक्तिशाली दिखाई दिया, इसलिये ऋषि ने उस कन्या को फिर से चुहिया बना दिया और उसका विवाह खुशी-खुशी उस चूहे से कर दिया। तो इस कथा से यह पता चलता है हनुका कि जो जिस प्रकार है, उसे सदैव वैसी ही चीजें भाती हैं।' यह कहकर माया शांत हो गई और हनुका की ओर देखने लगी।

हनुका माया की कथा सुनकर कुछ सोच में पड़ गया। उसे सोचता देख माया ने पूछ लिया- “क्या सोच रहे हो हनुका?”

"तो फिर मेरा भी विवाह किसी बालों वाली कन्या के साथ ही होगा?" हनुका ने अपने चेहरा रोने सा बनाते हुए पूछा।

हनुका की बात सुन माया जोर से हंसते हुए बोली“अरे नहीं हनुका, तुम्हारा विवाह तो मैं पृथ्वी की सबसे सुंदर कन्या से करुंगी और तब तक तो तुम देवशक्ति प्राप्त कर, अपने भी शरीर के बाल हटा चुके होगे?"

“फिर ठीक है।" माया की बात सुन अब हनुका खुश हो गया।

“अच्छा, अब मैं महानदेव की पूजा करने जा रही हूं। पर इस बीच, तुम कोई और शरारत मत करना। ठीक है?” माया ने हनुका को पलंग पर बैठाते हुए कहा।

“जी माता, मैं आपके पूजा करने तक, चुपचाप पलंग पर बैठा रहूंगा, मैं कोई शरारत नहीं करूंगा। हनुका ने भोलेपन से कहा।

हनुका के वचन सुन माया ने हनुका के सिर पर धीरे से हाथ फेरा और पूजा स्थल की ओर बढ़ गई।

माया तो चली गई, पर हनुका अभी भी पलंग पर बैठा देवशक्ति के बारे में सोच रहा था- “माता ने कहा कि अगर मुझे देवशक्ति मिल जाये तो मैं भी दूसरे मनुष्यों की ही भांति, सुंदर दिखने लगूंगा, पर दूसरे कमरे में एक डिब्बे में बहुत सी देवशक्तियां रखी हैं, फिर माता, मुझे उन देवशक्तियों से सुंदर क्यों नहीं बना देती? शायद माता उन देवशक्तियों के बारे में भूल गई होंगी? एक काम करता हूं, मैं स्वयं उन देवशक्तियों से सुंदर बन जाता हूं और माता जब पूजा करके आयेगी, तो मैं उसे अपना सुंदर चेहरा दिखाकर, आश्चर्यचकित कर दूंगा हां-हां यही सही रहेगा।“ यह सोच नन्हा हनुका दूसरे कक्ष की ओर चल दिया, जहां देवशक्तियां रखीं थीं।

हनुका ने दूसरे कमरे में रखी अलमारी खोल ली, नीचे के दोनों खानों में वह सुनहरा डिब्बा नहीं था। अतः हनुका एक कुर्सी को खींचकर, अलमारी के पास ले आया और उस पर चढ़कर देखने लगा।

अब हनुका को अलमारी के तीसरे खाने में रखा, वह सुनहरा डिब्बा दिखाई दे गया। हनुका ने दोनों हाथ लगाकर उस सुनहरे डिब्बे को उठा लिया।

अब वह कुर्सी से उतरकर, वहीं कक्ष में जमीन पर ही बैठ गया। हनुका ने अब डिब्बे को खोल लिया।

रंग-बिरंगे रत्नों से हनुका की आँखें चमक उठीं। हनुका अब एक-एक रत्न को उठाकर देखने लगा, पर उसे समझ ना आया कि इन देवशक्तियों का प्रयोग करना कैसे है?

