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Thriller कातिल रात

TheBlackBlood

Keep calm and carry on...
Supreme
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धीरे धीरे रात अब गहराती जा रही थी। कल की रात भी ये देविका नाम की जालिम लोशन मेरे घर में थी, और आज की रात तो इन मोहतरमा के साथ दो और हसीनाएं मेरे घर को रोशन कर रही थी।

रागिनी की खूबसूरती भी कोई देविका के मुकाबले में कहीं से भी कम नही थी। मेघना भी इन दोनों से कहीं भी उन्नीस नही थी।

मैं भी इस वक़्त पता नही क्यो इन तीनो के हुश्न की तुलना करने बैठ गया था। ऊपरवाले कि बनाई हुई किसी भी कलाकृति का तुलनात्मक अध्धयन करने वाला मैं कौन होता हूँ। 😉
Fate to fate par tharkayi na ghate :doh:
"जी मैं अब भी ये समझ नही पा रहा हूँ कि मैने इन मोहतरमा के सामने अपना पिस्टल अपने बेड की दराज में रखा था, फिर आज ये पिस्टल मेरे किचन में कैसे मिला" मैंने असमंजस भरे स्वर में कहा।
Lagta hai romesh ke bheje me bheja hi nahi hai, buddhi ghaas charne chali gai hai iski....kya jasus banega re tu, hat lauda :buttkick:
देविका ने भी मुरीद नजरो से देवप्रिय की ओर देखा। आखिर देखती भी क्यो नही, जनाब ने सिर्फ दो मिनट में मैडम को हर आरोप से बरी जो कर दिया था।
Tu kyo jal rela hai be :slap:
"लेकिन जनाब मैं इतना भुलक्कड़ नही हूँ कि पिस्टल जैसी चीज को लेकर मैं इतना लापरवाह हो जाऊंगा और उसके गुम हो जाने की रिपोर्ट लिखवाने थाने तक चला जाऊँगा" मैने देवप्रिय की बात का पुरजोर विरोध किया।
Pahle tharak ko bheje se nikaal bhai, fir achhe se soch ki pistol waakai me kaha rakhi thi tumne :lol:
"नही सर! रोमेश के बारे में ये बोलना सही नही है, बल्कि बहुत सी लड़कियां है, जो रोमेश को पसंद करती है,लेकिन रोमेश बाबू थोड़ा फ़्लर्ट जरूर करते है, लेकिन आज तक कभी फिसले नही है" इस बार मेघना ने इस मामले में मेरी पुरजोर वकालत की।
Pahle devpriya ko murid banane ki koshish aur ab romesh ko....:doh:
Abe wo already laar tapka rela hai :D
"तुम्हे एक बात बतानी थी, मेघना मुझ से कोई बीस सेकेण्ड पहले किचन में घुसी थी, मेरे साथ नही! मुझे लगता है मेघना ने ही उस पिस्टल को उस चूल्हे के नीचे प्लांट किया था" रागिनी जो मुझे अब बता रही थी, इसका अंदेशा मुझे रात को ही हो चुका था।

"मुझे भी इसी बात का शक है" मैने रागिनी की बात का समर्थन किया।

"मेघना शायद किसी बड़ी फिराक में है, मत भूलो की ये राजीव बंसल के साथ सौम्या को रास्ते से हटाकर शादी करने की फिराक में भी थी" रागिनी ने मुझें पुरानी बात याद दिलाई।
Very funny:lotpot:

Sach kahu to agar writer apna dimag na lagaye to romesh apne dam par ghanta kuch nahi kar sakta....matlab kya hi bole apan, Pahli baar aisa detective dekh rela hai apan jiski jasusi me koi dam hi nahi dikh rela hai, isse achha to devpriya hai jiska dimag faaltu ka hi sahi par chalta to hai :roll:

Anyway, meghna aur devika jitna khud ko innocent dikha reli hain utna hain nahi, ye dono kisi na kisi firaak me zarur hain. Kumar Gaurav ko bali ka bakra banaye ja rahi dono...but kya sach me aisa hai...dekhne wali baat hogi, :?:

Overall fantastic update...badhiya writing...keep it up bro :thumbup:
 

SHAMSHERA

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#01

बारिश: (रात 8 बजे!)

इस बार दिल्ली की सर्दियों में बारिश अपना अलग ही स्यापा कर रही थी।
कहने वाले तो कहने लगे थे कि, दिल्ली भी बारिश के मामले में अब मुम्बई बनती जा रही है।

एक तो जनवरी के पहले सप्ताह की कड़ाके की सर्दी और उस पर ये बारिश का कहर।

मैं उसी सर्दी की मार से बचने के लिए इस वक़्त अपने फ्लैट में अपने बेड पर और अपनी ही रजाई में लिपट कर अपनी सर्दी को दूर भगाने का प्रयास कर रहा था।

अब आप भी सोच रहे होंगे की ये कौन अहमक इंसान है,जो बेवजह दिल्ली के मौसम का आँखों देख़ा हाल सुना रहा है। :D

वैसे तो अभी तक आपने अपने इस सेवक को पहचान ही लिया होगा , लेकिन फिर भी मैं आपको बता दूं कि मैं “रोमेश!” दिल्ली में एक छोटा मोटा जासूसी का धंधा करता हूँ…न न मैं कोई राॅ का एजेंट नही हूँ,मैं तो एक प्राइवेट डिटेक्टिव हूँ, जो सिर्फ कत्ल के केस में ही अपनी टांग घुसाता है। :yo:

जासूसी के बाकी धंधो मसलन, शक धोखा, पीछा, तलाक जैसे सड़क छाप धंधों से मैं दूर ही रहता हूँ।

बन्दे को बचपन से ही जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक इस कदर था, की जिस उम्र में मुझें स्कूल की किताबें पढ़नी चाहिए थी,उस उम्र में मैं दिन रात जासूसी किस्से कहानिया पढ़ा करता था।:dazed:

इसी वजह से अपुन का मन भी सिर्फ जासूसी में ही अपना मुकाम बनाने का करने लगा था।

वैसे तो आपका ये सेवक जासूसी में दिल्ली से लेकर मेरठ आगरा ,मुम्बई और राजस्थान तक अपने झंडे गाड़ चुका था ,और आज किसी परिचय का मोहताज नही था , लेकिन मेरी एक नकचढ़ी सेक्रेटरी है,जिसका नाम रागिनी है, वो बन्दे की इस काबलियत की जरा भी कदर नही करती है,:beee: उसकी नजर में अपन आज भी घर की मुर्गी दाल बराबर है, लेकिन उसकी महिमा का बखान मैं बाद में करूँगा, इस वक़्त आपके इस जिल्ले-इलाही के फ्लैट को कोई बुरी तरह से पीट रहा था।

दरवाजा इतनी बेतरतीबी से पीटा जा रहा था कि, मानो कोई दरवाजा तोड़कर अंदर घुसना चाहता हो, मैं हड़बड़ाकर अपनी रजाई में से निकला और दराज में से अपनी पिस्टल निकालकर अपने बरमूडा में फँसाई और तेज कदमो दरवाजे की ओर बढ़ा और दरवाजे के पास जाकर ठिठक गया।

"कौन है,क्यो दरवाजा तोड़ने पर आमादा हो "मैंने बन्द दरवाजे के पीछे से ही बोला।

"दरवाजा खोलो ! मैं बहुत बड़ी मुसिबत में हूँ" ये किसी लड़की की घबराई हुई आवाज थी।

अब एक तो लड़की और ऊपर से मुसीबतजदा, और ऊपर से गुहार भी उस इंसान से लगा रही थी,जो मुसीबतजदा लड़कियों का सबसे बड़ा खैरख्वाह था,:smarty: तो अब दरवाजा खोलना तो बनता था, सो मैंने दरवाजा खोला और फोरन से पेश्तर खोला।

दरवाजा खोलते ही मुझे यू लगा मानो कोई आंधी तूफान कमरे में घुस आया हो, वो लडकी डेढ़ सौ किलोमीटर की रफ्तार से कमरे में घुसी और सीधा मेरे बेड पर बैठ गई।

मै किंककर्तव्यमूढ़ सा बस उस
लड़की की ओर देखता रहा, उस मोहतरमा में एक बार भी मुझ से अंदर आने के लिए पूछना गवांरा नही समझा था।

"दरवाजा बंद करो न, ऐसे क्या देख रहे हो, कभी कोई लडकी नही देखी क्या" उस लड़की की आवाज जैसे ही मेरे कानो में पड़ी, मैंने हड़बड़ा कर दरवाजे को बन्द कर दिया।

दरवाजा बंद करते ही मेरी नजर उस लड़की पर पहली बार पूरी नजर पड़ी थी। लड़की उची लंबे कद
की बेइंतेहा खूबसूरत थी।

उसके कटीले नैन नक्श पर उसका मक्खन में सिंदूर मिला रंग तो कयामत ही ढा रहा था।

उसे ध्यान से देखते ही मेरे दिल की घण्टिया किसी मंदिर के घड़ियाल की तरह से बजने लगी थी।:love2:

पता नही साला ये अपनी उम्र का तकाजा था या अभी तक कुंवारा रहने का नतीजा था कि,आजकल अपुन को हर लड़की खूबसूरत लगती थी। :loveeyed2:

मुझे इस तरह से कुत्ते की तरह से अपनी तरफ घूरते हुए देखकर वो लड़की अब बेचैनी से अपना पहलू बदलने लगी थी।:D

"हो गया हो तो, अब इधर भी आ जाओ" उस लड़की को शायद ऐसी कुत्ती निग़ाहों का अच्छा खासा तजुर्बा था।

होता भी क्यो नही, जो जलवा उसकी खूबसूरती का था, उसके मद्देनजर तो जिसने भी डाली होगी मेरे जैसी कुत्ति नजर ही डाली होगी।

लेकिन आपके इस सेवक ने लड़की के बोलते ही अपनी इस छिछोरी हरकत पर ब्रेक लगाई,और चहलकदमी करता हुआ उसके सामने आकर खड़ा हो गया।

एक तो साला सर्दी का मौसम, ऊपर से कड़कड़ाती बरसात, और अब ये कहर बरपाती मेरे ही बेड पर बैठी हुई मोहतरमा, मेरी जगह कोई और होता तो अभी तक इस खूबसूरत बला के साथ पूरी रात की योजना अपने ख्यालों में बना चुका होता, लेकिन अपनी नजर भले ही कितनी भी कुत्ती हो, दिल शीशे की तरह से साफ है।:declare:

"कौन हो तुम, और इतनी बरसात में मेरे पास क्यो आई हो" मै अब उसकी सुंदरता के खुमार से कुछ कुछ निकलते हुए बोला।