तभी हनुका को उस सुनहरे डिब्बे में एक छोटी सी डिबिया दिखाई दी। यह वहीं डिबिया थी, जिसे माया को महानदेव ने दिया था।

हनुका को इन सभी रत्नों के बीच, वह छोटी सी डिबिया का रखा होना, बहुत अजीब सा लगा, इसलिये हनुका ने उस डिबिया को खोल लिया।

“ये क्या बात हुई? इस डिबिया में तो जल की मात्र एक बूंद है?” हनुका ने सोचा- “कुछ सोच हनुका ने उस डिबिया को मुंह लगा कर, जल की उस बूंद को पी लिया।

“इससे तो प्यास भी नहीं बुझी। पता नहीं यह कैसी देवशक्ति थी ?” हनुका ने कहा।

तभी हनुका को कक्ष में किसी के आने की आहट सुनाई दी। वह आहट सुन हनुका डर कर तेजी से अलमारी के पीछे छिप गया।

सभी देवशक्तियां कमरे में वैसे ही बिखरी हुईं थीं। आने वाली आहट माया की थी, जो कि पूजा करके हनुका को ढूंढते हुए उधर ही आ गई थी- “हनुका !"

हनुका को पुकारते हुए, माया कक्ष में प्रविष्ठ हो गई, पर कक्ष में प्रविष्ठ होते ही माया के चेहरे पर हैरानी और क्रोध के भाव एक साथ आ गये। “हे मेरे ईश्वर, यह हनुका भी ना, पता नहीं क्या-क्या करता रहता है?"

माया ने घबराकर सभी देवशक्तियों को जमीन से उठाकर, वापस डिब्बे में रखना शुरु कर दिया। साथ ही साथ वह उन देवशक्तियों की गिनती भी करती जा रही थी। 14 देवशक्तियों की गिनती कर उन्हें डिब्बे में रखने के बाद, माया की नजर अब दूर पड़ी सुनहरी डिबिया पर गई।

माया ने उस डिबिया को खोलकर देखा, पर उसमें गंगा की पहली बूंद नहीं थी।

यह देखकर माया का कंठ सूख गया, पर इससे पहले कि वह हनुका को ढूंढकर, उसे कोई दण्ड दे पाती, माया की आँखों के सामने ही, हवा में एक बूंद प्रकट होकर, उस डिबिया के अंदर चली गई।

माया यह चमत्कार देख आश्चर्य में पड़ गई, तभी माया को अपने सामने महानदेव का ऊर्जा रुप दिखाई दिया।

यह देख माया ने हाथ जोड़कर देव को प्रणाम किया।

तभी वातावरण में देव की आवाज गूंजी “माया, तुम्हें देवशक्तियों को और ध्यान से रखना होगा, यह तुम्हारा कर्तव्य है, कि तुम इन देवशक्तियों को सदैव उचित व्यक्ति को ही दो। आज अंजाने में ही सही परंतु गुरुत्व शक्ति का प्रयोग हुआ है। परंतु तुम्हारे सद्भाग्य के कारण, वह गुरुत्व शक्ति सही पात्र के पास पहुंच गई है और यही कारण है कि तुम इस डिबिया की गुरुत्व शक्ति को दोबारा से देख पा रही हो। ध्यान रखना जब भी इस गुरुत्व शक्ति का वरण कोई सुपात्र करेगा, तो इसकी दूसरी बूंद इस डिबिया में आ जायेगी, परंतु यदि कभी इस बूंद का वरण किसी कुपात्र ने किया, तो यह बूंद कभी धरती पर प्रकट नहीं होगी और ऐसी स्थिति में, तुम्हें देवताओं के क्रोध का भी सामना करना पड़ सकता है। इसलिये तुम्हें इन देवशक्तियों को लेकर अत्यंत सावधान रहने की जरुरत है।"

“जी देव, मैं आगे से सदैव आपकी बात का ध्यान रखूगी। मैं आज ही हिमालय पर आपके एक शिव मंदिर का निर्माण कर, इस गुरुत्व शक्ति को उसमें रख दूंगी।" माया ने कहा- “वह शिव मंदिर इस गुरुत्व शक्ति को लेकर हिमालय के गर्भ में प्रवेश कर जायेगा और जब तक मुझे इस गुरुत्व शक्ति के लिये, कोई सुपात्र नहीं मिल जाता? तब तक मैं इसे वहीं रहने दूंगी। हां वह शिव मंदिर प्रत्येक वर्ष, आपकी पूजा-अर्चना के लिये हिमालय के गर्भ से एक बार बाहर आयेगा और संध्या वंदना के साथ, वापस हिमालय की गर्भ में समा जायेगा। अब रही बात इन बाकी की देवशक्ति यों की, तो इन्हें मैं ऐसे स्थान पर रखूगी, कि वहां तक कोई कुपात्र पहुंच कर, इन शक्तियों को प्राप्त ही नहीं कर पायेगा। आज की घटना ने मुझे अच्छा ज्ञान दिया है देव, अब मुझसे कभी भी इस प्रकार की त्रुटि नहीं होगी, ऐसा मैं आपको विश्वास दिलाती हूं।"