"मेरी जान खतरे में है,मुझे कोई मारना चाहता है" उस लड़की की आवाज में फिर से घबराहट का पुट आ चुका था।

"लेकिन आपको मेरे बारे में किसने बताया कि मैं मुसीबतजदा हसीनाओं की मदद आधी रात को भी सिर के बल चल कर करता हूँ" मैं अब अपनी जासूस वाली फोम में आता जा रहा था।

"मैं आपको नही जानती, मेरे पीछे तो कुछ लोग लगे हुए थे, मैं तो उनसे बचने के लिए आपके फ्लैट का दरवाजा पीटने लगी थी" उन मोहतरमा ने जो बोला था, वो मेरे लिए अनपेक्षित था ।

ऐसे कोई जबकि सर्दियो के दिनों में आठ बजते ही आधी रात का आलम लगने लगता है, क्यो किसी अंजान के घर मे ऐसे घुसेगा और न सिर्फ घुसेगा बल्कि आकर आराम से आकर बेड पर भी बैठ जाएगा।

"आप हो कौन, और कौन लोग है जो आपकीं जान लेना चाहते है" मैंने एक स्वभाविक सवाल किया।

"मेरा नाम अनामिका है, मै यही आपके इलाके के सेक्टर ग्यारह में रहती हूँ, मैं इधर किसी काम से आई थी, लेकिन जब मैं घर वापिस जा रही थी, तो मैंने देखा कि चार लोग मेरा पीछा कर रहे थे, मैं उन्हें देख कर घबरा गई और भागने लगी, तभी आपके फ्लैट पर नजर पड़ी, आपकी लाइट भी जली हुई थी, तो आपके फ्लैट का दरवाजा पीटने लगी" अनामिका ने बोला।

"उन लोगो को आपने पहले भी कभी अपने पीछे आते हुए देखा है, या आज ही देखा था" मै अब उससे सवाल जवाब करने के मूड में आ गया था।

"उन लोगो को तो मैंने आज ही देखा था, लेकिन मुझे कई दिनों से लग रहा है कि कोई मेरा पीछा कर रहा है" अनामिका ने रहस्यमय तरीके से बोला।

"ऐसा लगने का कोई कारण भी तो होना चाहिए, क्या आपको किसी से अपनी जान का खतरा है" मैंने उसके जवाब में से ही सवाल ढूंढा।

"खतरा तो मेरी जान को बहुत है, मुझे नही पता कि मौत किस पल मेरा शिकार कर ले" अनामिका की आवाज से ही ये बोलते हुए उसका डर झलक रहा था।

"कौन लेना चाहता है तुम्हारी जान" मैंने फिर से उसी सवाल को घुमा फिरा कर पूछा।

"धीरज!पूरा नाम उसका धीरज खत्री है" अनामिका ने मुझे उस बन्दे का नाम बताया।

"आप धीरज को कैसे जानती है" मेरा ये पूछना स्वभाविक था।

"किसी समय वो मेरा बॉयफ्रेंड था, लेकिन जल्दी ही मुझे ये एहसास ही गया कि मैंने गलत आदमी से प्यार कर लिया है, उसके बाद मैंने उससे अपने रिलेशन ख़त्म कर लिये, और दूसरी जगह शादी कर ली, उसके बाद से वो बन्दा मेरी जान का दुश्मन बना हुआ है" अनामिका ने पूरी बात बताई।

"देखिए मैं एक डिटेक्टिव हूँ… मेरा पाला हर रोज ऐसे लोगो से ही पड़ता है, आप मेरा ये कार्ड रख लीजिए, और कल मेरे आफिस आकर मुझे सभी कुछ डिटेल में बताइये, हो सकता है, इसके बाद आपका बॉयफ्रेंड फिर कभी आपको परेशान न करे" मैंने उसको विश्वास दिलवाने वाले शब्दो मे बोला।

"अगर आपने सच मे मेरा उस आदमी से पीछा छुड़ा दिया तो, आपको आपके वजन के बराबर नोट से तोल दूँगी" अनामिका ने उत्साहित स्वर में बोला।

"लेकिन मैडम इतना बता दीजिए कि वो नोट दस के होंगे या दो हजार के होंगे" मैंने उसकी बात का झोल पकड़ते हुए बोला।:D

मेरी बात सुनकर वो नाजनीन न केवल मुस्कराई बल्कि खिलखिलाकर हँस भी पड़ी।

"आप बहुत हाजिर जवाब हो रोमेश साहब" अनामिका ने मेरा नाम मेरे विजिटिंग कार्ड पर पढ़ते हुए बोला।

"चलिये अब मैं आपको आपके घर छोड़ देता हूँ, वैसे भी रात अब गहरी होती जा रही है" मैंने अनामिका की तरफ देख कर बोला।

"काफी शरीफ आदमी मालूम पड़ते हो रोमेश साहब, वरना मौसम तो आशिकाना है" उस जालिम ने एकाएक ऐसी बात बोलकर मेरे दिल के तारों को झंकृत कर दिया।

"इस मौसम की वजह से ही तो बोल रहा हूँ, आपके कपडे गीले हो चुके है, घर आपका पास में ही है, मैं अपको घर छोड़ देता हूँ, ताकि आप इन गीले कपड़ो से छुटकारा पा सको" मैंने अनामिका की बात को एक नया मोड़ दिया।

"लेकिन मैं अभी घर नही जाना चाहती हूँ, मेरे पति भी आज घर पर नही है, और मुझे ऐसे हालात में डर भी बहुत लगेगा"

अनामिका अब सीधे सीधे मेरे गले पड़ रही थी। जबकि मेरी छटी इंद्री मुझे बार बार सचेत कर रही थी।

मुझे न जाने क्यो ये लडकी खुद को जो बता रही थी,वो नही लग रही थी।

लेकिन इस बार उसने जो बहाना बनाया था, उसने मुझे कुछ बोलने लायक नही छोड़ा था।

"लेकिन देवी जी, ये बन्दा यहां अकेला रहता है, कल को किसी को पता चलेगा तो आपकी बदनामी नही होगी" मैने वो बात बोली, जो आजकल के जमाने मे अपनी अहमियत खो चुकी थी।

मेरी इस बात को अनामिका की हँसी ने सही भी साबित कर दिया था।

"किस जमाने मे जी रहे हो रोमेश बाबू, आजकल किसके पास इतनी फुर्सत है कि कोई मेरी रातों का हिसाब रखें कि मैं अपनी रात कहाँ किसके साथ बिताकर आ रही हूँ.. यार अब ये फालतू की बाते बन्द करो, और अगर एक कप कॉफी पिला सकते हो तो पिला दो" अनामिका मेरे गले पड़ने में कामयाब हो चुकी थी।

मैं मरता क्या न करता के अंदाज में अपने किचन की ओर चल दिया।

कॉफी की जरूरत तो मुझे भी थी। इसलिए मैंने कॉफी के लिये कोई आना कानी नही की।

मैंने अपने बरमूडा से अपनी पिस्टस्ल को निकाल कर दराज में डाला और कॉफी बनाने के वास्ते किचन की ओर चल दिया।

मै कोई दस मिनट के बाद काफी बनाकर जब बैडरूम में पहुंचा तो अनामिका वहां नही थी।

मैंने इधर उधर नजर दौड़ाई, लेकिन वो कहीं नजर नही आई। मैंने बाथरूम की तरफ देखा, उसका दरवाजा भी बाहर से ही लॉक था।

मैने दरवाजे पर नजर डाली, दरवाजा इस वक़्त हल्का सा खुला हुआ था। मुझे तत्काल इस बात का ध्यान हो आया कि दरवाजा मैंने अनामिका के घर मे घुसते ही बन्द कर दिया था।

अब दरवाजा खुला होने का मतलब था कि चिड़िया फुर्र हो चुकी थी।

मैंने दोनो कॉफी के कप टेबल पर रखे, और अपने बेड पर धम्म से बैठ गया।

मेरी समझ मे नही आ रहा था की मेरे फ्लैट में आने का उसका मकसद क्या था, और वो जिस तरह से एकाएक गायब हुई है, उसके पीछे उसका उद्देश्य क्या था।

अचानक ही मेरे दिमाग मे एक बिजली सी कौंधी और मै अपनी जगह से उछल कर खड़ा हो गया।

मैंने तत्काल कमरे में अपनी नजर घुमाई। घर की सभी चीजें अपने स्थान पर यथावत थी।

फिर मैंने दराजो को खंगालना शुरू किया। दराज में नजर पड़ते ही मेरे होश फाख्ता हो चुके थे।

आपके इस सेवक की पिस्टल दराज से गायब थी।


जारी रहेगा________✍️
Nice start
 

Darkk Soul

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Hum aapke jitna badhiya to likh nahi sakte, lekin bhai. लेकिन प्रयास अवश्य करेंगे कि आपको पसंद आ सके।
आपका बहुत-बहुत धन्यवाद 🙏🏼

वैसे मेरी एक और कहानी चल रही है, जिसका नाम है "सुप्रीम एक रहस्यमय सफर" जो कि एक फैंटेसी प्रिफिक्स पर आधारित है। उसका लिंक मेरे सिग्नेचर मे है। मै चाहूॅगा कि आप एक बार उस पर भी अपनी निगाह डालें। 🙏🏼

मैं कहाँ कुछ लिखता हूँ भाईसाहब... बहुत पहले एक कहानी लिखा था; उसके बाद से खाली बैठा हूँ.

मैंने सुप्रीमो कहानी का पहला दो अपडेट पढ़ा. अभी तक के टोटल अपडेट्स देख कर G*** फट गया. इतना लंबा कैसे लिख लिए भाई...??!

मेरा अटेंशन एबिलिटी सिर्फ 20 अपडेट तक है. अगर कहानी मेरे हिसाब से बहुत ही अच्छी है तब अधिकतम 25 अपडेट तक पढ़ लेता हूँ; उससे ज़्यादा नहीं.

इसलिए पहले ही सॉरी कह रहा हूँ भाई साहब... सुप्रीमो कहानी के लिए.

खैर, इस कहानी के लिए एकबार फिर से ढेर सारी शुभकामनाएँ --- अभी तक कहानी अच्छी लगी.

जल्दी से अगला अपडेट ले आओ. 🙂
 
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Raj_sharma

यतो धर्मस्ततो जयः ||❣️
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मैं कहाँ कुछ लिखता हूँ भाईसाहब... बहुत पहले एक कहानी लिखा था; उसके बाद से खाली बैठा हूँ.