"कल्याण हो माया।" यह कहकर देव अंतर्ध्यान हो गये। अब माया ने जल्दी से गुरुत्व शक्ति की डिबिया को भी, अपने सुनहरे डिब्बे में रखा और पूरे डिब्बे को अपने हाथ में लेकर कोई मंत्र पढ़ने लगी।

कुछ ही देर में वह सुनहरा डिब्बा माया के हाथों से कहीं हवा में विलीन हो गया। अब माया की नजर हनुका को ढूंढने में लग गई।

"हनुका ऽऽऽऽऽ।” माया ने कमरे के एक-एक स्थान का सामान हटाकर, हनुका को ढूंढना शुरु कर दिया।

माया ने अलमारी के पीछे भी देखा, पर हनुका पूरे कमरे में कहीं दिखाई नहीं दिया। तभी माया को हनुका की हंसी सुनाई दी।

माया ने हंसी की आवाज का पीछा करते हुए, कक्ष की छत की ओर देखा, तो माया के आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा क्यों कि हनुका इस समय पृथ्वी का गुरुत्वाकर्षण छोड़, कक्ष के छत की ओर, हवा में तैर रहा था।

एक पल में माया को समझ में आ गया कि देव किस सुपात्र की बात कर रहे थे। वह जान गई थी कि हनुका ने ही गुरुत्व शक्ति का वरण किया था।

माया ने हनुका को नीचे आने का इशारा किया, पर हनुका ने डरकर अपना सिर ना में हिलाया।

“आप मुझे मारोगी?” हनुका ने भोलेपन से कहा।

“नहीं मारुंगी, परंतु नीचे आओ।” माया ने हनुका को घूरते हुए कहा।

हनुका डरते-डरते नीचे आ गया। माया ने हनुका के कान पकड़े और उसे लेकर महल के अंदर की ओर चल दी- “चलो तुम्हें अपने हाथ के बने लड्डू खिलाती हूं।

“लड्डू! वाह, फिर तो आनन्द ही आ जायेगा। हनुका यह सुनकर खुश हो गया।

माया ने हनुका का हाथ पकड़ा और फिर उसे प्यार करते हुए महल के अंदर की ओर चल दी।

इस दृश्य को देखकर तो बस यही कहा जा सकता है कि माँ तो आखिर माँ ही होती है।


जारी रहेगा………✍️

Behad shandar update he Raj_sharma Bhai

Hanuka ne galti se hi sahi lekin gurutav shakti ka varan kar liya he.............

Mahadev ke kahe anusar ab maya ne sabhi shaktiyo ko adrishay kar diya he........

Dekhte he aage kya kya hota he

Keep rocking bro
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Bahut hi gazab ki update he Raj_sharma Bhai

Sabhi devtao ne apni apni shaktiya maya aur nilabh ko saunp di he

Ab ye dono milkar 15 loko ka nirman karenge.....

Keep rocking bro
Yes brother, wo aisa kar chuke hain, kahani flashback bata rahi hai, and aage jin shaktiyo se saamna hoga unka pata bhi to hona chahiye . Thank you very much for your wonderful review and support :thanks:
 

Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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Behad shandar update he Raj_sharma Bhai

Hanuka ne galti se hi sahi lekin gurutav shakti ka varan kar liya he.............

Mahadev ke kahe anusar ab maya ne sabhi shaktiyo ko adrishay kar diya he........

Dekhte he aage kya kya hota he

Keep rocking bro
Wo jaruri bhi tha, kyuki Hanuka to baccha tha, lekin agar galti se bhi koi shakti agar kisi galat hath me pad jaye to??🙄 and Hanuka mujhe lagta hai ki sahi paatra hai.
Thank you very much for your valuable review and support bhai :thanks:
 
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