मैंने सुप्रीमो कहानी का पहला दो अपडेट पढ़ा. अभी तक के टोटल अपडेट्स देख कर G*** फट गया. इतना लंबा कैसे लिख लिए भाई...??!

मेरा अटेंशन एबिलिटी सिर्फ 20 अपडेट तक है. अगर कहानी मेरे हिसाब से बहुत ही अच्छी है तब अधिकतम 25 अपडेट तक पढ़ लेता हूँ; उससे ज़्यादा नहीं.

इसलिए पहले ही सॉरी कह रहा हूँ भाई साहब... सुप्रीमो कहानी के लिए.

खैर, इस कहानी के लिए एकबार फिर से ढेर सारी शुभकामनाएँ --- अभी तक कहानी अच्छी लगी.


जल्दी से अगला अपडेट ले आओ. 🙂
प्रिय मित्र, सुप्रीम एक अलग लेवल की कहानी है। वो यहाॅ पर मिलने वाली आम कहानियो जैसी नहीं है। अब चोदम पट्टी तो मुझ से लिखी नही जाती, तो सोचा कुछ हट के ही लिखा जाए । इस लिए लिख रहा हूॅ। बाकी एक पब्लिश करने वाले को दिखाई तो उसे बोहोत पसंद आई।
उसमें कुछ चेंज कर रखा है, पर बेस यही रहेगा।
आप एक बार, 10-15 अपडेट पढ़कर देखो, सुरू में थोडा समझने में समय लगता है उसे लेकिन बाद में आप खुद उसे छोड़कर नही जाओगे 😎
इस कहानी का अगला अपडेट कल, अभी साइड धीमा है।😑
 

Darkk Soul

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बाकी एक पब्लिश करने वाले को दिखाई तो उसे बोहोत पसंद आई।

अरे वाह! बहुत बधाईयाँ.. Congratulations !! :applause::applause:

बहुत बढ़िया.
 
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Raj_sharma

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Fate to fate par tharkayi na ghate :doh:
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Lagta hai romesh ke bheje me bheja hi nahi hai, buddhi ghaas charne chali gai hai iski....kya jasus banega re tu, hat lauda :buttkick:
Ab wo jhatu niklega to kya bolega man :dazed:
Tu kyo jal rela hai be :slap:

Pahle tharak ko bheje se nikaal bhai, fir achhe se soch ki pistol waakai me kaha rakhi thi tumne :lol:
:lol: Hai to tharki sala
Pahle devpriya ko murid banane ki koshish aur ab romesh ko....:doh:
Abe wo already laar tapka rela hai :D

Very funny:lotpot:
😁
Sach kahu to agar writer apna dimag na lagaye to romesh apne dam par ghanta kuch nahi kar sakta....matlab kya hi bole apan, Pahli baar aisa detective dekh rela hai apan jiski jasusi me koi dam hi nahi dikh rela hai, isse achha to devpriya hai jiska dimag faaltu ka hi sahi par chalta to hai :roll:
Apun ko hi kuch karna padega man :smarty:
Anyway, meghna aur devika jitna khud ko innocent dikha reli hain utna hain nahi, ye dono kisi na kisi firaak me zarur hain. Kumar Gaurav ko bali ka bakra banaye ja rahi dono...but kya sach me aisa hai...dekhne wali baat hogi, :?:
Wo dono dedh syani hain be :shhhh: Aage pata chal jayega. Sagh bane rahne ka bhidu.
Overall fantastic update...badhiya writing...keep it up bro :thumbup:
Thank you so much for your wonderful review and superb support bhai :hug:
 

Raj_sharma

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Raj_sharma

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dono update lajawab ..................... the sarkar .............. :happy:

Agli KADI ka intazar rahega ........... sarkar Mahoday ...
Thank you so much for your valuable review and support :thanks:
Agla Update kal dopahar tak 👍
 

Raj_sharma

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#10

"तुम मेरी बात सुन रही हो न" मैने जब काफी देर तक सौम्या की कोई आवाज नही आई तो पूछा।

"मैं सुन रही हूँ! तुम मुझे पूरी बात बताओ" सौम्या ने बोला तो मैं उसे कल शाम को उसके आफिस से निकलने के बाद से कल रात तक का पूरा वाक्या बताता चला गया।

"दो दिन से मेरे मोबाइल पर अनजान नंबर से काल तो आ रही थी, लेकिन मैंने रिसीव नही किये थे, आफिस के फोन पर जब फोन आया होगा तो शायद मैं उस समय आफिस में नही होउंगी" सौम्या ने मेरी पूरी बात सुनने के बाद बोला।

"वैसे मेरी सलाह है कि मेघना या देविका तुम से मिलने की कोशिश करे तो उनसे मिलना मत, और तुम्हारी सिक्युरिटी की क्या व्यवस्था है" मैने आखिर में सौम्या से पूछा।

"चार बाउंसर रहते है मेरे साथ, जिनमे से दो के पास पिस्टल भी होती है" सौम्या ने मुझे बताया।

"उन लोगो को अलर्ट पर रखना ,इस वक़्त तुम्हारी सुरक्षा में कोई चूक नही होनी चाहिए"मैने सौम्या को चेताया।

"आज एक बार तुम भी मेरे पास आ जाओ, मुझे देविका के बारे में और भी कुछ बात करनी है" सौम्या ने मुझे बोला तो मैंने शाम के समय आने की हामी भरके फोन को काट दिया।

मैने फोन काटते ही फोन को एक तरफ उछाला और सुबह के नित्यकर्म से निर्वित होने के लिए
बाथरूम की ओर बढ़ा ही था कि फोन एक बार फिर से बज उठा था।
फोन थाने से देवप्रिय का था।

"ग्यारह बजे तक थाने आ जाओ, वो दोनो लडकिया भी तब तक थाने पहुंच जाएगी" देवप्रिय ने आदेशात्मक स्वर में बोला।

"जो आज्ञा जनाब, बन्दा समय पर हाजिर हो जायेगा" मैंने देवप्रिय को बोला।

"रागिनी मैडम को साथ लेकर आना, वो भी कल रात की घटना की चश्मदीद है" देवप्रिय ने फिर से बोला।

"जी वो भी आ रही है, उसे मैने सुबह ही फोन कर दिया था।

"ठीक है" ये बोलकर उसने फोन काल की इति श्री कर दी।

इस बार मैंने कुछ पल फोन को घूरा,..मुझे अंदेशा था की कहीं बाथरूम की तरफ जाते हुए इसका पुलिस सायरन फिर से न बज उठे।

लेकिन जब फोन खामोशी से मेरा मुंह चिढ़ाता रहा तो मैंने फोन को अपने बिस्तर में उछाला बाथरूम में घुस गया।

घँटे भर के भीतर ही बन्दा चकाचक हो कर खुद को शीशे में निहार रहा था। तभी दरवाजे की बेल बजी, मैने घड़ी की ओर देखा।

ये वक़्त रागिनी के आने का था। मैने जाकर दरवाजा खोला तो रागिनी अपनी क़ातिल मुस्कान बिखेरती हुई मेरी ओर ही देख रही थी।

"आ गई हुजूरे आला" मैंने रागिनी के सम्मान में अपने सिर को हल्का सा नवाते हुए बोला।

"आप बुलाये और हम न आये,ऐसी गुस्ताखी करके कम से कम मै अपनी सैलरी तो खतरे में नही डाल सकती हूँ" रागिनी की आते ही बकलोली शुरू हो चुकी थी।

"अच्छा किस महीने तेरी सैलरी नही मिली" मैने दिखावटी गुस्से में बोला।

"वो तो मैं कही से कोई भी पेमेंट आती है, तो अपनी सैलरी पहले ही काट कर बाकी पेमेंट तुम्हे देती हूँ, नही तो हर महीने ही मेरी सैलरी नही आती" रागिनी ने मुझे चिढ़ाने वाले अंदाज में बोला।

"ये तुम बोल रही हो" मैने आहत निग़ाहों से उसकी और देखा।

मेरे इस तरह बोलने से रागिनी ने शरारती नजरो से मेरी ओर देखा।

"मैं तो तुम्हे अपनी कंपनी के साथ साथ अपने घर की भी मालकिन बनाने की सोच रहा था" मैने उसकी शरारती मुस्कान को देखकर बोला।

"क्यो दुनिया से सन्यास लेकर क्या हिमालय पर जाना है तपस्या करने, जो सब कुछ मेरे नाम करके जाना चाहते हो" रागिनी ने ना समझ बनते हुए बोला।

"घर की मालकिन कोई तभी बनता है क्या, जब कोई अपना घर किसी के नाम करके सन्यासी बन जाता है" मैने हल्के से खीज भरे स्वर में बोला। मै जानता था कि वो इस वक़्त मेरे मजे ले रही है, लेकिन मैं भी कुछ सोचकर उसे मजे लेने देने रहा था।

"हाँ! मैने तो यही सुना है कि घर के मालिक तो ऐसे ही बनते है" रागिनी ने मुस्करा कर बोला।

"एक तरीका और है घर की मालकिन बनने का" इस बार मैं भी जवाब में मुस्कराया।

"अच्छा बताओ फिर, और कौन सा तरीका है" रागिनी ने मुझे तकते हुए पूछा।

"लड़की शादी करके भी किसी के घर की मालकिन बन सकती है" मैने मुस्कराते हुए बोला।

"हाये दैया! तो तुम इस रास्ते से चलती गाड़ी में चढ़ने की कोशिश कर रहे हो" रागिनी ने अचानक से अपने तेवर बदलते हुए बोला।

"क्या मतलब" मैं उसकी प्रतिक्रिया से बौखला सा गया था।

"मतलब ये की माना कि सुबह उठकर आज तुम नहा लिए हो, लेकिन अभी भी चेहरे पर वो चमक नही आई कि रागिनी दौड़कर तुम्हारे गले मे वरमाला डाल दे, चाहो तो एक बार फिर से शीशे में अपने चेहरे की चमक को चेक कर लो"

रागिनी की बात सुनकर मैं न रोने में था न हँसने में, एक तरीके से वो घुमा फिरा कर बोल रही थी, की जाकर अपनी शक्ल आईने में देखकर आओ, ये मुंह और मसूर की दाल, खैर इस हालात पर कहावतें तो ढेर सारी याद आ रही थी, लेकिन हर कहावत को याद करके खुद पर ही जूते पड़ते हुए महसूस होते।

"बेटा कुंवारी ही रहेगी पूरी उम्र, जिसने रोमेश की कद्र नही की उसकी कद्र कभी इस जमाने ने भी की" मैने झल्ला कर बोला तो रागिनी खिलखिला कर हँस पड़ी।

"मेरे बैग में से नाश्ता निकालो! मैं भी करके नही आई हूँ! इतने मैं कॉफ़ी बना कर ला हूँ" ये बोलकर वो बकलोल बिना मेरी तरफ देखे ही किचन में घुस गई।

मै नाश्ते की बात सुनकर मुस्करा दिया था। जो बात मैं सुबह उसे फोन पर नही कह सका था, वो इच्छा उसने बिना बोले ही पूरी कर दी थी।

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मैं इस वक़्त कुमार गौरव के फ्लैट की घँटी बजा रहा था। दरवाजा कोई पांच मिनट के बाद एक लगभग पचपन साल की महिला ने खोला।

जो कि अपनी सूरत से ही बता रही थी कि वे कुमार की माता जी है! असली कुमार गौरव की जबरा फैन। उन्होंने दरवाजा खोलते ही हमारी और सवालिया निगाहों से देखा।

"कुमार साहब से मिलना था" उनके कुछ पूछने से पहले ही मैं बोल पड़ा था।

"वो तो बेटा कल से घर पर नही लौटा है, अपनी बवाना वाली फैक्ट्री में गया था,अक्सर जब काम ज्यादा होता है तो रात को वही रुक जाता है" कुमार की माता जी ने एक ही बार मे पूरी कैफियत दे डाली थी।

"कल से आपकी उनकी फोन पर कोई बात हुई है" मैने साधारण भाव से पूछा।

"बेटा बात तो नही हुई उससे, एक बार रात को मैंने फोन भी किया था, लेकिन उस वक़्त फोन स्विच ऑफ आ रहा था" माताजी ने उसी साधारण भाव मे जवाब दिया।

"ठीक है माताजी! अगर कुमार साहब आये तो उन्हें बोलना की वो एक बार रोमेश को फोन कर ले" ये बोलकर मैं उन्हें नमस्कार करके उनके दरवाजे से रुखसत होकर अपनी गाड़ी में जाकर बैठ गया।

जैसे ही रागिनी गाड़ी में सवार हुई, मैने कुमार का नंबर अपने मोबाइल से मिला दिया। फोन इस वक़्त आउट ऑफ कवरेज एरिया बता रहा था। मैने एक बार रागिनी की ओर देखा। रागिनी के चेहरे पर भी इस वक़्त कई सवालों की रेखाएं देखी जा सकती थी।

"कुमार के साथ कुछ गलत न हुआ हो" रागिनी के मुंह से बरबस ही निकला।

"शायद वही हो रहा है जो हम लोग सोच रहे थे" मैंने हल्की सी चिंता भरे स्वर में बोला।

"शायद उससे भी कुछ ज्यादा बड़ा होने वाला है" रागिनी मेरी तरफ देखकर बोली।

"चलो थाने चलते है, देवप्रिय से भी मिलना है" मैने रागिनी की ओर देखते हुए बोला।

"नही! मेघना और देविका ने देवप्रिय के साथ मिलकर ये जाल बुना है, थाने जाने से पहले हमें शर्मा जी को एक बार पूरी बात बता देनी चाहिए, और शर्मा जी से बात करने के बाद हमे सबसे पहले कुमार को ढूंढना होगा" रागिनी ने अपने दिमाग के सारे घोड़े खोल दिये थे।

"दिमाग तो आला दर्जे का लगाया है इन दोनों कुड़ियो ने, लेकिन वो भूल गए कि उनका पाला रोमेश से पड़ा है"

मेरी बात सुनकर रागिनी ने अपना गला खंखारा। मानो कह रही हो कि सिर्फ तुम ही तुम नही हो, हम भी साथ मे है, पाला हमसे भी पड़ा है।
मै उसकी इस अदा को देखकर हल्का सा मुस्करा दिया।

मैने उसी समय एसी पी निरंजन शर्मा का नम्बर अपने फोन से डायल कर दिया।

तभी काल वेटिंग में देवप्रिय का नंबर भी चमकने लगा था। लेकिन तभी शर्मा जी ने मेरा फोन रिसीव कर लिया था।

"कहो रोमेश कैसे याद किया" शर्मा जी ने आत्मीयता भरें स्वर में पूछा।

"आपकी रहमुनाई की जरूरत पड़ गयी है जनाब, आपसे मिलना है, बहुत जरुरी" मैने शर्मा जी को बोला।

"मिलना है तो आ जाओ, अब तुम्हारे इलाके में ही आ गया हूँ, यही पुलिस लाइन में आ जाओ, मैं शाम तक यही हूँ" शर्मा जी ने मुझे बोला।

"जी जनाब मैं कुछ देर में हाजिर होता हूँ" ये बोलकर मैने फोन काटा ही था कि देवप्रिय का फ़ोन नंबर फिर से चमक उठा। इस बार मैंने फोन उठाने में कोई कोताही नही की।

"तुम्हे ग्यारह बजे आने को बोला था, तुम अभी तक आये नही, और फोन भी नही उठा रहे हो" उसने गुस्से भरे स्वर में बोला।

"जिस वक्त आपका फोन कॉल वेटिंग में बज रहा था, इस समय आपके हाकिम एसी पी निरंजन शर्मा का फोन आया हुआ था, उन्हें मुझ से कोई जरूरी काम है, इसलिए अभी मुझें शर्मा जी के पास पुलिस लाइंस जाना पड़ रहा है, वहां से फ्री होते ही आपके दरबार मे हाजिर होता हूँ" मैंने जान बूझकर शर्मा जी का नाम उसके सामने लिया था।

"ठीक है यार! जैसे ही वहाँ से फ्री होते हो, सीधा मेरे पास ही आना" देवप्रिय के तेवर एक दम से किसी झाग की मानिंद बैठ चुके थे।

"बिल्कुल हाजिर होता हूँ जनाब! तब तक आप उन दोनों दस्यु सुंदरियों के साथ चाय कॉफी का शगन मेला करो" ये बोलकर मैने फोन काट दिया।

मैंने देखा कि रागिनी मेरी तरफ ही देखकर मन्द मन्द मुस्करा रही थी।

देवप्रिय की छुट्टी:

पुलिस लाइन पहुंचने में हमे कोई आधा घन्टा लगा था। वजह थी सुबह मिलने वाला ट्रैफिक जाम, जो अब दिल्ली की सड़कों पर हमेशा ही मिलने लगा था।

एसी पी निरंजन शर्मा जी ने मेरे पहुंचते ही अपने कक्ष में मुझें बुलवा लिया था।

मुझे ये कहने में कोई संकोच नही है कि मैंने तो शर्मा जी की सिर्फ एक बंसल मर्डर केस में मदद की थी, जिसकी वजह से शर्मा जी तरक्की पाकर अपने इंस्पेक्टर के ओहदे से एसी पी की कुर्सी तक पहुंच गए थे, लेकिन उसके बाद शर्मा जी ने मेरी अनेक मौकों पर मदद की।

जब जब भी मुझे उनकी जरूरत पड़ी, उन्होंने मेरी मदद करने में कभी आना कानी नही की। वो अपने महकमे के काम मे कितने ही मसरूफ क्यो न हो, वो इस नाचीज़ के लिए हमेशा वक्त निकाल लेते थे।

इस वक़्त मैं शर्मा जी को अपनी पूरी आपबीती सुना चुका था, और शर्मा जी पूरी गंभीरता से मेरी बात को सुनकर मेरी ओर ही देख रहे थे।

"तुम्हारी कहानी तो मुझे समझ मे आ रही है, लेकिन सबसे बड़ा पेंच इसमे यही फँसा है कि पिस्टल की गुमशुदगी की रिपोर्ट पुलिस में करवाने के बाद पिस्टल का तुम्हारे ही घर से बरामद होना! अब अगर इस पिस्टल से कोई वारदात हो चुकी है तो, पहली फुर्सत में पुलिस तुम्हे ही गिरफ्तार करेगी" शर्मा जी ने साफ शब्दों में बोला।

"लेकिन मालिक मैं तो बेकसूर हूँ, आपके रहते हुए आपके ही इलाके में एक बेकसूर इंसान को फांसी चढ़ाने का इंतजाम कैसे किया जाता है" मैने विनय भरे स्वर में शर्मा जी की ओर देखते हुए बोला।

"वर्तमान हालात में मैं अपने किसी मातहत को तुम्हारे खिलाफ कोई कार्यवाही करने से तो नही रोक सकता, लेकिन इतना जरूर कर सकता हूँ, की इस कार्यवाही में मैं समय लगवा दू, लेकिन उस समय का सदुपयोग तुम्हे खुद की बेगुनाही साबित करने में करना होगा" शर्मा जी ने पहेली सी बुझाई।

"क्या मतलब" मै और खुलकर समझना चाहता था।

"मतलब ये की इस केस में तुम्हे अपनी मदद खुद ही करनी होगी, फिर रागिनी तो है ही तुम्हारे साथ, मुझें पूरी उम्मीद है कि तुम इस मुसीबत से भी बाहर आ जाओगे" शर्मा जी ने इस बार रागिनी पर नजर डालते हुए बोला।

"लेकिन देवप्रिय तो पहली फुर्सत में मुझे उठा कर जेल में ठूंस देगा, फिर मैं अपनी मदद कैसे कर पाऊंगा" मैंने शर्मा जो को बोला।

"तुम थाने जाओ, तुम्हारे वहां पहुंचने तक तुम्हारे केस में वहां का पूरा निजाम बदल चुका होगा, कोई भी तुम्हे नाहक परेशान नही करेगा, तुम्हारी तत्काल गिरफ्तारी को जब तक मेरे बस में होगा, मैं रोकने की कोशिश करूंगा, इस वक्त इससे ज्यादा मैं तुम्हारी कोई मदद नहीं कर पाऊंगा" शर्मा जी ने अपनी मजबूरी बताई।

लेकिन वो ये बोलकर सिर्फ यही जता रहे थे कि वे मेरी ज्यादा मदद करने में असमर्थ है, लेकिन मैं जानता था कि उनकी ये मदद मेरे लिये कितनी बड़ी मददगार होने वाली थी।

मैं जेल से बाहर रहकर तो रागिनी के साथ मिलकर अपने खिलाफ बड़ी से बड़ी साजिस को बेनकाब कर सकता था, लेकिन जेल में जाने के बाद मैं कुछ भी करनें में असमर्थ था।

मुझे गिरफ्तारी से बचाए रखना ही इस वक़्त मेरे लिए वरदान साबित होने वाली थी। मैने शर्मा जी का तहेदिल से शुक्रिया अदा किया और वहां से विदा ली।

अब मैं पहले थाने जाकर देवप्रिय का ही सामना करना चाहता था।


जारी रहेगा_____✍️
 
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